
नारी शक्ति वंदन अधिनियम…
भारतीय लोकतंत्र में आरक्षण एक अहम् मुद्दा या सवाल रहा है. वर्तमान समय के परिदृश्य में आरक्षण हर वर्गों को चाहिए. फ़िलहाल मैं बात कर रहा हूँ ” महिला आरक्षण विधेयक, 2023″ या यूँ कहें कि, नारी शक्ति वंदन अधिनियम. यह अधिनियम न केवल राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करता है, बल्कि देश के नीति-निर्धारण में ‘समान अधिकार और समान अवसर’ के संवैधानिक संकल्प को और भी मजबूती देता है. आधिकारिक तौर पर ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2023) के नाम से जाना जाने वाला यह विधेयक लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करता है. हालाँकि, इसकी यात्रा लगभग तीन दशकों से अधिक लंबी रही है, और इसके क्रियान्वयन को लेकर नई बहसें भी शुरू हो गई हैं.
बताते चलें कि, महिला आरक्षण विधेयक की कहानी की शुरुआत होती है देवगौड़ा सरकार से. एच. डी. देवगौड़ा की सरकार ने इसे पहली बार वर्ष 1996 में संसद में पेश किया था. तभी से यह विधेयक राजनीतिक गतिरोध और अलग-अलग सरकारों के शासनकाल में बार-बार अटकता रहा है. दूसरी बार वर्ष 2008 में, मनमोहन सिंह सरकार ने इसे फिर से संसद में पेश किया था. 9 मार्च 2010 को एक ऐतिहासिक क्षण आया, जब राज्यसभा ने इस विधेयक को पारित कर दिया, जहाँ पक्ष में 186 और विपक्ष में सिर्फ एक मत पड़ा था. हालाँकि, यह विधेयक लोकसभा में कभी पारित नहीं हो सका और अंततः 15वीं लोकसभा के साथ ही समाप्त भी हो गया था.
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ का मुख्य उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की कुल सीटों का एक-तिहाई हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित करना है. परन्तु, ये आरक्षण तुरंत प्रभावी नहीं होगा, बल्कि यह जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लागू किया जा सकेगा. बताते चलें कि, प्रस्तावित विधेयकों के अनुसार, लोकसभा की वर्तमान सीटों (543) को बढ़ाकर लगभग 850 किया जाना था, जिससे कुल सीटों पर 33% आरक्षण लागू होने पर महिला सांसदों की संख्या बढ़कर लगभग 283 हो जाती है. इसके अलावा, आरक्षित सीटों को एक राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में चक्रीय आधार पर आवंटित करने का भी प्रावधान है.
हाल ही में, केंद्र सरकार ने इस कानून को लागू करने के लिए तीन प्रमुख विधेयक पेश किए, जिनमें 131वां संविधान संशोधन विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक शामिल था. वहीं, सरकार का तर्क था कि वर्ष 1971 की जनगणना के बाद जनसंख्या में हुए बदलाव को देखते हुए परिसीमन और सीटों का विस्तार आवश्यक था. ज्ञात है कि 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में विधेयक पर मतदान हुआ, जिसमें यह 54 वोटों से गिर गया. पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े, जबकि इसे पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत (352 वोट) नहीं मिल सका. वहीं, विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण के सिद्धांत का समर्थन करते हुए भी विधेयक का विरोध कुछ मुद्दों पर रहा. उदाहरण – परिसीमन और दक्षिणी राज्यों का विरोध, ओबीसी आरक्षण का मुद्दा और प्रक्रियागत कमियाँ.
बताते चलें कि, विपक्ष का आरोप था कि सरकार महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़कर चुनावी ढाँचे में हेरफेर करना चाहती है. वहीं, दक्षिणी राज्यों के कई दलों का कहना था कि नए परिसीमन से उनकी संसदीय ताकत कम हो जाएगी, क्योंकि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण उत्तरी राज्यों के पक्ष में जाएगा. दूसरी तरफ कुछ सदस्यों का कहाँ था कि, कई दलों, विशेष रूप से पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले दलों का तर्क था कि महिला आरक्षण के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि, वर्ष1996 की संयुक्त संसदीय समिति ने भी यह सिफारिश की थी कि ओबीसी के लिए संविधान में संशोधन के बाद ही उनकी महिलाओं को आरक्षण दिया जाना चाहिए. साथ ही विपक्ष ने यह भी सवाल उठाया कि जब तक महिलाओं को इसका वास्तविक लाभ वर्ष 2029 या उसके बाद ही मिलेगा, तो अभी इतनी जल्दबाजी क्यों की जा रही है.
ज्ञात है कि, 131वां संविधान संशोधन विधेयक 2026 में पारित नहीं हो सका परन्तु, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (2023) को 16 अप्रैल 2026 से आधिकारिक रूप से लागू कर दिया गया है. इस अधिसूचना का अर्थ है कि कानून अब ‘कागज पर’ प्रभावी है, लेकिन इसका वास्तविक क्रियान्वयन अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन पर ही निर्भर करेगा.
बताते चलें कि, भारतीय राजनीति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बढ़ती आवश्यकता को रेखांकित करता है नारी शक्ति वंदन अधिनियम. ज्ञात है कि, वर्तमान समय में लोकसभा में करीब 14-15% भागीदारी महिलाओं की है. नारी शक्ति वंदन अधिनियम नामक बिल से पितृसत्तात्मक वंशवाद को बढ़ावा मिलेगा. चूकिं,इस बिल का फायदा सिर्फ राजनैतिक व्यक्तियों के परिवार को ही मिलेगा. इस बिल से आम महिलाएं कुछ भी हासिल नहीं करेंगी. उदाहरण – वर्तमान समय में पंचायत में जिन महिलाओं को आरक्षण का फायदा मिल रहा है वो पंचायत के रसूखदार परिवारों को ही मिल रहा है. इस बिल को लाने से महिला सीट तो बढ़ जाएगी परन्तु, इस बिल का फायदा नेता के पत्नी,बेटी और बहू को राजनीती में लाना आसान हो जाएगा. ज्ञात है कि, आम महिला तो गांव की एक मुखिया भी नहीं बन पाती है लेकिन, सांसद बनना तो दिवास्वप्न है.
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि आधी आबादी के प्रति राष्ट्र का सम्मान और विश्वास है. यह महिलाओं को राजनीति की मुख्यधारा में लाकर ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ के मंत्र को सिद्ध करने की दिशा में एक बड़ा कदम है. आने वाले दिनों में, यह देखना दिलचस्प होगा कि कैसे सरकार और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर आम सहमति बनती है और भारत की आधी आबादी को राजनीतिक सत्ता में उनका उचित स्थान कब और कैसे मिलता है!
संजय कुमार सिंह
राजनितिक एडिटर.



