Dharm

मोहनी एकादशी…

सत्संग सत्र की समाप्ति के बाद कुछ भक्तों ने महाराज जी से पूछा कि, महाराज जी सूना है कि बैसाख महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी का जो व्रत करता है उस व्रत के प्रभाव से मानव जीवन के माया व मोह समाप्त हो जाते हैं?

वालव्यास सुमनजी महाराज कहते है कि, बैसाख का पवन और पवित्र महीना चल रहा है. इस पवित्र महीने का वर्णन पुराणों में मिलता है. पुराणों के अनुसार, जिस प्रकार जिस प्रकार कार्तिक महीना बड़ा ही पवित्र, पावन और पुण्यदायी होता है उसी प्रकार बैसाख का भी महीना पवन और पुण्यदायनी होता है. इस महीने की शुरुआत देव वृक्ष वट की पूजा से शुरुआत हुई थी. कालक्रम के चलते-चलते आज का दिन गुरुवार  बैसाख शुक्ल पक्ष एकादशी है और इस एकादशी को मोहनी एकादशी कहते हैं. महाराज जी कहते है कि, इस एकादशी का विस्तृत वर्णन स्कंद पुराण के अवन्तिका खंड में की गई है.

वालव्यास सुमन जी महाराज कहते है कि स्कंद पुराण में पावन पवित्र नदी शिप्रा का वर्णन है. शिप्रा नदी भी पवित्र नदियों में से एक है और इसका उद्गम जानापाव की पहाड़ियों में माना गया है. जानापाव की पहाड़ियाँ मध्य प्रदेश के महू छावनी से लगभग 17 किलोमीटर दूर स्थित है. महाराज जी कहते है कि, इस स्थान पर भगवान नारायण के अवतार भगवान परशुराम का जन्म स्थान भी माना जाता है. इस पवित्र नदी के तट पर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंगों महाकालेश्वर भी यहीं है. शिप्रा नदी के तट पर ही कुम्भ (उज्जैन) का आयोजन भी किया जाता है. वालव्यास सुमन जी महाराज कहते है कि इस नदी में सिंहस्थ स्नान होने के कारण इसका महत्व और भी बढ़ जाता है.

वालव्यास सुमन जी महाराज कहते है कि, मान्यता यह है कि, बैसाख शुक्ल पक्ष एकादशी के ही भगवान विष्णु ने ही मोहनी रूप को धारण किया था. पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान कई प्रकार की सामाग्री निकली थी उनमें से एक अमृत भी था. इस अमृत को पाने के लिए देवताओं और असुरों में लड़ाई होने लगी. दोनों ही पक्ष अमृत के दावेदार हो गये. अंतत: भगवान केशव ने मोहनी रूप का धारण किया और असुरों को नापने मोह पाश में बांध लिया और देवताओं को अमृत का पान करवाकर देवता अमरत्व की प्राप्ति कर ली. महाराज जी कहते है कि, यह सारा घटनाक्रम बैसाख शुक्ल पक्ष एकादशी को हुई थी इस कारण बैसाख शुक्ल पक्ष एकादशी को मोहनी एकादशी भी कहा जाता है.

पूजन सामाग्री :-

वेदी, कलश, सप्तधान, पंच पल्लव, रोली, गोपी चन्दन, गंगा जल, दूध, दही, गाय के घी का दीपक, सुपाड़ी, शहद, पंचामृ्त, मोगरे की अगरबत्ती, ऋतू फल, फुल, आंवला, अनार, लौंग, नारियल, नीबूं, नवैध, केला और तुलसी पत्र व मंजरी.

व्रत विधि:-

सबसे पहले आपको एकादशी के दिन सुबह उठ कर स्नान करना चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए. उसके बाद भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र की स्थापना की जाती है. उसके बाद भगवान विष्णु की पूजा के लिए धूप, दीप, नारियल और पुष्प का प्रयोग करना चाहिए. अंत में भगवान विष्णु के स्वरूप का स्मरण करते हुए ध्यान लगायें, उसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करके, कथा पढ़ते हुए  विधिपूर्वक पूजन करें. ध्यान दें…. एकादशी की रात्री को जागरण अवश्य ही करना चाहिए, दुसरे दिन द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मणों को अन्न दान व दक्षिणा देकर इस व्रत को संपन्न करना चाहिए.

कथा:-

सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम का एक सुंदर नगर था और उस नगर का राजा धृतिमान था जो चन्द्र वंश में पैदा हुए थे जो सत्यप्रतिज्ञ थे. उसी राज्य में एक वैश्य रहता था जिसका नाम धनपाल था और उसके पांच पुत्र थे. धनपाल धनधान्य से परिपूर्ण और समृद्धिशाली भी था. वह हमेशा सत्कर्म में ही लगा रहता था और भगवान् केशव का अनयन भक्त भी था. धनपाल हमेशा दूसरों के लिए पौसला (प्याऊ), कुआँ, मठ, बगीचा, पोखरा और घर बनवाया करता था. धनपाल के पांच पुत्रों के नाम इस प्रकार है   सुमना, द्युतिमान, मेधावी, सुकृत तथा धृष्ट बुद्धि. सबसे छोटा बेटा धृष्ट बुद्धि अपने नाम के अनुकूल ही वो सारे कर्म भी करता था. वह हमेशा ही बड़े-बड़े पापों में संलग्न रहता साथ ही  दुर्व्यसनों में उसकी बड़ी आसक्ति थी. धृष्ट बुद्धि हमेशा ही वेश्याओं से मिलने के लिये लालायित रहता और अन्याय के मार्ग पर चलकर पिता का धन बरबाद किया करता था.

एक दिन उसके पिता ने तंग आकर उसे घर से निकाल दिया और वह दर दर भटकने लगा. भूख-प्यास से व्याकुल वह भटकते- भटकते महर्षि कौँन्डिन्य के आश्रम जा पहुँचा और हाथ जोड़ कर बोला : ‘ब्रह्मन ! द्विजश्रेष्ट ! मुझ पर दया करके कोई ऐसा व्रत बताइये, जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो. कौँन्डिन्य ऋषि ने कहा कि वैशाख के शुक्ल पक्ष में ‘मोहिनी’ नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो. मोहनी व्रत को करने से प्राणियों के अनेक जन्मों के किए हुए मेरु पर्वत जैसे महापाप भी नष्ट (समाप्त) हो जाते हैं. मुनि का यह वचन सुनकर धृष्ट बुद्धि का मन प्रसन्न हो गया और मुनि के बताये उपायों के अनुसार मोहनी एकादशी का व्रत किया और व्रत के प्रभाव से धृष्ट बुद्धि निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर गरुड़ पर आरूढ़ हो सब प्रकार के उपद्रवों से रहित श्रीविष्णुधाम को चला गया. इसके पढने और सुनने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है.

एकादशी का फल:-

एकादशी प्राणियों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक होती है. यह दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक माना गया है. इस दिन व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध मन से भगवान की भक्तिमयी सेवा करता है तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपापात्र बनता है.

वाल्वयास सुमन जी महाराज,

महात्मा भवन, श्रीरामजानकी टेम्पल,

राम कोट, अयोध्या.

मो:8709142129.

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Mohini Ekadashi…

After the end of the satsang session, some devotees asked Maharaj ji that, Maharaj ji has heard that one who fasts on the Ekadashi of Shukla Paksha in the month of Baisakh, with the effect of that fast, the illusions and temptations of human life end.?

Valvyassumanji Maharaj says that the windy and holy month of Baisakh is going on. The description of this holy month is found in the Puranas. According to Puranas, just as the month of Kartik is very pious, pious, and virtuous, in the same way, the month of Baisakh is windy and virtuous. This month started with the worship of Devvriksha Vat. Due to the chronology, today’s day is Baishakh Shukla Paksha Ekadashi and this Ekadashi is called Mohini Ekadashi. Maharaj ji says that this Ekadashi has been described in detail in the Avantika section of Skanda Purana.

Valvyassumanji Maharaj says that there is a description of the holy river Shipra in Skanda Purana. Shipra River is also one of the holy rivers and its origin is believed to be in the Janapav hills. The hills of Janapav are situated about 17 kilometers away from Mhow Cantonment of Madhya Pradesh. Maharaj ji says that this place is also considered to be the birthplace of Lord Parshuram, an incarnation of Lord Narayan. Mahakaleshwar, one of the twelve Jyotirlingas on the banks of this holy river, is also here. Kumbh (Ujjain) is also organized on the banks of the Shipra River. Walvyas suman ji Maharaj says that due to taking Simhastha bath in this river, its importance increases even more.

Valvyassumanji Maharaj says that the belief is that Lord Vishnu assumed the form of Mohini only on the Ekadashi of Shukla Paksha of Baisakh. According to the Puranas, during the churning of the ocean, many types of ingredients came out, one of them was nectar. There was a fight between the deities and the Asuras to get this nectar. Both parties became claimants of nectar. Ultimately, Lord Keshav assumed the form of Mohini and tied the Asuras in their trap, and by making the deities drink nectar, the deity attained immortality. Maharaj ji says that all these incidents took place on Baishakh Shukla Paksha Ekadashi, which is why Baishakh Shukla Paksha Ekadashi is also called Mohini Ekadashi.

Worship material: –

Vedi, Kalash, Saptadhan, Panch Pallav, Roli, Gopi Chandan, Ganges water, milk, curd, lamp of cow’s ghee, betel nut, honey, panchamrit, incense sticks of mogre, seasonal fruits, flowers, amla, pomegranate, cloves, coconut, Lemon, illegal, banana and basil leaves and Manjari.

Fasting method: –

First of all, on the day of Ekadashi, you should wake up early in the morning and take a bath and take a vow of fasting. After that, the idol or picture of Lord Vishnu is established. After that incense, lamps, coconut, and flowers should be used to worship Lord Vishnu. In the end, meditate remembering the form of Lord Vishnu, and after that recite Vishnu Sahastranam and worship it methodically while reciting the story. Pay attention… Jagran must be done on the night of Ekadashi, on the second day of Dwadashi, this fast should be completed by donating food and Dakshina to Brahmins.

Story:-

There was a beautiful city named Bhadravati on the banks of river Saraswati and the king of that city was Dhritiman who was born in Chandravansh and was truthful. In the same state, there lived a Vaishya whose name was Dhanapal and he had five sons. Dhanpal was full of wealth and also prosperous. He was always engaged in doing good deeds and was also an ardent devotee of Lord Keshav. Dhanpal always used to build pausla (pau), well, monasteries, gardens, ponds, and houses for others. The names of the five sons of Dhanpal are as follows: Sumana, Dyutiman, Medhavi, Sukrit, and Dhrishtabuddhi. The youngest son Dhrishtabuddhi used to do all those deeds according to his name. He was always involved in big sins, as well as he had a great attachment to gambling, etc. Dhrishtabuddhi was always eager to meet prostitutes and used to waste his father’s wealth by following the path of injustice.

One day his father got fed up and threw him out of the house and he started wandering door to door. Distraught with hunger and thirst, he wandered and reached the ashram of Maharishi Kaundinya and said with folded hands: ‘Brahmin! Dwijshrestha! Have mercy on me and tell me such a fast, due to the effect of which I can be freed. Kaundinya Rishi said that in the Shukla Paksha of Vaishakh, fast on Ekadashi, famous as ‘Mohini’. By observing Mohani Vrat, even the great sins like Mount Meru, committed by living beings in many births are destroyed (eliminated). Hearing this word of Muni, Dhrishtabuddhi’s mind became happy and according to the measures given by Muni, he observed Mohini Ekadashi fast, and due to the effect of fasting, Dhrishtabuddhi became sinless and wearing a divine body, mounted on Garuda, went to Sri Vishnudham, free from all kinds of troubles. Went. Reading and listening to it gives the fruit of a thousand cows.

Result’s of Ekadashi: –

Ekadashi helps in achieving the ultimate goal of living beings, devotion to God. This day is considered very auspicious and fruitful to serve the Lord with full devotion. On this day, if a person frees himself from desires and does devotional service to God with a pure heart, then he definitely becomes blessed by God.

Walvyas suman ji Maharaj,

Mahatma Bhavan,

Shri Ramjanaki Temple,

Ram Kot, Ayodhya.

Mob: – 8709142129.

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