नदी के किनारे बसा था वह शहर था जिसका नाम कभी सरस्वतीपुर था, अब लोग उसे सिर्फ ‘सरपुर’ कहते थे. यहाँ की गलियाँ अभी भी उस समय की गूँज रखती थीं जब हिन्दू-मुस्लिम साथ-साथ चलते थे, जब मंदिर की घंटी और मस्जिद की अज़ान एक-दूसरे की पूरक थीं. पर अब… अब यहाँ सिर्फ़ दरारें थीं जो सड़कों पर, दीवारों पर, और दिलों में…
यह कहानी है उन तीन परिवारों की, जो इसी शहर में रहते थे एक हिन्दू, एक मुस्लिम, और एक जो किसी धर्म का नहीं, सिर्फ़ इंसानियत का था. और यह कहानी है उस मौन की, जो इन सबके बीच पल-पल बढ़ता गया, जब तक कि एक दिन वह मौन फूट नहीं पड़ा.
अध्याय 1
श्यामलाल की दुकान पर सुबह-सुबह ही भीड़ लग जाती थी. चाय की भाप उठती, अखबारों की सरसराहट होती, और बातें होतीं थी गाँव की, शहर की, देश की. श्यामलाल खुद चाय बनाता, मिठाई तोलता, और हर ग्राहक का हाल-चाल पूछता. उसकी दुकान सरपुर का वह केंद्र थी जहाँ सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के लोग आते थे.
पर पिछले कुछ महीनों में कुछ बदला था. अब हिन्दू अपनी चाय अलग पीते थे, मुस्लिम अलग. किसी ने कहा नहीं, पर ऐसा हो गया था जैसे कोई अदृश्य रेखा खिंच गई हो.
एक दिन श्यामलाल की दुकान पर वकील साहब आए, अब्दुल रहमान, पुराने मित्र. वे बरसों से साथ पढ़े थे, साथ वकालत शुरू की थी. पर आज अब्दुल रहमान ने दूसरे मेज़ पर बैठने को कहा.
“क्यों भाई?” श्यामलाल ने पूछा, उसकी आँखों में नमी थी.
“बस यूँ ही,” अब्दुल रहमान ने आँखें झुका लीं। “लोग कहते हैं… तुम्हारी दुकान पर आने वालों को…”
श्यामलाल ने कुछ नहीं कहा. उसने चाय बनाई, अब्दुल रहमान के सामने रखी, और दूसरी मेज़ पर जा बैठा। चाय ठंडी हो गई, पर पी नहीं गई.
उस रात श्यामलाल ने अपनी पत्नी से कहा, “ये शहर अब वो नहीं रहा।”
उसकी पत्नी ने कहा, “तो चलो यहाँ से। कहीं और.”
श्यामलाल ने खिड़की से बाहर देखा चौराहे पर वही चिनार का पेड़ था जिसके नीचे वह और अब्दुल रहमान बच्चों में खेला करते थे. उसकी जड़ें गहरी थीं। उसका सरपुर भी उसी पेड़ की तरह था जड़ें गहरी, पर शाखाएँ कटती जा रही थीं.
“नहीं,” उसने कहा, “मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा. ये शहर मेरा है.”
शेष अगले अंक में,



