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वो चिट्ठी-पाती के दिन…

इंटरनेट अउ मोबाइल के आविष्कार होए के बाद आज भले पोस्ट कार्ड, अंतर्देशीय पत्र अउ लिफाफा के दिन ह इतिहास के अंग बनगे हवय, फेर एक बेरा अइसनो रिहिसे, जब इंकर मन के अगोरा म डॅंकहार बाबू के सइकिल के घंटी सुने बर कान हमेशा बेचैन राहय. कभू महीना भर म त कभू अठोरिया म त कभू बिहाने दिन डॅंकहार बाबू के आरो संग मयारु संगी के आरो मिल जावत रिहिसे.

वर्ष 1869 म आस्ट्रेलिया ले शुरू होय पोस्टकार्ड ह भारत म वर्ष1879 के जुलाई महीना म आइस हे. तब इहाँ एकर कीमत 3 पइसा रिहिस. फेर हमन तब एकर माध्यम ले सोर संदेशा ले दे के चालू करेन जब ए ह 15 पइसा के होगे रिहिस, जेन ह 50 पइसा के होवत ले चलिस. तब मैं हाईस्कूल म पढ़त रेहेंव. रायपुर के रामदयाल तिवारी स्कूल म. तब हमर गाँव के संगी मन कभू-कभार एकाद पाती पठो देवत रिहिन हें. जवाब म महूं वोमन ल पठो देवत रेहेंव. फेर वोकर सुरता ह गंज अकन दिन ले राहय. फलाना ह का-का लिखे रिहिसे, अउ मैं ह जवाब म का लिखेंव. स्कूल के किताब मन के आखर ल भुला जावत रेहेन फेर संगी संग होए पाती के गोठबात ल कभू नइ भुलावत रेहेन.

अइसन भुलाए बिसराए के तब चालू होइस जब मोला नंगत के चिट्ठी-पाती भेजे बर लागय अउ मोर जगा घलो नंगत के आए के जोंग माढ़िस. ए बेरा तब आइस जब 9 दिसंबर 1987 के मैं छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला मासिक पत्रिका “मयारु माटी” के प्रकाशन संपादन शुरू करेंव. तब अतका जादा पाती आवय, के वोमन ल पढ़े अउ जवाब दे म ही घंटों पहा जावत रिहिसे. वोमा के कतकों जेन विशेष किसम के लागय,  कोनो वरिष्ठ साहित्यकार के या कोनो बड़का नेता या मंत्री आदि के तेला तो फाइल बना के धर घलो लेवत रेहेंव.

हमन इतिहास के जुन्ना पन्ना ल लहुटाथन त इहू जाने ल मिलथे, के पोस्टकार्ड के जनम होए के पहिली घलो संदेश देके चलन रिहिसे.   पहिली ए बुता खातिर पोंसे अउ सिखोए-पढ़ोए परेवा मन के माध्यम ले सोर-संदेशा भेजे जावत रिहिसे. पहिली के राजा-महाराजा मन एकर खातिर विशेष संदेशिया घलो राखत रिहिन हें, जेमा पल्ला दौड़इया घोड़ा मनला एकर खातिर विशेष रूप ले खवा-पिया के राखे जावय.आज इंटरनेट अउ मोबाइल के आविष्कार ह ए सबो उदिम अउ जिनिस ल इतिहास के अंग बना देइस. फेर मोला आजो सुरता हे, जब कुछु खास पाती ल हमन महीनों धरे राहन. कापी-किताब म लुका छिपा के राखन. मोला सुरता हे, छायावाद के प्रवर्तक कवि पद्मश्री पं. मुकुटधर पाण्डेय जी के एक पाती (संदेश) ल तो मैं अपन पहला कविता संकलन ‘छितका कुरिया’ म ब्लाक बनवा के छपवाए घलो रेहेंव.

अब अइसन किसम के संदेश ह घलो ईमेल या व्हाट्सएप के माध्यम ले मिल जाथे. तब काकरो हाथ के लिखे पाती या संदेश ल सुरक्षित राखे के बात ह भुसभुसहा असन जनाथे. अब तो सइघो किताब घलो ह पीडीएफ के माध्यम ले मिनट भर म एती ले ओती चल देथे. पूरा दुनिया भर म बगर जाथे. तब काकरो मयारुक पाती अउ मोती कस लिखे अक्षर के सुरता कहाँ ले आही?आज तो मोला खुद सुरता नइए के मैं आखरी पाती कोन ल अउ कब लिखे रेहेंव. फेर जो हो, चिट्ठी-पाती के माध्यम ले जे अपनापन अउ खुशी तब मिलत रिहिसे वो ह आज के  विडियो कालिंग के  माध्यम ले होवइया मुंह देखिक-देखा गोठ-बात म घलो नइ मिलय।

प्रभाकर कुमार

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Those days of correspondence.

After the invention of the internet and mobile, although postcards, inland letters, and envelopes have become part of history today, there was a time when the ears of Dankahar Babu were always anxious to hear the bicycle bell . . . . Sometimes throughout the month, sometimes in the barn, sometimes in the morning, Dankahar Babu would meet more of his beloved friends.

Postcards originating in Australia in 1869 arrived in India in July Then it cost 3 bucks here. Then we started by giving voice messages through it when it was 15 paise, which lasted until it was 50 paise. I was in high school then. Ramdayal Tiwari School, Raipur. Then my village friends would occasionally send me a letter. I kept sending the woman in reply. Then he remembers Ganj staying for a while. So-and-so wrote what, and I wrote in reply. School books forgot the letters of the mind then never forgot the conversations with friends.

Such forgetting started when I started sending letters to Nangat and he wanted to come to my place. This time came when on 9 December 1987 I started publishing and editing the first monthly magazine in the Chhattisgarhi language, “Mayaru Mati” Then so many letters would come, that it would take hours for Women to read and answer them. Many of Woma’s Zens seem to be of special types, a senior writer or a big leader or minister, etc., so file them and hold them.

When we turn to the old pages of history, we also learn that postcards were used to convey messages even before they were born. Earlier, messages were sent through the ponce and the teaching parrots for this purpose. The kings and maharajas of old used to have special messengers for this, where the race horses were fed and watered, especially for it. Today, the invention of the internet and mobile has made all these enterprises and things part of history . . . . Then I remember today when we kept some special letters for months. Keep it hidden in the copybook. Mola Surta He, the pioneer of Shayadism, the poet Padmashri Pt. I have also had a letter (message) from Mukutdhar Pandey blocked and published in my first collection of poems ‘Chhitka Kuriya’

Now such types of messages are even available via email or WhatsApp. Then it’s a matter of keeping someone’s handwritten letter or message safe. Now even hundreds of books can go here and there in minutes via PDF. They go all over the world. Then where did I get the memory of someone’s lovely letter and the letters written like pearls? Today I don’t remember who wrote the last letter and when. Then whatever happens, the familiarity and happiness that you used to get through correspondence then is not even found in today’s face-to-face conversations through video calling.

Prabhakar Kumar.

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