
सम्राट मत्रिमंडल का हुआ विस्तार…
समय और इतिहास का मिलन हमेशा ही अनोखा और अनुपम होता है. ठीक वही घटना आज पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में पीएम मोदी और गृहमंत्री शाह, पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की उपस्थिति में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया, जिसमें 32 नए मंत्रियों ने पद की शपथ ली. यह विस्तार केवल नियुक्तियों की औपचारिक प्रक्रिया मात्र नहीं था, बल्कि यह बिहार की सत्ता के नए समीकरणों और जनता की अपेक्षाओं को साधने का प्रयास होता है.
मंत्रिमंडल का विस्तार- शासन व्यवस्था में मंत्रिमंडल का विस्तार केवल सीटों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह शासक की रणनीति, प्रशासनिक आवश्यकताओं और सत्ता संतुलन का सूक्ष्म गणित होता है. पुरातन काल में जब ‘राजा’ अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करते थे तब ये संकेत होता था कि शासन की चुनौतियाँ बढ़ रही हैं और उन्हें संभालने के लिए नए चेहरों, नई ऊर्जा और नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है. परन्तु वर्तमान समय में (राज्य बिहार में) जो मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ है वो ” सत्ता के नए समीकरणों, जातीय जनगणना की मांग के अनुसार”.
हाल ही में हुए घटी घटनाक्रमों के उपरांत राज्य बिहार की शासन व्यवस्था में नेतृत्व परिवतन हुआ और नई सरकार बनी. नई सरकार के मुखिया सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल का पहला विस्तार हुआ जिनमें कई युवा चेहरों को भी मंत्री बनाया गया है. बताते चलें कि, एनडीए गठबंधन में भाजपा पिछले दो दशकों से नीतीश कुमार के नेतृत्व में ‘जूनियर पार्टनर’ बनी हुई थी, पहली बार भाजपा की ओर से पहले मुख्यमंत्री बने सम्राट चौधरी। इस विस्तार के बाद, सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली बिहार सरकार में अब मुख्यमंत्री और दो उपमुख्यमंत्रियों सहित कुल 35 सदस्य हो गए. मंत्रिमंडल की संख्याओं के गणित में भाजपा के 15 मंत्री, जदयू के 13 + 2 (उपमुख़्यमंत्री), लोकशक्ति पार्टी के दो , हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के एक और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के एक.
राजनीति की बात जब होती है राज्य बिहार की राजनीति हमेशा से ही बहुस्तरीय रही है. यहाँ जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन और गठबंधन की मजबूरियाँ यहाँ की राजनीति को आकार देती हैं. देश की आजादी के बाद से वर्तमान समय तक मंत्रिमंडल विस्तार अक्सर सत्ता में बैठे दलों के लिए “संतुलन साधने” का औजार रहा है और यह परिस्थिति गठबंधन सरकारों में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है. कुछ समय पूर्व तक राज्य के मुखिया नीतीश कुमार ने ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोइरी) समीकरण को बचाए रखने और भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक को संतुष्ट करने का प्रयास किया था.
वर्तमान मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी खुद भी कोइरी समुदाय से आते हैं वहीं, नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार (कुर्मी) को मंत्री बनाकार ‘लव-कुश’ समीकरण को मजबूत किया गया है. इस मंत्रिमंडल में कुर्मी-कोइरी समुदाय के साथ-साथ अन्य पिछड़ों (ओबीसी) को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है.
बताते चलें कि, राज्य बिहार में करीब 36 प्रतिशत आबादी अतिपिछड़ी जातियों का है. नीतीश कुमार ने इस वोट बैंक को साधने के लिए बुलो मंडल, दामोदर रावत, शीला मंडल जैसे चेहरों को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया किया गया है. साथ ही नीतीश कुमार के ‘सेक्युलर’ चेहरे को बनाए रखने की कोशिश के रूप में जमा खान को मंत्री बनाया गया है. वहीं, अनुसूचित जातियों से संतोष मांझी (महादलित), रत्नेश सादा, और लखेंद्र पासवान तथा संजय पासवान (पासवान समुदाय) को मंत्री बनाया गया है.
बिहार सरकार की नई मंत्रिमंडल में निशांत कुमार और दीपक प्रकाश जैसे युवा चेहरों के साथ-साथ उनके बुजुर्गों विजय कुमार सिन्हा, नितीश मिश्रा और राम कृपाल यादव को शामिल किया गया है. राजनितिक जानकारों के अनुसार, जद(यू) में परिवारवाद और उत्तराधिकार की राजनीति की शुरुआत हो सकती है, जिसका नीतीश कुमार ने एक समय विरोध किया था. नए मंत्रिमंडल में शिक्षा और पेशे पर भी विशेष ध्यान दिया गया है.
नई मंत्रिमंडल भले ही संतुलित दिखता हो, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियाँ हैं जिनमें – पहली बार भाजपा के मुख्यमंत्री और जदयू ‘साधारण’ विधायक दल के नेता हैं. एक तरफ भाजपा के ‘हार्डकोर’ कैडर और नीतीश कुमार के ‘विकास मॉडल’ के बीच तालमेल बैठाना सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी तो दूसरी तरफ, सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री हैं लेकिन, राज्य की राजनीति में नीतीश कुमार का प्रभाव अभी भी बहुत गहरा है. नए मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी चुनौती होगी मंत्रियों की संख्या बढ़ने के साथ ही प्रशासनिक खर्च भी बढ़ेगा। वित्तीय रूप से कमजोर राज्य बिहार में भारी भरकम मंत्रिमंडल पर खर्च किए जा रहे पैसे की सार्थकता पर भी सवाल उठेंगें।
सम्राट का मंत्रिमंडल विस्तार एक ऐतिहासिक और युगांतरकारी बदलाव की घटना है जो जो शासन की दिशा और समाज की अपेक्षाओं को जोड़ती है. करीब, दो दशकों के बाद, सत्ता की बागडोर नीतीश कुमार के हाथों से निकलकर एक भाजपा नेता और एक मजबूत ओबीसी चेहरे सम्राट चौधरी के पास आई है. अब देखना दिलचस्प होगा कि, सम्राट चौधरी राज्य बिहार के विकास के मॉडल को किस दिशा में ले जाती है. आने वाले समय में राजनीती में जो परिवर्तन हुआ है वो जनता की जनता की अपेक्षाओं और गठबंधन पर कितना खरा उतर पाती है.
संजय कुमार सिंह,
पोलिटिकल एडिटर.



