रिंकू का मन दुविधा में पड़ गया. एक तरफ़ पिछली मुलाकात का डर था, उन हथियारबंद लोगों का खयाल था. दूसरी तरफ़ उस आदमी की बेबसी भरी आवाज़ थी, उसकी जान पर बने खतरे का एहसास था. शहर में रहते हुए रिंकू ने इतना तो जान लिया था कि मुसीबत में किसी की मदद करना इंसानियत का तकाज़ा होता है, भले ही उसमें थोड़ा जोखिम क्यों न हो.
“कहाँ मिलना है?” रिंकू ने आखिरकार पूछा.
“क्या तुम… क्या तुम कल सुबह दस बजे शहर के म्यूजियम के पास आ सकते हो? मैं वहीं तुम्हारा इंतज़ार करूंगा.” आदमी की आवाज़ में थोड़ी उम्मीद झलकी.
“ठीक है, मैं आ जाऊंगा,” रिंकू ने कहा.
फ़ोन कट गया. रिंकू ने गहरी सांस ली. उसने विकास को फ़ोन करके इस मुलाकात के बारे में बताया.
“रिंकू, मुझे लगता है तुम्हें पुलिस को बताना चाहिए,” विकास ने चिंता भरी आवाज़ में कहा. “यह मामला और उलझता जा रहा है.”
“मैं समझता हूँ विकास, लेकिन मैं पहले उससे मिलकर जानना चाहता हूँ कि आखिर बात क्या है. शायद वह सब कुछ बता दे.”
“ध्यान रखना अपना,” विकास ने हिदायत दी. “अगर कुछ भी गड़बड़ लगे तो तुरंत मुझे फ़ोन करना.”
अगली सुबह रिंकू ठीक दस बजे शहर के म्यूजियम के पास पहुँच गया. उसने अपनी टैक्सी थोड़ी दूरी पर पार्क की और आसपास नज़रें दौड़ाईं. थोड़ी देर में उसे वही घबराया हुआ आदमी दिखाई दिया. वह एक बेंच पर बैठा हुआ था और लगातार इधर-उधर देख रहा था.
रिंकू उसके पास गया. “नमस्ते.”
आदमी ने चौंककर ऊपर देखा और फिर पहचान लिया. “तुम… तुम आ गए.” उसकी आवाज़ में राहत थी.
“हाँ. अब बताओ, क्या बात है? तुम किस मुसीबत में फंसे हो?” रिंकू ने सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा.
आदमी ने एक गहरी सांस ली और आसपास देखा कि कोई सुन तो नहीं रहा है. फिर उसने धीरे-धीरे अपनी कहानी सुनानी शुरू की.
उसका नाम शेखर था. वह एक छोटा व्यापारी था और उसे एक बड़े घोटाले के बारे में पता चल गया था जिसमें कुछ प्रभावशाली लोग शामिल थे. उसके पास उस घोटाले के कुछ सबूत भी थे. जब उसने उन लोगों को यह बात बताई तो उन्होंने उसे जान से मारने की धमकी दी.
“मैं पुलिस के पास गया था,” शेखर ने कहा, उसकी आवाज़ में निराशा थी. “लेकिन उन्होंने मेरी बात पर विश्वास नहीं किया. मुझे लगा कि वे भी उन लोगों से मिले हुए हैं.”
इसी डर से वह शहर छोड़कर भाग रहा था और उसने रिंकू से मदद मांगी थी. हरिपुर में उसके दोस्त ने भी उसकी मदद करने से इनकार कर दिया था, डर के मारे.
“और वे दो आदमी जो तुम्हें ढूंढ रहे थे?” रिंकू ने पूछा. “वे उन्हीं लोगों के गुंडे हैं. वे मेरे पीछे पड़े हैं ताकि मैं उन सबूतों को किसी के सामने न ला सकूँ.”
रिंकू सब कुछ समझ गया था. शेखर वाकई बड़ी मुसीबत में फंसा हुआ था, और उसे किसी पर भरोसा नहीं था.
“तुम्हारे पास वे सबूत कहाँ हैं?” रिंकू ने पूछा.
शेखर ने अपनी पुरानी अटैची की ओर इशारा किया जो उसके पास रखी थी. “इसी में हैं.”
रिंकू ने कुछ देर सोचा. अब उसे क्या करना चाहिए? उसे अब भी पुलिस पर भरोसा नहीं था, खासकर शेखर की आपबीती सुनने के बाद। लेकिन वह शेखर को इस तरह खतरे में भी नहीं छोड़ सकता था.
तभी रिंकू को एक विचार आया. वह एक स्थानीय पत्रकार को जानता था जो हमेशा भ्रष्टाचार और घोटालों के खिलाफ आवाज़ उठाता था. शायद वह शेखर की मदद कर सके.
“शेखर,” रिंकू ने कहा. “मैं तुम्हें एक ऐसे आदमी के पास ले जा सकता हूँ जो तुम्हारी मदद कर सकता है. वह एक पत्रकार है और वह सच्चाई को सामने लाने के लिए जाना जाता है.”
शेखर ने रिंकू की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देखा. “क्या तुम्हें लगता है वह मेरी मदद करेगा?”
“मुझे उम्मीद है,” रिंकू ने कहा। “अब हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है.”
रिंकू ने शेखर को अपनी टैक्सी में बैठाया और उस पत्रकार के ऑफिस की ओर चल दिया. रास्ते भर शेखर डरा हुआ और घबराया हुआ था, लेकिन रिंकू ने उसे हौसला दिया.
जब वे पत्रकार के ऑफिस पहुँचे, तो रिंकू ने शेखर को अंदर भेजा और बाहर उसका इंतज़ार करने लगा. उसे उम्मीद थी कि यह पत्रकार शेखर की कहानी सुनेगा और सच्चाई को सामने लाने में उसकी मदद करेगा.
शेष भाग अगले अंक में…,



