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राजनीती…से ‘राम’ तक

राजनीती का अर्थ राज और नीति से बना है. परम्पराओं के देश में राजनीती का योगदान सिर्फ सत्ता पाने के लिए नहीं बल्कि, सत्ता, संस्कृति और राष्ट्र की चेतना का स्थायी आधार भी था. वहीँ, बात हो पुरुषोत्तम राम की तो भारत के राजनीतिक इतिहास और सामाजिक ताने-बाने में ‘राम’ केवल एक धार्मिक नाम नहीं, बल्कि एक वैचारिक धुरी रहे हैं. भारतीय राजनीति के केंद्र में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आगमन ने न केवल सत्ता के समीकरण बदले, बल्कि देश की परिभाषा और सांस्कृतिक पहचान को भी नए आयाम दिए. वर्तमान समय की राजनीति में राम का नाम चुनावी नारों से लेकर राष्ट्रीय विमर्श तक, नैतिकता और आदर्श शासन की कसौटी के रूप में प्रयुक्त होता है.

बताते चलें कि, भारतीय राजनीति में राम का उदय वर्ष 1980 के दशक के उत्तरार्ध में हुआ था. वर्ष 1989 के पालमपुर प्रस्ताव के साथ भाजपा ने राम मंदिर निर्माण को अपने आधिकारिक एजेंडे में शामिल किया. इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा (वर्ष 1990) ने भारतीय जनमानस को उद्वेलित किया. राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया. अयोध्या में राम जन्मभूमि विवाद ने न केवल धार्मिक भावनाओं को जगाया बल्कि राजनीतिक दलों के लिए जनसमर्थन जुटाने का माध्यम भी बना. एक तरफ भारतीय राजनीति में राम राज्य को आदर्श शासन की संज्ञा दी जाती है—जहाँ न्याय, समानता और धर्म की रक्षा होती है. यह अवधारणा आज भी राजनीतिक भाषणों और घोषणापत्रों में बार-बार दोहराई जाती है. राम भारतीय मानस में केवल देवता नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा हैं. इसीलिए राजनीतिक दल उन्हें सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं.

प्राचीन और मध्यकालीन भारत में, जब मध्य एशियाई शासकों का भारत में प्रवेश हुआ, तब संस्कृत साहित्य में इन आक्रांताओं को ‘तुरुष्क’ कहा गया और उनकी पहचान रावण की राक्षस सेना से जोड़ा गया. यह राम और रावण, दैवीय राजा और राक्षसी तानाशाह, ‘स्व और पर’ का वह द्वंद्व था जो बाद में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का आधार बना. महात्मा गांधी के लिए राम सत्य का नाम था. उनका ‘रामराज्य’ का सपना एक आदर्श राज्य की कल्पना थी, जहां सामाजिक न्याय, अहिंसा और सदाचार की स्थापना हो. गांधी ने ‘रघुपति राघव राजा राम’ को अपना प्रिय भजन बनाया और अल्लाह को भी राम का ही दूसरा नाम बताया.

लेकिन इसके विपरीत, दक्षिण भारत में पेरियार रामास्वामी नायकर के नेतृत्व में द्रविड़ आंदोलन ने राम को ब्राह्मणवादी वर्चस्व का प्रतीक मानकर उनका विरोध किया. वर्ष 1956 में उन्होंने राम की तस्वीरें जलाने का प्रयास किया और बाद में रामलीला के जवाब में रावणलीला का आयोजन किया. यह दर्शाता है कि राम का चरित्र भारत के विभिन्न क्षेत्रों और विचारधाराओं में कितने भिन्न अर्थों के साथ देखा जाता था. वर्ष 1987 में जब राजकीय चैनल दूरदर्शन पर रामानंद सागर की ‘रामायण’ का प्रसारण शुरू हुआ, तो यह भारतीय राजनीति और समाज के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ. लगभग 80-100 मिलियन दर्शकों तक पहुंचने वाली इस श्रृंखला ने एक ऐसी राम की छवि स्थापित की जो पूरे देश के लिए एक समान थी. इसने राम को स्थानीय परंपराओं और क्षेत्रीय भिन्नताओं से उपर उठाकर एक राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में परिवर्तित कर दिया.

इसी दौर में विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी ने राम जन्मभूमि आंदोलन को राष्ट्रीय मंच पर उठाया. 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का विध्वंस इस आंदोलन का चरम बिंदु था, जिसने पूरे देश में सांप्रदायिक दंगों को जन्म दिया और हजारों मुसलमानों की जान ले ली. इस घटना ने भारतीय राजनीति का मार्ग स्थायी रूप से बदल दिया – BJP जो वर्ष 1980 के दशक में मात्र दो लोकसभा सीटों वाली पार्टी थी, अब राष्ट्रीय स्तर की मुख्यधारा की पार्टी बन गई.

बताते चलें कि, राजा रवि वर्मा की पेंटिंग्स में राम को एक आदर्श राजकुमार के रूप में दिखाया गया था – सौम्य, संयत और भव्य। लेकिन 21वीं सदी में राम की छवि में आमूल-चूल परिवर्तन आया है. अब राम को एक उग्र योद्धा के रूप में चित्रित किया जाता है – धनुष पर तीर चढ़ाए, मांसपेशियां तनी हुई, चेहरे पर क्रोध की रेखाएं. यह परिवर्तन केवल सौंदर्यबोध का नहीं, बल्कि एक विशिष्ट राजनीतिक संदेश का वाहक है। जैसा कि इतिहासकार अनिरुद्ध कनीसेट्टी बताते हैं, “एंग्री हनुमान” और मस्कुलर राम की ये छवियां हिंदुत्व की उस मूल भावना को अभिव्यक्त करती हैं कि हिंदुओं को ऐतिहासिक रूप से ‘अपमानित’ किया गया और अब उन्हें ‘आक्रामक’ बनने की आवश्यकता है. वहीं, सोशल मीडिया और एआई-जनरेटेड विजुअल्स ने इस प्रक्रिया को और तेज(तीव्र) किया. एक तरफ फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप पर राम, हनुमान और शिव की ऐसी तस्वीरें वायरल होती हैं जो उन्हें सुपरहीरो की तरह प्रस्तुत करती हैं – जो हॉलीवुड कॉमिक्स से प्रेरित लगती हैं. वहीं, दूसरी तरफ यह “पश्चिमी पॉप कल्चर” और “हिंदू पारंपरिकता” का एक संकर रूप है, जो युवा पीढ़ी को एक नए प्रकार के धार्मिक-राष्ट्रवाद से जोड़ता है.

बताते चलें कि, 22 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की. यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था – यह भारतीय राजनीति का एक निर्णायक क्षण था. सरकार ने आधे दिन की छुट्टी घोषित की, पूरे देश में लाइव स्क्रीनिंग की गई, और अरबपति उद्योगपतियों से लेकर फिल्मी सितारों तक, सभी इस आयोजन में शामिल हुए. राजनीती के जानकारों के अनुसार, इस आयोजन के माध्यम से BJP ने वर्ष 2024 के आम चुनावों से पहले एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया – राम मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि हिंदू एकता और ‘विकसित भारत’ की नई राजनीतिक नैरेटिव का आधार है. नवंबर 2025 में राम मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वज स्थापित किया गया। प्रधानमंत्री मोदी और RSS प्रमुख मोहन भागवत ने इस अवसर पर वर्ष 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और वर्ष 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए एक नई रणनीति की रूपरेखा प्रस्तुत की. वहीं, मोदी ने अपने भाषण में राम मंदिर को ‘विकसित भारत वर्ष 2047’ के विजन से जोड़ा. उन्होंने कहा कि राम के भीतर जागरण ही विकसित भारत का मार्ग है। शबरी, निषादराज, अहिल्या, जटायु और गिलहरी जैसे पात्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने राम को दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों से जोड़ा.

राजनीती के जानकारों के अनुसार, वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में BJP को जो नुकसान हुआ, उसका मुख्य कारण हिंदू मतदाताओं में जातिगत विभाजन था. धर्म ध्वज समारोह को इसी को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था – विभिन्न जातियों और समुदायों के महानुभावों को सम्मानित किया गया, सोनभद्र और मिर्जापुर जैसे जिलों से बड़ी संख्या में आदिवासी नेताओं और पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया. इसके माध्यम से BJP उस 80:20 की नैरेटिव को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है, जिसके तहत 80% हिंदू एकजुट हों और 20% अल्पसंख्यक इस समीकरण से बाहर रहें. वही, पीएम मोदी ने विपक्ष पर ‘गुलाम मानसिकता’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि इस मानसिकता के बीज वर्ष 1835 में मैकाले ने डाले थे और वर्ष 2035 तक इससे पूर्ण मुक्ति भारत का लक्ष्य होना चाहिए. नौसेना के ध्वज से सेंट जॉर्ज क्रॉस हटाकर छत्रपति शिवाजी महाराज का प्रतीक लगाना इस ‘औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति’ का उदाहरण बताया गया.

हाल के वर्षों में ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरल फाइल्स’ और ‘छावा’ जैसी फिल्मों की सफलता ने हिंदू पीड़ा और प्रतिरोध की कथा को लोकप्रिय बनाया है. ‘छावा’ में संभाजी महाराज की मृत्यु को औरंगजेब के अत्याचार के रूप में दिखाया गया, जो ऐतिहासिक हिंदू-मुस्लिम द्वंद्व को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित करता है. विशेषज्ञों का मानना है कि जिस प्रकार तमिलनाडु में DMK की राजनीतिक सफलता से पहले उसकी विचारधारा का सिनेमाईकरण हुआ, उसी प्रकार ये फिल्में हिंदुत्व की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने का काम कर रही हैं.

ज्ञात है कि वर्ष 2025 के कुंभ मेले में लगभग 66 करोड़ लोगों ने स्नान किया था. यह आंकड़ा चौंकाने वाला है —रत की कुल हिंदू आबादी का आधा हिस्सा है.।प्राण प्रतिष्ठा समारोह में विपक्षी दलों के नेताओं की अनुपस्थिति उल्लेखनीय थी. कांग्रेस सहित कई दलों ने इसे ‘राजनीतिक प्रदर्शन’ करार दिया और सरकार पर धर्म का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया. लेकिन अधिक महत्वपूर्ण यह था कि चार प्रमुख शंकराचार्यों ने भी इस आयोजन से दूरी बनाए रखी. उनका कहना था कि अधूरे मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा शास्त्रों के विरुद्ध है, और प्रधानमंत्री धार्मिक अनुष्ठान कराने के लिए उचित व्यक्ति नहीं हैं. अगर बात की जय मुसलमानों की तो राम मंदिर मुस्लिम समुदाय के लिए एक खुले घाव की तरह है. मुस्लिम विद्वानों के अनुसार, “एक डर है कि यह सरकार और इससे जुड़े संगठन देश से इस्लामी सभ्यता के सभी निशान मिटाना चाहते हैं”. उनकी चिंता केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है – उत्तर भारत में कम से कम तीन ऐतिहासिक मस्जिदें अब कोर्ट में विवादित हैं, और हिंदुत्व संगठन सैकड़ों मस्जिदों पर दावा ठोकने के लिए याचिकाएं दायर कर रहे हैं.

वर्ष 2024 का अगस्त महीना शेख हसीना के पतन के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की खबरों ने भारत में हिंदू चेतना को नई ऊर्जा दी है. पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की घटती जनसंख्या और भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की बढ़ती जनसंख्या के बीच का अंतर अब राजनीतिक प्रवचन का हिस्सा बन गया है. विश्लेषकों के अनुसार, अयोध्या में जिस पैमाने पर राम मंदिर बनाया जा रहा है, वह इसे ‘हिंदू वेटिकन’ की तरह प्रस्तुत करेगा. यह अवधारणा न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर हिंदू डायस्पोरा को एक केन्द्र प्रदान करती है. वहीं, दुसरे विश्लेषक के अनुसार, राजनीतिक संप्रभुता को दैवीय स्वरूप प्रदान करना, और दानवीकरण एक निर्धारित ‘अन्य’ को राक्षसी स्वरूप में प्रस्तुत करना. हिंदुत्व की राजनीति इन दोनों तत्वों का सटीक उपयोग करती है. राम को दैवीय राजा के रूप में स्थापित करना, और मुस्लिम समुदाय को उस ‘राक्षसी अन्य’ के रूप में चित्रित करना जिसे पराजित किया जाना है. एक गंभीर चिंता यह है कि हिंदू धर्म धीरे-धीरे अब्राहमिक धर्मों की तरह एक केन्द्रीय पवित्र स्थल, एक प्रमुख देवता और एक प्रमुख ग्रंथ (गीता) पर निर्भर होता जा रहा है. यह हिंदू धर्म की उस विविधता और स्थानीयकरण की शक्ति को कमजोर करता है जिसने सदियों से इस धर्म को बचाए रखा था.

राम भारतीय चेतना का अटूट हिस्सा हैं. लेकिन, जब राम राजनीति के ‘चरित्र’ बन जाते हैं, तो उनकी सार्वभौमिकता संकीर्ण होने लगती है. गांधी का राम, तुलसीदास का राम, कम्बन का राम और आज के राजनीतिक राम के बीच की दूरी भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण परीक्षण है. राम भारतीय राजनीति में नैतिकता, आदर्श शासन और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं. लेकिन जब उनका नाम केवल सत्ता प्राप्ति के साधन के रूप में प्रयोग होता है, तो यह उनके आदर्शों के साथ अन्याय है. राजनीति को राम से प्रेरणा लेकर त्याग, न्याय और समरसता को व्यवहार में उतारना होगा—तभी सच्चे अर्थों में राम राज्य की स्थापना संभव होगी.

संजय कुमार सिंह,

पोलिटिकल एडिटर. 

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