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रामकृष्ण परमहंस…

सनातन धर्म और संस्कृति की बात ही अनोखी है वहीँ, गंगा का तट और यहाँ रहने वाले लोग की छवि बड़ी ही अनुपम और अनोखी है. यूँ तो देखा जाय तो भारतवर्ष की भूमि उर्वरकता से भरपूर है यहाँ एक से एक महान संत और महात्मा हुए हैं जो विश्व को एक नई दिशा और दृष्टि दी.आज हम एक ऐसे ही संत के बारे में बात कर रहें हैं ”जिन्होंने कठोर साधना और भक्ति में अपने जीवण कर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि, संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं है वे सभी तो ईश्वर तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र हैं”.

आज से 187 वर्ष पूर्व आज ही के दिन 18 फरवरी 1836 को कामारपुकुर ग्राम(बंगाल प्रांत) के ब्रह्मण परिवार में हुआ था. इनके पिता का नाम खुदीराम और माताजी के नाम चन्द्रा देवी था. रामकृष्ण के बचपन का नाम गदाधर था. बताते चलें कि, रामकृष्ण के  भक्तों के अनुसार रामकृष्ण के माता पिता को उनके जन्म से पहले ही अलौकिक घटनाओं और दृश्यों का अनुभव हुआ था. उनके पिता के अनुसार, गया प्रवास के दौरान जब गदाधर का जन्म नहीं हुआ था उससे पहले ही उन्होंने एक स्वपन में भगवान गदाधर ( विष्णु के अवतार ) ने कहा की वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे जबकि गदाधर की माता को शिव मन्दिर में रौशनी प्रवेश करते हुए देखा था. बताते चलें कि, गदाधर की बालसुलभ सरलता और मंत्रमुग्ध मुस्कान से हर कोई सम्मोहित हो जाता था.

गदाधर जब सात वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया और विपरीत परिस्थिति में परिवार का भरण-पोषण व आर्थिक कठिनाइयां कठिन होता चला गया वहीँ, गदाधर का साहस कम नहीं हुआ. गदाधर के बड़े भाई  रामकुमार चट्टोपाध्याय कलकत्ता (कोलकाता) में एक पाठशाला चलाते थे. बालक गदाधर अपने बड़े भाई के साथ कलकत्ता चले आए. काफी प्रयासों के बावजूद भी रामकृष्ण का मन पढाई में नहीं लगा. वर्ष 1855 में रामकृष्ण के बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय को दक्षिणेश्वर काली मंदिर का मुख्य पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था. इस काम में रामकृष्ण और उनके भांजे ह्रदय रामकुमार की सहायता करते थे.

रामकृष्ण को देवी प्रतिमा को सजाने का दायित्व दिया गया था. वर्ष 1856 में रामकृष्ण के बड़े भाई की मृत्यु के बाद  रामकृष्ण को काली मंदिर में पुरोहित के तौर पर नियुक्त किया गया. बताते चलें कि, बड़े भाई की मृत्यु के बाद रामकृष्ण ध्यान में ज्यादा रहने लगे और ध्यान में ही वे काली माता के मूर्ति को अपनी माता और ब्रम्हांड की माता के रूप में देखने लगे थे. ज्ञात है कि जब रामकृष्ण को काली माता के दर्शन ब्रम्हांड की माता के रूप में हुआ था. वहीँ, रामकृष्ण इसकी वर्णना करते हुए कहते हैं ” घर ,द्वार ,मंदिर और सब कुछ अदृश्य हो गया , जैसे कहीं कुछ भी नहीं था! और मैंने एक अनंत तीर विहीन आलोक का सागर देखा, यह चेतना का सागर था. जिस दिशा में भी मैंने दूर दूर तक जहाँ भी देखा बस उज्ज्वल लहरें दिखाई दे रही थी, जो एक के बाद एक ,मेरी तरफ आ रही थी.

बताते चलें कि, रामकृष्ण जब साधना में लीन हुए तब, एक  अफवाह फ़ैल गयी थी की दक्षिणेश्वर में आध्यात्मिक साधना के कारण रामकृष्ण का मानसिक संतुलन ख़राब हो गया. इस कारण रामकृष्ण की माता और उनके बड़े भाई काफी चिंतित हुए और फैसला किया कि रामकृष्ण का विवाह कर दिया जाय. विवाह के बाद गदाधर का मानसिक संतुलन ठीक हो जायेगा परन्तु,रामकृष्ण ने खुद ही बताया कि, उनका विवाह किस लड़की से और कहाँ होगा. वर्ष 1859 को रामकृष्ण का विवाह 05 वर्ष की शारदामणि मुखोपाध्याय से सम्पन्न हुआ उस वक्त रामकृष्ण का उम्र करीब 23 वर्ष था. विवाह के बाद शारदा के साथ अपने घर दक्षिणेश्वर में रहने लगे. विवाह के बाद भी रामकृष्ण संन्यासी का ही जीवन जीते थे.

समय के साथ रामकृष्ण के बड़े भाई भी चल बसे जिसके कारण रामकृष्ण काफी व्यथित हुए और उनके मन में वैराग्य का उदय हुआ.  अन्दर से मन ना करते हुए भी श्रीरामकृष्ण मंदिर की पूजा एवं अर्चना करने लगे और  दक्षिणेश्वर स्थित पंचवटी में रामकृष्ण ध्यानमग्न रहने लगे.  रामकृष्ण ईश्वर दर्शन के लिए व्याकुल रहने लगे जिसके कारण लोग उन्हें पागल समझने लगे. उसी दौरान दक्षिणेश्वर में भैरवी ब्राह्मणी का आगमन हुआ. उसके बाद रामकृष्ण ने तन्त्र की दीक्षा ली. उसके बाद गदाधर ने तोतापुरी महाराज से अद्वैत वेदान्त की ज्ञान लाभ किया और जीवन्मुक्त की अवस्था को प्राप्त किया.गदाधर ने संन्यास ग्रहण किया उसके बाद गदाधर का नाम श्रीरामकृष्ण परमहंस हुआ.

जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया वैसे-वैसे रामकृष्ण की साधना और कठोर होती गई साथ ही आध्यात्मिक अभ्यासों और सिद्धियों के समाचार तेजी से फैलने लगे. उसके बाद दक्षिणेश्वर मंदिर का उद्यान भक्तों और संन्यासियों का प्रिय आश्रयस्थान हो गया.साथ ही बड़े-बड़े विद्वान एवं प्रसिद्ध वैष्णव और तांत्रिक साधक जैसे- पं॰ नारायण शास्त्री, पं॰ पद्मलोचन तारकालकार, वैष्णवचरण और गौरीकांत तारकभूषण आदि उनसे आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करते रहे. इसी दौरान रामकृष्ण के सम्पर्क में कई ऐसे विचारक का सम्पर्क हुआ जो बंगाल में नए विचारों का नेतृत्व कर रहें थें. उनमें केशवचंद्र सेन, विजयकृष्ण गोस्वामी, ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम लिए जा सकते हैं वहीँ, इसके अतिरिक्त साधारण भक्तों का एक दूसरा वर्ग था जिसमें सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति रामचंद्र दत्त, गिरीशचंद्र घोष, बलराम बोस, महेंद्रनाथ गुप्त और दुर्गाचरण नाग थे जबकि, स्वामी विवेकानन्द उनके परम शिष्य थे.

रामकृष्ण अपने जीवन के अंतिम दिनों में ज्यादातर समाधि की स्थिति में रहने लगे.वहीँ, उनके शिष्यों द्वारा स्वास्थ्य पर ध्यान देने की प्रार्थना करने पर शिष्यों की अज्ञानता जानकर हँस देते थे. एक बार की बात है कि रामकृष्ण के परम शिष्य स्वामी विवेकानंद हिमालय पर जाकर तपस्या करना चाहते थे. यही आज्ञा लेने के लिए स्वामी विवेकानंद जब अपने गुरु के पास पहुंचें तो उनके गुरु रामकृष्ण ने कहा कि, आसपास के क्षेत्र के लोग भूख से तड़प रहें है और चारों तरफ अज्ञान का अँधेरा छाया हुआ है. यहाँ के लोग रोते-चिल्लाते रहें और तुम हिमालय की किसी गुफा में समाधि के आनन्द में निमग्न रहो.. क्या तुम्हारी आत्मा स्वीकारेगी? इसके बाद स्वामी विवेकानन्द दरिद्र नारायण की सेवा में लग गये.

यूँ तो रामकृष्ण महान योगी, उच्चकोटि के साधक व विचारक थे. वो सेवा पथ को ईश्वरीय, प्रशस्त मानकर अनेकता में एकता का दर्शन करते थे. रामकृष्ण सेवा से ही समाज की सुरक्षा चाहते थे. एक बार रामकृष्ण की तबियत अचानक ही ज्यादा खराब हो गई जिसके बाद डॉक्टर ने स्वस्थ की जांच कर स्वामी रामकृष्ण से अनुरोध किया कि, ठाकुर जी आपके गले में कैंसर हो गया है जिसके कारण आप समाधि लेने और वार्तालाप से दूर रहें तब भी वे मुस्कराये.

रामकृष्ण के मना करने के बाद भी स्वामी विवेकानन्द उनका ईलाज करते रहे लेकिन,उनका स्वस्थ दिन पर दिन गिरता ही चला जा रहा था अंतत: वर्ष 1886 ई. में श्रावणी पूर्णिमा के अगले दिन 16 अगस्त को सवेरा होने के कुछ ही वक्त पहले आनन्दघन विग्रह श्रीरामकृष्ण इस नश्वर देह को त्याग कर महासमाधि द्वारा स्व-स्वरुप में लीन हो गये.

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The talk of Sanatan Dharma and culture is unique, whereas, the image of the banks of the Ganges and the people living here is very unique unique. If seen like this, the land of India is full of fertility, there have been one great saint and Mahatma who gave a new direction and vision to the world. Today we are talking about one such saint “who practiced hard Having lived his life in devotion, he came to the conclusion that all the religions of the world are true and there is no difference between them, they are all just different means to reach God.

It was born 187 years ago, on this day, 18 February 1836, in a Brahmin family of Kamarpukur village (Bengal province). His father’s name was Khudiram and his mother’s name was Chandra Devi. Ramakrishna’s childhood name was Gadadhar. Let us tell you that, according to the devotees of Ramakrishna, Ramakrishna’s parents had experienced supernatural events and scenes even before his birth. According to his father, during his stay at Gaya, before Gadadhar was born, he had a dream in which Lord Gadadhar (incarnation of Vishnu) told him that he would be born as his son while Gadadhar’s mother was given a light in the Shiva temple. Saw it while entering. Let us tell you that everyone used to get hypnotized by Gadadhar’s childlike simplicity and mesmerizing smile.

When Gadadhar was seven years old, his father died and in adverse circumstances, the family’s maintenance and financial difficulties became difficult, whereas Gadadhar’s courage did not diminish. Gadadhar’s elder brother Ramkumar Chattopadhyay used to run a school in Calcutta (Kolkata). The boy Gadadhar went to Calcutta with his elder brother. Despite many efforts, Ramakrishna’s mind was not engaged in their studies. In the year 1855, Ramakrishna’s elder brother Ramkumar Chattopadhyay was appointed as the chief priest of Dakshineswar Kali Temple. Ramakrishna and his nephew Hriday used to help Ramkumar in this work.

Ramakrishna was given the responsibility of decorating the idol of the goddess. After the death of Ramakrishna’s elder brother in the year 1856, Ramakrishna was appointed as a priest in the Kali temple. Let us tell that, after the death of his elder brother, Ramakrishna started meditating more, and in meditation, he started seeing the idol of Kali Mata as his mother and the mother of the universe. It is known that when Ramakrishna had a vision of Kali Mata as the mother of the universe. Wherein, Ramakrishna describes it saying “The house, the gate, the temple, and everything disappeared as if nothing was anywhere! And I saw an infinite arrowless ocean of light, it was the ocean of consciousness. In whatever direction Everywhere I looked I could see only bright waves coming toward me, one after the other.

Let us tell that, when Ramakrishna was engrossed in spiritual practice, a rumor was spread that Ramakrishna lost his mental balance due to spiritual practice in Dakshineswar. For this reason, Ramakrishna’s mother and his elder brother were very worried and decided that Ramakrishna should be married. Gadadhar’s mental balance will be fine after marriage, but Ramakrishna himself told that with which girl and whom he will be married. In the year 1859, Ramakrishna was married to 05-year-old Shardamani Mukhopadhyay, at that time Ramakrishna was about 23 years old. After marriage, he started living with Sharda at his home in Dakshineswar. Even after marriage, Ramakrishna lived the life of a monk.

With time, Ramakrishna’s elder brother also passed away, due to which Ramakrishna was greatly distressed and disinterest arose in his mind. Despite not wanting from inside, he started worshiping and worshiping Sri Ramakrishna temple and Ramkrishna started meditating in Panchavati located in Dakshineswar. Ramakrishna started being anxious to see God, and because of this people started considering him mad. During the same time, Bhairavi Brahmin arrived in Dakshineswar. After that Ramakrishna took the initiation of Tantra. After that Gadadhar gained the knowledge of Advaita Vedanta from Totapuri Maharaj and attained the state of Jivanmukta.

As time passed, Ramakrishna’s meditation became more rigorous, and the news of his spiritual practices and achievements started spreading rapidly. After that, the garden of Dakshineswar temple became a favorite shelter of devotees and ascetics. Along with this, great scholars and famous Vaishnava and Tantrik saints like Pt. . During this time many such thinkers came in contact with Ramakrishna who was leading new ideas in Bengal. Among them the names of Keshavchandra Sen, Vijaykrishna Goswami, and Ishwarchandra Vidyasagar can be taken. In addition, there was another class of ordinary devotees, in which the most important figures were Ramchandra Dutt, Girishchandra Ghosh, Balaram Bose, Mahendranath Gupta, and Durgacharan Nag, while Swami Vivekananda was his He was the ultimate disciple.

Ramakrishna lived mostly in the state of samadhi in the last days of his life. On the other hand, when his disciples prayed to pay attention to their health, they used to laugh knowing the ignorance of the disciples. Once upon a time, Swami Vivekananda, the supreme disciple of Ramakrishna, wanted to go to the Himalayas and do penance. When Swami Vivekananda reached his Guru to take this permission, his Guru Ramakrishna said that the people of the surrounding area are suffering from hunger and there is the darkness of ignorance all around. The people here keep crying and crying and you remain engrossed in the joy of samadhi in some cave of the Himalayas… Will your soul accept? After this Swami Vivekananda got engaged in the service of Daridra Narayan.

In fact, Ramakrishna was a great yogi, a seeker, and thinker of the highest order. He used to see unity in diversity considering the path of service as divine, and expansive. Ramakrishna wanted the protection of society only through service. Once Ramakrishna’s health suddenly worsened, after which the doctor, after examining his health, requested Swami Ramakrishna that, Thakur ji, you have cancer in your throat, due to which you should stay away from taking samadhi and talking, even then he smiled.

Swami Vivekananda continued to treat him even after Ramakrishna’s refusal, but his health was deteriorating day by day, finally in the year 1886 AD, shortly before dawn on August 16, the next day of Shravani Purnima, Anandghan Vigraha died. Sri Ramakrishna renounced this mortal body and merged himself in the Self through Mahasamadhi.

Dr. Jai Ram Jha.

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