सम्राट पृथ्वीराज चौहान - Gyan Sagar Times
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सम्राट पृथ्वीराज चौहान

पृथ्वीराज चौहान ने 12 वर्ष कि उम्र मे बिना किसी हथियार के खुंखार जंगली शेर का जबड़ा फाड़ ड़ाला था ।पृथ्वीराज चौहान ने 16 वर्ष की आयु मे ही महाबली नाहरराय को युद्ध मे हराकर माड़वकर पर विजय प्राप्त की थी। पृथ्वीराज चौहान ने तलवार के एक वार से जंगली हाथी का सिर धड़ से अलग कर दिया था । महान सम्राट प्रथ्वीराज चौहान कि तलवार का वजन 84 किलो था, और उसे एक हाथ से चलाते थे ..सुनने पर विश्वास नहीं हुआ होगा किंतु यह सत्य है सम्राट पृथ्वीराज चौहान पशु-पक्षियो के साथ बाते करने की कला जानते थे।महान सम्राट पुर्ण रूप से मर्द थे ।अर्थात उनकी छाती पर स्तंन नही थे । पृथ्वीराज चौहान 1166 ई.  मे अजमेर की गद्दी पर बैठे और तीन वर्ष के बाद यानि 1169 मे दिल्ली के सिहासन पर बैठकर पुरे हिन्दुस्तान पर राज किया।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान की तेरह पत्निया थी। इनमे संयोगिता सबसे प्रसिद्ध है पृथ्वीराज चौहान ने महमुद गौरी को 16 बार युद्ध मे हराकर जीवन दान दिया थाऔर 16 बार कुरान की कसम  खिलवाई थी ।

गौरी ने 17 वी बार मे चौहान को धौके से बंदी बनाया और अपने देश ले जाकर चौहान की दोनो आँखे फोड दी थी ।उसके बाद भी राजदरबार मे पृथ्वीराज चौहान ने अपना मस्तक नहीं झुकाया था।महमूद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर  अनेको प्रकार की पिड़ा दी थी और कई महिनो तक भुखा रखा था..

फिर भी सम्राट की मृत्यु नहीं हुई थी । सम्राट पृथ्वीराज चौहान की सबसे बड़ी विशेषता यह थी की जन्म से शब्द भेदी बाण की कला ज्ञात थी, जो की अयोध्या नरेश “राजा दशरथ” के बाद..केवल उन्ही मे थी।पृथ्वीराज चौहान ने महमुद गौरी को उसी के भरे दरबार मे शब्द भेदी बाण से मारा था।गौरी को मारने के बाद भी वह दुश्मन के हाथो नहीं मरे.अर्थार्त अपने मित्र चन्द्रबरदाई के हाथो मरे, दोनो ने एक दुसरे को कटार घोंप कर मार लिया.. क्योंकि और कोई विकल्प नहीं था ।चौहान वंश वास्तव में चतुर्भुजचव्हाण के नाम से चला है चतुर्भुज का अर्थ यह नही है कि चव्हाण नाम के राजा के चार हाथ थे बल्कि चौहान नाम के इस राजा की मारक क्षमता इतनी थी की अलंकारिक रूप में इन्हें चतुर्भुज कहा गया चौहान निश्चित रूप से राम के वंसज रघुवंशी ही है इसका प्रमाण भी साफ साफ है।सूर्यवंश के उपवंश चौहान वंश में एक राजा विजयसिंह जी हुए जिन्होंने हरपालिया कीर्तिस्तम्भ में अचलेश्वर शिलालेख ( मरु भारती पिलानी )  में आसराज के प्रसंग में लिखा है।

राघर्यथा वंश करोहिवंशे सुर्यस्यशुरोभुतिमंडलेsग्रे।

तथा बभूवत्र पराक्रमेंणा स्वानामसिद्धः प्रभुरामसराजः भावार्थ :- पृथ्वीतल पर जिस प्रकार पहले सूर्यवँश में पराक्रमी राजा रघु हुए, उसी प्रकार इस वंश रघुवंश में अपने पराक्रम से कीर्तिराज आसराज नामक राजा हुए इस शिलालेख से स्पष्ठ है कि चौहान सूर्यवँशी थे राम के रघुवंश से थे जब श्रीराम ही ठाकुरजी है तो उनके वंसज गुर्जर कैसे हो सकते है अब सवाल यह उठता है कि चौहानो का सूर्यवँशी राम से सम्बन्ध कहाँ जुड़ता है ;-  तो अजमेर के सरस्वती मंदिर शिलालेख में लिखा है इसमें साफ साफ वर्णन है की चौहान श्रीराम के कुल से है तो चौहान अगर राम के कुल में है तो इस वंश का आदि पुरुष कौन है ? इसपर भी विचार करना जरूरी है हम सब जानते है कि चौहानों का उत्कर्ष राजस्थान से है बिजौलिया शिलालेख में इन्हें अहिस्छतरपुर अंकित किया है पृथ्वीराज विजय हमीर महाकाव्य, तथा सुरजन चरित्र में इनका मूल स्थान पुष्कर है।

चौहानो के बहिभाट नर्मदा के उत्तर में स्थित महिष्मति ग्राम को इनका मूल बताते है इन सब आधार पर तो एक ही निष्कर्ष निकलता है की चौहानो का मूल स्थान राजस्थान ही है परंतु चौहान भृववट 813 में भड़ौच गुजरात पर शासन कर रहा था जो कि पहले गुर्जर प्रदेश हुआ करता था तो इनका मूल स्थान यह भी हो सकता है आबू पर्वत में चन्द्रवंशी अर्जुनायन में चालुक्य( चोल )  नाम का राजा चौहानो में चौहान नाम का राजा एक प्रतिहारः राजा तथा एक यदुवंशी परमार नाम के राजा सम्मिलित हुए, इनके नाम से ही इनका वंश चला। दुख होता है ये सोचकर कि वामपंथीयो ने इतिहास की पुस्तकों में टीपुसुल्तान, बाबर, औरँगजेब, अकबर जैसे हत्यारो के महिमामण्डन से भर दिया और पृथ्वीराज जैसे योद्धाओ को नई पीढ़ी को पढ़ने नही दिया बल्कि इतिहास छुपा दियामहाराज पृथ्वीराज चौहान की मूहम्मद गौरी के विरुद्ध पराजय के कारण क्या रहें ?

पिछले लेख में आपने पढ़ा की अर्णोराज_चौहान के कई पुत्र थे, जिनमे 2 पुत्र बड़े प्रतिभाशाली हुए …. एक का नाम था। विग्रहराजचौहान ओर दूसरे का नाम था सोमेश्वरदेव चौहान विग्रहराज चौहान को गर्जन_मतङ्गा भी कहा जाता है, कहते है, विग्रहराज ने मल्लेछो ( तुर्को – अरबो ) को ऐसे मथ दिया, जैसे नारायण ने समुद्र को मथा था विग्रहराज की जब मृत्यु हुई, उस समय उनका पुत्र नागार्जुन अल्पायु था, अतः पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वरदेव गद्दी पर विराजमान हुए लेकिन जब पृथ्वीराज चौहान मात्र 11 वर्ष के थे, उसी समय सोमेश्वरदेव का देहान्त हो गया और पृथ्वीराज चौहान अजमेर की गद्दी पर विराजमान हुए विग्रहराज चौहान के पुत्र नार्गाजुन ने पृथ्वीराज चौहान के विरूद्ध विद्रोह किया…. लेकिन अजमेर में हुए युद्ध मे नार्गाजुन वीरगति को प्राप्त हुए, ओर अंततः राजा पृथ्वीराज चौहान ही बने ….. यह युद्ध राजकुमारों एवं राजपरिवार के बीच युद्ध था, ऐसे युद्ध कितनी बड़ी हानि देते है, बुद्धिमान व्यक्ति अनुमान लगा सकता है।

ईस्वी 1180 का समय था, जब चौहान साम्राज्य का पूर्ण नियंत्रण पृथ्वीराज चौहान के हाथों में आ गया ।। पृथ्वीराज ने गद्दी पर बैठने के 2 साल के अंदर ही भी भिवानी रेवाड़ी तथा अलवर के क्षेत्रों पर अपनी सेना चढ़ा दी ….1182 ईस्वी तक यह पूरा क्षेत्र पृथ्वीराज चौहान के अधीन था…इसके बाद पृथ्वीराज चौहान की साम्राज्यवादी नीति के कारण  गहरवारों एवं चंदेलों से भी उनकी शत्रुता हुई पृथ्वीराजरासो की माने तो पृथ्वीराज का गुजरात के भीमदेव या उनके वंशजो के साथ भी संघर्ष रहा ।। सोलंकियों ने मुहम्मदगौरी जैसे विशाल सेना के स्वामी को भी कैद कर 6 महीने अपनी जेल में रखा था । पृथ्वीराज इतने शक्तिशाली राज्य से भी टकरा गए इसके बाद पृथ्वीराज का चंदेलों से सामना हुआ  कहते है इस युद्ध मे चंदेलों-चौहानों की पूरी सेना का ही नाश हो गया ।। इसी युद्ध के कारण चौहान साम्राज्य इतना जर्जर हो चुका था, की मूहम्मद गौरी भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत कर पाया रही सही कसर संगोगिता हरण ने पूरी कर दी, अब तक आमेर के शासक पजबनजी थे, तो पृथ्वीराज को अनेक संकटों से निकाल चुके थे । मूहम्मद गौरी को पेशावर के दर्रो में बार बार पराजित पजबनदेव जी ने ही किया था, चंदेलों के विरूद्ध युद्ध जितने में  भी पजबनजी जी बड़ा योगदान था संगोगिता हरण के समय पजबनदेव जी भी वीरगति को प्राप्त हो गए ।। पश्चिम का गुजरात उनका शत्रु था ,  पश्चिमी सीमाओं को विदेशियों से भी खतरा था, देशी एवं विदेशी , दोनो तरफ से युद्ध झेलने के कारण पश्चिमी सीमा बहुत अधिक जर्जर एवं कमजोर हो गयी पूर्व में काशीराज जयचंद्र जी भी पृथ्वीराज चौहान के शत्रु बन चुके थे।

चंदेल 52 गढ़ के विजेता थे। MP छत्तीसगढ़ में इनका बड़ा जबरदस्त प्रभाव था । यह भी पृथ्वीराज चौहान के शत्रु बन गए इसी मौके का लाभ उठाया मूहम्मद गौरी ने पिछले लेख में आपने पढ़ा ही था, की विग्रहराज चौहान ने पंजाब जीत लिया था, लेकिन मूहम्मद गौरी ने भी अफगानिस्तान से पंजाब पर अपना अधिकार जमाना शुरू कर दिया, यहां तक कि सिंध मुल्तान जीतकर वह पृथ्वीराज चौहान की सीमाओं तक आ गया 1191 ईस्वी मे नाड़ोल ( पाली-जोधपुर ) के हिन्दू शासक पर विजय के पश्चात मूहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को संदेश भिजवाया, की वह इस्लाम मे दीक्षित हो जाएं पृथ्वीराज ने उसका यह निमंत्रण ठुकरा दिया जिस समय नाड़ोल पर गौरी में विजय प्राप्त की, उस समय नाड़ोल पर गुजरातियों का अधिकार था, पृथ्वीराज ने बड़ी भुल की, की गुजरातियों की उन्होंने कोई मदद नही की , यही भूल फिर पृथ्वीराज चौहान की हार का कारण भी बनी पृथ्वीराज एवं मूहम्मद गौरी के बीच शुरूवातीं मुठभेड़ इतनी बड़ी नही थी, लेकिन मूहम्मद गौरी ने पंजाब पर बड़ा हमला करते हुए सरहिंद( भटिंडा) पर भी अपना अधिकार कर लिया पृथ्वीराज चौहान अपनी नई नवेली नोसिखिया सेना के साथ भटिंडा की मुक्ति के लिए आगे बढ़े। क्यो की ट्रेंड सेना तो चंदेलों – गहरवारों एवं देशी राजाओ से युद्धो में ही समाप्त हो गयी थी चौहानों को नोसिखया सेना ने  भी मुसलमानो को चारों ओर से घेर किया । मूहम्मद गौरी की सेना भाग खड़ी हुई …आज तक मुस’लमानो को इतनी बड़ी पराजय का सामना नही करना पड़ा था ।। 80 मील तक चौहान सेना ने गौरी एवं उसकी का पीछा किया कुछ ही महीनो बाद मूहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज पर 1,20,000 की विशाल सेना के साथ धावा बोल दिया । मुहम्मदगौरी लाहौर तक आ गया, ओर पृथ्वीराज चौहान को किवाम-उल-मुल्क के हाथों संदेष् भिजवाया की इस्लाम कबूल कीजिये ” यहां पृथ्वीराज ने मूहम्मद गौरी को बड़ा तकड़ा जवाब दिया ।।  यहां गौरी की पराजय हुई तीसरे युद्ध मे बेखबर पृथ्वीराज पर 3,00,000 की विशाल सेना के साथ आक्रमण कर दिया । यह आक्रमण सुबह 3 बजे हुआ था । इसी युद्ध मे पृथ्वीराज चौहान को हार का सामना करना पड़ा…यह एक आतंकवादी हमले की तरह था, जिसमे चौहान साम्राज्य के 1 लाख सेंनिक मारे गए शहाबुद्दीन गौरी नेहरवाला पहुंचा जहां सोलंकी राजा मूलराज द्वितीय की माँ नाइकीदेवी ने उसका सामना किया (राजा मूलराज द्वितीय बालक थे इसलिए फौज का नेतृत्व नाइकीदेवी ने किया कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस समय राजा भीमदेव का शासन था)

इस आक्रमण की ख़बर पृथ्वीराज चौहान को मिली तो वे सोलंकी राजा की मदद करने को आतुर हो गए।तब सेनापति कैमास ने पृथ्वीराज चौहान को सुंदोपसुन्दन्याय का उपदेश दिया और उन्हें सोलंकी राजा की मदद हेतु न जाने के लिए समझाया बहरहाल अर्बुद पर्वत के निकट गाडरारघट्ट के रणक्षेत्र में हुई इस लड़ाई में शहाबुद्दीन गौरी का विजय रथ रोकते हुए नाइकीदेवी ने उसको करारी शिकस्त दी इस लड़ाई में पराजित होकर गौरी को भागना पड़ा।भारत के बड़े भू-भाग पर चौहानों का राज था जिसकी राजधानी थी अजमेर राजपूताने में दूसरा बड़ा राज्य मेवाड़ के गुहिलों का था।दिल्ली में तोमरों मालवा में परमारों गुजरात में सोलंकियों पूर्व में कन्नौज काशी आदि पर गहड़वालों का और वहां से पूर्व में बंगाल के सेनवंशियों का राज था।1179 ई.  शहाबुद्दीन गौरी ने पेशावर पर हमला किया और फ़तह हासिल की।1180 ई. शहाबुद्दीन गौरी ने ख़ुसरो मलिक को गिरफ़्तार करके लाहौर पर फ़तह हासिल की (गौरी ने अली किर्माख को लाहौर का हाकिम नियुक्त किया)। सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने सेनापति भुवनैकमल्ल को फौज समेत विदा किया भुवनैकमल्ल ने चंबल के पश्चिमी भाग पर हमला किया और वहां के एक भाग (वर्तमान मध्यप्रदेश की श्योपुर तहसील) को विजय किया इस विजय से चौहानों को कई हाथी प्राप्त हुए।

अलवर वाला भादानक राज्य का हिस्सा बड़गूजर महाराज पृथ्वीपाल देव के अधिकार में था जिस पर सम्राट ने आक्रमण किया इस लड़ाई में सम्राट की विजय हुई जिसके बाद महाराज पृथ्वीपाल ने अपने पुत्र रामराय की पुत्री नंदकंवर बड़गूजर का विवाह सम्राट के साथ किया।दिल्ली के तोमरों का वर्णन करना अब आवश्यक हो गया है इसलिए यदि किसी ने सरकारी किताबों और गूगल के अलावा सम्राट के जीवन पर थोड़ा बहुत शोध करते हुए 5-7 किताबों का भी अध्ययन किया हो तो दिल्ली के तोमर वंश के कुछ राज़ सामने आते हैं।चर्चित कथा जो अक्सर बहुत से लोग सच मानते हैं कि पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली की गद्दी उनके नाना अनंगपाल तोमर ने भेंट की तो ये मात्र कल्पना है बहुत से लोग मानते हैं कि राजा अनंगपाल तोमर के कोई पुत्र नहीं था जो की सरासर गलत धारणा है।राजा अनंगपाल तोमर का शासनकाल 1051-81 ई. तक का था जिनके देहांत के 85 वर्ष बाद पृथ्वीराज चौहान का जन्म हुआ अब यदि कोई कहे कि अनंगपाल नाम के 2 राजा हुए थे तो ये दूसरे वाले ही हैं।प्रसिद्ध इतिहासकार ओझा जी ने लिखा है कि बीसलदेव ने 1150 ई. में तोमरों से दिल्ली फतह की जिसके बाद सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समय चौहान वंश की राजधानी थी अजमेर जिसका एक सूबा था दिल्ली अर्थात ओझा जी ने दिल्ली के तोमरों को चौहानों के अधीन बताया है।ओझा जी के इस मत का खंडन किया है हरिहर द्विवेदी जी ने हरिहर द्विवेदी जी ने तर्कों सहित स्पष्ट किया है कि पृथ्वीराज चौहान और नागार्जुन की लड़ाई के समय राजा पृथ्वीपाल तोमर ने नागार्जुन को फौजी मदद दी थी इसलिए उस समय दिल्ली का शासक स्वतंत्र था।

फिर हरिहर द्विवेदी आगे लिखते हैं कि 1189 ई. में राजा चाहड़पाल तोमर जब दिल्ली की गद्दी पर बैठे तो पृथ्वीराज चौहान ने उनसे मित्रता की।तराइन की दोनों लड़ाइयों में फ़ारसी लेखकों और समकालीन हिन्दू लेखकों ने मुख्य रूप से अजमेर के सम्राट पृथ्वीराज चौहान और दिल्ली के राजा चाहड़पाल तोमर का वर्णन किया है।यदि कोई ये कहे कि ये मत आधुनिक इतिहासकारों का है तो हम एक उदाहरण मध्यकाल का भी दे देते हैं।अर्थात जिस प्रकार शत्रुओं ने तंवरों से दिल्ली और राठौड़ों से कन्नौज छीन लिया आज हमें लगता है कि वैसा ही दिन मेवाड़ का आया है राजा पृथ्वीपाल तोमर व राजा चाहड़पाल तोमर के सिक्कों का प्राप्त होना ये सिद्ध करता है कि दिल्ली पर उनका शासन रहा।दिल्ली पर तोमर वंश का शासन था इसमें हमें कोई संदेह नहीं लेकिन समकालीन ग्रंथों से ज्ञात होता है कि दिल्ली के राजा चाहड़पाल तोमर अन्य राजाओं को साथ लेकर सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पास गए और उनसे गौरी का वध करने का निवेदन किया।विद्वान इतिहासकारों में आपसी मतभेद इस बात को लेकर है कि दिल्ली के तोमर अजमेर के अधीन थे या नहीं ना कि इस बात को लेकर कि दिल्ली पर तोमर वंश का राज था या चौहान वंश का क्योंकि विद्वान इतिहासकारों को भी कोई संदेह नहीं है कि दिल्ली पर तोमर वंश का शासन था।

निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि सम्भव है कि बीसलदेव ने दिल्ली विजय की हो लेकिन सोमेश्वर देव के समय में दिल्ली पर उनका अधिकार नहीं रहा और फिर सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने राजा पृथ्वीपाल तोमर के अधीन कुछ छोटे बड़े प्रदेश भी अपने कब्ज़े में लिए और राजा पृथ्वीपाल तोमर ने भी नागार्जुन को फौजी मदद दी जिससे मालूम पड़ता है कि इस समय तक दिल्ली व अजमेर की शत्रुता रही। तत्पश्चात राजा चाहड़पाल तोमर दिल्ली की गद्दी पर बैठे सम्राट पृथ्वीराज चौहान द्वारा इनके समय में दिल्ली पर हमला करने का कोई प्रमाण प्राप्त नहीं होता है और ना ही दोनों शासकों के बीच किसी प्रकार की संधि के कोई प्रमाण हैं।ऐसे में हम्मीर महाकाव्य का लिखा वर्णन ही इस तरफ इशारा करता है कि राजा चंद्रराज (चाहड़पाल) ने पश्चिम के राजाओं का संघ बनाकर सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पास जाकर उनसे गौरी का वध करने का निवेदन किया।(1) सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समकालीन दिल्ली के शासकों के सिक्के अस्तित्व में कैसे आए हैं। (2) यदि दिल्ली की गद्दी पर सम्राट पृथ्वीराज चौहान विराजमान थे तो उस समय राजा अनंगपाल तोमर के वंशजों का राज किस प्रदेश पर था। (3) यदि राजा अनंगपाल तोमर की कोई संतान नहीं थी तो तोमर वंश की वंशावली को गलत सिद्ध करने के क्या प्रमाण हैं?

(4) फ़ारसी लेखकों ने चाहड़पाल/गोविंदराय का वर्णन किया है वो कहाँ के शासक थे (5) राजा चाहड़पाल तोमर कोई साधारण राजा होते तो फ़ारसी लेखकों ने गौरी द्वारा राजा चाहड़पाल के टूटे हुए दांतों से उनके सिर की पहचान करने की बात क्यों लिखी?

सम्राट की महानता को कम आंकना नहीं है बल्कि उस सत्य को सामने लाना है जिसने कई तोमर वीरों के बलिदानों को इतिहास के गर्त में दफन कर दिया है राजा चाहड़पाल तोमर का वो कटा हुआ सिर कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा दिल्ली के किले पर लटकाया गया राजा तेजपाल तोमर का वो कटा सिर क्या कोई मोल नहीं रखता यह काफी विवादित विषय है ये जानते हुए भी हमने सत्य दर्शाना आवश्यक समझा जो कुछ भी हरिहर द्विवेदी जी ने दिल्ली के तोमर नामक पुस्तक में समझाया है उसे हम एक पोस्ट में नहीं समझा सकते इसलिए अधिक जानकारी के लिए एक बार यह पुस्तक अवश्य पढ़ें।

खतरगच्छ बृहदगुर्वावली, इंद्रप्रस्थ प्रबंध, तबकात-ए-नासिरी आदि समकालीन ग्रंथ व तवारीखों में दिल्ली के तोमर वंश से संबंधित बातें पढ़ने को मिल जाएंगी।

1180 ई. – भादानकों_से_युद्ध

  • यह लड़ाई अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग समय पर होना बताई गई है इसलिए इसका समयकाल 1177 ई. से 1181 ई. के बीच होना चाहिए भादानकों का राज गुड़गांव, भिवानी, बयाना आदि इलाकों पर था।
  • यदुवंशियों की राजधानी तिमनगढ़ थी जिनका सामंत सोहनपाल भादानक (वर्तमान बयाना नगर) पर राज करता था।
  • भादानकों से लड़ाई में विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) को भी क़ामयाबी नहीं मिली थी।
  • सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने भादानकों की फौजी ताकत का सटीक अंदाज़ा लगाकर हमले की पहल की सम्राट ने नारायन नामक स्थान पर अपनी कुल फौज जमा की (वर्तमान में अजमेर के निकट स्थित नरायणा) ।
  • सम्राट ने सेनापति कैमास के साथ नारायन से कूच किया।
  • सम्राट ने भादानकों को परास्त कर बयाना पर अधिकार कर लिया जिनपति सूरी ने अपने ग्रंथ में सम्राट पृथ्वीराज चौहान को भादानकोर्वीपति नामक उपाधि दी।
  • 1182 ई. – चंदेलों_से_लड़ाई
  • सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर चढ़ाई की चंदेल नरेश जेजामुक्ति के राजा परमर्दिदेव ने अपने सामंत मलखान को फौज देकर विदा किया।
  • सिरसागढ़ में सम्राट और मलखान के बीच हुई लड़ाई में सम्राट के सेनापति कैमास ने मलखान और उसके भाई सलखान को मार गिराया।
  • राजा परमर्दिदेव ने संदेश भिजवाकर कन्नौज से आल्हा और ऊदल को बुलाया आल्हा और ऊदल बड़े दर्जे के वीर योद्धा थे।
  • गहड़वाल राजा जयचंद ने आल्हा और ऊदल को एक फौज देकर विदा किया इस तरह इस मिली-जुली फौज को सम्राट पृथ्वीराज ने शिकस्त दी।

इस लड़ाई में सम्राट की तरफ से विजयराय व चंदराय वीरगति को प्राप्त हुए :-

(मदनपुर शिलालेख के अनुसार सम्राट ने उन्हें शिकस्त देकर उनके इलाकों को खूब लूटा शिलालेख केवल लूटने की बात लिखता है ना कि अधिकार करने की कुछ इतिहासकारों ने तर्कों सहित यह निष्कर्ष निकाला कि सम्राट ने कालिंजर और महोबा पर अधिकार नहीं किया बल्कि इन इलाकों को लूटा और सिरसागढ़ पर जरूर अधिकार किया इसीलिए इस अभियान को सम्राट का अपूर्ण अभियान भी कहा जाता है।  जो क्षेत्र सम्राट ने जीता वह भी राजा परमर्दिदेव ने तराइन की लड़ाई के बाद फिर से चौहानों से छीन लिया।)

(आल्हा और ऊदल):- इनके बारे में हमें समकालीन ग्रंथों में काफी अलग-अलग बातें मिली कोई लिखता है कि दोनों को सम्राट ने मारा तो कोई लिखता है केवल एक को सम्राट ने मारा। किसी ने लिखा है कि दोनों को सम्राट ने नहीं मारा यह बात भी सामने आती है कि कन्नौज से फौज लेकर केवल आल्हा ही रवाना हुआ था ऊदल नहीं इसलिए इस मुद्दे पर हम किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाए हैं।)

सतलज_घाटी_की_लड़ाई___

  • कुछ इतिहासकारों ने 1182-83 ई. में सम्राट पृथ्वीराज चौहान और शहाबुद्दीन गौरी के बीच एक लड़ाई होने का ज़िक्र किया है जो सतलज किनारे हुई।
  • (हमें इस लड़ाई का वर्णन समकालीन ग्रंथों या किसी प्रामाणिक पुस्तक से नहीं मिला है इस घटना का एक शिलालेख है जो फलौदी-जोधपुर में है परंतु यह शिलालेख भी 1555 ई. का है जो विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता इसलिए इस लड़ाई का वर्णन हमने नहीं लिखा है)।
  • 1184 ई. शहाबुद्दीन गौरी ने देवल की तरफ़ चढ़ाई करके समुद्र के किनारे का मुल्क फ़तह किया इसी वर्ष गौरी ने सियालकोट का किला बनवाया।
  • 1184 ई. नागौर_की_लड़ाई गुजरात के भीमदेव सोलंकी ने जगदेव व धारावर्ष को फौज देकर नागौर की तरफ भेजा नागौर में चौहानों से हुई लड़ाइयों के बाद संधि हुई।
  • 1187 ई. अजमेर_से_कुछ_व्यापारी_गुजरात_गए अभयड नामक दंडनायक ने उनको लूटने की सलाह जगदेव को दी पर जगदेव ने संधि के नियमों का उल्लंघन नहीं किया।
  • 1189 ई. दिल्ली के राजा पृथ्वीराज तोमर का देहांत हुआ व राजा चाहड़पाल तोमर दिल्ली की गद्दी पर बैठे राजा चाहड़पाल को ही ग्रंथों में गोविंदराय चंद्रराज आदि लिखा गया है।
  • शहाबुद्दीन गौरी ने तबरहिन्द (भटिंडा) का किला फ़तह करके काजी ज़ियाउद्दीन तोलक को सौंप दिया।
  • राजाओं_से_संबंध_सुधारना।
  • शहाबुद्दीन गौरी के बढ़ते वर्चस्व को देखकर सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अन्हिलपाटन के चालुक्यों और दिल्ली के तोमरों से पुरानी शत्रुता भुलाते हुए मित्रता कर ली।
  • 1191 ई. तराइन_का_पहला_युद्ध।

(हम्मीरमहाकाव्य में लिखा है कि)

जब पृथ्वीराज अपनी प्रजा पर न्यायपूर्ण शासन कर रहा था और अपने शत्रुओं को भयभीत किए हुए था तब शहाबुद्दीन विश्व विजय के प्रयासों में लगा हुआ था शहाबुद्दीन के हाथों प्रताड़ित होकर पश्चिम के भूमिहारों ने चंद्रराज (दिल्ली के राजा चाहड़पाल तोमर) को अपना प्रमुख बनाया और वे सब पृथ्वीराज के पास पहुंचे।

पृथ्वीराज ने उनके मुख देखकर क्लेश का कारण पूछा तब चंद्रराज ने कहा कि शहाबुद्दीन नामक एक शक राजाओं का विनाश कर रहा है वह हमारे नगरों को लूट रहा है और मंदिरों का विध्वंस कर रहा है शहाबुद्दीन से हमारी भूमि बचाने के लिए सभी राजागण आपसे सहायता की आस लिए आए हैं।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने विचार किया कि दिन-दिन सुल्तान की शक्ति बढ़ती जा रही है अगर इस वक्त उसे नहीं रोका तो गज़नी से दोबारा आकर वह हावी हो सकता है।

शहाबुद्दीन गौरी गज़नी की तरफ जाने की फ़िराक़ में था लेकिन उसे ख़बर मिली कि अजमेर के सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने कई राजाओं की फ़ौजें मिलाकर तबरहिन्द (भटिंडा) के किले की तरफ कूच किया है।

सम्राट के साथ कैमास, उदयराज, स्कन्द, भुवनैकमल्ल भी थे I

फिरिश्ता के अनुसार सम्राट पृथ्वीराज की फौज :- 3 लाख पैदल सैनिक और 3000 हाथी।

पृथ्वीराज प्रबंध के अनुसार सम्राट की फौज :- 2 लाख सैनिक व 5000 हाथी थे (आधुनिक इतिहासकार इतनी भारी फौज के आंकड़ों को सही नहीं मानते)

गौरी ने ख़बर सुनते ही राजपूतों को मार्ग में ही रोकने के लिए तराइन के मैदान में पड़ाव डाला गौरी की फौज में मुख्य सेनापतियों में कुतुबुद्दीन ऐबक भी था।

तराइन के प्रथम युद्ध में सम्राट ने गजसेना को मध्य में रखा और गजसेना के दायीं व बायीं तरफ अश्व सेनाओं को रखा पैदल सेना को गजसेना के पीछे रखा।

गजसेना के बीच में सम्राट स्वयं एक गज पर तीर-कमान व भाले के साथ युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे दिल्ली के राजा चाहड़पाल तोमर भी हाथी पर विराजमान थे।

शहाबुद्दीन गौरी ने भी ठीक इसी तरह अपनी फ़ौजों को जमाया लेकिन उसके पास हाथियों की संख्या सम्राट के हाथियों से आधी भी नहीं थी वह खुद एक घोड़े पर बैठकर युद्ध का नेतृत्व कर रहा था।

(यह लड़ाई संभवतः 1191 ई. के जनवरी माह में हुई)

सम्राट की तरफ से लड़ते हुए प्रतापसिंह बड़गूजर वीरगति को प्राप्त हुए इस लड़ाई में गौरी बरछा लेकर घोड़े पर सवार था I हाथी पर सवार दिल्ली के राजा चाहड़पाल तोमर का सामना गौरी से हुआ गौरी ने राजा पर बरछा चलाया जिससे बरछा राजा के कंठ तक चला गया और 2 दांत गिर गए।

फिर राजा चाहड़पाल ने भी ज़ख्मी हालत में बरछा चलाया जिससे सुल्तान की बाज़ू पर गहरा घाव लगा और घोड़े से गिरने ही वाला था कि तभी एक खिलजी सिपाही ने फ़ौरन सुल्तान के घोड़े पर सवार होकर उसको संभाला और घोड़ा भगाकर उसे युद्धभूमि से बाहर ले गया।

जीवनदान_की_धारणा

यह धारणा प्रचलित है कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने गौरी को जीवनदान दिया यही बात बढ़ा चढ़ाकर लिखकर बहुत से लेखकों ने सम्राट को एक नासमझ योद्धा करार दिया जबकि हक़ीक़त ये थी कि गौरी को सुरक्षित वहां से बचा लिया गया था वरना निश्चित रूप से गौरी का वध किया जाता।

इस विषय में एक तर्क ये है कि सम्राट ने इस युद्ध की पहल ही इसीलिए की थी ताकि गौरी को मारकर संभावित आक्रमणों को रोका जा सके।

सम्राट ने नागार्जुन से लड़ाई के वक्त भी अपने संबंधी विद्रोहियों को कठोर दंड देते हुए उनके सिर काटकर अजयमेरु दुर्ग के बाहर वाले मैदान में लटका दिए थे तो सम्राट द्वारा क्रूर आक्रमणकारी गौरी को जीवनदान देना असंभव था।

कई राजाओं के संघ ने तराइन की लड़ाई से पूर्व सम्राट से गौरी के वध का निवेदन किया था यदि सम्राट गौरी को जीवित छोड़ देते तो वे राजा-महाराजा जो सम्राट के अधीन न होने के बावजूद भी तराइन की लड़ाई में उनके साथ थे वे दोबारा तराइन की दूसरी लड़ाई में हरगिज़ सम्राट का साथ न देते।

अज्ञानवश बहुत से राजपूत भी जीवनदान वाली बातें लिखकर सम्राट के उच्च आदर्शों को दिखाने के चक्कर में अनजाने में ही सम्राट को नासमझ करार दे देते हैं जिससे वामपंथी इतिहासकारों को मौका मिल जाता है।

बहरहाल, तराइन की इस लड़ाई में सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी को करारी शिकस्त दी गौरी ने लाहौर में अपने घावों का इलाज करवाया और फिर गज़नी लौट गया।

गौरी की पराजय का प्रमुख कारण

सम्राट के हाथियों ने गौरी के हाथियों को पीछे हटने पर विवश कर दिया जिससे गौरी के अश्व घबरा गए और अश्व अपने सवारों समेत भागने लगे।

 

प्रभाकर कुमार (जमुई).

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