Health

मूली…

मूली वा मूलक भूमी के अन्दर पैदा होने वाली सब्ज़ी है.  यह एक रूपान्तिरत प्रधान जड़ है जो बीच में मोटी और दोनों सिरों की ओर क्रमशः पतली होती है. मूली पूरे विश्व में उगायी एवं खायी जाती है. मूली की अनेक प्रजातियाँ हैं जो आकार, रंग एवं पैदा होने में लगने वाले समय के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है. मूली शब्द संस्कृत के ‘मूल’ शब्द से बना हुआ है.आयुर्वेद में इसे ‘मूलक’ के नाम से भी जाना जाता है जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बताया गया है. मूली को अंग्रेजी में Radish कहा जाता है. इसका वानस्पतिक नाम रैफेनस सैटाइवस (Raphanus sativus) है, जो कि ब्रासीसियाई (Brassicac- eae) परिवार से संबंधित होता है.

इतिहास: –

मूली के इतिहास एवं उत्पत्ति के बारे में अलग-अलग मत है लेकिन ऐसा माना जाता है कि इसका उत्पत्ति क्षेत्र केन्द्रीय एवं पश्चिमी चीन और भारत में हुई है. प्राचीन समय से ही खाद्य-पदार्थ के रूप में उपयोग की जाती रही है. यह मेडीरेरियन क्षेत्र में जंगली रूप में पायी जाती हैं. वहीं, कुछ लोगों का ऐसा विश्वास है कि इसकी उत्पत्ति या जन्म स्थान दक्षिणी-पश्चिमी यूरोप है. मूली कृषक सभ्यता के सबसे प्राचीन आविष्कारों में से एक है. चीनी इतिहास में इसका उल्लेख करीब तीन हजार पूर्व से भी पहले से मिलता है. अत्यंत प्राचीन चीन और यूनानी व्यंजनों में इसका प्रयोग होता था और इसे भूख बढ़ाने वाली समझा जाता था. यूरोप के अनेक देशों में भोजन से पहले इसको परोसने की परंपरा का उल्लेख मिलता है. पूरे भारतवर्ष में जड़ों वाली सब्जियों में मूली एक प्रमुख फ़सल है.

कृषि: –

मूली की खेती अब पूरे वर्षभर की जाती है. इसकी खेती प्राय: सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है. बलुई दोमट और दोमट भूमि में जड़ों की बढ़वार अच्छी होती है किन्तु मटियार भूमि, खेती के लिए अच्छी नहीं मानी जाती है. मूली की खेती करने के लिए गहरी जुताई की आवश्यकता होती है.चुकिं, इसकी जड़ें गहराई तक जाती है अत: गहरी जुताई करके मिट्टी भुरभुरी बना लेते हैं. उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में एशियाई मूली बोने का मुख्य समय सितम्बर से फ़रवरी तथा यूरोपियन किस्मों की बुआई अक्तूबर से जनवरी तक करते हैं. पहाड़ी क्षेत्रों में बुआई मार्च से अगस्त तक करते हैं.

पोषक तत्व: –

मूली में प्रोटीन, कैल्शियम, गन्धक, आयोडिन तथा लौह तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होती हैं.साथ ही इसमें सोडियम, फॉस्फोरस, क्लोरीन तथा मैग्नीशियम भी होता है. मूली में विटामिन ‘ए’ का खजाना है वहीं, इसमें  ‘बी’ और ‘सी’ भी होता है. मूली धरती के नीचे पौधे की जड़ होती हैं. धरती के ऊपर रहने वाले पत्ते से भी अधिक पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं. इनमें खनिज लवण, कैल्शियम, फास्फोरस आदि अधिक मात्रा में पाया जाता हैं.

नोट: –

सामान्यत: लोग मोटी मूली पसन्द करते हैं. मगर स्वास्थ्य तथा उपचार की दृष्टि से छोटी, पतली और चरपरी मूली ही उपयोगी है. ऐसी मूली त्रिदोष वात, पित्त और कफ नाशक है. इसके विपरीत मोटी और पकी मूली त्रिदोष कारक मानी जाती है.

औषधिय गुण: –

भारतीय घरों में अक्सर मूली का प्रयोग सलाद के रूप में किया जाता है. अक्सर लोग मूली के पत्तों को फेंक देते हैं जो सरासर गलत होता है. मूली का प्रयोग करते समय इसके हरे पत्तों को भी प्रयोग करना चाहिए. चुकिं, इसके पत्तों में कफ, पित्त और वात जैसे दोषों को दूर करने की क्षमता होती है. मूली जितनी पतली हो उसका प्रयोग करना चाहिए. चुकिं, मूली शरीर से कार्बन डाई ऑक्साइड निकालकर ऑक्सीजन प्रदान करती है साथ ही हमारे दाँतों व हड्डियों को मज़बूत करती है. थकान मिटाने और अच्छी नींद लाने में मूली का विशेष योदान होता है. यह हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में सहायक होती है.

मूली प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर की हानिकारक पदार्थ से रक्षा करती हैं. प्रतिरक्षा में कमी या गड़बड़ी विभिन्न प्रकार की समस्याओं का कारण बनती है. अतः प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार करने तथा उसे मजबूत बनाने के लिए मूली का सेवन करना चाहिए।, विशेष रूप से सफेद मूली का नियमित रूप से सेवन प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार कर सकता है.

तासीर: –    

मूली की तासीर गर्म होती है. ज्यादा मात्रा में मूली खाने से नुक्सान भी हो सकते है. आम जनमानस में मूली को लेकर भ्रम होता है कि इसकी तासीर ठंडी होती है जिसके कारण खाँसी होती है या बढ जाती है. कोई भी कच्ची सब्जी, जूस, कच्चे फल हमेशा दिन में खासतौर से दोपहर के समय ही खाने चाहिए इससे एक तो इनको पचने में काफी समय मिल जाता है दूसरा इनसे कफ नहीं बनता है.

फायदा: –  

  • घृत में भुनी मूली वात-पित्त तथा कफ़नाशक है. सूखी मूली भी निर्दोष साबित है. गुड़, तेल या घृत में भुनी मूली के फूल कफ वायुनाशक हैं तथा फल पित्तनाशक होता है.
  • मूली के पत्ते गुणों की खान हैं, इनमें खनिज लवण, कैल्शियम, फास्फोरस आदि अधिक मात्रा में होते हैं.
  • मूली का ताजा रस पीने से मूत्र संबंधी रोगों में राहत मिलती है.
  • पीलिया रोग में मूली लाभ पहुँचाती है.
  • मूली के पत्तों को धोकर मिक्सी में पीस लें। फिर इन्हें छानकर इनका रस निकालें व मिश्री मिला दें. इस मिश्रण को रोजाना पीने से पीलिया रोग में आराम मिलता है.
  • मूली के रस में थोड़ा नमक और नींबू का रस मिलाकर नियमित रूप में पीने से मोटापा कम होता है और शरीर सुडौल बन जाता है.
  • अगर मूली के रस से सर धोया जाय तो सर में जुएं नहीं होती है.
  • नीबू और मूली के रस मिलाकर चेहरे पर लगाने से चेहरे का सौंदर्य निखरता है.
  • मूली पत्ते चबाने से हिचकी बंद हो जाती है.
  • एक कप मूली के रस में एक चम्मच अदरक का और एक चम्मच नीबू का रस मिलाकर नियमित सेवन से भूख बढ़ती है.
  • अजीर्ण रोग होने पर मूली के पत्तों की कोंपलों को बारीक काटकर, नीबू का रस मिलाकर व चुटकी भर सेंधा नमक डालकर खाने से लाभ होता है.
  • मूली के पत्तों में लौह तत्व भी काफ़ी मात्रा में रहता है इसलिए इनका सेवन ख़ून को साफ़ करता है और इससे शरीर की त्वचा भी मुलायम होती है.
  • हडि्डयों के लिए मूली के पत्तों का रस पीना फ़ायदेमंद होता है.
  • मूली के नरम पत्तों पर सेंधा नमक लगाकर प्रात:खाएं, इससे मुंह की दुर्गंध दूर होती है.
  • हाथ-पैरों के नाख़ूनों का रंग सफ़ेद हो जाए तो मूली के पत्तों का रस पीनाम उत्तम होता है.
  • मूली के पत्तों में सोडियम होता है, जो हमारे शरीर में नमक की कमी को पूरा करता है.
  • पेट में गैस बनती हो तो मूली के पत्तों के रस में नीबू का रस मिलाकर पीने से तुरंत लाभ होता है.
  • मूली का रस रुचिकर एवं हृदय को प्रफुल्लित करने वाला होता है. यह हलका एवं कंठशोधक भी होता है.
  • मूली के रस में नमक मिलाकर पीने से पेट का भारीपन, अफरा, मूत्ररोग दूर होता है.

नुक्सान: –

  • मूली को अधिक मात्रा में खाने से किडनी को नुक्सान पहुंचाता है. अधिक मात्रा में मूली खाने से मूत्र उत्सर्जन के द्वारा शरीर में पानी की कमी हो सकता है जिससे निर्जलीकरण की समस्या हो सकती है.
  • मूली का अत्यधिक सेवन करने से रक्तचाप को असामान्य रूप से बहुत निम्न स्तर तक कम कर सकता है, जिससे हाइपोटेंशन या रक्तचाप में कमी की समस्या बढ़ सकती है.
  • मूली का अत्यधिक मात्रा में सेवन रक्त में शुगर के अत्यधिक कम स्तर का कारण बन सकती है जिससे “हाइपोग्लाइसेमिया” नामक स्थिति से जाना जाता है.
  • पथरी की बीमारी वाले व्यक्तियों और गर्भवती महिलाओं के लिए मूली के सेवन से बचना चाहिए क्योंकि इस स्थिति में इसका सेवन गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकता है.

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Radish…

Radish or Mulak is a vegetable grown underground. It is a modified taproot which is thick in the middle and gradually thinner towards both the ends. Radish is grown and eaten all over the world. There are many species of radish which vary in size, color and time taken to grow. The word radish is derived from the Sanskrit word ‘Mool’. In Ayurveda it is also known as ‘Moolak’ which is said to be very important for health. Radish is called Radish in English. Its botanical name is Raphanus sativus, which belongs to the Brassicaceae family.

History: –

There are different opinions about the history and origin of radish, but it is believed that it originated in central and western China and India. It has been used as a food item since ancient times. It is found wild in the Mediterranean region. At the same time, some people believe that its origin or place of birth is South-Western Europe. Radish is one of the oldest inventions of agricultural civilization. It is mentioned in Chinese history even before three thousand years ago. It was used in ancient Chinese and Greek cuisine and was considered an appetite enhancer. There is mention of the tradition of serving it before meals in many European countries. Radish is a major crop among root vegetables throughout India.

Agriculture: –

Radish is now cultivated throughout the year. It can be cultivated in almost all types of soils. Root growth is good in sandy loam and loamy soil, but clay soil is not considered good for farming. To cultivate radish, deep plowing is required. Since its roots go deep, hence deep plowing makes the soil friable. In the plains of North India, the main time for sowing Asian radish is from September to February and European varieties are sown from October to January. In hilly areas, sowing is done from March to August.

Nutrients: –

Protein, calcium, sulphur, iodine and iron are available in sufficient quantities in radish. It also contains sodium, phosphorus, chlorine and magnesium. Radish is a treasure trove of Vitamin ‘A’ and it also contains ‘B’ and ‘C’. Radish is the root of the plant under the soil. Those living above the earth are more-rich in nutrients than the leaves. Mineral salts, calcium, phosphorus etc. are found in large quantities in these.

Note: –

Generally people like thick radish. But from health and treatment point of view only small, thin and crisp radish is useful. Such radish is destroyer of Tridosha Vata, Pitta and Kapha. On the contrary, thick and ripe radish is considered to be a Tridosha factor.

Medicinal Properties:-

Radish is often used as salad in Indian homes. Often people throw away radish leaves which is completely wrong. While using radish, its green leaves should also be used. Because, its leaves have the ability to remove defects like phlegm, bile and vata. Radish should be used as thin as it can be. Because, radish removes carbon dioxide from the body and provides oxygen and also strengthens our teeth and bones. Radish plays a special role in relieving fatigue and in inducing good sleep. It is helpful in controlling high blood pressure.

Radish immune system protects the body from harmful substances. Decrease or disturbance in immunity causes various types of problems. Therefore, to improve and strengthen the immune system, radish should be consumed. Regular consumption of especially white radish can improve the immune system.

effect: –

Radish has a hot nature. Eating radish in large quantities can also cause harm. There is a misconception among the common people about radish that it has a cooling effect which causes or increases cough. Any raw vegetable, juice, raw fruits should always be eaten during the day, especially in the afternoon, this gives them enough time to digest and secondly, they do not cause phlegm.

Benefit: –

  • Radish roasted in ghee is an antidote to gas, bile and phlegm. Dry radish also proves to be innocent. Radish flowers roasted in jaggery, oil or ghee are anti-phlegm and the fruit is anti-bilious.
  • Radish leaves are a mine of properties, they contain mineral salts, calcium, phosphorus etc. in large quantities.
  • Drinking fresh radish juice provides relief from urinary diseases.
  • Radish is beneficial in jaundice.
  • Wash radish leaves and grind them in a mixer. Then filter them and extract their juice and add sugar candy. Drinking this mixture daily provides relief from jaundice.
  • Drinking radish juice mixed with a little salt and lemon juice regularly reduces obesity and makes the body shapely.
  • If head is washed with radish juice then there will be no lice in the head.
  • Mixing lemon and radish juice and applying it on the face enhances the beauty of the face.
  • Chewing radish leaves stops hiccups.
  • Regular consumption of one cup radish juice mixed with one spoon ginger and one spoon lemon juice increases appetite.
  • In case of indigestion, eating radish leaves by finely cutting them, adding lemon juice and a pinch of rock salt to it is beneficial.
  • Radish leaves also contain a lot of iron, hence their consumption purifies the blood and also softens the skin of the body.
  • Drinking juice of radish leaves is beneficial for bones.
  • Apply rock salt on soft radish leaves and eat them in the morning, this removes bad breath.
  • If the color of the nails of hands and feet becomes white then it is best to drink the juice of radish leaves.
  • Radish leaves contain sodium, which fulfills the deficiency of salt in our body.
  • If there is gas formation in the stomach then drinking the juice of radish leaves mixed with lemon juice provides immediate relief.
  • Radish juice is tasty and heart-warming. It is also light and soothing.
  • Drinking radish juice mixed with salt relieves stomach heaviness, indigestion and urinary problems.

Disadvantages: –

  • Eating radish in large quantities causes damage to the kidneys. Eating radish in large quantities can cause loss of water in the body through urine excretion, which can lead to dehydration.
  • Excessive consumption of radish can reduce blood pressure to abnormally low levels, which can increase the problem of hypotension or low blood pressure.
  • Excessive consumption of radish can cause extremely low levels of sugar in the blood, a condition known as “hypoglycemia”.
  • People suffering from kidney disease and pregnant women should avoid consumption of radish because in this condition its consumption can give rise to serious problems.
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