
लापरवाही, हादसा और सरकारी कर्मचारी की संवेदना…
हादसा हमेशा ही दिल और मन को झकझोर देता है. हादसा चाहे सड़क दुर्घटना, रेल हादसा, प्राकृतिक आपदा, या औद्योगिक दुर्घटना की हो… यह एक बड़ी प्रशासनिक विफलता की दास्तान होती है. जब इस तरह की सूचनाएं आती है तो प्रशासन की ओर से सबसे पहले मृतकों और पीड़ितों के परिजनों को सरकारी मदद का आश्वासन दिया जाता है. यह आश्वासन जो एक संवेदना के रूप में होती है जो महज प्रोटोकॉल पर आधारित होता है. हम बात कर रहें हैं बारगी डैम के घटना की…
ज्ञात है कि, 30 अप्रैल 2026 की शाम को मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित बरगी डैम के जलाशय में एक पर्यटक क्रूज नाव पलट गई. जिसमें अब तक 9 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि कई अब भी लापता हैं. यह दुर्घटना सिर्फ एक हादसा नहीं बल्कि लापरवाही और प्रशासनिक विफलता की एक नई कहानी भी कहता है.
बरगी डैम – बरगी डैम, जबलपुर (रानी अवंती बाई लोधी सागर परियोजना) न केवल सिंचाई और बिजली उत्पादन का केंद्र है. बताते चलें कि, बरगी बांध बनाते समय भी हज़ारों परिवारों को विस्थापित होना पड़ा. इसका इतिहास काफी संघर्षपूर्ण रहा है.
विभिन्न समाचार पत्रों के अनुसार, यह दुर्घटना 30 अप्रैल की शाम के समय हुआ जब पर्यटकों से भरी क्रूज बरगी बांध के खमरिया द्वीप के पास पहुंची उसी समय नर्मदा नदी के जलाशय में अचानक भारी आंधी आई, जिसके साथ तेज हवाएं (40-50 किमी प्रति घंटा) चलने लगीं और ऊंची लहरें उठने लगीं. मौसम में हुई बदलाब बाद क्रूज अनियंत्रित होकर पलट गई. यह हादसा भले ही प्राकृतिक आंधी के कारण हुआ, लेकिन इसके पीछे मानवीय लापरवाही के साथ कई ऐसे पहलू भी उजागर हुए, जो काफी चौंकाने वाले हैं –
सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि एनजीटी के आदेशों की अनदेखी की गई. ज्ञात है कि, बरगी डैम में क्रूज का संचालन पूरी तरह अवैध था. चूकिं, वर्ष 2023 में एनजीटी ने पेट्रोल और डीजल से चलने वाली मोटरबोट और क्रूज को पेयजल स्रोतों में प्रतिबंधित कर दिया था. पर्यावरणविद् की याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने स्पष्ट कर दिया था कि नर्मदा से जुड़े बांधों में ऐसी गतिविधियां पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं. उसके बाद मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन मार्च 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी के फैसले को सही ठहराते हुए इसे बरकरार रखा था. उसके बाद भी,पर्यटन निगम और जिला प्रशासन की मिलीभगत से बरगी डैम में अवैध क्रूज संचालन जारी रहा. वहीं, सवारियों की सुरक्षा के मामले में भी बेहद लापरवाही बरती जा रही थी. दुसरा मुद्दा यह कि, सवारियों की संख्या निश्चित नहीं थी और तीसरा सबसे गंभीर मुद्दा यह है कि, मौसम की चेतावनी के बाद भी क्रूज को जलाशय में उतारा गया. सवाल ये उठता है कि, जब एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से प्रतिबंध लगा दिया था, तो फिर यह अवैध संचालन कैसे हो रहा था? क्या इसमें स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत तो नहीं थी?
इसे घटना क्या कहें प्रशासनिक लापरवाही या तकनीकी विफलता… “जब गोताखोरों ने एक माँ का शव अपने बच्चे को कसकर छाती से लगाए पाया”. यह तस्वीर मानवीय संवेदना की वह चरम सीमा है, जहां मृत्यु के क्षण में भी माँ का आखिरी प्रयास अपने बच्चे की रक्षा ही करना था. जब देश में सिर्फ आंकड़े का खेल चलता हो वहां, टूटे परिवारों, बिछड़ते रिश्तों, और अधूरे सपनों की कहानी कौन सुनेगा? इस घटना में कितने लोग अपनों से दूर हो गए… बस अब उनकी यादें ही बचीं है वहीं, सरकार की ओर से वही पुरानी घिसी-पिट्टी परम्पराओं का पालन करते हुए निचले दर्जे के कर्मचारियों सेवा से बर्खास्त कर बड़े मछलियों को बचाने की कायवाद भी शुरू हो गई है.
जब भी देश में कोई त्रासदी होती है उसका सबसे बड़ा फायदा सरकारी कर्मचरियों को ही होता है. ये कर्मचारी ऐसे अवसर की तलाश में रहते है… वहीं, प्रोटोकॉल के नाम पर संवेदना व साहनभूति से दूर होकर मलाई हड़पने के तमाम प्रोपगंडा अपना कर मुआवजे की रकम को हड़प जाते हैं. तो दूसरी तरफ पीड़ित परिवार अपने दुःख के भारी बोझ के साथ अपने बचे-खुचे परिवार के साथ जिंदगी के दिन व्यतीत करते हैं और खुद को कोसते रहते हैं और कर्मचारी दिन-दूनी तरक्की करते रहतें हैं.
वर्ष 2012 से अबतक कई घटनाएं व दुर्घटनाएं हो चुकी है परन्तु सरकारी कर्मचारियों के कानों पर ‘जूं ‘ भी नहीं रेंगती है.
घटनाएं व दुर्घटनाएं –
- 30 अप्रैल 2012 को ब्रह्मपुत्र नौका हादसा – इस भीषण हादसे में 100 से अधिक लोगों की मौत हुई थी.
- हुगली (पश्चिम बंगाल) नदी हादसा – वर्ष 2016 में बर्धमान जिले में एक नौका पलटने से लगभग 20 लोगों की मौत हुई थी.
- कृष्णा नदी (आंध्र प्रदेश) हादसा – वर्ष 2017 में विजयवाड़ा के पास कृष्णा नदी में एक निजी नाव पलटने से 22 पर्यटकों की जान गई थी.
- गोदावरी नदी हादसा – वर्ष 2019 में पूर्वी गोदावरी जिले में देवीपटनम के पास एक नाव ‘पापीकोंडलु’ पलट गई थी, जिसमें 47 लोगों की मौत हुई थी.
- मझुली नाव हादसा – वर्ष 2021 में ब्रह्मपुत्र नदी में निमति घाट के पास दो नावों की सीधी टक्कर हुई थी. इस हादसे में कई लोगों की जान गई थी.
- तनुवा बोट हादसा – वर्ष 2023 में केरल के मल्लपुरम जिले के तानूर में एक डबल-डेकर पर्यटक नाव ‘तनुवा’ पलट गई थी. जिसमें करीब 22 लोगों की मौत हुई थी.
- वृंदावन नाव हादसा – वर्ष 2026 में वृंदावन (उत्तर प्रदेश) में स्टीमर पलटने से 13 श्रद्धालुओं की मौत.
तरह -तरह की घटनाएं होने के बाद भी सरकारी कर्मचारियों के कानों में जूं भी नहीं रेंगती है वहीं, सरकार के बड़े अधिकारी मामले को दबाने के लिए तमाम कोशिस करती है. वैसे तो देखा जाय तो सुरक्षा मानक सिर्फ कागजों तक ही सीमित होती हैं, हकीकत से दूर -दूर तक कोई नाता नहीं होता है.
बरगी डैम का हादसा हमें यह सिखाता है कि संवेदना और प्रशासनिक दक्षता साथ-साथ चलनी चाहिए. जब कोई हादसा होता है तो एक सरकारी सेवक से केवल ‘कागजी कार्रवाई’ की उम्मीद नहीं की जाती है.अगर, सरकारी कर्मचारी यदि पीड़ितों के दुःख को अपना दुःख मानें, तो राहत कार्य केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवीय सहयोग बन जाएगा. वर्तमान समय में सरकारी कर्मचारियों को आपदा या हादसा में अवसर तलाशने के बजाय उन्हें यह सोचना चाहिए कि “सुरक्षा केवल एक नियम नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है.”
संजय कुमार सिंह
राजनीति एडिटर.



