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क्या हमारी सोच कुंठित होती जा रही है ?

आधुनिक जीवन शैली में हमारी सोच कुंठित होती जा रही है. हम सभी अपनी बात मनवाने के लिए तमाम तरह के उपाय करते रहते हैं और कुछ हद तक कामयाब भी हो जाते हैं चाहे उसके कारण कुछ भी क्यों न हो? अक्सर हम सभी कुछ बातों को जेनेरेशन गैप कह कर टाल जाते हैं. आखिर ये जेनेरेशन गैप हम सभी जिसे कहते हैं ! क्या वो कुंठित सोच का हिस्सा नहीं है?आज हम सभी बड़े गर्व से कहते हैं कि, 21वीं सदी में जीवन यापन कर रहे हैं. 21वीं सदी में हाथ से कम मशीन से ज्यदा काम करते हैं या यूँ कहें कि मशीन युग में ही जीवन यापन कर रहे हैं.

मानसिक तनाव व बेरोजगारी की मार और गरीबी भी 21वीं सदी का हिस्सा है. हम सभी अपनी मूल जिन्दगी और स्वरूप से दूर होते जा रहे हैं, कुछ बातें तो किताबों में ही देखने को मिलती है. 21वीं सदी में प्रकृति या यूँ कहें कि आवो-हवा भी बदल गई है. इस बदलती जिन्दगी में सहारे की जरूरत नहीं होती है बस एक सीढ कि जरूरत होती है जो उसे ऊँचाइयों तक ले जा सके. 21वीं सदी में तनाव से हर कोई परेशान है चाहे बच्चा हो जवान हो या बुजुर्ग सभी इससे परेशान है कुछ हैरान व परेशान हैं तो कुछ ……

एक समय था जब हमारे बुजुर्ग कहते थे कि, बच्चों के पास क्या गम है सिर्फ खाना, खेलना और पढना ही तो है…. वर्तमान समय में बच्चे भी तनाव से गुजर रहें है, “क्या वो कल था”….. और आज क्या है? हम सभी पीढ़ियों को भुलाकर जेनेरेशन गैप का बहाना बना कर “वो कल” को भूल गये है य यूँ कहें कि भुलाने की पूरी कोशिस कर रहे हैं. एक समय था जब बारिश होती थी तो मिटटी की सुहानी खुशबु सूंघने में आनंद आता था लेकिन आज मिटटी की खुशबू की जगह धुंआ और सीमेंट की खशबू का आनंद लेते हैं. हमारी सोच तो आधुनिक हो गई है साथ मानसिक विकार भी और अधिक ज्घयन या यूँ कहें कि विकृत होती जा रही है.

वर्तमान समय का आलम यह है कि, मशीनी युग में सोच भी मशीनी होनी चाहिए, लेकिन हालत ये है कि, आधुनिक युग में मनुष्यों की सोच जाति और धर्म पर आकर सिमट गई है. हमे अपने इतिहास को बचाना और संवारना दोनों है लेकिन वर्तमान समय का आलम यह है कि मानव ने कितनी भी प्रगति कर ली हो, लेकिन सोच वही पुरातन ही है. धर्म ग्रन्थों या किताबों में लिखी बातों को हमसभी पढ़ते जरुर है लेकिन, जीवन में अमल करना नहीं जानते हैं. मशीनी युग में हमारी दिनचर्या में काफी परिवर्तन आया है, दिनचर्या के परिवर्तन से जिन्दगी के सोच और मायने ही बदल गये है.

आज के मानव हर जगह मानव समाज को नष्ट करने पर तुला हुआ है, और समाज मूक दर्शक बने बैठे हैं. चंद लोगों के निजी स्वार्थ के ही कारण, आज समाज के हर वर्ग में क्षोभ व्याप्त है, खासकर बच्चे और युवा जो देश के भविष्य हैं, वो चंद लोगों के कारण ही अपने भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं हैं. आज के बच्चे व युवाओं में तनाव बढ़ता ही जा रहा है. तनाव का आलम यह है कि, बच्चों में आत्महत्या की प्रवृति बढती ही जा रही है. दौडती-भागती जिन्दगी में आज के माता-पिता अपने बच्चों को कम समय या यूँ कहें कि, नहीं के बराबर समय देते है, जिसका प्रभाव भी बच्चों के मन पर पड़ता है.

विज्ञान ने प्रगति की है लेकिन, टेक्नोलोजी का ज्यादा प्रयोग भी बच्चों व यवाओं के मन मस्तिष्क पर पड़ता है और इसका असर इतना घातक और मीठा होता है. एक बार बच्चों या युवाओं को टेक्नोलॉजी की आदत लग जाने पड़ उससे बाहर निकालना आसन नहीं होता है. आज के बच्चों की पढाई की शुरुआत टेक्नोलॉजी या गैजेट से ही शुरू होती है. टेक्नोलॉजी या गैजेट से निकलने वाली घातक तरंगों या किरणों के प्रभाव में बच्चे या युवा रहते हैं, उन तरंगों का घातक प्रभाव बच्चे या युवाओं के मन व मस्तिष्क पर पड़ता है. आज के बच्चे जोड़, घटाव, गुणा और भाग करने के लिए कैलकुलेटर का प्रयोग करते है. आज के बच्चों का संसार गैजेट से शुरू होकर गैजेट पर ही खत्म हो जाता है.

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Is our thinking getting frustrated?

In the modern lifestyle, our thinking is getting frustrating. We all keep on doing all kinds of measures to get our point across and even become successful to some extent, no matter what is the reason for that.? Often we all avoid some things by saying generation gap. After all, what we all call this generation gap! Is it not a part of frustrated thinking? Today we all proudly say that we are living in the 21st century. In the 21st century, people work more with machines than with hands, or rather, they are living in the machine era.

Mental stress, unemployment, and poverty are also a part of the 21st century. We all are moving away from our original life and form, some things are seen only in books. In the 21st century, nature, or rather the air has also changed. There is no need for support in this changing life, only a ladder is needed which can take it to heights. In the 21st century, everyone is troubled by stress, be it a child, young or old, everyone is troubled by it, some are shocked and troubled, and some……

There was a time when our elders used to say that what do children have to worry about, they only have to eat, play and study… In present times children are also going through stress, “was that yesterday”…..And what is today? By forgetting all the generations, we have forgotten “that yesterday” by making an excuse for the generation gap, or rather we are trying our best to forget it. There was a time when it used to rain, and it used to be a pleasure to smell the pleasant smell of soil, but today instead of the smell of soil, we enjoy the smell of smoke and cement. Our thinking has become modern along with mental disorders are also becoming more and more serious or should we say that they are getting perverted.

The situation of the present time is that, in the mechanical age, thinking should also be mechanical, but the condition is that, in the modern age, the thinking of humans has been limited to caste and religion. We have to both save and decorate our history, but the situation of the present time is that no matter how much progress has been made by human beings, the thinking remains the same. We all definitely read the things written in religious books or books, but do not know how to implement them in life. In the machine age, there has been a lot of change in our daily routine, with the change of routine, the thinking and meaning of life have changed.

Today’s humans are bent on destroying human society everywhere, and societies are sitting as mute spectators. Because of the selfishness of a few people, today there is anger in every section of society, especially the children and youth, who are the future of the country, are playing with their future because of a few people. Tension is increasing day by day among children and youth. The situation of stress is that the tendency to suicide is increasing in children. In this running life, today’s parents give less time to their children, or rather, no time at all, which also affects the mind of the children.

Science has progressed, but excessive use of technology also affects the minds of children and youth and its effect is so deadly and sweet. Once children or youth get used to technology, it is not easy to get them out of it. The education of today’s children starts with technology or gadgets only. Children or youth live under the influence of harmful waves or rays emanating from technology or gadgets, those waves have a fatal effect on the mind and brain of the child or youth. Today’s children use calculators for addition, subtraction, multiplication, and division. The world of today’s children starts with gadgets and ends with gadgets only.

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