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खामोश गवाह…
सरपुर में अब भी दरारें हैं पर लोग धीरे-धीरे उन्हें पाट रहे हैं. एक-एक पत्थर, एक-एक बात, एक-एक मुस्कान के…
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खामोश गवाह…
तीन दिन बाद। झड़पें रुक गईं. पुलिस ने बैरिकेड्स लगा दिए. दोनों तरफ़ के लोग अपने-अपने इलाकों में लौट गए.…
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खामोश गवाह…
15 अगस्त की सुबह, सूरज निकला तो लाल था खूनी लाल. पुराने सरपुर में तिरंगा फहराया गया. नए सरपुर में…
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खामोश गवाह…
वह रात 14 अगस्त की थी। स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले. पूरे शहर में झंडे लगे थे—त्रिरंगा. पर उस…
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खामोश गवाह…
यह कहानी है रफ़ीक की. वह एक पत्रकार था, युवा, उत्साही। वह सरपुर की इन दरारों पर लिखना चाहता था.…
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खामोश गवाह…
इस कहानी में एक पात्र है नैना. वह एक स्कूल टीचर थी. उसे बच्चे पढ़ाना पसंद था. पर अब स्कूल…
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खामोश गवाह
सरपुर में एक नई बस्ती बसी—”नया सरपुर।” वहाँ सिर्फ एक विशेष समुदाय के लोग रहते थे. दूसरी तरफ़ “पुराना सरपुर”…
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खामोश गवाह…
डॉक्टर कैलाशनाथ सरपुर के सबसे पुराने निवासियों में से थे. उन्होंने हज़ारों बच्चों को जन्म दिया था—हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई—सबको.…
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खामोश गवाह…
फिरोज़ ख़ाँ कुम्हार था. उसके हाथों में जादू था, मिट्टी के टुकड़े को वह जान दे देता. बच्चे उसकी दुकान…
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खामोश गवाह…
नदी के किनारे बसा था वह शहर था जिसका नाम कभी सरस्वतीपुर था, अब लोग उसे सिर्फ ‘सरपुर’ कहते थे.…
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