
जाते-जाते मीठा-मीठा गम दे गया…
वर्ष 2026 की शुरुआत से ही बिहार की राजनीती में अहम् बदलाब हो रहें हैं. एक तरफ एक युग का अंत हो रहा है वहीं, दूसरी तरफ नए शासन व शक्ति का उदय भी हो रहा है. एक युग के समापन के बाद बिहार की राजनीति में जो भूचाल आया है, उस पर एक गीत याद आ रहा है. “एक परदेशी मेरा दिल ले गया, जाते-जाते मीठा-मीठा गम दे गया”. बिहार के संदर्भ में उन राजनीतिक गठबंधन और वादों की याद दिलाता है जो देखने में तो लुभावने लगते हैं, परन्तु उनके पीछे सत्ता का संघर्ष और जनता की उम्मीदों का गम भी छिपा होता है.
बताते चलें कि, भारतीय राजनीती में कई ऐसे राज्य हैं जहाँ विचारधाराओं से ज्यादा ‘अंकगणित’ को महत्व दिया जाता है. एक दशक में हमने देखा है कि कैसे सत्ता की धुरी एक ही व्यक्ति (नीतीश कुमार) के इर्द-गिर्द घूमती रही, लेकिन उसके साथी बदलते रहे. जहां एक तरफ ‘पालटू राम’ के रूप में चिन्हित किए गए उनके सियासी दांव-पेंच की याद है, तो दूसरी तरफ उनकी सत्ता-विरोधी लहर को रोकने की अद्भुत क्षमता के लिए उन्हें याद किया जाएगा.
वैसे तो देखा जाय तो, नीतीश कुमार के राजनीतिक कैरियर का अंतिम पड़ाव उनके शुरुआती वादों से काफी मेल नहीं खाता था, लेकिन यह उनकी सियासी चतुराई की पराकाष्ठा थी. मार्च 2026 में हुए राज्यसभा चुनाव ने उनकी विदाई की नींव रख दी गई थी. जहां एक ओर वे खुद राज्यसभा पहुंचे, वहीं उनके नेतृत्व वाले जद(यू) ने अपनी सीटें बढ़ाकर 85 कर लीं. यह जीत उनके नाम पर लड़ी गई थी और नारा था—”25 से 30, फिर से नीतीश”. वहीं, दूसरी ओर असलियत कुछ और ही थी. भाजपा के लिए यह जीत के मायने ही कुछ और थे चूकिं, केंद्र में अपनी मजबूत सरकार और संगठनात्मक ताकत के दम पर भाजपा ने बिहार में धीरे-धीरे जद(यू) को किनारे करना शुरू कर दिया था. वहीं, नीतीश का स्वास्थ्य, उनकी थकान और लगातार सियासी दलबदल (“पालटू राम” छवि) ने उनके भीतर ही एक धारणा बना दी थी कि अब उनकी सत्ता का सूरज ढल रहा है.
ज्ञात है कि, 14 अप्रैल 2026 को जब उन्होंने इस्तीफा दिया, तो यह एक औपचारिकता मात्र थी. उनके इस्तीफे के साथ ही बिहार की उस “अपवादवादिता” का अंत हुआ, जहां भाजपा सत्तारूढ़ गठबंधन में हमेशा जूनियर पार्टनर की भूमिका में रह रही थी. नीतीश कुमार ऐसे नेता थे, जिन्होंने ‘मंडल’ और ‘कमंडल’ के बीच संतुलन बनाकर चलना सीखा था, लेकिन अब वह पुल टूट चुका था. नीतीश कुमार के जाने के बाद सवाल उठा कि ” अब कौन होगा ?” वहीँ भाजपा और संघ के लिए परेशानी थी कि “आने वाले कई सालों तक बिहार की राजनीति का ‘चेहरा’ कौन बन सकता है”? वहीं, पार्टी ने पहले बिहारी मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी को चुना.
यह चुनाव इतना आसान नहीं था. यह सिर्फ एक व्यक्ति का चुनाव नहीं था बल्कि, भाजपा की सामाजिक इंजीनियरिंग का एक मास्टरस्ट्रोक था. बताते चलें कि, सम्राट चौधरी कोई सवर्ण नेता नहीं हैं. वे एक प्रभावशाली ओबीसी समुदाय कुशवाहा (कोइरी) से आते हैं. यह वही जाति है, जो पारंपरिक रूप से नीतीश कुमार के ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोइरी) समीकरण का हिस्सा भी था.बताते चलें कि इस चुनाव के साथ ही भाजपा ने सीधे नीतीश के गढ़ में ही सेंध लगा दी थी. एक तरफ भाजपा के पास पहले से ही सवर्णों (बिहार में लगभग 15%) का वोट है वहीं, सम्राट जैसे ओबीसी चेहरे के साथ वे अपने सामाजिक आधार को और भी चौड़ा करना चाहती है.
सम्राट चौधरी के बारे में बात करें तो वो एक ऐसे नेता के रूप में देखें जाते हैं जो जो पूरी तरह से भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व (प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह) के प्रति वफादार हैं वहीं, नीतीश कुमार को हमेशा “स्वतंत्र” कमांडर के रूप में जाना जाता था. बताते चलें कि, भाजपा ने वही किया जो उसने पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में किया था. वो है स्थानीय नेताओं की महत्वाकांक्षा को केंद्र के हितों में ढालना और जातिगत समीकरणों को पलट देना.
सम्राट चौधरी के नाम की घोषणा होते ही विपक्ष ने मोर्चा खोलते हुए तीखा हमला करते हुए कहा कि, “अब बिहार चलेगा गुजरात से”. तेजस्वी यादव ने आरोप लगाते हुए कहा कि, नीतीश कुमार ने बापू (गांधी) का नाम लेकर भाजपा को मौका दे दिया. तेजस्वी ने आरोप लगाया कि अब मुख्यमंत्री चाहे कोई भी हो, असली सत्ता तो गुजरात (अर्थात अमित शाह) के हाथ में होगी. उन्होंने इसे बिहार के लोकतंत्र के लिए काला दिन बताया। वहीं, प्रशांत किशोर तंज करते हुए कहा कि, जो ‘चाल, चरित्र और चेहरा’ की बात करती है, उसने बिहार को यह “तोहफा” दिया है. विपक्ष की यह रणनीति साफ समझ में आता है कि, वे इस सरकार को “बाहरी” और “अलोकतांत्रिक” साबित करना चाहते हैं. उनका तर्क है कि चुनाव तो नीतीश के चेहरे पर लड़ा गया, लेकिन सरकार बनाने का अधिकार किसी और को दे दिया गया.
वैसे तो देखा जाय तो नीतीश कुमार की विरासत दोधारी तलवार है. उन्होंने बिहार को अपराध के गर्त से बाहर निकाला, सड़कें बनवाईं और लड़कियों की पढ़ाई पर जोर दिया। वहीं, सम्राट चौधरी के सामने जो चुनौतियां हैं, वे बहुत बड़ी हैं – बिहार का सबसे बड़ा अभिशाप है युवाओं को रोजगार नहीं है. अत: सम्राट को यह साबित करना होगा कि भाजपा की सरकार नीतीश के कल्याणकारी मॉडल से हटकर उद्योग और निवेश ला सकती है, ताकि पलायन रुके. वहीं, दूसरी ओर शहरीकरण, औद्योगीकरण और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बिहार अब भी पिछड़ा है. चूकिं, नीतीश का मॉडल स्थिर हो चुका है. अब देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा नीतीश की तुलना में बेहतर कर पाती है या नहीं !
सबसे बड़ी समस्या है गठबंधन प्रबंधन की. भले ही भाजपा बड़ी पार्टी है (89 सीटें), लेकिन जद(यू) के पास 85 सीटें हैं. जद(यू) के विधायक इस बात से नाराज हो सकते हैं कि उनके नेता को हटाकर भाजपा का आदमी मुख्यमंत्री बन गया. इस गठबंधन को संभालना सम्राट के लिए सबसे बड़ी अग्नि परीक्षा होगी. राजनीती में कब क्या हो जाय यह कहना अनुचित होगा. वैसे भी बिहार की राजनीती में नीतीश कुमार ने जाते-जाते मीठा-मीठा गम छोड़कर जा रहें है और यह गम है “क्षेत्रीय दलों का”. जहां एक क्षेत्रीय दल का मुख्यमंत्री केंद्र की सबसे बड़ी पार्टी को संतुलित करके चलता था वहीं, वर्तमान समय के बिहार में एक नया प्रयोग शुरू हो रहा है, जहां भाजपा पूरी तरह से ड्राइवर सीट पर है और सम्राट चौधरी के पास साबित करने का मौका है कि ” वे सिर्फ हुक्म के गुलाम नहीं बल्कि बिहार के विकास की नई ईबादत भी लिख सकते हैं”. अब देखना दिलचस्प होगा कि, आधुनिक बिहार की राजनीती में क्या नया होने वाला है…
संजय कुमार सिंह,
पोलिटिकल एडिटर.



