रिंकू ने अलसाई आँखों से छत की ओर देखा। सुबह के पाँच बज रहे थे, और पटना शहर धीरे-धीरे अपनी नींद से जाग रहा था. नीचे चाय की केतली की हल्की सीटी सुनाई दी. उसकी माँ, शांति देवी, हमेशा समय की पाबंद थीं. रिंकू जानता था कि थोड़ी देर में उनकी कर्कश लेकिन प्यार भरी आवाज़ उसे बिस्तर छोड़ने के लिए कहेगी.
वह एक निजी टैक्सी ड्राइवर था. शहर की सड़कों की धूल और धूप उसकी साथी थीं. हर दिन नई सवारियाँ, नई कहानियाँ, और कभी-कभी नई परेशानियाँ लेकर आता था. रिंकू को अपनी नौकरी पसंद थी. लोगों से मिलना, शहर के कोने-कोने में घूमना, उसे एक अलग तरह की आज़ादी महसूस कराता था.
आज कुछ अलग होने वाला था, यह उसे सुबह की ठंडी हवा में भी महसूस हो रहा था. शायद यह कल रात देखा गया अजीब सपना था, या शायद यह सिर्फ़ पेट में उठ रही मामूली सी बेचैनी थी.
नीचे से माँ की आवाज़ आई, “रिंकू! अरे ओ रिंकू! चाय ठंडी हो रही है.”
रिंकू ने एक गहरी सांस ली और बिस्तर छोड़ दिया.
चाय की चुस्की लेते हुए, रिंकू ने कल की सवारियों के बारे में सोचा. एक कॉलेज जाने वाली लड़की, एक व्यापारी जो अपनी नई डील को लेकर उत्साहित था, और शाम को एक बूढ़ा जोड़ा जो नदी के घाट पर घूमने गया था. सब कुछ सामान्य था. फिर आज क्या अलग होगा?
तभी उसका पुराना मोबाइल फ़ोन बज उठा. स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमक रहा था.
“हेलो?” रिंकू ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा.
“क्या यह रिंकू ड्राइवर है?” एक भारी आवाज़ दूसरी तरफ से आई. आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट और जल्दबाजी थी.
“जी, मैं ही हूँ. क्या बात है?” “मुझे तुरंत रेलवे जंक्शन आना है. एक ज़रूरी काम है. क्या तुम अभी आ सकते हो?”
रिंकू ने घड़ी देखी. सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे. जंक्शन यहाँ से लगभग आधा घंटा दूर था. “हाँ, आ सकता हूँ. कहाँ मिलना है?” “प्लेटफॉर्म नंबर तीन के बाहर. जल्दी करो!” फ़ोन कट गया.
रिंकू थोड़ा हैरान था. इतनी सुबह कौन इतनी अर्जेंट में जंक्शन जाना चाहता है? और यह अनजान नंबर किसका था?
शांति देवी ने पूछा, “कौन था बेटा? इतनी सुबह?” “पता नहीं माँ. कोई ज़रूरी सवारी है, जंक्शन जाना है.” ध्यान से जाना बेटा. आजकल शहर में…” माँ ने अपनी बात पूरी नहीं की, लेकिन उनकी आँखों में चिंता साफ़ झलक रही थी.
रिंकू ने माँ को तसल्ली दी और अपनी पुरानी टैक्सी स्टार्ट की. सुबह की शांत सड़कों पर वह तेज़ी से जंक्शन की ओर बढ़ गया. उसके मन में कई सवाल घूम रहे थे. यह अनजान सवारी कौन होगी? इतनी सुबह जंक्शन पर क्या काम हो सकता है? और वह अजीब सी बेचैनी, वह अब और भी ज़्यादा महसूस हो रही थी।
जैसे ही वह प्लेटफॉर्म नंबर तीन के बाहर पहुँचा, उसकी नज़र एक घबराए हुए आदमी पर पड़ी. वह इधर-उधर देख रहा था, और उसके चेहरे पर परेशानी साफ़ झलक रही थी. क्या यही वह सवारी थी?
शेष भाग अगले अंक में…,



