
त्रियामी संबंध हैं राम के…
रामनवमी पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को हिंदुओं के महापर्व के रूप में धूम-धाम से मनाया जाता है. यह पर्व भगवान विष्णु के सातवें अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जन्म दिवस का प्रतीक है तथा भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है. रामनवमी एक पर्व के रूप में आध्यात्मिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन के गहराई से जुड़ा हुआ है जो राम के आदर्श जीवन से प्रेरित है. यह धार्मिक त्यौहार होने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, सामाजिक संगठन और राजनीतिक चेतना का प्रतीक बन चुका है.
रामनवमी पर्व को हिंदुओं की भावनाओं के रूप में धर्म, सत्य, मर्यादा और आत्मशुद्धि का प्रतीक माना जाता है. इस दिन हिंदू जन व्रत, पूजा, रामायण-पाठ और मंत्र जाप कर अपने तन-मन को शुद्ध करते हैं जिससे उनमें आंतरिक शांति, धैर्य, कर्तब्यबोध और दिव्य गुणों का विकास एवं आध्यात्मिक जागरण होता है. रामनवमी पर्व सामाजिक रूप से यह सामाजिक समावेशन, एकता, समरसता और भाईचारे को बढ़ावा देता है. यह आदर्श समाज की स्थापना “राम राज्य” के मूल्यों, न्याय, समानता और नैतिकता के रूप में बनाए रखना सिखाता है. समरसता के रूप में यह पर्व राम के जीवन में समाज के हर वर्ग जैसे केवट, शबरी जैसे नीची जाति, समाज के दबे कुचले लोगों, यहां तक कि वानर सेना को भी प्रेम और सम्मान देने एवं एकता के संदेश का पाठ पढ़ाता है. अतः इस दिन समाज के सभी वर्गों के साथ शोभा-यात्राएं, मंदिरों में समारोह और सामूहिक भजन-कीर्तन जैसी गतिविधियों से समाज में एकता, सह-अस्तित्व और सामाजिक समरसता की भावना बढ़ाती है. समाज में भेदभाव को खत्म कर, सभी वर्गो का आदर करना, ये सब श्रीराम के जीवन प्रेरणा स्रोत है.
रामनवमी पर्व का राजनीतिक पहलू “रामराज्य” की अवधारणा से प्रेरित है जो एक आदर्श शासन का प्रतीक है. इसमें धर्म एवं कर्तव्य के अनुसार प्रशासन की परिकल्पना है जहां जनता के कल्याण को प्राथमिकता देने की बात कही गई है. आधुनिक समय में रामनवमी एक धार्मिक पर्व के साथ साथ राजनीतिक चेतना और चुनावी रणनीति का भी हिस्सा बन चुकी है. कई राजनीतिक दल इस पर्व की आड़ में रामनवमी शोभा यात्राओं, “रामराज्य के नारे” और “जय श्रीराम” के नारे के साथ जनता के धार्मिक भावनाओं से जोड़कर अपनी छवि और जन समर्थन बनाकर राजनीतिक लाभ ले लेने की भरपूर चेष्टा करते हैं. इस त्यौहार के बहाने हिंदुओं की छवि को सामने रखकर ” हथियार बंद राजनीति ” और ” सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ” का प्रतीक बनाने की कोशिश की जाती है.
उदाहरणस्वरूप आजकल भारत के कई राज्यों में विधानसभा का चुनाव होने वाला है जैसे पश्चिम बंगाल , जहां रामनवमी के संदर्भ में राजनीतिक विवाद इसलिए उठ रहा है, क्योंकि यहां यह त्यौहार सिर्फ धार्मिक आयोजन से निकलकर दो मुख्य राजनीतिक दलों — तृणमूल कांग्रेस (TMC) तथा भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच सांप्रदायिक तनाव, हिंदू शक्ति दिखाने की होड़ और चुनावी जमीन बनाने की कोशिश जारी है। यहां TMC के मुस्लिम वोटों को काटने के लिए हिंदुत्व का नारा देकर हिंदू वोटरों को लुभाने का एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने की अनवरत चेष्टा जारी है.
श्री राम को “मर्यादा पुरुषोत्तम” उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं के कारण उन्हें आदर्श नायक बनाती है, जैसे पुत्र धर्म, जहां अपने पिता के दिए कैकयी के वचनों का सम्मान करने के लिए 14 वर्ष का बनवास स्वीकार करना, पति धर्म का निर्वहन, जहां बनवास के दौरान रावण-हरित सीता की खोज में दर दर भटकना और अपनी अटूट निष्ठा व प्रेम का परिचय देना. कुछ अन्य घटनाएं जैसे अहंकार त्याग, जहां लंका विजय के बाद भी वहां का राजा न बनकर विभीषण को राज्य सौंप देना, वानर सुग्रीव, निषादराज और केवट को गले लगाकर भेदभाव रहित प्रेम दर्शाना, रावण जैसे शत्रु की मृत्यु के बाद उन्हें सम्मान देना उच्च नैतिक मूल्यों और शत्रु के प्रति आदर दर्शाना जो मर्यादा युक्त है.
अयोध्या लौटकर न्यायप्रिय और लोक कल्याणकारी नीति अपनाते हुए”रामराज्य” रूपी आदर्श शासन की स्थापना राज धर्म का उदाहरण है. संक्षिप्त में श्री राम ने जीवन की हर विपरीत परिस्थिति में धर्म, नैतिकता, धैर्य और कर्तव्य की मर्यादाओं का पालन किया जो आदर्शों की सर्वोच्च मिसाल है अतः उन्हें सर्वोत्तम पुरुष की संज्ञा दी गई.
श्री राम का स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण अत्यंत सम्मान जनक मर्यादित एवं करुणामयि था. उनके प्रमुख योगदान में नारी सम्मान, समानता और सशक्तिकरण का सर्वोच्च आदर्श है.
- नारी शक्ति का सम्मान और उद्धार में उन्होंने नारी चरित्रों को सदा सम्मान दिया और माता अहिल्या को गौतम ऋषि के श्राप के कारण जो पत्थर की मूरत बन गई थी, श्री राम के चरण स्पर्श उनका उद्धार कर उन्हें उनका स्थान वापस दिलाया.
- एक-पत्नी व्रत का पालन श्री राम के द्वारा निभाना जहां उस युग में राजाओं की कई पत्नियां हुआ करती थी, लेकिन श्री राम ने सीता को ही अपनी पत्नी माना और पूर्ण रूप से उन पर निष्ठा और समर्पण बनाए रखा.
- शबरी के रूप में जाति और सामाजिक स्थिति के बंधनों को तोड़ते हुए वृद्ध तपस्विनी शबरी का आतिथ्य स्वीकार किया और प्रेम से दिए जूठे बेर को खाया और उनकी भक्ति और प्रेम को सर्वोच्च सम्मान दिया.
- रावण वध के पश्चात उनकी पत्नी मंदोदरी के प्रति श्री राम ने बिना कोई द्वेष दिखाए रावण के छोटे भाई विभीषण को रानी मंदोदरी का उचित सम्मान और राज्य में “रानी” का गौरव प्रदान करने की सलाह दी जो शत्रुओं की स्त्रियों का सम्मान देने का मिसाल है.
- बनवास के बाद, श्री राम ने स्वयं मंथरा से मिलने की इच्छा जताते हुए उनके कक्ष में गए और उन्हें क्षमा करते हुए ‘ माता ‘ कहकर संबोधित किया, जबकि मंथरा के कूटनीति के कारण ही उन्हें 14 वर्ष का बनवास मिला था, ये उनके सौम्यता और क्षमा का प्रतीक है.
- सीता का स्वेच्छा से महल का सुख त्याग कर एक गेरूआ वस्त्रधारी संन्यासिन के रूप में श्री राम के साथ वन गमन का दृढ़ निर्णय लेना और श्री राम का इस स्वतंत्र निर्णय का सम्मान करना उनकी समानता और स्वाभिमान को दर्शाता है.
रामनवमी पर्व आध्यात्मिक स्वरूपों में व्यक्ति को धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने, सामाजिक स्तर पर समरसता, भाई चारा और एकता बढ़ाने तथा राजनीतिक स्तर पर राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पहचान को जोड़ने वाला एक बहुआयामी त्यौहार है. रामनवमी हमें संदेश देता है कि सच्चा रामत्व केवल राम का नाम लेने में नहीं बल्कि उनके दिखाए गए मार्ग — साहस, संयम और अटूट ईमानदारी पर चलने में है. यह पर्व व्यक्ति से लेकर समाज और राष्ट्र तक को आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करता है जिसे हर लोगों के दिल में पूरी तरह आत्मसात हो जाना चाहिए.
डॉ. अमरेंद्र कुमार,
एजुकेशनल एडिटर.



