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बनारस के किस्से और लोग

चाय सर्वहारा का पेय है. कल्पना कीजिए चाय न होती तो आम आदमी क्या पीता. चाय थकान मिटाती है, उर्जा देती है, और देती है हमें बौद्धिक विमर्श की खुराक. चुनाचें इस मुल्क में चायखानो में होने वाली बहसो को देखें तो लगेगा कि बस अब क्रांति होने ही वाली है. वैसे चायखानो से अगर क्रांति होती तो इस देश में रोज कोई न कोई क्रांति होती.

बनारस में चाय के ऐसे ही अड्डे क्रांति धर्मी लोगों का केन्द्र होते थे. जहां अर्थ भरे भाव से घंटों व्यर्थ की बातें होतीं थीं. मेरे मुहल्ले में ऐसे ही बौद्धिक जुगाली का एक केन्द्र था, “ चूहडमल की चाय की दुकान”. पर गफ़लत में मत रहिएगा. इन चूहडमल का उन टोडरमल से कोई सम्बन्ध नहीं था. जो अकबर के दरबार के नौरत्न थे. हालॉंकि उन टोडरमल की भी बनारस में रूचि थी. ये चूहडमल सिन्धी थे और  बँटवारे में उनके पिताजी सिन्ध से बनारस आए और यहीं चाय की दुकान खोल ली. बनारस की चायमिजाजी निराली है. कभी इन्ही चायखानो से साहित्य, संगीत और आध्यात्म के सूत्र निकलते थे. यहॉं होने वाली बहस मुबाहिसो को देख कभी कभी लगता है, कि काशी में शास्त्रार्थ की जो परम्परा आचार्य शंकर और मंडन मिश्र से चली थी, वह अब इन अडियों पर सिमट गयी है.

चूहडमल मेरे मुहल्ले में ही रहते थे और कबीरचौरा पर उनकी चाय की दुकान थी. चाय के अलावा उनकी दुकान का मक्खन टोस्ट और ऑमलेट पूरे बनारस में प्रसिद्ध था. चूहडमल की दुकान में कुल दो टेबुल थे जिन पर सिर्फ़ आठ लोग ही बैठ सकते थे. बाक़ी के कोई तीस चालीस लोग सड़क पर रखी बेंचों पर बैठ वैचारिक मिसाईल दागते थे. जाति,सम्प्रदाय के दुराग्रह से आगे चाय की इस अडी पर होने वाली बहस किसी संसद से कम नहीं होती.  कबीरचौरा के संगीत घराने, पत्रकार और सामाजिक लोगों के जमावड़े से यह चाय की दुकान हमेशा गुलजार रहती. उस वक्त आठ पेज के ‘आज’ अख़बार को चार टुकड़ों में बॉंट अलग अलग कोनो में खड़े लोग अपनी अगली बहस की सामग्री तलाश रहे होते.

मैं उधर से आते जाते अक्सर इस चाय की अडी पर खड़ा हो ज्ञान प्राप्त करता. राजनैतिक विमर्श के संस्कार मुझे यहीं मिलें. बनारस में चाय की दुकानों में गजब का राजनैतिक विमर्श होता है. दुकान चाहे चूहडमल की हो या फिर पप्पू की. सबकी राजनैतिक चेतना चरम पर होती है.  चूहडमल पढ़े लिखे थे  नहीं. जीवन का उद्देश्य भी चाय के तसले के आगे कुछ नहीं था. उनके दो बेटे दुकान चलाने में उनका हाथ बँटाते थे. निहायत मरियल सा उनका एक बेटा था. जो झक सफ़ेद 25 इंच मोहरी का बेलवॉटम और सफ़ेद शर्ट के कॉलर पर लाल रूमाल खोंस अंगीठी पर टोस्ट सेंकता था. चूहडमल ने चाय बनाना किसी अंग्रेज से सीखा था. वे खौलते तसले में दूध वाली चाय तो बनाते ही थे साथ ही, ’लिपटन ग्रीन लेबल’ जो उस वक्त अभिजात्य की चाय होती थी, उसका अर्क निकाल उसमें नींबू निचोड़ और लवणभास्कर डाल एक अलग ही किस्म की बेहद उर्जावान चाय भी बनाते थे.

इसे वे ‘भास्कर चाय’ कहते थे. दूसरे विश्व युद्ध में चाय के ऐसे बौद्धिक द्वीप बनारस में खूब सक्रिय रहे है. मेरे तो खून में यह अडीबाजी है. पिताजी ऐसी ही एक अडी में पले और बढ़े. वे दारानगर के रामधन सरदार के चाय की दुकान पर ज़ोर-ज़ोर से अख़बार पढ़ खबरे सुनाते थे. बनारस के दारानगर त्रिराहे पर रामधन सरदार की दूध, चाय, रबड़ी, मलाई की दुकान थी. उनके सामने जीउत सरदार की मिठाई की दुकान थी. दारानगर मुहल्ले का नाम औरंगजेब के भाई दाराशिकोह के नाम पर पड़ा था. यहीं रहकर उसने संस्कृत की पढ़ाई की थी.

यह दौर 1941 के दूसरे विश्व युद्ध का था. रामधन सरदार की दुकान पर ही अखबार आता था. वहॉं जमा ज़्यादातर लोग युद्ध की खबरें जानने की आतुरता में होते. अख़बार एक होता और खबर जानने वाले अनेक थे. इसलिए सुबह सुबह पिताश्री की ड्यूटी अख़बार बॉंच कर सुनाने की थी. वे एक बेंच पर खड़े होकर बुलंद आवाज़ में हिरोशिमा नागासाकी के बर्बाद होने की खबरे बॉंचते. एकदम रामधन सरदार की दुकान के एंकर के लहजे में. अख़बार वाचन के बदले में रामधन सरदार पिता जी को एक गिलास दूध और जिऊत साव एक दोना बूंदिया देते. जिससे पिता जी की पेट की भूख मिटती और श्रोता समाज की खबरो की भूख. पिताजी की माली हालत ठीक नहीं थी. रामधन सरदार के दूध से उनका शरीर पुष्ट हो रहा था और दूसरी तरफ़ पराड़करजी तथा पंडित कमलापति त्रिपाठी का संपादकीय बॉंच उनमें भाषा के संस्कार बन रहे थे.

अब आप समझ सकते हैं कि मामूली सी दिखने वाली ये चाय की दुकानें हमारे सार्वजनिक जीवन में कितनी उपयोगी है. चूहडमल की चाय की दुकान साहित्य संगीत और समाज का तिराहा थी. यहॉं नियमित आने वालों में राजन, साजन मिश्र, उनके चाचा पं० गोपाल मिश्र, शारदा सहाय और तबला सम्राट गुदई महराज भी थे. चूहडमल की दुकान तो गुदई महराज के ड्राईंग रूम जैसी थी. अपनी गली से निकलकर, कमर में लुंगी बॉंधे, कंधे पर गमछा रखे, हाथ में कपड़े का झोला पकडे, ओंठ के दोनों कोरों से पान की रिसती हुई पीक के साथ वे अक्सर यहॉं बैठे मिलते थे. यह रोजमर्रा का दृश्य था. अगर गुदई महराज आपको पायजामा पहने मिलें तो यह मान लिजिए कि वे या तो एयरपोर्ट जा रहे है या कहीं बाहर से लौट रहे है. वरना वे बनारस में हमेशा लुंगी और गमछे की राष्ट्रीय पोशाक में ही रहते थे.

उनके तबले की गूंज से मुहल्ला गुंजायमान होता था. फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आँखें ‘ के गीत ‘नाचे मन मोरा मगन तिक ता धिक् धिक्’ में तबले पर उनकी ही उंगलियोँ का जादू था. फ़िल्म शोले के उस दृश्य में जिसमें गब्बर सिंह के डाकू बसंती का पीछा करते हैं और वह अपने ताँगे से भाग रही होती है, उसकी पृष्ठभूमि से आती तबले की आवाज़ गुदई महराज की उँगलियों का ही कमाल थी. बनारस में पप्पू की चाय की दुकान पर तो फ़िल्म भी बन चुकी है. इस अडी की तवारीख़ में बड़े बड़े राजनेता, साहित्यकार, पत्रकार और कलाकार दर्ज रहे है. बवासीर की दवा से लेकर फ़्रांस की क्रांति तक, तुलसीदास की भक्ति से लेकर नासा के अभियान तक, पाईथागोरस से लेकर चीनी वाइरस तक, लोहिया से लेकर हाब्स, लॉक, रूसों और सुदामा से वास्कोडिगामा तक यहाँ  घंटो बिना बात के बहस चलती है.

आलम यह है कि दक्षिण अफ़्रीका में अगर कोई कवि मर जाय तो इस चाय की दुकान पर उसकी भी शोक सभा हो जाती है. पप्पू यानी विश्वनाथ सिंह के बाबा आज़ादी के बाद सोनभद्र से यहॉं आए. उनके पूर्वज फ़ौज में थे. अफ़सर मेस में बनने वाली चाय के अंग्रेज़ी तरीक़े का उन्होंने बनारसीकरण कर लोगों में अपनी चाय की लत लगा दी. अब तो पप्पू के बेटे मनोज भी इस परम्परा को चलाने के लिए तैयार हैं. इनके चाय बनाने का तरीका भी एकदम अलग है ।उनकी चाय का पानी घंटो पकता है. उस पानी से कपड़े वाली छननी में चाय रख हर गिलास में उसका अर्क बूँद बूँद टपकाते हैं. फिर अलग से दूध चीनी मिलाई जाती है. एक ख़ास तरीक़े से पप्पू का चम्मच हिलाना उनके चाय बनाने के कर्मकाण्ड का हिस्सा है. पप्पू की चाय पीने से ज़्यादा मज़ा उसे बनाते हुए देखने में आता है.

आपने चाय की दुकानों पर टोस्ट, समोसा नमकीन मिलते देखा होगा. मगर यह दुनिया की इकलौती चाय की दुकान है, जहॉं चाय के साथ भॉंग भी मिलती हैं. वर्ष 1969 के हिन्दी आन्दोलन से लेकर जेपी आन्दोलन तक का केन्द्र यह चाय की दुकान रही. फ़िल्म वाटर के विरोध का आन्दोलन तो इसी दुकान से निकला. मौलिक, क्रान्तिकारी, बरेडिकल और दायॉं-बॉंया, सब तरह के लोगों का यहॉं जमावड़ा रहता है. यहॉं असल भारत की झलक मिलती है. पप्पू की अडी पर जनता की नब्ज समझने वाले समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीज, राज नारायण ,भाजपा नेता राजनाथ सिंह, कलराज मिश्रा, मोहन प्रकाश, अनिल शास्त्री, सुनील शास्त्री और रुस्तम सैटिन का आना जाना लगा रहता था. यहॉं अड़ी लगाने वालों में साहित्यकारों की भी एक नामचीन विरासत थी जिसमें डॉ० नामवर सिंह , केदारनाथ सिंह, पं० चन्द्रशेखर मिश्र, काशीनाथ सिंह, कवि धूमिल, रूद्र काशिकेय, राहगीर जैसे ढेर सारे कवि थे. पप्पू की अड़ी छात्र नेताओं का भी अखाड़ा थी.

इनमें डी मजूमदार, मोहन प्रकाश, चंचल, मार्कण्डेय सिंह, रामबचन पांडे, लालमुनी चौबे जैसे नेता शामिल थे. जिन्होंने बाद में देश की राजनीति में अपनी भूमिका निभाई. पप्पू की चाय की इस दुकान ने बनारस में बौद्धिक विमर्श के नए आयाम स्थापित किए.  सिर्फ़ बनारस ही नहीं समूची दुनिया में आपको ऐसे चायखाने मिलेगें जिनकी दीवारों पर सृजन की बेजोड़ विरासत टंगी है. मैं पेरिस के उस चायखाने में भी गया हूँ जहॉं अस्तित्ववादी चिन्तक ज़्याँ पाल सार्त्र बैठते थे. पेरिस के Cafe de Flore एवं Les Deux Magots में ज्यां पाल सार्त्र और उनके रचना संसार की साथी सिमोन द बोउआर चाय की चुस्कियों के साथ साहित्य रचते रहे. उनकी हस्तलिपि आज भी इस चाय खाने में  फ़्रेम कर टॉंगी गयी है.  ये दोनो ही कैफे उस दौर में लेखकों के राइटिंग रूम के तौर पर मशहूर थे.

इसी तरह पेरिस का मशहूर चायखाना La Rotonde मशहूर चित्रकार पाब्लो पिकासो के चिंतन की जमीन थी. चाय एक जुनून है. इस जूनून से जुड़ी प्रसिद्ध शख्सियतों का सिलसिला दुनिया भर में पाया जाता है. पाकिस्तान में लाहौर का ‘पाक टी हाउस’ बौद्धिक विमर्श का एक ऐसा ही मशहूर अड्‍डा रहा है. वर्ष 1940 में अपनी स्थापना के वक्त से ही यह अविभाजित भारत की कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़ी सुप्रसिद्ध हस्तियों का पसंदीदा ठिकाना रहा है. वर्ष 1947 के विभाजन के बाद पाकिस्तान की प्रगतिशील सोच ने इसी चायखाने को विमर्श का केंद्र बनाया. इस चायखाने की दरो-दीवार पर फैज़ अहमद फैज़, इब्न ए इंशा, अहमद फराज़, साहिर लुधियानवी, अमृता प्रीतम, मजरूह सुल्तानपुरी, फिराक गोरखपुरी और राजेंद्र सिंह बेदी से लेकर हिंदी कथा साहित्य के सम्राट मुंशी प्रेमचंद भी शामिल रहे हैं.

वर्ष 2003 में प्रधानमंत्री अटल विहारी बाजपेयी और राष्ट्रपति मुशर्रफ की शिखर वार्ता होनी थी. अटल जी की टोली में ‘मैं’ भी पाकिस्तान गया. बातचीत काश्मीर पर अटकी थी. मै इस्लामाबाद से लाहौर चला गया मुल्क को समझने के लिए. उन दिनों पाकिस्तान के मशहूर अख़बार ‘जंग’ के संपादक बाराबंकी के रहने वाले एक किदवई साहब थे, उन्होंने मुझे लाहौर में देखने वाली चीजों में उस चायखाने का भी ज़िक्र किया. मैंने लाहौर का सिर्फ़ अनारकली बाज़ार ही सुन रखा था. इतिहास से बाबास्ता होने के लिए मैं इस चाय खाने में भी गया.

आप कुछ भी कहे चाय से क्रांति का रिश्ता रहा है. चाय के सवाल पर कभी अमेरिका में क्रांति हो गई थी. अंग्रेजी हुकूमत की तानाशाही के विरोध में 16 दिसंबर, 1773 को अमेरिकी क्रांतिकारियों के एक समूह ने बॉस्टन के बंदरगाह में घुसकर चाय की पेटियों को समंदर में फेंक दिया. ब्रिटेन की संसद के ‘टी एक्ट’ के विरोध में अमेरिकियों ने उस अंग्रेजी चाय को खारे पानी में मिला दिया. उस रोज कुल 342 चाय की पेटियां समंदर में बहाई गईं. इस घटना को इतिहास में ‘बॉस्टन टी पार्टी’ के नाम से जाना गया.

चाय के नाम हुई क्रांति की इस शुरूआत ने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दीं. महज तीन सालों के भीतर अमेरिका आज़ाद हो गया. 04 जुलाई 1776 की सुबह अमेरिकी आजादी की सुबह थी जो करीब तीन साल पहले बॉस्टन के समंदर में घुली चाय से पैदा हुई संघर्ष का नतीजा थी. चाय अपने आप में एक इतिहास है. पाँच हज़ार साल के चाय के इस इतिहास में एक रोज़ चीन के शासक शान नुंग के सामने रखे गर्म पानी के प्याले में कुछ सूखी पत्तियों आकर गिर गयीं. जब सम्राट नें उसकी चुस्की ली तो उन्हें उसका स्वाद पंसद आया और तभी से यह चीन का ख़ास पेय बन गया. भारत में चाय बाग़ान की शुरुआत वर्ष 1834 के आस पास अंग्रेजों ने की, जहॉं से चलते चलते अब यह तमाम रूपों में नमूदार हो चुकी है. इनमें हर्बल टी, स्ट्रेस रीलिविंग टी, रिजुविनेटिंग टी, स्लिमिंग टी जैसे न जाने कितने रूप शामिल हैं. भारत में सबसे महँगी ‘ व्हाइट टी ‘ पच्चहतर हज़ार किलो तक मिलती है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया की सबसे मंहगी चाय चीन की ‘हॉंग पाओ‘ टी है. लौटते हैं बनारस पर क्योंकि बनारस में चाय महज एक उत्पाद नही बल्कि जीवनशैली है. बनारस में चाय के लिए कुल्हड का चलन व्यापक है. पर न जाने क्यों चाय की अड़ियों पर कॉंच के कटिंग ग्लास का ही इस्तेमाल होता हैं. शायद उसमें चाय लेकर देर तक गप्प लड़ाने में सुविधा होती है! चाहे कबीरचौरा पर चूहडमल की दुकान हो,या लंका पर टंडन जी की, अस्सी की पप्पू की चाय की अडी हो या चौक का लक्ष्मी चायवाला या फिर लहुराबीर की मोती की कैंटीन.

हर जगह चाय के ग्लास में ही क्रान्ति का तूफ़ान पैदा होता है. बनारसी कुल्हड़ यहीं पिछड़ जाता है. कुल्हड़ के सवाल पर कालजयी साहित्यकार  विद्यानिवास मिश्र का कहा अद्भुत हैं. वे बनारस के बादशाह बाग में रहते थे. उनके घर जाइए तो गर्मियों में आवंले का मुरब्बा और सर्दियों में चाय मिलती थी. पंडित जी पूछते “बालक ! चाय पियोगे? ” अगर आपने हॉं कहा तो उनका अगला सवाल होता “ चरित्रवान चाय पियोगे या चरित्रहीन? ” आने वाला अचकचा जाता. फिर मोटे चश्मे से  झॉंकती उनकी आँखें घूर कर खुद बतातीं “बेटा ! चीनी-मिट्टी के कप में जो चाय आती है वो चरित्रहीन है. हर बार धुल-पुछकर नए रूप में, नए साज-सिंगार में आकर पीने वाले के अधरो को चूमती है ! पर जो चाय कुल्हड़ में पी जाती है वह तो पंचतत्वों से स्वयं को तपाकर तैयार होती है और किसी अधर से एक बार जब छू जाए तो अपना नश्वर शरीर त्याग देती है.

फिर उसी अग्नि में तपकर नया जन्म लेती है, नए प्रेमी के अधर छूने के लिए.“ अब तो आप कुल्हड़ की चाय की आध्यात्मिकता को समझ गए होंगे. चाय अपने आप में अध्यात्मिकता की एक सीढ़ी है जो वह दृष्टि पैदा करती है जिससे सभी समस्याओं का हल चुटकी में होता है. वह दुनिया के किसी भी हिस्से की समस्या सुलझा सकता है. वह चाय का लुत्फ लेते हुए इजरायल और फिलिस्तीन के बीच सुलह भी करवा सकता है और चुनाव हारने के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका का दोबारा राष्ट्रपति भी बनवा सकता है. समुद्र मंथन के समय दो ही विकल्प थे, अमृत और विष. अगर तीसरा विकल्प चाय का होता तो बनारसी अवश्य ही अमृत छोड़कर चाय की ओर लपकते.

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Tales and people of Banaras

Tea is the drink of the proletariat. Imagine what the common man would drink if there was no tea. Tea removes fatigue, gives energy, and gives us a dose of intellectual discussion. If we look at the debates that take place in the teahouses in this country, it would appear that a revolution is about to happen. By the way, if there was a revolution from teahouses, there would have been one revolution or the other in this country every day.

In Banaras, such tea stalls used to be the centers of revolutionaries. Where meaningless talks used to take place for hours. In my locality, there was a center of such intellectual ruminations, “Chuhdmal ki tea shop”. But don’t be mistaken. This rat had nothing to do with that Todermal. Who was the jewel of Akbar’s court? Although that Todermal was also interested in Banaras. This Chuhadmal was a Sindhi and his father came to Banaras from Sindh during the partition and opened a tea shop there. The tea mood of Banaras is unique. Once upon a time sources of literature, music, and spirituality used to emerge from these teahouses. Looking at the debate happening here, it sometimes seems that the tradition of Shastrarth in Kashi, which started from Acharya Shankar and Mandan Mishra, has now been reduced to these foundations.

Chudhamal used to live in my locality and he had a tea stall at Kabirchaura. Apart from tea, his shop’s butter toast and omelet were famous all over Banaras. Chuhadmal’s shop had a total of two tables on which only eight people could sit. Remaining 30-40 people used to fire ideological missiles sitting on the benches kept on the road. Apart from caste and community prejudice, the debate on this issue of tea is no less than any parliament. This tea stall would always be buzzing with the gathering of Kabirchaura’s music gharana, journalists, and social people. At that time the eight-page ‘Aaj’ newspaper was divided into four pieces and people standing in different corners were looking for material for their next debate.

While coming from there, I used to get knowledge by standing on the heels of this tea. This is where I get the culture of political discussion. Amazing political discussions take place in tea shops in Banaras. Whether it is Chudhamal’s shop or Pappu’s. Everyone’s political consciousness is at its peak. Chuhadmal was not educated. The purpose of life was also nothing in front of the teapot. His two sons used to help him in running the shop. He had a son who was very cruel. The one who used to bake toast on the khons angeethi with a white 25-inch mohri bellwatom and a red handkerchief on the collar of the white shirt. Chudhamal had learned to make tea from an Englishman. He not only used to make tea with milk in a boiling pot but also made a different type of very energetic tea by extracting the extract of ‘Lipton Green Label’, which was an elite tea at that time, adding lemon juice and Lavan Bhaskar to it.

He used to call it ‘Bhaskar Chai’. During the Second World War, such intellectual islands of tea have been very active in Banaras. This stubbornness is in my blood. Father grew up in such a condition. He used to read newspapers loudly at the tea shop of Ramdhan Sardar of Daranagar. Ramdhan Sardar had a milk, tea, rabri, cream shop on the Daranagar tri-route of Banaras. There was a sweet shop of Jiut Sardar in front of them. Daranagar locality was named after Aurangzeb’s brother Darashikoh. Staying here, he studied Sanskrit.

This period was the second world war of 1941. The newspaper used to come to Ramdhan Sardar’s shop only. Most of the people gathered there would have been eager to know the news of the war. There would have been one newspaper and there would have been many people who knew the news. That’s why it was the father’s duty in the morning to narrate the newspapers. Standing on a bench, he used to share the news of the destruction of Hiroshima and Nagasaki in a loud voice. Exactly in the tone of the anchor of Ramdhan Sardar’s shop. In return for reading the newspaper, Ramdhan Sardar would give a glass of milk and a couple of drops of Jiut Sau to his father. Due to this the hunger of the father’s stomach and the hunger of the listeners for the news of society would be satisfied. Father’s financial condition was not good. His body was being nourished by Ramdhan Sardar’s milk and on the other hand, the editorial board of Paradkarji and Pandit Kamlapati Tripathi was forming language skills in him.

Now you can understand how useful these modest-looking tea shops are in our public life. Chuhadmal’s tea stall was the crossroads of literature, music, and society. Rajan, Sajan Mishra, his uncle Pandit Gopal Mishra, Sharda Sahay, and Tabla Samrat Gudai Maharaj were among the regular visitors here. Chuhadmal’s shop was like Gudai Maharaj’s drawing room. Coming out of his street, with a lungi tied around his waist, a towel on his shoulder, holding a cloth bag in his hand, he would often be found sitting here with a betel leaf dripping from both the corners of his lips. It was an everyday scene. If you find Gudai Maharaj wearing pajamas, then assume that he is either going to the airport or returning from somewhere outside. Otherwise, he always lived in Banaras in the national dress of lungi and gamcha.

The locality used to resonate with the echo of his tabla. The song ‘Nache Man Mora Magan Tik Ta Dhik Dhik’ from the film ‘Meri Surat Teri Aankhen’ had the magic of his fingers on the tabla. In the scene of the movie Sholay in which Gabbar Singh’s dacoits chase Basanti and she is running away in her tonga, the sound of tabla in the background was just a wonder of Gudai Maharaj’s fingers. A film has also been made on Pappu’s tea shop in Banaras. Big politicians, litterateurs, journalists, and artists have been recorded in the history of this adi. From piles medicine to the French Revolution, from the devotion of Tulsidas to the NASA campaign, from Pythagoras to the Chinese virus, from Lohia to Hobbes, Locke, Rousseau and from Sudama to Vasco da Gama, the debate goes on here for hours without talking.

The situation is that if a poet dies in South Africa, his condolence meeting is also held at this tea shop. Pappu i.e. Baba of Vishwanath Singh came here from Sonbhadra after independence. His ancestors were in the army. By binarizing the English method of tea made in the officer’s mess, he made people addicted to his tea. Now Pappu’s son Manoj is also ready to carry on this tradition. The method of making their tea is also completely different. Their tea water cooks for hours. Keep tea in a cloth strainer with that water and drip its extract drop by drop in every glass. Then milk and sugar are mixed separately. Shaking Pappu’s spoon in a special way is a part of his ritual of making tea. It is more fun to see Pappu making tea than drinking it.

You must have seen toast, and samosas being available at tea shops. But this is the only tea shop in the world, where cannabis is also available along with tea. From the Hindi movement of 1969 to the JP movement, this tea shop was the center. The movement against the film Water originated from this shop. Original, revolutionary, radical, and left-right, all kinds of people gather here. Here one gets a glimpse of the real India. Socialist leaders George Fernandez, Raj Narayan, BJP leaders Rajnath Singh, Kalraj Mishra, Mohan Prakash, Anil Shastri, Sunil Shastri, and Rustom Satin, who understood the pulse of the people on Pappu’s heels, used to come and go. There was also a renowned legacy of litterateurs among those who insisted here, in which there were many poets like Dr. Namvar Singh, Kedarnath Singh, Pandit Chandrashekhar Mishra, Kashinath Singh, Kavi Dhumil, Rudra Kasikeya, Raahgir. Pappu’s adamant student leaders also had an arena.

Leaders like D Majumdar, Mohan Prakash, Chanchal, Markandeya Singh, Rambachan Pandey, and Lalmuni Choubey were included in these. Who later played his role in the politics of the country. Pappu’s tea shop established new dimensions of intellectual discussion in Banaras. Not only in Banaras but in the whole world, you will find such teahouses, whose unique heritage of creation hangs on their walls. I have also been to the teahouse in Paris where the existentialist thinker Jean-Paul Sartre used to sit. In Paris’s Cafe de Flore and Les Deux Magots, Jean-Paul Sartre and his companion Simone de Bouar created literature over a cup of tea. Even today his handwriting is framed and hangs in this tea room. Both these cafes were famous as the writing rooms of writers in that period.

Similarly, the famous tea house La Rotonde of Paris was the land of contemplation of the famous painter Pablo Picasso. Tea is a passion. The chain of famous personalities associated with this passion is found all over the world. The ‘Pak Tea House’ of Lahore in Pakistan has been one such famous place of intellectual discussion. Since its inception in the year 1940, it has been a favorite destination for eminent personalities associated with the art, literature, and culture of undivided India. After the partition of 1947, the progressive thinking of Pakistan made this tea house the center of discussion. From Faiz Ahmed Faiz, Ibn-e-Insha, Ahmed Faraz, Sahir Ludhianvi, Amrita Pritam, Majrooh Sultanpuri, Firak Gorakhpuri, and Rajendra Singh Bedi to the emperor of Hindi fiction, Munshi Premchand has also been involved in this tea house.

In the year 2003, Prime Minister Atal Bihari Vajpayee and President Musharraf were to have summit talks. ‘I’ also went to Pakistan in Atal ji’s group. The conversation was stuck on Kashmir. I went to Lahore from Islamabad to understand the country. In those days, the editor of Pakistan’s famous newspaper ‘Jung’ was a Kidwai Sahab from Barabanki, he also mentioned that tea house among the things I would like to see in Lahore. I had only heard of the Anarkali market in Lahore. To get away from history, I also went to this tea house.

Whatever you say, there has been a relationship of revolution with tea. There was once a revolution in America on the question of tea. In protest against the dictatorship of British rule, on December 16, 1773, a group of American revolutionaries entered the port of Boston and threw tea boxes into the sea. In protest against the ‘Tea Act’ of the British Parliament, the Americans mixed English tea with salt water. That day a total of 342 tea boxes were thrown into the sea. This event was known in history as the ‘Boston Tea Party’.

This beginning of the revolution in the name of tea shook the stove of British rule. America became independent within just three years. The morning of 04 July 1776 was the morning of American independence, which was the result of the conflict that arose from tea dissolved in the sea of Boston about three years ago. Tea is a history in itself. In this history of five thousand years of tea, one day some dry leaves fell into the cup of hot water kept in front of Shan Nung, the ruler of China. When the emperor tasted it, he liked its taste and since then it became a special drink in China. Tea plantation in India was started by the British around the year 1834, from where it has now become visible in all forms. These include many forms like herbal tea, stress relieving tea, rejuvenating tea, and slimming tea. The most expensive ‘white tea’ in India is available for up to seventy-five thousand kilos.

According to a report, the world’s most expensive tea is China’s ‘Hong Pao’ tea. Coming back to Banaras because tea is not just a product but a lifestyle in Banaras. The practice of Kulhad for tea is widespread in Banaras. But don’t know why only glass-cutting glasses are used on tea bags. Perhaps there is convenience in having tea and chatting for a long time! Be it Chuhadmal’s shop at Kabirchaura, Tandon ji’s at Lanka, Pappu’s chai ki aadi at Assi or Lakshmi Chaiwala at Chowk or Moti’s canteen at Lahurabir.

Everywhere a storm of revolution is born in a glass of tea. Banarasi Kulhad lags behind here. The saying of classical writer Vidyanivas Mishra on the question of Kulhad is wonderful. He lived in Badshah Bagh of Banaras. Gooseberry marmalade was available in summer and tea was available in winter. Pandit Ji asks, “Child! Will you have tea? If you said yes, his next question would have been, “Will you drink tea with character or characterless? ′′ The visitor would have been surprised. Then staring at his eyes peeping through the thick glasses, she used to tell herself “Son! The tea that comes in porcelain cups is characterless. Every time after being washed, it comes in a new form, in new decorations, and kisses the lips of the drinker! But the tea that is drunk in the kulhad is prepared by heating itself with the five elements and once it is touched by any medium, it leaves its mortal body.

Then after burning in the same fire, she takes a new birth, to touch the belly of a new lover.” Now you must have understood the spirituality of Kulhad tea. Tea in itself is a ladder of spirituality that creates a vision that solves all problems in a jiffy. He can solve the problem of any part of the world. While enjoying tea, he can also bring about reconciliation between Israel and Palestine and despite losing the election, he can make Donald Trump the President of America again. At the time of the churning of the ocean, there were only two options, nectar, and poison. If the third option was tea, then Banarasi would have left nectar and turned to tea.

Prabhakar Kumar.

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