शहर की ओर लौटते हुए रिंकू का दिमाग विचारों के बवंडर से घिरा था. उसे क्या करना चाहिए? पुलिस को बताना सही होगा? लेकिन अगर वह आदमी किसी ऐसे मामले में फंसा है जिसमें पुलिस भी शामिल हो, तो क्या होगा? और उन दो गुंडों का क्या? अगर उन्हें पता चल गया कि रिंकू ने पुलिस को बताया है, तो वे उसे भी नुकसान पहुंचा सकते हैं.
उसने अपनी माँ के बारे में सोचा. शांति देवी अकेली थीं, और रिंकू ही उनका सहारा था. वह किसी भी कीमत पर उन्हें खतरे में नहीं डालना चाहता था.
लेकिन दूसरी ओर, उस डरे हुए आदमी की तस्वीर उसकी आँखों के सामने घूम रही थी. उसकी जान खतरे में थी, और रिंकू ने उसे मुसीबत में अकेला छोड़ दिया था. क्या यह सही था?
जब वह शहर पहुँचा, तो उसने सीधे अपने घर जाने के बजाय एक सुनसान जगह पर टैक्सी रोकी. उसे सोचने के लिए कुछ वक़्त चाहिए था.
उसने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और एक ऐसे दोस्त का नंबर डायल किया जो थोड़ा दबंग किस्म का था और शहर के कुछ लोगों को जानता था. उसका नाम विकास था.
“हेलो, विकास? मैं रिंकू बोल रहा हूँ.”
“अरे रिंकू! क्या हाल है? सब ठीक तो है?” विकास की आवाज़ हमेशा की तरह बेफिक्री भरी थी.
“विकास, मुझे थोड़ी मदद चाहिए. थोड़ी परेशानी में फंस गया हूँ.”
“क्या हुआ? बताओ तो.”
रिंकू ने उसे सुबह की पूरी कहानी सुनाई – अनजान सवारी, जंक्शन पर मिलना, उस आदमी का डर, और हरिपुर के पास गांव में उन दो गुंडों का मिलना.
विकास कुछ देर चुप रहा. फिर उसने कहा, “यह मामला थोड़ा पेचीदा लग रहा है. वह आदमी कौन था और उसे कौन ढूंढ रहा था, इसका कुछ अंदाज़ा है तुम्हें?”
“नहीं, बिल्कुल नहीं. उसने कुछ नहीं बताया. बस इतना कहा कि उसकी जान खतरे में है.”
“और उन दो आदमियों के पास हथियार थे?”
“लाठियां थीं.”
“ठीक है.तुम एक काम करो. तुम मुझसे आकर मिलो. हम बैठकर सोचते हैं कि क्या करना है.”
रिंकू को विकास की बात सुनकर थोड़ी राहत मिली. कम से कम शहर में एक ऐसा शख्स तो था जिससे वह सलाह ले सकता था.
वह विकास के अड्डे पर पहुँचा. विकास एक पुरानी वर्कशॉप चलाता था और वहाँ अक्सर उसके जैसे ही कुछ और लोग भी बैठे रहते थे. रिंकू ने उसे कोने में ले जाकर फिर से सारी बात बताई.
विकास ने ध्यान से सुना और फिर अपनी ठुड्डी पर हाथ फेरते हुए कहा, “देखो रिंकू, सीधा पुलिस के पास जाना थोड़ा रिस्की हो सकता है. तुम्हें नहीं पता कि कौन किस से मिला हुआ है और अगर उन लोगों को पता चल गया कि तुमने पुलिस को बताया है, तो वे तुम्हें भी नहीं छोड़ेंगे.”
“तो क्या करना चाहिए?” रिंकू ने निराशा से पूछा.
“एक काम करते हैं. पहले थोड़ा पता लगाते हैं कि मामला क्या है. उस आदमी का कोई हुलिया याद है तुम्हें? या गाड़ी का नंबर?”
“आदमी का चेहरा तो ठीक से याद है. चालीस के आसपास, घबराया हुआ. गाड़ी का नंबर तो मैंने ध्यान नहीं दिया.”
“ठीक है. मैं अपने कुछ कॉन्टैक्ट्स से बात करता हूँ. शायद उन्हें कुछ पता चले. तुम फिलहाल शांत रहो और किसी को कुछ मत बताना.”
रिंकू थोड़ा उलझन में था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह सही कर रहा है या गलत. लेकिन विकास की बात में दम था. सीधे पुलिस के पास जाना खतरे से खाली नहीं था.
अगले दो दिन रिंकू के लिए बेचैनी भरे रहे. वह हर पल उस रहस्यमय आदमी और उन गुंडों के बारे में सोचता रहा. विकास ने उसे कोई नई जानकारी नहीं दी थी.
तीसरे दिन, सुबह जब रिंकू अपनी टैक्सी साफ़ कर रहा था, उसका फ़ोन बजा. स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमक रहा था – वही नंबर जिससे उसे पहली सवारी मिली थी.
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा. क्या यह वही आदमी था? या फिर… कोई और?
उसने हिचकिचाते हुए कॉल उठाया.
“हेलो?”
दूसरी तरफ से एक धीमी और थकी हुई आवाज़ आई, “क्या… क्या यह रिंकू ड्राइवर है?”
रिंकू पहचान गया. यह उसी आदमी की आवाज़ थी.
“जी, मैं ही हूँ. आप… आप ठीक हैं?” रिंकू ने पूछा.
“मैं… मैं ठीक हूँ. सुनिए, मुझे आपकी मदद की ज़रूरत है. क्या आप मुझसे मिल सकते हैं?”
रिंकू ने एक गहरी सांस ली. अब उसे फैसला करना था. क्या वह फिर से उस मुसीबत में पड़ेगा? या फिर इस आदमी की मदद करेगा?
शेष भाग अगले अंक में…,



