
अस्तित्व बनाम प्रतिष्ठा : बांकीपुर उपचुनाव
सितारों के खेल भी निराले होते हैं. वर्ष 2026 की शुरूआती दौर से राज्य बिहार में विस्फोटों का दौर जारी है. वर्ष की शुरूआती दौर में “लम्बी पारी खेलने वाले मुख्यमंत्री” की कुर्सी गई. उसके बाद नये मुख्यमंत्री ने गद्दी संभाली. कुछ महीने बीतने के बाद ही कुछ जिलों में उपचुनाव आ गया. एक बार फिर चुनाव का पर्व आया लेकिन, वर्तमान समय की सरकार के माथे पर चिंताओं की लकीरे खिंच गई. वर्तमान समय में हम बात कर रहें हैं “बांकीपुर उपचुनाव” की.
किसी भी राज्य की राजनीति में कुछ विधानसभा क्षेत्र केवल चुनावी सीट नहीं होते, बल्कि वे राजनीतिक शक्ति, वैचारिक प्रभाव और जनमत की दिशा तय करने वाले केंद्र बन जाता है. राज्य बिहार की राजधानी पटना स्थित बांकीपुर विधानसभा सीट पर 30 जुलाई 2026 को होने वाला उपचुनाव राज्य की सियासत का केंद्र बन गया है. यह सिर्फ एक विधानसभा सीट का उपचुनाव नहीं है, बल्कि यह भाजपा की प्रतिष्ठा, प्रशांत किशोर के राजनीतिक भविष्य और बिहार की नई सरकार की पहली बड़ी राजनीतिक के साथ-साथ बिहार के आगामी सियासी भविष्य की दिशा तय करने वाला लिटमस टेस्ट बन गया है.
बांकीपुर पटना शहर के प्रमुख शहरी विधानसभा क्षेत्रों में शामिल है. यह क्षेत्र प्रशासनिक, शैक्षणिक, व्यावसायिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र माना जाता है. यहां के मतदाता अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित, जागरूक और विविध सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं. सरकारी कर्मचारी, व्यापारी, शिक्षक, अधिवक्ता, डॉक्टर, युवा पेशेवर, छात्र तथा मध्यमवर्गीय परिवार इस क्षेत्र की चुनावी दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. बताते चलें कि, बांकीपुर सीट का एक लंबा राजनीतिक इतिहास रहा है. वर्ष 1995 से भाजपा इस सीट पर कब्ज़ा जमाए हुए है. इससे पहले यह सीट “पटना पश्चिम” के नाम से जानी जाती थी और नितिन नबीन के दिवंगत पिता नवीन किशोर सिन्हा ने भी इस सीट से जीत हासिल की थी. यानी पिछले तीन दशकों से भाजपा का यह अभेद्य गढ़ रहा है. ज्ञात है कि, बांकीपुर सीट खाली हुई क्योंकि यहाँ से लगातार पाँच बार विधायक रहे नितिन नबीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राज्यसभा के लिए निर्वाचित किया गया. नितिन नबीन ने इस सीट से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद उपचुनाव की आवश्यकता पड़ी.
वर्तमान समय में यह उपचुनाव में मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है, जिसमें भाजपा, जन सुराज और राजद मुख्य दावेदार हैं.
मुद्दे: – बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, स्थानीय समस्याएं, अधूरी योजनाएं, नगर प्रशासन की विफलता, जलभराव, प्रदूषण, ट्रैफिक, सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छता, स्वास्थ्य, सुरक्षा, पेयजल, रोजगार, स्टार्टअप, डिजिटल सेवाएं, बेहतर इंटरनेट…
अभिषेक कुमार ‘बंटी’ (भाजपा – NDA): – भाजपा ने नितिन नवीन की विरासत को बचाए रखने के लिए अपने 26 साल पुराने जमीनी संगठनकर्ता और भाजयुमो के प्रदेश उपाध्यक्ष अभिषेक कुमार पर दांव खेला है. कायस्थ समुदाय से आने वाले अभिषेक के कंधे पर भाजपा के इस अभेद्य किले को सुरक्षित रखने की भारी जिम्मेदारी है. ज्ञात है कि, 9 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और अन्य शीर्ष एनडीए नेताओं की मौजूदगी में उन्होंने अपना नामांकन दाखिल किया. लेकिन अगले ही दिन उन्होंने अचानक नामांकन वापस ले लिया, जिससे बिहार की राजनीति में हड़कंप मच गया. अभिषेक बंटी के नाम वापसी के तुरंत बाद भाजपा ने नीरज कुमार सिन्हा को नया प्रत्याशी घोषित किया. नीरज सिन्हा भाजपा युवा मोर्चा के नेता हैं और उन्हें नितिन नबीन के करीबी माना जाता है.
प्रशांत किशोर (जन सुराज पार्टी): – देश के सबसे चर्चित चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर (PK) इस उपचुनाव के जरिए पहली बार खुद चुनावी मैदान में उतरे हैं. वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में खाली हाथ रहने के बाद, प्रशांत किशोर के लिए यह चुनाव जन सुराज के वजूद और उनकी खुद की राजनीतिक साख को साबित करने की आखिरी और सबसे बड़ी परीक्षा है.
रेखा गुप्ता (RJD): – राष्ट्रीय जनता दल ने एक बार फिर रेखा गुप्ता पर भरोसा जताया है. वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में नितिन नबीन के खिलाफ उपविजेता रह चुकी हैं और उन्हें 46,000 से अधिक वोट मिले थे. पिछले चुनाव में सम्मानजनक वोट हासिल करने वाली रेखा गुप्ता इस त्रिकोणीय मुकाबले में वैश्य और ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण के सहारे उलटफेर करने की ताक में हैं.
बांकीपुर सीट पिछले तीन दशकों से भाजपा का अभेद्य किला रही है. नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा से लेकर उनके पुत्र नितिन नवीन तक, इस सीट पर भगवा ध्वज लहराता रहा है. भाजपा के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष की खाली की हुई सीट पर यदि भाजपा को कोई नुकसान होता है, तो यह सीधे तौर पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की साख पर बड़ा सवाल खड़ा करेगा.
हाल ही में हुई घटनाओं में भाजपा के उम्मीदवार बदलने की घटना ने सबसे ज्यादा सुर्खियाँ बटोरीं. अभिषेक बंटी ने नामांकन वापसी का कारण “पारिवारिक कारण” बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसकी असली वजह कुछ और ही बताई जा रही है. ज्ञाता है कि, अभिषेक बंटी के पिता रवींद्र प्रसाद चारा घोटाले में दोषी करार दिए गए थे. वर्ष 2022 में सीबीआई अदालत ने लालू प्रसाद यादव सहित 75 लोगों को चारा घोटाले में दोषी ठहराया था. रवींद्र प्रसाद, जो उस समय मगध केमिकल कॉरपोरेशन के मैनेजर थे, को तीन वर्ष की सजा सुनाई गई थी. 139 करोड़ रुपये के इस घोटाले में सीबीआई ने 575 गवाहों और 4,200 दस्तावेज़ों की जाँच के बाद उन्हें आरोपी बनाया था.
भाजपा नेतृत्व को डर था कि प्रशांत किशोर इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाएंगे. सूत्रों के अनुसार, प्रशांत किशोर ने इस मामले से जुड़े सभी दस्तावेज़ जुटा लिए थे और चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में थे. इसलिए भाजपा ने पूर्व-सक्रिय रुख अपनाते हुए अपना प्रत्याशी ही बदल दिया.
बताते चलें कि, वर्ष 2025 में हुई बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज को जनता ने पूरी तरह नकार दिया था. वर्तमान समय में प्रशांत किशोर ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत बांकीपुर जैसी शहरी और प्रबुद्ध मतदाताओं वाली सीट से उनका खुद मैदान में उतरे हैं. वहीं, महागठबंधन की ओर से आरजेडी इस लड़ाई को त्रिकोणीय बनाकर भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करने की कोशिश में है. यदि भाजपा और जन सुराज के बीच सवर्ण और शहरी वोटों का बिखराव होता है, तो आरजेडी के लिए यह एक अप्रत्याशित जीत का रास्ता खोल सकता है.
बताते चलें कि, ऐतिहासिक रूप से बांकीपुर बेहद कम मतदानके लिए जाना जाता है. पिछले चुनाव में यहाँ महज 41.35% मतदान हुआ था, जिसका मतलब है कि लगभग 60% मतदाताओं (करीब 1.75 लाख लोग) ने वोट ही नहीं डाला था. वैसे तो देखा जाय तो बांकीपुर बिहार की एकमात्र कायस्थ-बहुल विधानसभा सीट है. यहाँ कायस्थ मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है, उसके बाद भूमिहार, राजपूत, वैश्य, यादव, मुस्लिम और ब्राह्मण समुदाय के मतदाता हैं.
एक तरफ भाजपा की प्रतिष्ठा का सवाल है बांकीपुर. चुकिं, पार्टी ने तीन दशकों से यह सीट नहीं गँवाई है. वहीँ, भाजपा के लिए यह सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि अपनी साख बचाने की लड़ाई है. साथ ही मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार का पहला बड़ा चुनावी परीक्षण भी है. वहीँ दूसरी तरफ, प्रशांत किशोर के लिए यह चुनाव अस्तित्व का सवाल है. चूकिं, वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में जन सुराज का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था. करीब 95 प्रतिशत उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी. प्रशांत किशोर इस चुनाव को भाजपा के खिलाफ “जनमत संग्रह” के रूप में पेश कर रहे हैं. उनका कहना है कि भले ही एक सीट से सरकार नहीं बदलेगी, लेकिन एक जन सुराज विधायक बाकी 242 विधायकों से ज़्यादा मायने रखेगा.
तीसरी तरफ, राजद के लिए यह अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर है. वर्ष 2025 में रेखा गुप्ता ने अच्छा प्रदर्शन किया था और त्रिकोणीय मुकाबले में राजद को फायदा हो सकता है. हालाँकि, महागठबंधन में इस बात को लेकर मतभेद भी सामने आए हैं कि क्या अपना उम्मीदवार उतारा जाए या प्रशांत किशोर का समर्थन किया जाए.
बांकीपुर उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं है, बल्कि यह बिहार की बदलती राजनीतिक संस्कृति का दर्पण है. यहां की चुनावी प्रतिस्पर्धा यह दर्शाती है कि लोकतंत्र में जनता का विश्वास, सुशासन, विकास, जवाबदेही और स्थानीय समस्याओं का समाधान किसी भी राजनीतिक दल की वास्तविक परीक्षा हैं. इस चुनाव का परिणाम तय करेगा कि क्या बांकीपुर के मतदाता परंपरा के साथ बने रहेंगे या बदलाव को चुनेंगे. भाजपा के लिए यह प्रतिष्ठा बचाने की लड़ाई है, प्रशांत किशोर के लिए अस्तित्व की और राजद के लिए वापसी की. तीन अगस्त का नतीजा बिहार की आने वाली राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा.
संजय कुमार सिंह,
राजनितिक संपादक.



