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गुप्ता धाम…

बिहार के घने जंगलों के बीच, कैमूर की पहाड़ियों में एक ऐसी गुफा है, जहाँ खुद भगवान शिव छिपने पर मजबूर हो गए थे. न कोई सड़क, न कोई सीधा रास्ता, सिर्फ पहाड़, जंगल, नदियाँ और एक रहस्य, जो आज तक अनसुलझा है. इसका नाम है  गुप्ता धाम. आज हम आपको ले चलेंगे इस रहस्यमयी यात्रा पर, जहाँ आस्था भी है और रोमांच भी। वीडियो पूरा देखिएगा, क्योंकि आखिर में हम बताएंगे वो रहस्य, जो आज तक कोई नहीं पढ़ पाया.

गुप्ताधाम स्थित है बिहार के रोहतास जिले के चेनारी प्रखंड में, विंध्य पर्वत श्रृंखला की कैमूर पहाड़ियों पर स्थित है. यह जगह जिला मुख्यालय सासाराम से करीब पचपन किलोमीटर दूर है. घने जंगलों और ऊँची-नीची पहाड़ियों के बीच बसी यह गुफा, बाबा गुप्तेश्वरनाथ महादेव का पवित्र धाम मानी जाती है  और इसकी लोकप्रियता झारखंड के प्रसिद्ध बाबाधाम जैसी ही है.

अब बात करते हैं उस कथा की, जिसकी वजह से इस जगह को गुप्त नाम मिला. पौराणिक मान्यता के अनुसार, भस्मासुर नाम का एक राक्षस था, जिसने कठोर तपस्या करके भगवान शिव से एक वरदान पा लिया कि, जिसके सिर पर वह हाथ रखे, वह तुरंत भस्म हो जाए। वरदान पाते ही भस्मासुर के मन में लालच आ गया. उसने सोचा कि, क्यों न इसी वरदान का इस्तेमाल खुद भगवान शिव पर ही कर दिया जाए? भस्मासुर शिव को भस्म करने के लिए उनका पीछा करने लगा, और भगवान शिव को बचने के लिए भागना पड़ा. भागते-भागते भोलेनाथ इसी कैमूर पहाड़ी की एक गुफा में आकर छिप गए . इसीलिए इस स्थान का नाम पड़ा गुप्ताधाम, यानी वह जगह जहाँ भगवान खुद को गुप्त यानी छिप कर बैठे.

फिर भगवान विष्णु ने मोहिनी यानी पार्वती जी का रूप धारण किया और भस्मासुर के सामने प्रकट होकर उसे नृत्य करने के लिए ललचाया. सुंदरी के मोह में भस्मासुर नाचने लगा, और बिहार के घने जंगलों के बीच, कैमूर की पहाड़ियों में एक ऐसी गुफा है, जहाँ खुद भगवान शिव छिपने पर मजबूर हो गए थे. न कोई सड़क, न कोई सीधा रास्ता — सिर्फ पहाड़, जंगल, नदियाँ और एक रहस्य, जो आज तक अनसुलझा है. इसका नाम है  गुप्ताधाम. आज हम आपको ले चलेंगे इस रहस्यमयी यात्रा पर, जहाँ आस्था भी है और रोमांच भी. वीडियो पूरा देखिएगा, क्योंकि आखिर में हम बताएंगे वो रहस्य, जो आज तक कोई नहीं पढ़ पाया.

कहा जाता है, भगवान शिव आज भी उसी गुफा में शिवलिंग रूप में विराजमान हैं, जिसे लोग गुप्तेश्वरनाथ महादेव कहकर पूजते हैं. गुप्ताधाम पहुँचना कोई आसान काम नहीं. यहाँ पहुँचने के मुख्यतः तीन दुर्गम रास्ते हैं – रेहल, पनारी घाट और उगहनी घाट. हाल के वर्षों में ताराचंडी धाम के पास से एक नया रास्ता भी बना है, जहाँ से वाहन भी पहाड़ी तक जा सकते हैं.

पनियारी घाट से जाने वाला रास्ता सबसे लोकप्रिय है. सासाराम से करीब चालीस किलोमीटर दूर आलमपुर होते हुए पनियारी पहुँचकर, यहाँ से लगभग तीन हज़ार मीटर ऊँची पहाड़ी की चढ़ाई शुरू होती है. रास्ते में मिलती हैं पनियारी माई, एक देवी स्थान जहाँ ज़मीन से बारहों महीने पानी निकलता रहता है. आगे बढ़ने पर मिलता है बघवा खोह — यानी बाघ की मांद, जहाँ पहले कभी बाघ रहा करते थे. यहाँ अक्सर एक साधु बाबा भी नज़र आ जाते हैं, जो वर्षों से इसी गुफा-नुमा जगह में तपस्या में लीन हैं.

फिर रास्ता गुज़रता है अमवाचुआ नाम की जगह से है. जहाँ विशाल आम के पेड़ों की छांव मिलती है. उससे आगे दुर्गावती नदी, जिसे दो बार पार करना पड़ता है. बारिश के मौसम में यह नदी उफान पर होती है, इसलिए यहाँ खास सावधानी ज़रूरी है. यह पूरी यात्रा पहाड़, जंगल, झरने और नदियों का ऐसा संगम है, जो इसे सिर्फ एक तीर्थ यात्रा नहीं, बल्कि एक रोमांचक ट्रैक भी बना देती है.

अब बात करते हैं खुद गुफा की, गुफा के द्वार पर पहुँचकर सीढ़ियों से नीचे उतरना पड़ता है. प्रवेश द्वार करीब अठारह फीट चौड़ा और बारह फीट ऊँचा है. अंदर घना अंधेरा है, बिना मशाल या टॉर्च के भीतर जाना नामुमकिन है. पूरब दिशा में करीब तीन सौ तिरसठ फीट अंदर चलने पर एक बड़ा गड्ढा मिलता है, जिसमें साल भर पानी भरा रहता है जिसे श्रद्धालु पातालगंगा कहते हैं.

इसके आगे गुफा और संकरी होती जाती है. यहाँ प्राचीन काल के दुर्लभ शैल चित्र आज भी दीवारों पर मौजूद हैं. गुफा के बीच से एक शाखा फूटती है, जो एक बड़े कक्ष का रूप लेती है जिसे लोग नाचघर या घुड़दौड़ कहते हैं, जहाँ पर्याप्त रोशनी न होने के कारण ज़्यादातर श्रद्धालु पहुँच ही नहीं पाते. सबसे रहस्यमयी बात यह है कि, पातालगंगा के पास एक दीवार पर कुछ प्राचीन शिलालेख खुदे हैं, जिन्हें लोग ब्रह्मा के लेख कहते हैं. आज तक कोई भी इन्हें पढ़ नहीं पाया है. इतिहासकारों का मानना है कि अगर यह लिपि कभी पढ़ी गई, तो शायद इस गुफा के कई और रहस्य खुल सकते हैं. कुछ लोग तो यह भी मानते हैं कि प्रसिद्ध उपन्यासकार देवकीनंदन खत्री ने अपने उपन्यास चंद्रकांता में जिन तिलिस्मी गुफाओं का जिक्र किया है, उनमें से एक शायद यही गुप्ताधाम की गुफा भी हो.

गुफा के अंत में स्थित है असली शिवलिंग — जिसे गुप्तेश्वर महादेव कहा जाता है. खास बात यह कि यह कोई बनाया हुआ नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक शिवलिंग है, जिस पर गुफा की छत से लगातार जल की बूँदें टपकती रहती हैं. श्रद्धालु इसी जल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं. गुप्ताधाम से लगभग डेढ़ किलोमीटर दक्षिण में है सीता कुंड है जिसका पानी हमेशा बर्फ जैसा ठंडा रहता है. श्रद्धालु यहाँ स्नान कर, फिर यहीं से जल लेकर बाबा के दर्शन करने गुफा में जाते हैं.

बक्सर से गंगाजल लेकर आना और शिवलिंग पर चढ़ाना यहाँ की सदियों पुरानी परंपरा है. सावन के पूरे महीने, और साथ ही सरस्वती पूजा व महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशाल मेला लगता है. बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और यहाँ तक कि नेपाल से भी हज़ारों शिव-भक्त हर साल यहाँ पहुँचकर जलाभिषेक करते हैं. तो यह थी गुप्ताधाम की पूरी कहानी. जहाँ आस्था, इतिहास और रहस्य एक साथ मिलते हैं. भस्मासुर से बचने के लिए छिपे भगवान शिव की यह गुफा आज भी अपने अंदर कई अनसुलझे राज़ समेटे हुए है.

अगर आपको यह जगह और इसकी कहानी दिलचस्प लगी हो, तो वीडियो को लाइक ज़रूर करें, चैनल को सब्सक्राइब करें, और कमेंट में बताएं. क्या आप कभी गुप्ताधाम गए हैं, या अब जाना चाहेंगे? मिलते हैं अगले वीडियो में, तब तक के लिए… हर हर महादेव!

संकलन:             –     सुनील कुमार.  

Video Link:       –    https://youtu.be/U3tfHkASO-E

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