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राणा हरराय चौहान…

आज हम आपको चौहान वंश के ऐसे वीर यौद्धा की गाथा सुनाएंगे जिनके बारे आज बहुत कम लोग जानते हैं,एक समय हरियाणा के इतिहास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है,यही नहीं दसवी सदी में इस हिस्से पर उनके शासन के बाद ही यह क्षेत्र हरयाणा के नाम से प्रसिद्ध हुआ आज हरियाणा,पंजाब,यमुना पार सहारनपुर,मुजफ्फरनगर के लगभग सभी चौहान राजपूत राणा हर राय और उनके सगे सम्बन्धियों के वंशज हैं,यही नहीं गुर्जर,जाट,रोड,जातियों में जो चौहान वंश है उन सबके पूर्वज भी क्षत्रिय राजपूत सम्राट राणा हर राय चौहान को माना जाता है,जो राणा हर राय चौहान अथवा उनके पुत्रो के उस समय उन जातियों की महिलाओ से अंतरजातीय विवाह से उत्पन्न संतान के वंशज हैं जिनसे उन जातियों में चौहान वंश का प्रचलन हुआ।राणा हर राय चौहान का हरयाणा यह ऐतिहासिक कहानी है दसवी सदी की जब हरयाणा के उत्तर पूर्वी भाग पर चौहानो का राज्य स्थापित हुआ. नीमराना के चौहानो और पुण्डरी(करनाल,कैथल) के पुंडीर राजपूतों के बीच हुए इस रक्तरंजित युद्ध का इतिहास गवाह है। यह ऐतिहासिक कहानी आपको हरियाणा के उस स्वर्णिम काल में ले जाएगी जब यहां क्षत्रिय राजपूतो का राज था ,यानी अंग्रेजों और मुगलों के समय से भी पहले नीमराणा के राणा हर राय चौहान संतानहींन थे। राज पुरोहितो के सुझाव के पश्चात राणा हर राय गंगा स्नान के लिए हरिद्वार के लिए निकले। लौटते हुए उन्होंने एक रात करनाल के पास के क्षेत्र में खेमा लगाया।उस क्षेत्र का नाम बाद में जा कर जुंडला पड़ा क्यूंकि यहां जांडी के पेड़ उगते थे। राणा जी और उनकी सेना इस इलाके की उर्वरता व हरयाली देख कर मोहित हो गये। उनके पुरोहितों ने उन्हें यहीं राज्य स्थापित करने का सुझाव दिया क्यूंकि पुरोहितों को यह भूमि उनके वंश की वृद्धि के लिए शुभ लगी।उस समय यह क्षेत्र पुंडीर क्षत्रियों के पुण्डरी राज्य के अंतर्गत था। विक्रमसम्वत 602 में यह राज्य राजा मधुकर देव पुंडीर जी ने बसाया था। राजा मधुकर देव जी का शासन तेलंगाना में था, वे अपने सैनिको के साथ तेलांगना से कुरुक्षेत्र ब्रह्मसरोवर में स्नान के लिए आये थे। यहां के रघुवंशी राजा सिन्धु ( जो की हर्षवर्धन के पूर्वज हो सकते हैं) ने आपने बेटी अल्प्दे का विवाह उनसे किया और दहेज़ में कैथल करनाल का इलाका उन्हें दिया,

राजा मधुकर देव पुंडीर ने यही पर अपने पूर्वज के नाम पर पुण्डरी नाम से राजधानी स्थापित की, बाद में उनके वंशजो ने यहां चार गढ़ स्थापित किये जो कि पुण्डरी, पुंडरक ,हावडी, चूर्णी (चूर्णगढ़) के नाम से जाने गए हर्षवर्धन के पश्चात् सन 712 इसवी के आसपास पुंडीर क्षत्रिय (राजपूतो) ने यमुना पार सहारनपुर और हरिद्वार क्षेत्र पर भी कब्जा कर 1440 गाँव पर अपना शासन स्थापित किया।पुंडीर राज्य के दक्षिण पश्चिम में मंडाड क्षत्रिय राजपूतों का शासन था जो कि यहां मेवाड़ से आये थे और राजोर गढ़ के बड़गुजरों की शाखा थे। उनके एक राज़ा जिन्द्रा ने जींद शहर बसाया और इस क्षेत्र में राज किया। इन्होने चंदेल और परमार राजपूतों को इस इलाके से हराकर निकाल दिया और घग्गर नदी से यमुना नदी तक राज्य स्थापित किया। चंदेल उत्तर में शिवालिक पहाड़ियों की तराई में जा बसे।(यहां इन्होने नालागढ़ (पंजाब) और रामगढ़ ( पंचकुला ,हरयाणा) राज्य बसाये ).वराह परमार राजपूत सालवन क्षेत्र छोडकर घग्घर नदी के पार पटियाला जा बसे। जींद ब्राह्मणों को दान देने के बाद मंढाडो ने कैथल के पास कलायत में राजधानी बसाई व घरौंदा ,सफीदों ,राजौंद और असंध में ठिकाने बनाये।मंडाड क्षत्रिय राजपूतो का कई बार पुंडीर राज्य से संघर्ष हुआ पर उन्हें सफलता नहीं मिली।गंगा स्नान से लौटते वक्त राणा हर राय चौहान थानेसर पहुंचे तथा पुरोहितो के सुझाव पर पुंडीरो से कुछ क्षेत्र राज करने के लिए भेंट में माँगा। पुंडीरो ने राणा जी की मांग ठुकराई और क्षत्रिये धर्म निभाते हुए विवाद का निर्णय युद्ध में करने के लिए राणा हर राय देव को आमंत्रित किया। जिसे हर राय देव ने स्वीकार किया।ऐसा कहा जाता है कि मंडाड राजपूतो ने चौहानो का इस युद्ध में साथ दिया. पुंडीर सेना पर्याप्त शक्तिशाली होने के कारण प्रारम्भ में हर राय को सफलता नहीं मिली मात्र पुण्डरी पर वो कब्जा कर पाए,राणा हर राय ने हार नजदीक देख नीमराणा से मदद बुलवाई।नीमराणा से राणा हर राय चौहान के परिवार के राय दालू तथा राय जागर अपनी सेना के साथ इस युद्ध में हिस्सा लेने पहुंचे.नीमराणा की अतिरिक्त सेना और मंडाड राज्य की सेना के साथ मिलने से क्षत्रिय राजपूत राणा हर राय चौहान की स्थिति मजबूत हो गयी और चौहानो ने फिर हावडी, पुंड्रक को जीत लिया,अंत में पुंडीर राजपूतो ने चूर्णगढ़ किले में अंतिम संघर्ष किया और रक्त रंजित युद्ध के बाद इस किले पर भी राणा हर राय चौहान का कब्ज़ा हो गया इसके बाद बचे हुए पुंडीर क्षत्रिय (राजपूत) यमुना पार कर आज के सहारनपुर क्षेत्र में आये और कुछ समय पश्चात् उन्होंने दोबारा संगठित होकर मायापुरी(हरिद्वार)को राजधानी बनाकर राज्य किया,बाद में इस मायापुरी राज्य के चन्द्र पुंडीर और धीर सिंह पुंडीर क्षत्रिय राजपूत सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बड़े सामंत बने और सम्राट द्वारा उन्हें पंजाब का सूबेदार बनाया गया,यह मायापुर राज्य हरिद्वार,सहारनपुर,मुजफरनगर तक फैला हुआ था.

बाद में युद्ध की कटुता को भूलाते हुए चौहानों और पुंडीरो में पुन वैवाहिक सम्बन्ध होने लगे पुंडीर राज्य पर जीत के बाद राणा हर राय ने राय डालु को 48 गांव की जागीर भेंट की जो की आज क नीलोखेड़ी के आसपास का इलाका था।जागर को 12 गांव की जागीर यमुनानगर के जगाधरी शहर के पास मिली तथा हर राय के भतीजे को टोंथा के( कैथल ) आस पास के 24 गांव की जागीर मिली। राणा हर राय देव ने जुंडला से शासन किया।इन्ही के नाम पर इस इलाके का नाम हरयाणा पड़ा जिसका मतलब वो स्थान जहा हर राय राणा के वंशज राज्य करते थे।

(हर राय राणा = हररायराणा हरियाणा)

परन्तु आजादी के बाद इसका अर्थ राजपूत विरोधी जातियों ने हरी का आना बना दिया जबकि हरी तो हमेशा से उत्तर प्रदेश में ही अवतरित हुए है, हरयाणा तो हरी की कर्म भूमि थी।राणा हरराय चौहान और उनके चौहान सेना के वंशज आज हरयाणा के अम्बाला पंचकुला करनाल यमुनानगर जिलो के 164 गाँवो में बसते है।रायपुर रानी (84 गाँव की जागीर) इनका आखिरी बचा बड़ा ठिकाना है जो की आजादी के बाद तक भी रहा। हालाकिं इन चौहानो कई छोटी जागीरे चौबीसी के टिकाइओ के नीचे बचीं रहीं जैसे उनहेरी, टोंथा, शहजादपुर, जुंडला, घसीटपुर आदि जो बाद में अंग्रेजो के शासन के अंतर्गत आ गयी. इन चौहानो की एक चौबीसी यमुना पार मुज़्ज़फरनगर जिले में भी मिलती है।कलस्यान गुर्जर भी खुद को इसी चौहान वंश की शाखा मानते है, (मुजफरनगर गजेटियर पढ़े). राणा हर राय देव के एक वंशज राव कलस्यान ने गुर्जरी से विवाह किया जिनकी संतान ये कलसियान गुर्जर है।ये गुर्जर आज चौहान सरनेम लगाते है और इनके 84 गांव मुज़्ज़फरनगर के चौहान राजपूतो के 24 गाँव के साथ ही बसे हुए है।राणा हर राय चौहान ने दूसरी जातियों जैसे जाट ,रोड़ , नाइ ,जोगन जातियों की लड़कियों से भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये।कुरुक्षेत्र के पास के अमीन गाँव चौहान रोड़ इन्ही के वंशज माने जाते है। लाकड़ा जाट या चौहान जाट भी इन्ही चौहानो के वंशज माने जाते है। नाइ व जोगन बीविओं की संताने आज सोनीपत और उत्तर प्रदेश के घाड के आसपास के इलाके में बसते है इन्हे खाकी चौहान कहा जाता है जिनमे शुद्ध रक्त के राजपूत विवाह नहीं करते।राणा हर राय के वंशज राणा शुभमल के समय अंबाला,करनाल क्षेत्र में चौहानो के 169 गाँव थे। शुभमल के पुत्र त्रिलोक चंद को 84 गाँव मिले जबकि दुसरे पुत्र मानक चंद को 85 गाँव मिले जो मुसलमान बन गया। त्रिलोक चंद की आठवी पीढ़ी में जगजीत हुए जो गुरु गोविनद सिंह के समय बहुत शक्तिशाली थे, 1756 में जगजीत के पोते फ़तेह चंद ने अपने दो पुत्रो भूप सिंह और चुहर सिंह के साथ अहमद शाह अब्दाली का मुकाबला किया जिसमे अब्दाली की विशाल शाही सेना ने कोताहा में धोखे से घेरकर 7000 चौहानो का नरसंहार किया।

हरयाणा के चौहान आज भी बहुत स्वाभिमानी है और अपने इतिहास पर गर्व करते है। हरियाणा में क्षत्रिय (राजपूतो) की जनसँख्या और प्रभुत्व आज नगण्य सा हो गया है राणा हर राय देव चौहान की छतरी आज भी जुंडला गाँव (करनाल) में मौजूद है। पर ये दुःख की बात यहाँ के चौहान राजपूत अपने वीर पूर्वज की शौर्य गाथा को भूलते जा रहे है ।

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Today we will tell you the story of such a brave warrior of the Chauhan dynasty, about whom very few people know today, at one time he had an important contribution to the history of Haryana, not only this but only after his rule in this part in the tenth century, this area became part of Haryana. Today Haryana, Punjab, Yamuna Par Saharanpur, almost all Chauhan Rajputs of Muzaffarnagar are the descendants of Rana Har Rai and his relatives, not only this, but the ancestors of the Chauhan dynasty in Gujjar, Jat, Road, castes are also Kshatriya Rajputs. Emperor Rana Har Rai Chauhan is considered, who is the descendant of Rana Har Rai Chauhan or his sons at that time from inter-caste marriages with women of those castes, from which the Chauhan dynasty was prevalent in those castes. Haryana of Rana Har Rai Chauhan This is a historical story of the 10th century when the kingdom of Chauhans was established in the northeastern part of Haryana. History is witness to this bloody war between the Chauhans of Neemrana and the Pundir Rajputs of Pundri (Karnal, Kaithal). This historical story will take you to the golden age of Haryana when it was ruled by Kshatriya Rajputs, that is, even before the time of the British and Mughals, Rana Har Rai Chauhan of Neemrana was childless. After the suggestion of Raj Purohit, Rana Har Rai left for Haridwar for a Ganga bath. On his return, he camped for one night in an area near Karnal. The area was later named Jundla because Jandi trees grew here. Rana ji and his army were fascinated by the fertility and greenery of this area. His priests suggested he establish the kingdom here because the priests found this land auspicious for the growth of their dynasty. At that time this area was under the Pundri kingdom of Pundir Kshatriyas. In Vikramsamvat 602, this state was established by King Madhukar Dev Pundir ji. King Madhukar Dev ji’s rule was in Telangana, he came from Telangana with his soldiers to bathe in Kurukshetra Brahmasarovar. The Raghuvanshi king Sindhu (who may be the ancestor of Harshvardhan) married his daughter Alpde to him and gave him the area of Kaithal Karnal in dowry.

King Madhukar Dev Pundir established the capital here by the name of his ancestor, Pundri. Later, his descendants established four forts here, which were known as Pundri, Pundrak, Hawdi, and Churni (Churnagarh). Kar established his rule over the village in 1440. In the southwest of the Pundir kingdom, Mandad was ruled by the Kshatriya Rajputs who came here from Mewar and were a branch of the Badgujars of Rajorgarh. One of their kings, Jindra, established the city of Jind and ruled the region. He defeated Chandel and Parmar Rajputs from this area and established a kingdom from the Ghaggar river to the Yamuna river. The Chandelas settled in the foothills of the Shivalik hills in the north. (Here they established the kingdoms of Nalagarh (Punjab) and Ramgarh (Panchkula, Haryana). The Varaha Parmar Rajputs left the Salwan area and settled across the Ghaggar river to Patiala. After donating Jind to Brahmins, Mandhado settled the capital at Kalayat near Kaithal and made bases in Gharaunda, Safidon, Rajound, and Assandh. Mandad Kshatriya Rajputs had many times struggled with Pundir state but they did not get success. While returning from the Ganga bath Rana Har Rai Chauhan reached Thanesar and on the suggestion of priests asked Pundiro to rule some areas in a gift. Pundiro rejected Rana ji’s demand and invited Rana Har Rai Dev to decide the dispute in the war while playing the Kshatriya religion. Which was accepted by Har Rai Dev. It is said that Mandad Rajputs supported Chauhans in this war. Due to Pundir’s army being strong enough, Har Rai did not get success in the beginning, only he was able to capture Pundri, Rana Har Rai seeing the defeat, called for help from Neemrana. Rai Dalu and Rai Jagar of the family of Rana Har Rai Chauhan from Neemrana. Arrived to take part in this war with the army. The position of Kshatriya Rajput Rana Har Rai Chauhan was strengthened by meeting with Neemrana’s additional army and Mandad state’s army and Chauhans again won Howdi, Pundrak, finally Pundir Rajputs Last fought in Churnagarh fort and after a bloody war, this fort was also captured by Rana Har Rai Chauhan, after that the remaining Pundir Kshatriyas (Rajputs) crossed the Yamuna and came to today’s Saharanpur area and after some time they regrouped. Ruled Mayapuri (Haridwar) as the capital, later Chandra Pundir and Dhir Singh Pundir of this Mayapuri state became the great feudatories of the Kshatriya Rajput emperor Prithviraj Chauhan and he was made the governor of Punjab by the emperor, this Mayapur state till Haridwar, Saharanpur, Muzaffarnagar was spread.

Later, forgetting the bitterness of the war, the Chauhans and the Pundiros started remarriage. The jagir of the village was found near Jagadhari town of Yamunanagar and Har Rai’s nephew got the jagir of 24 villages around Tontha (Kaithal). Rana Har Rai Dev ruled from Jundla. It was after him that the region was named Haryana which means the place where the descendants of Har Rai Rana ruled.

(Har Rai Rana = Harrayrana Haryana)

But after independence, anti-Rajput castes made it mean the coming of Hari, while Hari has always been incarnated in Uttar Pradesh, Haryana was Hari’s karma land. Descendants of Rana Harrai Chauhan and his Chauhan army today Ambala Panchkula of Haryana Karnal resides in 164 villages of Yamuna Nagar district. Raipur Rani (a manor of 84 villages) is their last remaining big place which remained till independence. However, many small estates of these Chauhans remained under Chaubisi’s Tikaio like Unheri, Tontha, Shahzadpur, Jundla, Ghasitpur, etc. which later came under British rule. Twenty-four of these Chauhans are also found in the Muzaffarnagar district across Yamuna. Kalsyan Gurjars also consider themselves a branch of this Chauhan dynasty (read Muzaffarnagar Gazetteer). Rao Kalsian, a descendant of Rana Har Rai Dev, married a Gurjari, whose children are these Kalsian Gurjars. These Gurjars today bear the surname Chauhan and their 84 villages are inhabited along with 24 villages of the Chauhan Rajputs of Muzaffarnagar. Rana Har Rai Chauhan He also established matrimonial relations with girls of other castes like Jat, Rod, Nai, and Jogan castes. Amin village Chauhan Road near Kurukshetra is considered to be their descendants. Lakra Jat or Chauhan Jat are also considered to be the descendants of these Chauhans. The children of Nai and Jogan wives today live in the areas around Sonipat and Ghad in Uttar Pradesh, they are called Khaki Chauhans, whom Rajputs of pure blood do not marry. Chauhans in Ambala, Karnal region during the time of Rana Shubmal, the descendants of Rana Har Rai. There were 169 villages. Subhamal’s son Trilok Chand got 84 villages while another son Manak Chand got 85 villages and became a Muslim. In the eighth generation of Trilok Chand came Jagjit who was very powerful during the time of Guru Gobind Singh, 1756 Jagjit’s grandson Fateh Chand along with his two sons Bhup Singh and Chuhar Singh fought Ahmad Shah Abdali in which Abdali’s huge royal army defeated Kota. I massacred 7000 Chauhans by being surrounded by deceit.

Even today the Chauhans of Haryana are very self-respecting and take pride in their history. The population and dominance of Kshatriyas (Rajputs) in Haryana have become negligible today. The umbrella of Rana Har Rai Dev Chauhan is still present in Jundla village (Karnal). But it is sad that the Chauhan Rajputs here are forgetting the bravery story of their brave ancestors.

Prabhakar Kumar (Jamui).

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