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टैक्सी ड्राइवर…

भाग - 01

रिंकू ने अपनी टैक्सी उस आदमी के पास रोकी. आदमी लगभग चालीस वर्ष का रहा होगा, अस्त-व्यस्त कपड़े, आँखों में डर और बेचैनी का अजीब मिश्रण. उसने रिंकू की टैक्सी देखी और तेज़ी से उसकी ओर बढ़ा.

“तुम रिंकू हो?” उसने हाँफते हुए पूछा.

“जी, आप ही ने फ़ोन किया था?”

“हाँ, हाँ, जल्दी करो, मुझे यहाँ से निकलना है.” वह पिछली सीट पर धड़ाम से बैठ गया और चारों ओर देखने लगा जैसे कोई उसका पीछा कर रहा हो.

रिंकू ने मीटर चालू किया और पूछा, “कहाँ जाना है?”

“कहीं भी… बस यहाँ से दूर चलो.” आदमी की आवाज़ में घबराहट साफ़ थी.

रिंकू ने एक पल के लिए उसे देखा, कुछ गड़बड़ ज़रूर थी. यह महज़ एक साधारण सवारी नहीं लग रही थी. लेकिन उसने ज़्यादा सवाल नहीं किए. ऐसे हालात में सवाल पूछना अक्सर उल्टा पड़ जाता है.

“ठीक है,” रिंकू ने कहा और गाड़ी आगे बढ़ाई. “लेकिन आपको बताना तो पड़ेगा कि जाना कहाँ है.”

कुछ देर चुप्पी रही… फिर आदमी ने धीरे से कहा, “मुझे… मुझे शहर के बाहर छोड़ दो. कहीं दूर, जहाँ कोई मुझे ढूंढ न सके.”

रिंकू ने आईने में उसे देखा. उसकी आँखों में निराशा थी. वह किसी बड़ी मुसीबत में फंसा हुआ लग रहा था.

“क्या हुआ है? क्या कोई परेशानी है?” रिंकू ने पूछा, उसकी आवाज़ में हमदर्दी थी.

आदमी ने एक गहरी सांस ली. “बहुत बड़ी परेशानी है… मेरी जान खतरे में है.”

रिंकू समझ गया कि यह मामला गंभीर है. उसने गाड़ी की स्पीड थोड़ी बढ़ाई और शहर की भीड़भाड़ वाली सड़कों से निकलकर बाहरी इलाके की ओर बढ़ने लगा. सुबह का हल्का उजाला अब पूरी तरह फैल चुका था, और सड़कों पर चहल-पहल शुरू हो गई थी. लेकिन टैक्सी के अंदर एक अजीब सा तनाव पसरा हुआ था.

“क्या तुम पुलिस के पास नहीं जा सकते?” रिंकू ने सुझाव दिया.

आदमी हंसा, लेकिन उस हंसी में कड़वाहट और निराशा थी. “पुलिस? पुलिस तो… छोड़ो भी.”

रिंकू को उसकी बात समझ में नहीं आई. पुलिस से क्यों भागा जा रहा है? क्या वह खुद किसी अपराध में शामिल है? या फिर… वह किसी और के डर से भाग रहा है?

शहर की सीमा पार करते ही आदमी थोड़ा शांत हुआ. उसने सीट पर थोड़ा सीधा होकर बैठा और एक लंबी सांस ली.

“धन्यवाद,” उसने कहा. “तुमने मेरी बहुत मदद की.”

“अभी तो मैंने कुछ नहीं किया है. आपको कहाँ जाना है, यह तो बताइए.”

आदमी ने कुछ देर सोचा. “मुझे… मुझे हरिपुर के पास छोड़ दो. वहाँ मेरा एक दोस्त रहता है, शायद वह मेरी मदद कर सके.”

हरिपुर यहाँ से लगभग सौ किलोमीटर दूर था. एक लंबी ड्राइव.. रिंकू ने मन ही मन सोचा. आज की सुबह तो वाकई असामान्य होने वाली थी.

रास्ते भर आदमी चुप रहा. कभी-कभी वह पीछे मुड़कर देखता, जैसे उसे किसी के पीछा करने का डर हो. रिंकू ने उससे ज़्यादा बात करने की कोशिश नहीं की. वह समझ रहा था कि इस वक़्त उसे शांति की ज़रूरत है.

जैसे-जैसे सूरज चढ़ता गया, सड़क पर ट्रैफिक बढ़ता गया. खेतों और गांवों के बीच से गुजरती हुई उनकी टैक्सी हरिपुर की ओर बढ़ती रही. रिंकू के मन में अब भी कई सवाल थे, लेकिन वह जानता था कि सही समय आने पर यह आदमी खुद ही सब कुछ बताएगा. उसे बस एक अनजान मुसीबत में फंसे हुए इस आदमी की मदद करनी थी.

लगभग तीन घंटे बाद, वे हरिपुर पहुँच गए. आदमी ने रिंकू को एक छोटे से गांव के बाहर टैक्सी रोकने के लिए कहा.

“यहाँ मेरा दोस्त रहता है,” उसने कहा. “तुम थोड़ा इंतज़ार करो, मैं उसे मिलकर आता हूँ.”

रिंकू ने गाड़ी रोकी और इंजन बंद कर दिया. आदमी तेज़ी से टैक्सी से उतरा और एक कच्चे रास्ते पर चला गया. रिंकू उसे तब तक देखता रहा जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गया.

अब रिंकू अकेला था, एक अनजान गांव के बाहर, एक रहस्यमय आदमी का इंतज़ार करते हुए. उसके मन में बेचैनी और बढ़ गई थी. वह किस मुसीबत में फंस गया था? और इस सबका अंजाम क्या होगा?

शेष भाग अगले अंक में…,

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