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धुप-छांव -5.

चिन्मय ने अर्पिता को वह डायरी दी-जो शायद प्रभात उसके लिए छोड़ गया था.

“तुम्हारे लिए कभी एक पूरी कहानी नहीं लिखी-शायद इसलिए कि तुम्हें शब्दों से बाँधना मुझे सही नहीं लगा.” “पर तुम्हें वो जगह देता हूँ जहाँ मैं सबसे ज़्यादा ख़ुद था… इस गाँव की छांव.”

वह डायरी अब अर्पिता की थी.

वह कुछ दिनों तक गाँव में रुकी.

बच्चों को कहानियाँ सुनाई.

दादी के साथ चौपाल पर बैठी

उस आम के पेड़ तले पहली बार कुछ लिखा-

“जब कोई गुम हो जाए, तो उसे ढूँढना नहीं चाहिए-उसे जीना चाहिए.”

समापन-या नया आरंभ?

वह गाँव से लौटी, लेकिन अब वह प्रभात को ढूँढने नहीं, बल्कि उसे जिन्दा रखने के लिए लौट रही थी.

अब शहर में, वह हर रविवार बच्चों को कहानी सुनाती है-“धूप-छांव कथा शृंखला” के नाम से.

शेष भाग अगले अंक में…,

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