Article

महाराजा सुहेलदेव बैंस

राजा सुहेलदेव आज से करीब हजार वर्ष पूर्व के ऐसे महानायक हैं जिनका इतिहास में स्थान खोजना दुष्कर ही नहीं लगभग असाध्य है, किंतु उत्तर प्रदेश में अवध व तराई क्षेत्र से लेकर पूर्वाचल तक मिथकों व किंवदंतियों में उनकी वीरता के किस्से कुछ इस तरह से जीवित हैं, मानो कल की ही बात हो .आज हम राजा सुहेलदेव का पूरा इतिहास ही जानेंगे. ईसा की सातवीं शताब्दी में जब अरब तथा उसके पड़ोसी देशों से असभ्य तथा बर्बर लोगों के गिरोह भारत में आने शुरू हुए थे तब से लेकर उस समय तक के भारत के इतिहास का अध्ययन -जब तक देश-भक्ति की भावना से पूर्ण शक्तियों ने उन्हें अन्तत : निश्चल तथा निर्वीर्य न बना दिया- बड़ा विषादपूर्ण और वीभत्स है. भारत में प्रवेश कर ये बर्बर गिरोह दीमक तथा टिड्डी – दल के समान इस देश को चट कर गए. यहां के राजप्रासादों तथा सुरम्य भवनों में दूध और शहद की नदियाँ बहती थीं और जो स्वर्ण तथा हीरे  मोतियों से सुसज्जित तथा प्रकाशवान थे उस देश को इन्होंने खुली नालियों झोपड़ियों, और कच्चे मकानों वाली गन्दी बस्ती में परिवर्तित कर दिया. भारतीय इतिहास के कपटवेश में इस काल के जो वृत्तान्त विश्वभर के स्कूलों, कालिजों और शोध-संस्थाओं में पढ़ाए जाते हैं वे तब जले पर और भी नमक छिड़कते हैं जब उनमें इस सहस्राबदी को इस आधार पर स्वर्णयुग बताया जाता है कि तब अरबी और फारसी संस्कृतियों का भारतीय संस्कृति (एवमेव) के साथ यशस्वी (एवमेव) संयोजन हुआ था. वस्तुतः नृशंस तथा क्रूर जत्थों द्वारा हिंसात्मक व्यवहारों और ध्वंसों, हत्याओं और सामूहिक नरसंहारों अपहरण  लूटमार और चोरियों, बलात्कारों और डाकों यातनाओं तथा क्रूर पीड़ाओं का ७ वीं शताब्दी से १८ वीं शताब्दी ईसा तक का यह १००० वर्षों का समय बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण था. पर यह चित्रण तब और भी भ्रष्ट हो जाता है जब इस युग को भारत का सौभाग्य बताया जाता है. मध्य युग के भारतीय इतिहास का वह अंश यदि आप पढ़ें जिसमें लोलुप , अंधविश्वासी अरब इस्लाम का प्रचार करने के बहाने,धरती को रौदते और खून की नदियाँ बहाते हुए , चारों ओर बिखर रहे थे तो आप भय से काँप उठेंगे. ये आवारा , खानाबदोश और नैतिकता से हीन लोग हर जगह गए , हर घर में घुसे. उनके एक हाथ में खून से भीगी तलवार थी, दूसरे में जलती मंशाल. ये व्यक्तियों को काटते थे,चीखती – चिल्लाती स्त्रियों और बच्चों को व्यभिचार और गुलामी के लिए घसीटते थे. किसी भी धर्म और जाति का यह रूप एक ऐसा कलंक है जिसकी कालिमा शैतान को भी मात करती है. भारत उन देशों में से एक था जो बुरी तरह जले -झुलसे थे, चीरे – फाड़े गए थे, कुचले – मसले गये थे, पंगु और अपंग बने थे, बन्दी – कैदी बनाए गये थे. भारत ने इनसे अति – मानवीय सामना किया था. ये खूखार हजार वर्षों के लम्बे अरसे से सागर – तरंगों की भाँति बराबर आ रहे थे. ये दरिन्दे तब तक आते रहे जबतक कि इनके अन्तिम मुसलमान शासक को १८५८ ई ० में रंगून की कब्र में सुला नहीं दिया गया. भारत पर इस्लामी आक्रमण कितने भयंकर होते थे, इसके कुछ ही अंश पढ़कर आपकी रूह कांप जायेगी. मूहम्मद बिन कासिम सिंध में चार वर्ष रुका था, 4 वर्ष में उसने 1लाख 20 हजार लोगों की कटवाकर फिंकवा दिया था. लगभग 100 व्यक्ति प्रतिदिन सिंध में मारे जाने लगे, जिस दिन से कासिम आया. इतने वीभत्स आंकड़े सीरिया के भी नही है. इतनी निर्दयता के बाद भी सुन्नी लेखक कासिम को  न्यायी तथा निष्पक्ष बताते है. ओर कासिम का आक्रमण All Islamic Country Vs Raja Dahir था. इसके बाद भी जुनैद – सलीम आदि के हमले होते रहे, जिन्हें पश्चिम में प्रतिहार एवं चौहान राठौड़ आदि निष्फल करते रहें, बहुत बार निराशा भी हाथ लगी. एक दिन भी ऐसा नही रहा, जब इस्लाम मानने वालों ने भारत पर हमला न् किया हो. इसके बाद मूहम्मद गजनवी का समय आया, यह प्रतिवर्ष जिहाद पर निकलता था, तथा भारत को कुचलता था. मुहमद गजनवी का पिता  सुबुक्तगीन किर्गीस्तान का था. किर्गीस्तान तक पहले भारत के क्षत्रियो का ही राज था, पहले यह बोद्ध बने, बाद में मुस्लिम. भीषण अत्याचार कर इन्हें इस्लाम मे दीक्षित किया गया था, ताकि इनकी आने वाली नस्लें अपने ही भाइयों का खून बहाएं. मूहम्मद् गजनवी प्रतिवर्ष भारत पर हमला करता था. मोढेरा सूर्य मंदिर, सोमनाथ मंदिर, जो महाभारतकालीन निर्माण थे, उन्हें भी गजनवी ने तोड़ डाला. मूहम्मद गजनवी की मृत्यु के बाद उसके सेनापति सालार मसूद गजनी ने भारत पर आक्रमण करने तथा मूर्तिपूजा को मिटाने की शपथ खाई थी. कहते है यह 16 साल का सालार मसूद इतना खूंखार था, की यह जहां से गुजरता था, वहां की हवाएं भी इस्लाम कबूल कर लेती थी…. इसी नरभक्षी का आक्रमण भारत पर हुआ था, जो भारत मे उतनी बड़ी तबाही फैला सकता था, जो आज तक पहले कभी नही हुई, न् गजनवी के समय, न् कासिम के समय. भारत को रक्त का ताल बना दिया जाता. भारतीयों की भक्ती के बल के कारण श्रीहरि की कृपा स्वरूप श्रीवस्ती के राजा सुहेलदेव ने भारत की रक्षा का भार उठाया. हमने 17वीं शताब्दी की पुस्तक मिरात-ए-मसूदी में  पढ़ा तो वहां पाया कि राजा सुहेलदेव 11वीं सदी में श्रीवस्ती के राजा थे, जिन्होंने महमूद गजनवी के भांजे गाज़ी सैयद_सालार मसूद को युद्ध में हराया था.17वीं सदी में मुगल राजा जहांगीर के दौर में अब्दुर_रहमान_चिश्ती नाम के एक लेखक हुए. 1620 के दशक में चिश्ती ने फारसी भाषा में एक दस्तावेज लिखा ‘मिरात-इ-मसूदी’. हिंदी में इसका मतलब ‘मसूद का आइना’ होता है. इस दस्तावेज को गाज़ी सैयद सालार मसूद की बायोग्राफी बताया जाता है. मिरात-इ-मसूदी के मुताबिक मसूद महमूद गजनवी का भांजा था, जो 16 की उम्र में अपने पिता गाज़ी सैयद सालार साहू के साथ भारत पर हमला करने आया था. अपने पिता के साथ उसने इंडस नदी पार करके मुल्तान, दिल्ली, मेरठ और सतरिख (बाराबंकी) तक जीत दर्ज की.सतरिख में मसूद को न जाने क्या भाया कि उसने यहां टिकने का फैसला किया. टिकने के लिए उसे आसपास के हिंदू राजाओं से सुरक्षा भी चाहिए थी. तो उसने अपने साथियों को आसपास के राजाओं को ठिकाने लगाने के लिए भेजा. इनमें से एक खेमे का खुद मसूद का पिता सालार साहू नेतृत्व कर रहा था. बहराइच और उसके आसपास के इलाकों के राजाओं ने मसूद के साथियों से युद्ध किया, लेकिन वो सालार साहू से हार गए. वो अलग बात है कि हार के बावजूद वो झुकने को तैयार नहीं थे. ऐसे में छिटपुट लड़ाइयां चलती रहीं.

फिर 1033 ई. में खुद सालार मसूद अपनी ताकत परखने बहराइच आया. उसका विजय रथ तब तक बढ़ता रहा, जब तक उसके रास्ते में राजा सुहेलदेव नहीं आए. सुहेलदेव के साथ युद्ध में मसूद बुरी तरह ज़ख्मी हो गया, भारत पर विजय की आशा लिए एक विशाल सेना भारत आई थी. जब सिंध पर आक्रमण हुआ था, उस समय सिंध की जनसँख्या से ज़्यादा कासिम की सेना थी. सालार गाजी के समय भी ऐसा ही था. लेकिन राजा सुहलदेव के पराक्रम के आगे मात्र 6 मुसलमान वापस जीवित जा सकें. आज ऐसे महान राजा का हम नाम तक नही लेते, यह बहुत दुर्भाग्य की बात है, कांग्रेस -भाजपा ने वोटो के ने हमे एक आध करेक्टर पकड़ा दिए है, हम उन्ही में उलझे रहते है. बैस राजपूतो के गोत्र, प्रवर,आदि वंश-बैंस सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल है. हालाँकि, कुछ विद्वान इन्हें नागवंशी भी बताते हैं. गोत्र-भारद्वाज है प्रवर-तीन है.  भारद्वाज  बार्हस्पत्य और अंगिरस वेद-यजुर्वेद कुलदेवी-कालिका माता इष्ट देव-शिवजी प्रसिद्ध बैस व्यक्तित्वशालिवाहन,हर्षवर्धन,त्रिलोकचंद,सुहेलदेव,अभयचंद,राणा बेनी माधव बख्श सिंह, मेजर बैस राजपूत नागो को नहीं मारते हैं,नागपूजा का इनके लिए विशेष महत्व है,इनमे ज्येष्ठ भ्राता को टिकायत कहा जाता था, और सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा आजादी से पहले तक उसे ही मिलता था. मुख्य गढ़ी में टिकायत परिवार ही रहता था और शेष भाई अलग किला/मकान बनाकर रहते थे, बैस राजपूतो में आपसी भाईचारा बहुत ज्यादा होता है. बिहार के सोनपुर का पशु मेला बैस राजपूतों ने ही प्रारम्भ किया था. यूपी के अवध में स्थित बैसवाडा, मैनपुरी, एटा, बदायूं, कानपूर, इलाहबाद,बनारस,आजमगढ़,बलिया,बाँदा,हमीरपुर,प्रतापगढ़,सीतापुर,रायबरेली,उन्नाव,लखनऊ,हरदोई,फतेहपुर,गोरखपुर,बस्ती,मिर्जापुर,गाजीपुर,गोंडा,बहराइच,बाराबंकी,बिहार,पंजाब,पाक-अधिकृत कश्मीर, पाकिस्तान में बड़ी आबादी है और मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी थोड़ी आबादी है. बैस राजपूतों कि उत्पत्ति के बारे में कई मत प्रचलित हैं ठाकुर ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली के प्रष्ठ संख्या 112-114 के अनुसार सूर्यवंशी राजा वासु जो बसाति जनपद के राजा थे,उनके वंशज बैस राजपूत कहलाते हैं, बसाति जनपद महाभारत काल तक बना रहा है. देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास के पृष्ठ संख्या 67-74 के अनुसार वैशाली से निकास के कारण ही यह वंश वैस या बैस या वैश कहलाया, इनके अनुसार बैस सूर्यवंशी हैं,इनके किसी पूर्वज ने किसी नागवंशी राजा कि सहायता से उन्नति कि,इसीलिए बैस राजपूत नाग पूजा करते हैं और इनका चिन्ह भी नाग है,महाकवि बाणभट ने सम्राट हर्षवर्धन जो कि बैस क्षत्रिय थे उनकी बहन राज्यश्री और कन्नौज के मौखरी(मखवान,झाला) वंशी महाराजा गृहवर्मा के विवाह को सूर्य और चन्द्र वंश का मिलन बताया है,मौखरी चंद्रवंशी थे अत: बैस सूर्यवंशी सिद्ध होते हैं.

महान इतिहासकार गौरिशंकर ओझा जी कृत राजपूताने का इतिहास के पृष्ठ संख्या 154-162 में भी बैस राजपूतों को सूर्यवंशी सिद्ध किया गया है,रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी कृत क्षत्रिय राजवंश के प्रष्ठ संख्या 78,79 एवं 368,369 के अनुसार भी बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं. डा. देवीलाल पालीवाल कि कर्नल जेम्स तोड़ कृत राजपूत जातियों का इतिहास के प्रष्ठ संख्या 182 के अनुसार बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं. ठाकुर बहादुर सिंह बीदासर कृत क्षत्रिय वंशावली एवं जाति भास्कर में बैस वंश को स्पष्ट सूर्यवंशी बताया गया है. इनके झंडे में नाग का चिन्ह होने के कारण कई विद्वान इन्हें नागवंशी मानते हैं,लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार भी माना जाता है.अत: कुछ विद्वान बैस राजपूतो को लक्ष्मण का वंशज और नागवंशी मानते हैं,कुछ विद्वानों के अनुसार भरत के पुत्र तक्ष से तक्षक नागवंश चला जिसने तक्षिला कि स्थापना की,बाद में तक्षक नाग के वंशज वैशाली आये और उन्ही से बैस राजपूत शाखा प्रारम्भ हुई.कुछ विद्वानों के अनुसार बैस राजपूतों के आदि पुरुष शालिवाहन के पुत्र का नाम सुन्दरभान या वयस कुमार था जिससे यह वंश वैस या बैस कहलाया,जिन्होंने सहारनपुर कि स्थापना की.कुछ विद्वानों के अनुसार गौतम राजा धीरपुंडीर ने 12 वी सदी के अंत में राजा अभयचन्द्र को 22 परगने दहेज़ में दिए इन बाईस परगनों के कारण यह वंश बाईसा या बैस कहलाने लगा. कुछ विद्वान इन्हें गौतमी पुत्र शातकर्णी जिन्हें शालिवाहन भी कहा जाता है उनका वंशज मानते हैं,वहीं कुछ के अनुसार बैस शब्द का अर्थ है वो क्षत्रिय जिन्होंने बहुत सारी भूमि अपने अधिकार में ले ली हो.बैस वंश कि उत्पत्ति के सभी मतों का विश्लेष्ण एवं निष्कर्ष बैस राजपूत नाग कि पूजा करते हैं और इनके झंडे में नाग चिन्ह होने का यह अर्थ नहीं है कि बैस नागवंशी हैं,महाकवि बाणभट ने सम्राट हर्षवर्धन जो कि बैस क्षत्रिय थे उनकी बहन राज्यश्री और कन्नौज के मौखरी(मखवान,झाला) वंशी महाराजा गृहवर्मा के विवाह को सूर्य और चन्द्र वंश का मिलन बताया है,मौखरी चंद्रवंशी थे अत: बैस सूर्यवंशी सिद्ध होते हैं.

लक्ष्मण जी को शेषनाग का अवतार माना जाता है किन्तु लक्ष्मन जी नागवंशी नहीं रघुवंशी ही थे और उनकी संतान आज के प्रतिहार(परिहार) और मल्ल राजपूत है,जिन विद्वानों ने 12 वी सदी में धीरपुंडीर को अर्गल का गौतमवंशी राजा लिख दिया और उनके द्वारा दहेज में अभयचन्द्र को 22 परगने दहेज़ में देने से बैस नामकरण होने का अनुमान किया है वो बिलकुल गलत है,क्योंकि धीरपुंडीर गौतम वंशी नहीं पुंडीर क्षत्रिय थे जो उस समय हरिद्वार के राजा थे,बाणभट और चीनी यात्री ह्वेंस्वांग ने सातवी सदी में सम्राट हर्ष को स्पष्ट रूप से बैस या वैश वंशी कहा है तो 12 वी सदी में बैस वंशनाम कि उतपत्ति का सवाल ही नहीं है,किन्तु यहाँ एक प्रश्न उठता है कि अगर बैस वंश कि मान्यताओं के अनुसार शालिवाहन के वंशज वयस कुमार या सुंदरभान सहारनपुर आये थे तो उनके वंशज कहाँ गए?बैस वंश कि एक शाखा त्रिलोकचंदी है और सहारनपुर के वैश्य जैन समुदाय कि भी एक शाखा त्रिलोकचंदी है इन्ही जैनियो के एक व्यक्ति राजा साहरनवीर सिंह ने अकबर के समय सहारनपुर नगर बसाया था,आज के सहारनपुर,हरिद्वार का क्षेत्र उस समय हरिद्वार के पुंडीर शासको के नियन्त्रण में था तो हो सकता है शालिवाहन के जो वंशज इस क्षेत्र में आये होंगे उन्हें राजा धीर पुंडीर ने दहेज़ में सहारनपुर के कुछ परगने दिए हों और बाद में ये त्रिलोकचंदी बैस राजपूत ही जैन धर्म ग्रहण करके व्यापारी हो जाने के कारण वैश्य बन गए हों और इन्ही त्रिलोकचंदी जैनियों के वंशज राजा साहरनवीर ने अकबर के समय सहारनपुर नगर कि स्थापना कि हो, और बाद में इन सभी मान्यताओं में घालमेल हो गया हो.अर्गल के गौतम राजा अलग थे उन्होंने वर्तमान बैसवारे का इलाका बैस वंशी राजा अभयचन्द्र को दहेज़ में दिया था।गौतमी पुत्र शातकर्णी को कुछ विद्वान बैस वंशावली के शालिवाहन से जोड़ते हैं किन्तु नासिक शिलालेख में गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी को एक ब्राह्मण (अद्वितिय ब्राह्मण) तथा खतिय-दप-मान-मदन अर्थात क्षत्रियों का मान मर्दन करने वाला आदि उपाधियों से सुशेभित किया है. इसी शिलालेख के लेखक ने गौतमीपुत्र की तुलना परशुराम से की है. साथ ही दात्रीशतपुतलिका में भी शालीवाहनों को मिश्रित ब्राह्मण जाति तथा नागजाति से उत्पन्न माना गया है. अत:गौतमीपुत्र शातकर्णी अथवा शालिवाहन को बैस वंशी शालिवाहन से जोड़ना उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि बैसवंशी सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं.उपरोक्त सभी मतो का अधयन्न करने पर हमारा निष्कर्ष है कि बैस राजपूत सूर्यवंशी हैं,प्राचीन काल में सूर्यवंशी इछ्वाकू वंशी राजा विशाल ने वैशाली राज्य कि स्थापना कि थी,विशाल का एक पुत्र लिच्छवी था यहीं से सुर्यवंश कि लिच्छवी, शाक्य(गौतम), मोरिय(मौर्य), कुशवाहा(कछवाहा) ,बैस शाखाएँ अलग हुई,जब मगध के राजा ने वैशाली पर अधिकार कर लिया और मगध में शूद्र नन्दवंश का शासन स्थापित हो गया और उसने क्षत्रियों पर जुल्म करने शुरू कर दिए तो वैशाली से सूर्यवंशी क्षत्रिय पंजाब, तक्षिला, महाराष्ट्र, स्थानेश्वर,दिल्ली,आदि में आ बसे, दिल्ली क्षेत्र पर भी कुछ समय बैस वंशियों ने शासन किया,बैंसों की एक शाखा पंजाब में आ बसी. इन्होंने पंजाब में एक नगर श्री कंठ पर अधिकार किया, जिसका नाम आगे चलकर थानेश्वर हुआ.

दिल्ली क्षेत्र थानेश्वर के नजदीक है अत:दिल्ली शाखा,थानेश्वर शाखा,सहारनपुर शाखा का आपस में जरुर सम्बन्ध होगा,बैसवंशी सम्राट हर्षवर्धन अपनी राजधानी थानेश्वर से हटाकर कन्नौज ले गए,हर्षवर्धन ने अपने राज्य का विस्तार बंगाल,असम,पंजाब,राजपूताने,मालवा,नेपाल तक किया और स्वयं राजपुत्र शिलादित्य कि उपाधि धारण की. हर्षवर्द्धन के पश्चात् इस वंश का शासन समाप्त हो गया और इनके वंशज कन्नौज से आगे बढकर अवध क्षेत्र में फ़ैल गए, इन्ही में आगे चलकर त्रिलोकचंद नाम के प्रसिद्ध व्यक्ति हुए इनसे बैस वंश कि कई शाखाएँ चली, इनके बड़े पुत्र बिडारदेव के वंशज भालेसुल्तान वंश के बैस हुए जिन्होंने सुल्तानपुर कि स्थापना की.इन्ही बिडारदेव के वंशज राजा सुहेलदेव हुए जिन्होंने महमूद गजनवी के भतीजे सैय्यद सलार मसूद गाजी को बहराइच के युद्ध में उसकी सेना सहित मौत के घाट उतार दिया था और खुद भी शहीद हो गए थे.चंदावर के युद्ध में हर्षवर्धन के वंशज केशवदेव भी जयचंद के साथ युद्ध लड़ते हुए शहीद हो गए बाद में उनके वंशज अभयचंद ने अर्गल के गौतम राजा कि पत्नी को तुर्कों से बचाया जिसके कारण गौतम राजा ने अभयचंद से अपनी पुत्री का विवाह कर उसे 1440 गाँव दहेज़ में दे दिए जिसमें विद्रोही भर जाति का दमन कर अभयचंद ने बैस राज्य कि नीव रखी जिसे आज बैसवाडा या बैसवारा कहा जाता है,इस प्रकार सूर्यवंशी बैस राजपूत आर्याव्रत के एक बड़े भू भाग में फ़ैल गए.बैसवंशी राजपूतों का सम्राट हर्षवर्धन से पूर्व का इतिहास बैस राजपूत मानते हैं कि उनका राज्य पहले मुर्गीपाटन पर था और जब इस पर शत्रु ने अधिकार कर लिया तो ये प्रतिष्ठानपुर आ गए,वहां इस वंश में राजा शालिवाहन हुए,जिन्होंने विक्रमादित्य को हराया और शक सम्वत इन्होने ही चलाया,कुछ ने गौतमी पुत्र शातकर्णी को शालिवाहन मानकर उन्हें बैस वंशावली का शालिवाहन बताया है,और पैठण को प्रतिष्ठानपुर बताया और कुछ ने स्यालकोट को प्रतिष्ठानपुर बताया है,किन्तु यह मत सही प्रतीत नहीं होते ,कई वंशो बाद के इतिहास में यह गलतियाँ कि गई कि उसी नाम के किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को यह सम्मान देने लग गए,शालिवाहन नाम के इतिहास में कई अलग अलग वंशो में प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हैं.भाटी वंश में भी शालिवाहन हुए हैं और सातवाहन वंशी गौतमीपुत्र शातकर्णी को भी शालिवाहन कहा जाता था, विक्रमादित्य के विक्रम सम्वत और शालिवाहन के शक सम्वत में पूरे 135 वर्ष का फासला है अत:ये दोनों समकालीन नहीं हो सकते.दक्षिण के गौतमीपुत्र शातकर्णी को नासिक शिलालेख में स्पष्ट:ब्राह्मण लिखा है अत:इसका सूर्यवंशी बैस वंश से सम्बन्ध होना संभव नहीं है.वस्तुत: बैस इतिहास का प्रतिष्ठानपुर न तो दक्षिण का पैठण है और न ही पंजाब का स्यालकोट है यह प्रतिष्ठानपुर इलाहबाद(प्रयाग) के निकट और झूंसी के पास था. किन्तु इतना अवश्य है कि बैस वंश में शालिवाहन नाम के एक प्रसिद्ध राजा अवश्य हुए जिन्होंने प्रतिष्ठानपूरी में एक बड़ा बैस राज्य स्थापित किया,शालिवाहन कई राज्यों को जीतकर उनकी कन्याओं को अपने महल में ले आये,जिससे उनकी पहली तीन क्षत्राणी रानियाँ खिन्न होकर अपने पिता के घर चली गयी, इन तीन रानियों के वंशज बाद में भी बैस कहलाते रहे और बाद कि रानियों के वंशज कठबैस कहलाये, इन्ही शालिवाहन के वंशज त्रिलोकचंद बैस ने दिल्ली (उस समय कुछ और नाम होगा) पर अधिकार कर लिय.स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार दिल्ली पर सन 404 ईस्वी में राजा मुलखचंद उर्फ़ त्रिलोकचंद प्रथम ने विक्रमपाल को हराकर शासन स्थापित किया इसके बाद विक्र्मचन्द, कर्तिकचंद, रामचंद्र, अधरचन्द्र, कल्याणचन्द्र, भीमचंद्र, बोधचन्द्र, गोविन्दचन्द्र और प्रेमो देवी ने दो सो से अधिक वर्ष तक शासन किया,वस्तुत ये दिल्ली के बैस शासक स्वतंत्र न होकर गुप्त वंश और बाद में हर्षवर्धन बैस के सामंत के रूप में यहाँ पर होंगे, इसके बाद यह वंश दिल्ली से समाप्त हो गया,और सातवी सदी के बाद में पांडववंशी अर्जुनायन तंवर क्षत्रियों(अनंगपाल प्रथम) ने प्राचीन इन्द्रप्रस्थ के स्थान पर दिल्ली कि स्थापना की. वस्तुत:बैसवारा ही बैस राज्य था.(देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास पृष्ठ संख्या 70,एवं ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली पृष्ठ संख्या 113,114)कोट बाहर बैस—शालिवाहन कि जो रानियाँ अपने पीहर चली गयी उनकी संतान कोट बाहर बैस कहलाती है.कठ बैस—शालिवाहन कि जो जीती हुई रानियाँ बाद में महल में आई उनकी संतान कोट बैस या कठ बैस कहलाती हैं. डोडिया बैस डोडिया खेडा में रहने के कारण राज्य हल्दौर जिला बिजनौर त्रिलोकचंदी बैस-त्रिलोकचंद के वंशज इनकी चार उपशाखाएँ हैं राव,राजा,नैथम,सैनवासी

प्रतिष्ठानपूरी बैस—प्रतिष्ठानपुर में रहने के कारण

चंदोसिया—ठाकुर उदय बुधसिंह बैस्वाड़े से सुल्तानपुर के चंदोर में बसे थे उनकी संतान चंदोसिया बैस कहलाती है.

रावत–फतेहपुर,उन्नाव में

भाले सुल्तान–ये भाले से लड़ने में माहिर थे मसूद गाजी को मारने वाले सुहेलदेव बैस संभवत:इसी वंश के थे,रायबरेली,लखनऊ,उन्नाव में मिलते हैं.

कुम्भी एवं नरवरिया–बैसवारा में मिलते हैं.

=========  ==========  ===========

Raja Suheldev is such a great hero about a thousand years ago, whose place in history is not only difficult to find, but it is almost impossible, but in Uttar Pradesh, from Awadh and Terai region to Purvanchal, the stories of his heroism are alive in myths and legends like this. As if it was only yesterday. Today we will know the complete history of King Suheldev. In the seventh century of Christ, when the gangs of uncivilized and barbaric people from Arab and its neighboring countries started coming to India, the study of the history of India till that time – till the country – Powers full of devotion did not make them finally motionless and seamless – it is very sad and gruesome. After entering India, these barbaric gangs licked this country like termites and locusts. The rivers of milk and honey used to flow in the palaces and picturesque buildings here and they converted the country which was decorated and illuminated with gold and diamond pearls into a slum with open drains, huts, and raw houses. The accounts of this period which are taught in schools, colleges, and research institutes all over the world, in the guise of Indian history, sprinkle more salt on the fire when they describe this millennium as the golden age on the basis that then Arabic and Persian cultures There was a successful (avmev) combination with the Indian culture (avmev). In fact, this period of 1000 years from the 7th century to the 18th century AD was a very unfortunate period of violent practices and destructions, murders and mass massacres, abductions, robberies and thefts, rapes and dacoits, tortures and brutal tortures by brutal and brutal gangs. But this portrayal becomes even more corrupt when this era is described as India’s good fortune. Flowing rivers were scattered all around, you would tremble with fear. These vagabonds, nomads, and people without morals went everywhere and entered every house. He had a blood-soaked sword in one hand, and a burning torch in the other. They used to bite people and drag screaming women and children into fornication and slavery. This form of any religion and caste is such a stigma whose blackness defeats even the devil. India was one of those countries which were horribly burnt, mutilated, crushed, maimed, maimed, and taken prisoner. India had faced them in a very humane manner. For a long period of thousand years, these dreads were coming equally like the waves of the ocean. These beasts kept coming until their last Muslim ruler was put to sleep in the tomb of Rangoon in 1858. Your soul will tremble after reading a few excerpts of how fierce the Islamic invasions on India were. Muhammad bin Qasim stayed in Sindh for four years, in four years he got 1 lakh 20 thousand people cut off and thrown away. About 100 people started being killed daily in Sindh from the day Qasim arrived. Even Syria doesn’t have such gruesome figures. Even after such brutality, Sunni writers describe Qasim as just and fair. And Kasim’s attack was All Islamic Country Vs Raja Dahir. Even after this, the attacks of Junaid-Salim, etc. continued, which were thwarted by Pratihar and Chauhan Rathod, etc. in the west, many times disappointment was also in hand. There was not even a single day when the followers of Islam did not attack India. After this came the time of Muhammad Ghaznavi, who used to go on Jihad every year and used to crush India. Muhammad Ghaznavi’s father Subuktgin was from Kyrgyzstan. India’s Kshatriyas were the ruler till Kyrgyzstan, first, they became Buddhists, and later they became Muslims. They were initiated into Islam by severe torture so that their future generations would shed the blood of their own brothers. Muhammad Ghaznavi used to attack India every year. Modhera Sun Temple, Somnath Temple, which dates back to the Mahabharata period There were constructions, they were also destroyed by Ghaznavi. After the death of Muhammad Ghaznavi, his commander Salar Masood Ghazni took an oath to attack India and eradicate idolatry. It is said that this 16-year-old Salar Masood was so ferocious that wherever he passed, even the winds used to accept Islam. , Which has never happened before till today, at the time of Ghaznavi, and at the time of Qasim. India would have been made a pool of blood. Due to the power of devotion of Indians #Srihari’s grace, King Suheldev of Srivasti took the responsibility of protecting India. We read the 17th-century book Mirat-e-Masoodi and found that Raja Suheldev was the king of Srivasti in the 11th century. , who defeated Ghazi Syed _ Salar Masood, nephew of Mahmud Ghaznavi, in the war. In the 17th century, during the time of Mughal King Jahangir, there was a writer named Abdur _ Rahman _ Chishti. In the 1620s, Chishti wrote a document in Persian called ‘Mirat-i-Masudi’. In Hindi, it means ‘mirror of Masood’. This document is called the biography of Ghazi Syed Salar Masood. According to Mirat-i-Masudi, Masood was the nephew of Mahmud Ghaznavi, who came to attack India at the age of 16 along with his father Ghazi Syed Salar Shahu. Along with his father, he crossed the Indus River and conquered Multan, Delhi, Meerut, and Satrikh (Barabanki). Not knowing what Masood liked in Satrikh, he decided to stay here. To survive, he also needed protection from the nearby Hindu kings. So he sent his companions to hide the surrounding kings. Masood’s father Salar Shahu himself was leading one of these camps. The kings of Bahraich and its surrounding areas fought with Masood’s companions but were defeated by Salar Sahu. It is a different matter that despite the defeat, he was not ready to bow down. In such a situation, sporadic battles continued.

Then in 1033 AD, Salar Masood himself came to Bahraich to test his strength. His chariot of victory kept moving until King Suheldev came in his way. Masood was badly injured in the war with Suheldev, and a huge army came to India with the hope of victory over India. When Sindh was attacked, Qasim’s army was more than the population of Sindh. It was the same during the time of Salar Ghazi. But in front of King Suhaldev’s might, only 6 Muslims could go back alive. Today we do not even take the name of such a great king, it is a matter of great misfortune, Congress-BJP has caught us with a half-character of votes, and we remain entangled in them only. Bains Suryavanshi is a Kshatriya clan. However, some scholars also call them Nagvanshi. Gotra-Bhardwaj is Pravar-three, Bhardwaj is Barhaspatya and Angiras Veda-Yajurveda Kuldevi-Kalika Mata Ishta Dev-Shiv ji Famous Bais personality Shalivahan, Harshvardhan, Trilokchand, Suheldev, Abhaychand, Rana Benimadhavbakhsh Singh, Major Bais Rajputs do not kill snakes, snake worship has special importance for them, among them the eldest brother was called Tikayat, and he used to get a major part of the property till independence. Tikayat family in the main fort Bais Rajputs had a lot of mutual brotherhood. Bais Rajputs started the animal fair of Sonpur in Bihar. Baiswada, Mainpuri, Etah, Badayun located in Awadh of UP, Kanpur, Allahabad, Banaras, Azamgarh, Ballia, Banda, Hamirpur, Pratapgarh, Sitapur, Rae Bareli, Unnao, Lucknow, Hardoi, Fatehpur, Gorakh There is a large population in Pur, Basti, Mirzapur, Ghazipur, Gonda, Bahraich, Barabanki, Bihar, Punjab, Pakistan Occupied Kashmir, Pakistan and also a small population in parts of Madhya Pradesh and Rajasthan.

There are many views about the origin of Bais Rajputs. According to Thakur Ishwar Singh Madhad’s Rajput genealogy page number 112-114, Suryavanshi king Vasu who was the king of the Basati district, his descendants are called Bais Rajputs, Basti district remained till the Mahabharata period. According to page number 67-74 of the history of Devi Singh Mandawa Rajput branches, this dynasty was called Bais or Bais or Vaish because of exit from Vaishali, according to them Bais are Suryavanshis, some of their ancestors progressed with the help of Nagvanshi king. That’s why Bais Rajputs worship snakes and their symbol is also a snake, Mahakavi Banabhat called the marriage of Emperor Harshavardhana who was Bais Kshatriya, his sister Rajyashri and Kannauj’s Maukhari (Makhwan, Jhala) Vanshi Maharaja Grihavarma the meeting of Surya and Chandra dynasty. It has been said that Maukhari was a Chandravanshi, so Bais are proved to be Suryavanshi.

On page number 154-162 of the history of Rajputana written by great historian Gauri Shankar Ojha, 20 Rajputs have been proven to be Suryavanshi.

According to page number 78,79 and 368,369 of the Kshatriya Dynasty by Mr. Raghunath Singh Kalipahari, Bais Suryavanshis are also Kshatriyas. According to page number 182 of History of Rajput Castes by Dr. Devilal Paliwal, Col. James Tod, Bais Suryavanshis are Kshatriyas. Thakur Bahadur Singh Bidasar Krit In Kshatriya genealogy and caste Bhaskar, the Bais dynasty has been clearly described as Suryavanshi.

Due to the symbol of the snake in their flag, many scholars consider them Nagvanshi, Lakshman is also considered the incarnation of Sheshnag. Therefore, some scholars consider Bais Rajputs as descendants of Laxman and Nagvanshi, according to some scholars Bharat’s son Taksha Takshak Nag dynasty started, who established Takshila, later the descendants of Takshak Nag came to Vaishali and Bais Rajput branch started from them. According to some scholars, the name of the son of Shalivahan, the first man of Bais Rajputs, was Sunderbhan or Vayas Kumar, from whom this dynasty started as Vais or Called Bais, who founded Saharanpur. According to some scholars, Gautam Raja Dhirpundir gave 22 Parganas in dowry to King Abhaychandra at the end of the 12th century, because of these twenty-two Parganas, this dynasty came to be called Baisa or Bais. Some scholars call him Gautami’s son Shatkarni. Those who are also called Shalivahans are considered to be their descendants, while according to some, the word Bais means those Kshatriyas who have taken a lot of land under their authority. Analysis and conclusion of all the views of the origin of the Bais dynasty Bais Rajput worshiped Nag and the snake symbol in their flag It does not mean that Bais are Nagvanshi, Mahakavi Banabhat has told the marriage of Emperor Harshvardhan, who was Bais Kshatriya, his sister Rajyashri and Maukhari (Makhwan, Jhala) Vanshi Maharaja Grihavarma of Kannauj, the union of Surya and Chandra dynasty, Maukhari was Chandravanshi. : Bais Suryavanshi is proven. Laxman ji is considered to be the incarnation of Sheshnag, but Laxman ji was not Nagvanshi but Raghuvanshi and his progeny are today’s Pratihar (Parihar) and Malla Rajput, the scholars who in the 12th century named Dhirpundir as Gautamvanshi of Argal Wrote Raja and by giving 22 Parganas in dowry to Abhaychandra, it is estimated to be named Bais, it is completely wrong because Dhirpundir was not Gautam Vanshi but Pundir Kshatriya who was the king of Haridwar at that time, Banbhat and Chinese traveler Xuanzang. Emperor Harsha is clearly called Bais or Vaish Vanshi in the seventh century, so there is no question of the origin of the Bais dynasty in the 12th century, but here a question arises that if according to the beliefs of the Bais dynasty, the descendants of Shalivahan were Vayas Kumar or When Sunderbhan came to Saharanpur, where did his descendants go? A branch of the Bais dynasty There is Trilokchandi and there is also Trilokchandi, a branch of the Vaishya Jain community of Saharanpur. Raja Saharanpur, a person of these Jains, had established the city of Saharanpur at the time of Akbar, the area of today’s Saharanpur, Haridwar was under the control of the Pundir rulers of Haridwar at that time. It is possible that the descendants of Shalivahan who came to this area were given some Parganas of Saharanpur by Raja Dhir Pundir in dowry and later these Trilokchandi Bais Rajputs became Vaishyas by adopting Jainism and became Vaishyas and these Trilokchandi Jains Descendant king Saharanveer established the city of Saharanpur at the time of Akbar, and later all these beliefs got mixed up. Gautam Raja of Argal was different. Some scholars associate him with Shalivahan of the Bais dynasty, but in the Nasik inscription, Gautama’s son Shri Shatkarni has been honored with the titles of a Brahmin (unique Brahmin) and Khatiya-Dap-Man-Madan i.e. the one who honors the Kshatriyas. The author of this inscription has compared Gautamiputra to Parashurama. Also, in Datrishatputlika, Shalivahans has been considered to be born from mixed Brahmin caste and Naga caste. Therefore, it does not seem appropriate to link Gautamiputra Shatkarni or Shalivahan with Bais Vanshi Shalivahan because Bais Vanshi is Suryavanshi Kshatriyas. Our conclusion after studying all the above opinions is That Bais Rajputs are Suryavanshi, in ancient times Suryavanshi Ichhwaku dynasty King Vishal established the Vaishali kingdom, Vishal had a son Lichchavi, and from here Suryavansh that Lichchavi, Shakya (Gautam), Moriya (Maurya), Kushwaha (Kachwaha), Bais The branches separated, when the king of Magadha took over Vaishali and the rule of Shudra Nandavansh was established in Magadha and he started oppressing the Kshatriyas, then the Suryavanshi Kshatriyas from Vaishali went to Punjab, Taxila, Maharashtra, Sthaneshwar, Delhi, etc. Bai’s dynasty ruled the Delhi region for some time, and a branch of Bais settled in Punjab. He took control of the city of Sri Kanth in Punjab, whose name later became Thaneshwar.

Delhi area is close to Thaneshwar, so the Delhi branch, Thaneshwar branch, and Saharanpur branch will definitely have relations with each other.

Baisvanshi Emperor Harshavardhan moved his capital from Thaneshwar to Kannauj, Harshavardhan expanded his kingdom to Bengal, Assam, Punjab, Rajputane, Malwa, Nepal and himself assumed the title of Rajputra Shiladitya. After Harshavardhan, the rule of this dynasty ended. And his descendants spread beyond Kannauj to the Awadh region, in which a famous person named Trilokchand went ahead, many branches of Bai’s dynasty started from him, and the descendants of his elder son Bidardev became the Bais of the Bhalesultan dynasty who founded Sultanpur. King Suheldev was the descendant of Mahmud Ghaznavi’s nephew, Sayyid Salar Masood Ghazi was killed along with his army in the battle of Bahraich and was martyred. Harshavardhan’s descendant Keshavdev also fought with Jaichand in the battle of Chandawar. Later, his descendant Abhaychand saved the wife of Gautam Raja of Argal from the Turks, due to which Gautam Raja married his daughter to Abhaychand and gave her 1440 villages in dowry, in which Abhaychand suppressed the rebellious caste and established Bai’s state. that laid the foundation of what today Baiswada or It is called Baiswara, thus Suryavanshi Bais Rajputs spread over a large area of Aryavrat. History of Baisvanshi Rajputs before Emperor Harshvardhan Bais Rajputs believe that their kingdom was earlier on Murgipatan and when the enemy took over it. They came to Pratishthanpur, where there was King Shalivahan in this dynasty, who defeated Vikramaditya and ruled the Shak Samvat, some consider Gautami’s son Shatkarni as Shalivahan and called him Shalivahan of Bai’s dynasty, and called Paithan as Pratishthanpur and some called Sialkot. Pratishthanpur has been told, but this opinion does not seem to be correct, in the later history of many dynasties, these mistakes were made and they started giving this honor to a famous person of the same name. There have been Shalivahans in the Bhati dynasty as well and Gautamiputra Shatkarni of the Satavahana dynasty was also called Shalivahan, there is a gap of 135 years between Vikramaditya’s Vikram Samvat and Shalivahan’s Saka Samvat, so both of them cannot be contemporary. Gautamiputra Shatkarni of South Clear in the Nasik inscription T: Brahmin is written, so it is not possible to be related to the Suryavanshi Bais dynasty. In fact, Pratishthanpur of Bai’s history is neither Paithan of South nor Sialkot of Punjab, this Pratishthanpur was near Allahabad (Prayag) and near Jhansi. But it is certain that there was a famous king named Shalivahan in Bai’s dynasty who established a big Bais state in Pratishthanpuri, Shalivahan conquered many states and brought their daughters to his palace, due to which his first three Kshatrani queens got upset and went to their palace. She went to her father’s house, the descendants of these three queens continued to be called Bais even later and after that, the descendants of the queens were called Kath Bais, Trilokchand Bais, a descendant of Shalivahan, took control of Delhi (at that time there would be some other name). Swami Dayanand Saraswati According to this, in 404 AD, Raja Mulakhchand alias Trilokchand I established rule by defeating Vikrampala, after that Vikramchand, Kartikchand, Ramchandra, Adharchandra, Kalyanchandra, Bhimchandra, Bodhchandra, Govindchandra and Premo Devi ruled for more than two hundred years. In fact, these Bai’s rulers of Delhi are independent. Rather, the Gupta dynasty and later Harshavardhan would be here as a feudatory of Bais, after that this dynasty ended in Delhi, and after the seventh century, Pandavavanshi Arjunayan Tanwar Kshatriyas (Anangpal I) established Delhi in place of ancient Indraprastha. established. In fact, Baiswara was Bai’s state only. (History of Rajput branches by Devi Singh Mandawa, page number 70, and Rajput genealogy page number 113,114 by Ishwar Singh Madhad) Kot Bais or Kath Bais, the children of the conquered queens of Shalivahan who later came to the palace are called Bais.

Their, The four sub-branches are Rao, Raja, Naitham, and Sainwasi.

Pratishthanpuri Bais—due to living in Pratishthanpur

Chandosiya — Thakur Uday Budhsingh from Baiswade settled in Chandor of Sultanpur, his child is called Chandosiya Bais.

Rawat – in Fatehpur, Unnao

Bhale Sultan — He was an expert in fighting with a spear, Suheldev Bais who killed Masood Ghazi probably belonged to this dynasty, found in Rae Bareli, Lucknow, Unnao. Kumbhi and Narvariya meet in Baiswara.

Prabhakar Kumar.

Rate this post
:

Related Articles

Back to top button