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व्यक्ति विशेष -986.

चिकित्सा विज्ञानी रमन विश्वनाथन

डॉ. रमन विश्वनाथन एक भारतीय चिकित्सा विज्ञानी और चिकित्सक थे, जो अपने योगदान के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं. उन्होंने भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया, विशेषकर पल्मोनरी मेडिसिन (फुफ्फुसीय चिकित्सा) के क्षेत्र में. डॉ. रमन विश्वनाथन का जन्म 8 सितंबर 1899 को नागरकोइल, तमिलनाडु में हुआ था. उन्होंने अपनी चिकित्सा शिक्षा मद्रास मेडिकल कॉलेज से पूरी की और बाद में लंदन से चिकित्सा में उच्च शिक्षा प्राप्त की.

डॉ. रमन विश्वनाथन ने चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान दिया. उन्होंने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली में चिकित्सा के प्रोफेसर और प्रमुख के रूप में कार्य किया. उनके नेतृत्व में, AIIMS में फुफ्फुसीय चिकित्सा विभाग को स्थापित किया गया और इसे देश के प्रमुख चिकित्सा केंद्रों में से एक बनाया गया.

डॉ. विश्वनाथन ने फुफ्फुसीय चिकित्सा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण अनुसंधान किए और नई उपचार विधियों का विकास किया. उनके अनुसंधान ने भारत में तपेदिक (टीबी) और अन्य फेफड़ों के रोगों के उपचार में महत्वपूर्ण प्रगति की. उन्होंने चिकित्सा विज्ञान पर कई शोध पत्र और लेख लिखे, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जर्नलों में प्रकाशित हुए. उनके लेखन ने चिकित्सा क्षेत्र में नई दिशा प्रदान की और अन्य चिकित्सकों को प्रेरित किया.

डॉ. रमन विश्वनाथन को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए. उन्हें भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा सम्मानित किया गया और वे कई चिकित्सा संगठनों के सदस्य और अध्यक्ष भी रहे. डॉ. रमन विश्वनाथन एक सरल और समर्पित व्यक्ति थे. वे अपने मरीजों और छात्रों के प्रति हमेशा समर्पित रहे और उनकी सेवा भावना ने उन्हें एक आदर्श चिकित्सक और शिक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया.

डॉ. रमन विश्वनाथन का निधन 14 जुलाई 1982 को हुआ था. उनके निधन से भारतीय चिकित्सा क्षेत्र ने एक महान वैज्ञानिक और चिकित्सक को खो दिया. उनके योगदान और अनुसंधान आज भी चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में मार्गदर्शन का स्रोत बने हुए हैं.

डॉ. रमन विश्वनाथन का जीवन और कैरियर भारतीय चिकित्सा विज्ञान में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा. उनकी सेवा, अनुसंधान, और शिक्षा के प्रति समर्पण ने उन्हें एक महान चिकित्सा विज्ञानी और प्रेरणा का स्रोत बना दिया. उनके द्वारा किए गए कार्य और उनके आदर्श आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक बने रहेंगे.

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हॉकी खिलाड़ी रूप सिंह

हॉकी का जिक्र आते ही सबसे पहले जो नाम आता है वो हैं मेजर ध्यानचंद. लेकिन, दुसरा नाम मेजर ध्यानचंद के दूसरे भाई रूप सिंह जिन्हें हॉकी के ‘चाँद’ कहा जाता था. वे विश्व हॉकी के सबसे महान इनसाइड-लेफ्ट फॉरवर्ड खिलाड़ियों में से एक माना जाता है, जिनकी गति, अद्भुत गेंद नियंत्रण और गोल करने की क्षमता बेजोड़ थी.

 रूप सिंह का जन्म 8 सितंबर 1908 को जबलपुर (तत्कालीन मध्य प्रांत) में हुआ था. वह एक ऐसे परिवार से आए थे जिसने भारतीय खेल को एक नहीं, बल्कि दो महान खिलाड़ी दिए. अपने बड़े भाई ध्यानचंद की तरह, रूप सिंह ने भी सेना में रहते हुए हॉकी खेलना शुरू किया और बहुत जल्द ही अपनी असाधारण प्रतिभा से ध्यान आकर्षित किया.

रूप सिंह भारतीय राष्ट्रीय हॉकी टीम के सदस्य थे जिसने वर्ष 1932 लॉस एंजिल्स ओलंपिक और वर्ष 1936 बर्लिन ओलंपिक में लगातार दो स्वर्ण पदक जीते थे. उनकी अविश्वसनीय गति, फिनिशिंग की सटीकता और ध्यानचंद के साथ उनकी शानदार तालमेल के लिए जाना जाता था. उनके और बड़े भाई ध्यानचंद के बीच मैदान पर ऐसी समझ थी कि गेंद उनके स्टिक के साथ एक जादू की तरह नाचती थी.

रूप सिंह ने 16 दिसंबर 1977 को दुनिया को अलविदा कहा. उनका योगदान भारतीय हॉकी के स्वर्णिम युग का एक अभिन्न अंग है. ध्यानचंद जहाँ भारतीय हॉकी के ‘जादूगर’ थे, वहीं रूप सिंह उनकी टीम के सबसे घातक स्ट्राइकर थे, जिनकी गोल स्कोरिंग क्षमता ने भारत को विश्व हॉकी के शिखर पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

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गायक भूपेन हज़ारिका

भूपेन हज़ारिका भारतीय गायक, संगीतकार, गीतकार, कवि और फिल्म निर्माता थे. उनका जन्म 8 सितंबर 1926 को असम में हुआ था. उन्हें असमिया, हिंदी और बंगाली भाषाओं में अपने गाने और संगीत के लिए जाना जाता है, और उन्होंने भारतीय लोक संगीत और पारंपरिक धुनों को अपने संगीत में शामिल करके उसे एक अनूठा रूप दिया. भूपेन हज़ारिका को उनके गहरे, प्रभावशाली और काव्यात्मक गीतों के लिए “संगीतकार, कवि और मानवतावादी” के रूप में सम्मानित किया गया.

भूपेन हज़ारिका का संगीत सामाजिक संदेशों, मानवीय संवेदनाओं और समाज में व्याप्त विषमताओं को दर्शाने के लिए जाना जाता है. उनके गाने जैसे “गंगा बहती हो क्यों” और “दिल हूम हूम करे” ने न केवल संगीत प्रेमियों को प्रभावित किया बल्कि सामाजिक समस्याओं की ओर भी ध्यान आकर्षित किया. हज़ारिका ने असमिया और हिंदी फिल्मों में संगीत निर्देशन किया और कई यादगार धुनें दीं.

गायक और संगीतकार भूपेन हज़ारिका का निधन 5 नवंबर 2011 को मुम्बई के कोकिलाबेन धीरूबाई अंबानी अस्पताल में हुआ था. उनके योगदान को मान्यता देने के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया. उन्हें मरणोपरांत 2019 में भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया. भूपेन हज़ारिका की संगीत यात्रा और उनके समाज को जागरूक करने वाले गाने उन्हें हमेशा संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित रखेंगे.

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पार्श्व गायिका आशा भोंसले

आशा भोसले के पिता दीनानाथ मंगेशकर एक प्रसिद्ध नाटकीय अभिनेता और शास्त्रीय गायक थे. आशा का जन्म 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था. करीब  पांच साल की छोटी उम्र में ही उनके पिता का देहांत हो गया. इसके बाद परिवार ने अत्यधिक कठिनाइयों का सामना किया. उसके बाद उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर ने परिवार की कमान संभाली और आशा ने भी बचपन से ही संगीत सीखना शुरू कर दिया था, लेकिन उनका रास्ता लता जी की तुलना में अधिक कठिन था. शुरुआती दिनों में उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा.

आशा भोसले की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अद्भुत बहुमुखी प्रतिभा है. उनकी आवाज़ में वह क्षमता है जो भारी-भरकम शास्त्रीय रागों से लेकर सिहरन भरे कैबरे गीतों तक, दिल को छू लेने वाले शोकगीतों से लेकर जोश भरे देशभक्ति गीतों तक हर रंग में रंग सकती है. उन्होंने ‘राग मालकौंस’, ‘राग दरबारी’ जैसे दुर्लभ रागों में भी गाया है. फिल्म ‘देवदास’ (2002) का गीत “मारा पिया घर आए” उनके शास्त्रीय ज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण है. वहीं, आशा ताई ने ठुमरी शैली को आधुनिक ढांचे में पिरोकर फिल्म: अब के बरस का गाना “अब के बरस भेजो” को अमर कर दिया.

आशा ताई ने वर्ष 1960-70 के दशक में कैबरे गीतों को नई परिभाषा देते हुए “मेरा नाम चिन चिन चू” (हाउस नंबर 44), “पिया तू अब तो आजा” (कारवां), “ये मेरा दिल” (डॉन) गाने गा कर एक नई मिसाल पेश की और उन्हें ‘कैबरे क्वीन’ का दर्जा मिला। बताते चलें कि, इन गीतों में उनकी आवाज़ में एक विशेष तरह का ठसक, बेपरवाही और शरारत है, जो उस समय की नायिकाओं के लिए बिल्कुल नया था. वहीं, उनके गाये भावनात्मक गीतों में एक अलग गहराई थी. उदाहरण – फिल्म ‘आनंद’ का “कहीं दूर जब दिन ढल जाए” या ‘उमराव जान’ का “दिल चीज़ क्या है” जैसे गीतों में उनकी आवाज़ में करुणा और संवेदनशीलता का अद्भुत मेल देखने को मिलता है.

आशा भोसले ने दो विवाह किया था. पहला विवाह उन्होंने गणपत राव भोसले से की जो पूरी तरह से असफल रही. इस दौरान उन्होंने मानसिक व शारीरिक संघर्ष से भी दो-चार होना पड़ा था. उसके बाद उन्होंने दूसरा विवाह संगीतकार आर.डी. बर्मन से किया. और उनका यह साझा सफर सबसे चर्चित रहा. बताते चलें कि, पति-पत्नी होने के साथ-साथ, वे एक अद्भुत संगीत जोड़ी थे. पंचम के प्रयोगशील और पश्चिमी संगीत से प्रभावित धुनों को आशा जी ने अपनी दमदार और अनुशासित आवाज़ से जीवंत किया। उदाहरण – “दम मारो दम”, “मेहबूबा मेहबूबा”, “छुरा लिया है तुमने”.

गीत:  –  “पिया तू अब तो आजा”, “ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली”, “दम मारो दम”, “चुरा लिया है तुमने जो दिल को”, “दिल चीज़ क्या है”, “मेरा कुछ सामान”, “रंगीला रे” “हंगामा हो गया”….

आशा भोसले ने पारंपरिक शास्त्रीय से लेकर आधुनिक पॉप तक हर शैली में अपनी पहचान बनाई. उनकी आवाज़ ने भारतीय समाज में स्त्री की बदलती छवि को भी दर्शाया. उन्होंने ‘प्लेबैक सिंगिंग’ को पुनर्परिभाषित किया, यह दिखाते हुए कि गायिका केवल पर्दे के पीछे की आवाज़ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीक भी हो सकती है.

आशा भोसले का निधन 12 अप्रैल 2026 को 92 वर्ष की आयु में हुआ था. आशा भोसले सिर्फ एक गायिका नहीं हैं बल्कि, वे भारतीय महिला सशक्तिकरण की एक अनकही मिसाल हैं, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपनी धुन बनाई और पूरी दुनिया को थिरकना सिखाया. उनकी विरासत यह है कि उन्होंने संगीत की किसी एक शैली को अपना घर नहीं बनाया, बल्कि हर शैली में खुद को ढाला और हर शैली को अपना बना लिया.

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अभिनेता सतीश कौल

सतीश कौल एक भारतीय अभिनेता थे, जिन्होंने मुख्य रूप से हिंदी और पंजाबी फिल्मों में काम किया. उनका जन्म 08 सितंबर  1946 को कश्मीर में हुआ था. उन्हें अपने समय के सबसे प्रमुख और लोकप्रिय अभिनेताओं में से एक माना जाता था. कौल ने वर्ष 1970 – 80 के दशक में अपने अभिनय कैरियर के चरम पर बहुत सी फिल्मों में काम किया और विविध भूमिकाओं में अपनी प्रतिभा दिखाई.

सतीश कौल को विशेष रूप से पंजाबी फिल्म उद्योग में उनके योगदान के लिए याद किया जाता है, जहां उन्होंने कई हिट फिल्मों में अभिनय किया. वे अपने विविध अभिनय कौशल के लिए प्रसिद्ध थे, जिसमें वे नायक, सहायक भूमिका और यहाँ तक कि खलनायक के रूप में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकते थे.

कौल ने न केवल फिल्मों में, बल्कि टेलीविजन पर भी काम किया. सतीश कौल ने धारावाहिकों में भी अभिनय किया, जिसमें सबसे उल्लेखनीय भूमिका बी.आर. चोपड़ा की महाभारत में थी, जहाँ उन्होंने इंद्र की भूमिका निभाई थी. उनके व्यापक अभिनय कैरियर के बावजूद, सतीश कौल के बाद के जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिसमें वित्तीय संकट और स्वास्थ्य समस्याएं शामिल थीं. उनके जीवन के इस पहलू ने मनोरंजन उद्योग के प्रति लोगों की सहानुभूति और चिंता को आकर्षित किया.

सतीश कौल का निधन 10 अप्रैल 2021 को हुआ था, लेकिन उनके अभिनय का योगदान और उनकी फिल्में आज भी उनके प्रशंसकों द्वारा याद की जाती हैं. उनके निधन के समय, फिल्म और टेलीविजन उद्योग के कई सदस्यों और प्रशंसकों ने उनके योगदान को याद किया और शोक व्यक्त किया.

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स्वतंत्रता सेनानी फ़ीरोज़ गाँधी

फ़िरोज़ गांधी एक स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ और पत्रकार थे. वह भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पति और राजीव गांधी और संजय गांधी के पिता थे.

फ़ीरोज़ गाँधी का जन्म 12 सितम्बर 1912 को मुम्बई के एक अस्पताल में पारसी परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम जहाँगीर एवं माता का नाम रतिमाई था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा -दीक्षा इलाहाबाद में हुई. वह बहुत कम उम्र में ही महात्मा गांधी से प्रभावित होकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए थे. उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे कई महत्वपूर्ण आंदोलनों में भाग लिया और कई बार जेल भी गए.

आज़ादी के बाद, फ़ीरोज़ एक सफल राजनीतिज्ञ बने. वो वर्ष 1952 में रायबरेली से लोकसभा सांसद चुने गए और वर्ष 1957 में दोबारा इसी सीट से जीते। उन्होंने संसद में एक प्रभावशाली सदस्य के रूप में अपनी पहचान बनाई. वह भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुखर आवाज़ के लिए जाने जाते थे. 

फ़िरोज़ गांधी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने द नेशनल हेराल्ड और द नवजीवन जैसे अख़बारों का प्रकाशन किया और उन्हें चलाने में भी मदद की. फ़ीरोज़ ने वर्ष 1942 में इंदिरा नेहरू से शादी की, जो बाद में इंदिरा गांधी बनीं. उनके दो बेटे थे, राजीव गांधी और संजय गांधी. फ़िरोज़ गांधी का निधन 8 सितंबर 1960 को 48 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से हुआ था.

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भूतपूर्व केन्द्रीय कानून मंत्री राम जेठमलानी

राम जेठमलानी एक प्रसिद्ध भारतीय वकील, राजनीतिज्ञ और भूतपूर्व केंद्रीय कानून मंत्री थे. उन्हें भारतीय न्यायिक प्रणाली में सबसे तेज-तर्रार और विवादास्पद वकीलों में से एक माना जाता था. उनका कानूनी कैरियर लगभग सात दशकों तक फैला रहा, और उन्होंने कई हाई-प्रोफाइल मामलों में अपना प्रभावशाली कौशल दिखाया.

राम जेठमलानी का जन्म 14 सितंबर 1923 को सिंध (अब पाकिस्तान) के शिकारपुर में हुआ था. उन्होंने बहुत कम उम्र में कानून की पढ़ाई पूरी की, और 17 साल की उम्र में कानून की डिग्री प्राप्त की. भारत के विभाजन के बाद जेठमलानी भारत आए और यहां उन्होंने वकालत शुरू की. वे प्रमुख आपराधिक मामलों में अपनी प्रभावशाली वकालत के लिए प्रसिद्ध हुए. उनका कानूनी कैरियर उन्हें भारत के सबसे महंगे और सफल वकीलों में से एक बन गये.

राम जेठमलानी ने कई हाई-प्रोफाइल आपराधिक मामलों में वकालत की, जिनमें राजनीतिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील मुद्दे शामिल थे. वे भारतीय न्यायपालिका के सबसे प्रमुख और अनुभवी वकीलों में गिने जाते थे. उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों में अभियुक्तों का बचाव किया, जो जनता और मीडिया में अत्यधिक चर्चा का विषय बने.

जेठमलानी न केवल एक वकील थे, बल्कि उन्होंने भारतीय राजनीति में भी अहम भूमिका निभाई. उन्होंने कई बार लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य के रूप में कार्य किया. वे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से जुड़े रहे और कुछ समय तक अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय कानून मंत्री भी रहे. वे वर्ष 1996 और 1998-2000 तक कानून मंत्री और शहरी विकास मंत्री रहे. जेठमलानी ने राजनीति में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया और कई बार बीजेपी और अन्य राजनीतिक दलों के साथ जुड़े रहे.

जेठमलानी अपनी बेबाकी और स्पष्टवादिता के लिए प्रसिद्ध थे. वे अक्सर अपने बयानों और विवादित विचारों के कारण सुर्खियों में रहते थे, चाहे वह राजनीतिक हों या कानूनी मुद्दे.

राम जेठमलानी का व्यक्तित्व बेहद प्रभावशाली था, और वे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने अपने जीवन में बड़ी मेहनत और आत्मविश्वास से सफलता प्राप्त की.08 सितंबर 2019 को उनका निधन हुआ था, लेकिन उनकी कानूनी और राजनीतिक विरासत आज भी भारतीय समाज में गहरी छाप छोड़ती है.

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