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कटते वन और उजड़ता जन -जीवन

अगर याद आ रहा हो तो बहुत अच्छी बात है कि 21 मार्च को  विश्व वानिकी दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि धरती पर जीवन भी तब तक है जब तक हरे -भरे वन हैं ।लेकिन आधुनिकता के इस दौर में तीव्र शहरीकरण और बेतहाशा और बेतरतीब औद्योगिक विकास की वजह से  जंगल कट रहे हैं और नैसर्गिक दुनिया उजड़ रही है। उजड़ते वनों के साथ जन -जीवन भी उजड़ रहा है।।उसके बदले जो दुनिया बन रही है ,वह प्राकृतिक नहीं ,बनावटी है। फलस्वरूप ग्लोबल वार्मिंग की समस्या हमारे सामने है। कहीं बेमौसम बारिश , तो कभी मानसून की बेरुख़ी सम्पूर्ण विश्व को परेशान कर रही है ।वनों की अंधाधुंध कटाई से वन्य प्राणियों का जीवन भी संकट में पड़ता जा रहा है।  उनके लिए चारे और पानी का संकट बढ़ रहा है। इस वजह से वो  भोजन और पानी की तलाश में गाँवों और शहरों तक पहुँच रहे हैं।  देश के कई इलाकों में हाथियों ,भालुओं और बंदरों का मानव -बस्तियों में आकर फसलों और कच्चे मकानों को नुकसान पहुँचाना चिन्ताजनक है। कई बार  जंगली हाथियों के झुण्ड ग्रामीणों की जान के दुश्मन बन जाते हैं।।अगर इन इलाकों में सघन वन होते तो शायद इन जंगली जानवरों को मनुष्यों की बसाहटों में ख़तरनाक ढंग से दस्तक नहीं देनी पड़ती।  मानव आबादी वाले इलाकों में लोग अब  बंदरों का उत्पात झेलने के भी अभ्यस्त हो चुके हैं।स्वच्छ हवा और पानी तथा बहुमूल्य वनौषधियों सहित  वनों के हम पर ढेरों एहसान हैं।  इसलिए वनों को उजाड़ कर हमें एहसानफरामोश नहीं बनना चाहिए । वनौषधियों की बात चली तो हमें सोचना चाहिए कि कई तरह की गंभीर बीमारियों से  बचाव के लिए भी वनों में दवाइयों की संभावनाओं को खँगाला जा सकता है । जैसे तीन साल पहले कोरोना की वैश्विक बीमारी के दौरान  वनों के इर्द -गिर्द बसे गाँवों में इसका असर नहीं के बराबर पाया गया था। बहरहाल हम विश्व वानिकी दिवस को याद करते हुए वनों के संरक्षण और संवर्धन के बारे में चर्चा कर रहे थे

आपने ध्यान दिया होगा कि देश के कई  राज्यों में   गर्मी के मौसम में वनों में आग लग जाती है। कभी वनों के रास्ते गुजरते मुसाफिरों द्वारा बीड़ी ,सिगरेट के अधजले टुकड़े लापरवाही से फेंक देने के कारण और कभी  महुआ बीनने वाले ग्रामीणों द्वारा भालू आदि वन्य जीवों को दूर रखने के लिए सूखे पत्तों को बेतरतीबी से जलाने के कारण वनों में आग फैल जाती  है। कभी जंगलों की अवैध कटाई करने वाले लकड़ी तस्कर जानबूझकर वनों में आग सुलगा देते हैं। कभी सड़क निर्माण सहित कई अन्य विकास परियोजनाओं के लिए और उद्योगों के लिए आधिकारिक रूप से वनों की कटाई की जाती है।  जितने वन काटे जाते हैं ,उनकी भरपाई के लिए राष्ट्रीय स्तर पर क्षति पूर्ति पौध रोपण की भी योजना है ,लेकिन काटे गए चालीस -पचास साल और सौ -सौ साल पुराने पेड़ों की तुलना में  भरपाई के लिए जो पौधे लगाए जाते हैं ,उनके वृक्ष बनने में भी कई साल लग जाते हैं। इसके अलावा इन पौधों की अगर बेहतर देखभाल नहीं हुई तो ये असमय ही मौत का शिकार हो जाते हैं। हालांकि सरकारें वनों की रक्षा और उनके विकास के लिए सजग और सक्रिय रहती हैं। उनका वन विभाग हर साल  बारिश के मौसम में वन महोत्सवों का आयोजन करके आम जनता और स्कूल -कॉलेजों के विद्यार्थियों की भागीदारी से करोड़ों पौधे लगवाता है ,लेकिन नियमित देखरेख नहीं होने के कारण ये पौधे कुम्हलाकर धरती में समा जाते हैं ,या फिर लावारिस गाय -बैलों और बकरे -बकरियों का भोजन बन जाते हैं।भारत सरकार की  संयुक्त वन प्रबंधन योजना के तहत देश के सभी प्रांतों में राज्य सरकारों ने ग्रामीणों की भागीदारी से वन प्रबंध समितियों का गठन किया है। इनमें लाखों -करोड़ों ग्रामीण जन सदस्य के रूप में शामिल हैं।  इन समितियों पर भी वनों की देखभाल की ज़िम्मेदारी है। सरकार भी इनकी मदद करती है। ये समितियां भी अगर वनों की देखभाल के अपने दायित्वों को ठीक से निभाएं तो काफी हद तक स्थिति सुधर सकती है।।हमें अमेजॉन के वर्षा वनों ,ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटीना में आग से हज़ारों वर्ग किलोमीटर के दायरे में पिछले वर्षों में वनों को हुए भयानक नुकसान को भी याद करना चाहिए । पता नहीं किसकी लापरवाही से यह  नुकसान हुआ ? बहरहाल , उम्मीद की जानी चाहिए कि धरती पर वनों का विनाश रुकेगा   और अगले साल विश्व वानिकी दिवस दोगुने उत्साह के साथ मनाया जाएगा ।

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Cutting forests and desolating people’s life

If you are remembering, then it is a very good thing that World Forestry Day is celebrated on 21st March. This day reminds us that there is life on Earth as long as there are green forests. But in this era of modernity, due to rapid urbanization and reckless and haphazard industrial development, forests are being cut down and the natural world is being destroyed. Along with the desolated forests, people’s life is also being destroyed. The world that is being created instead is not natural, it is artificial. As a result, the problem of global warming is in front of us. Somewhere unseasonal rains, and sometimes the indifference of monsoons is troubling the whole world. Due to the indiscriminate cutting of forests, the life of wild animals is also in danger. The crisis of fodder and water is increasing for them. Because of this, they are reaching villages and cities in search of food and water. In many areas of the country, elephants, bears, and monkeys coming into human settlements and damaging crops and kutcha houses are worrisome. Sometimes herds of wild elephants become enemies of the lives of the villagers. If there were dense forests in these areas, then perhaps these wild animals would not have to knock dangerously in human settlements. People in human-populated areas have also become used to facing the menace of monkeys. Forests have many favors on us including clean air and water and valuable herbal medicines. That’s why we should not become ungrateful by destroying forests. When it comes to herbal medicines, we should think that the possibilities of medicines in forests can be explored to prevent many types of serious diseases. Three years ago, during the global disease of Corona, its effect was found to be negligible in the villages situated around the forests. However, remembering World Forestry Day, we were discussing the conservation and promotion of forests.

You must have noticed that in many states of the country, forest fires take place during the summer season. Sometimes due to careless throwing of half-burnt pieces of beedis, and cigarettes by the travelers passing through the forests and sometimes due to random burning of dry leaves by the mahua picking villagers to keep away the wild animals like bears, etc., the forest fires spread. Sometimes wood smugglers who do illegal felling of forests intentionally set fire to the forests. Deforestation is sometimes officially done for various other development projects including road construction and industries. There is also a plan to plant compensatory trees at the national level to compensate for the number of forests that are cut, but compared to the 40-50 years old and 100-100-year-old trees that were cut, the trees that are planted to compensate also take many years to become. Apart from this, if these plants are not taken care of properly, then they become victims of untimely death. However, governments remain alert and active in the protection and development of forests. Every year during the rainy season, their forest department organizes forest festivals and plants crores of saplings with the participation of the general public and school-college students, but due to lack of regular care, these saplings wither into the earth or become unclaimed cows. Bullocks and goats become food for the goats. Under the Joint Forest Management Scheme of the Government of India, the State Governments in all the provinces of the country have formed Forest Management Committees with the participation of the villagers. Lakhs and crores of rural people are included in these as members. These committees are also responsible for taking care of the forests. The government also helps them. If these committees also fulfill their responsibilities of taking care of the forests properly, then the situation can improve to a great extent. We can see the terrible damage caused to the forests in the area of thousands of square kilometers in the last years due to the fire in the rain forests of Amazon, Australia, and Argentina. should also be remembered. Don’t know whose negligence caused this loss? However, it should be hoped that the destruction of forests on earth will stop and next year World Forestry Day will be celebrated with double enthusiasm.

 

Prabhakar Kumar.

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