व्यक्ति विशेष -809.
कुश्ती प्रशिक्षक गुरु हनुमान
गुरु हनुमान एक भारतीय कुश्ती प्रशिक्षक थे, जिन्होंने भारतीय पहलवानी को नई पहचान दिलाई. उनका वास्तविक नाम विजय पाल सिंह था, लेकिन वे गुरु हनुमान के नाम से अधिक प्रसिद्ध हुए. उनका जन्म 24 अप्रैल, 1901 को राजस्थान में हुआ था.
गुरु हनुमान ने अपनी कुश्ती अकादमी दिल्ली में स्थापित की, जो जल्द ही देश के सर्वश्रेष्ठ पहलवानों को तैयार करने के लिए प्रसिद्ध हो गई. उन्होंने अपने जीवनकाल में सैकड़ों पहलवानों को प्रशिक्षित किया, जिनमें से कई ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते
उनकी अकादमी से निकले प्रमुख पहलवानों में सतपाल सिंह, करतार सिंह, और योगेश्वर दत्त जैसे नाम शामिल हैं. गुरु हनुमान की प्रशिक्षण पद्धतियां और उनकी सख्त दिनचर्या ने कई पहलवानों को उनकी असीम क्षमता का एहसास कराया और उन्हें उच्चतम स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया.
उनके योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कार और सम्मान से नवाजा गया, जिसमें द्रोणाचार्य पुरस्कार भी शामिल है, जो भारतीय खेलों में एक प्रशिक्षक के लिए सर्वोच्च सम्मान माना जाता है. गुरु हनुमान का निधन 15 मार्च 1999 को हुआ था, लेकिन उनकी विरासत आज भी भारतीय कुश्ती में जीवित है.
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राजनीतीज्ञ कांशी राम
कांशी राम भारतीय राजनीति में एक दलित नेता और समाज सुधारक थे. वे बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक हैं, जो विशेष रूप से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित एक राजनीतिक पार्टी है. कांशी राम का जीवन और कार्य दलित आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं.
कांशी राम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के गुरदासपुर जिले के खरड़ नामक गाँव में हुआ था. वे एक साधारण परिवार में पैदा हुए और उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में प्राप्त की. कांशी राम ने अपनी उच्च शिक्षा की पढ़ाई पंजाब विश्वविद्यालय से की, जहाँ उन्होंने विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की.
कांशी राम ने अपने कैरियर की शुरुआत भारतीय रेलवे में एक अधिकारी के रूप में की. हालांकि, उन्हें जल्दी ही यह एहसास हुआ कि उन्हें समाज के शोषित वर्गों के लिए काम करना है. इसके बाद, उन्होंने दिल्ली में सामाजिक न्याय और समानता के लिए काम करना शुरू किया. वर्ष 1984 में, कांशी राम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य दलितों, पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना था. उनके नेतृत्व में, BSP ने उत्तर प्रदेश में महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत हासिल की.
कांशी राम ने दलितों के अधिकारों के लिए कई आंदोलनों का नेतृत्व किया. उन्होंने समाज के शोषित वर्गों के लिए एक मजबूत आवाज़ उठाई और उन्हें सशक्त बनाने के लिए कई कार्यक्रमों की योजना बनाई. उनका नारा “चौकिदारी नहीं, हमें हक चाहिए” दलित समुदाय में लोकप्रिय हुआ. कांशी राम की पार्टी ने वर्ष 1993 में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई, जिसमें मायावती मुख्यमंत्री बनीं. यह दलितों के लिए एक ऐतिहासिक पल था और कांशी राम की राजनीति में महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी गई.
कांशी राम ने शादी नहीं की थी और अपने जीवन को सामाजिक और राजनीतिक कार्यों के लिए समर्पित किया. उन्होंने समाज में व्याप्त जातिवाद और भेदभाव के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई. कांशी राम का निधन 9 अक्टूबर 2006 को हुआ. उनका योगदान भारतीय राजनीति और समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था. उन्हें एक महान विचारक और समाजसुधारक के रूप में याद किया जाता है. उनके विचार और दृष्टिकोण आज भी दलितों और शोषित वर्गों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं. कांशी राम की विरासत उनके द्वारा स्थापित बहुजन समाज पार्टी और उनके सामाजिक न्याय के प्रति समर्पण के माध्यम से जीवित है.
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राजनीतिज्ञ साहिब सिंह वर्मा
साहिब सिंह वर्मा एक भारतीय राजनीतिज्ञ थे, जो विशेष रूप से दिल्ली की राजनीति में सक्रिय थे. उनका जन्म 15 मार्च 1943 को हुआ था. वह भारतीय जनता पार्टी के सदस्य थे और दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में भी कार्य किया था.
साहिब सिंह वर्मा का राजनीतिक कैरियर काफी उल्लेखनीय था. उन्होंने शिक्षाविद् के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करने के बाद राजनीति में आए. उन्होंने दिल्ली विधानसभा में कई बार सेवा की और विभिन्न मंत्रालयों में मंत्री के रूप में भी कार्य किया. वर्ष 1993 में उन्हें दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया गया, और उन्होंने वर्ष 1996 तक इस पद पर कार्य किया.
साहिब सिंह वर्मा अपनी विनम्र शुरुआत और जमीन से जुड़ी शैली के लिए जाने जाते थे. वह विशेष रूप से ग्रामीण और पिछड़े वर्गों के बीच प्रसिद्ध थे. उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पहल की.
साहिब सिंह वर्मा का देहांत 30 जून 2007 को हुआ. उनका निधन भारतीय राजनीति और विशेष रूप से दिल्ली के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ी क्षति माना गया. उनकी विरासत और उनके द्वारा किए गए कार्य आज भी कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं.
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हॉकी खिलाड़ी अजीत पाल सिंह
भारतीय हॉकी के इतिहास में अजीत पाल सिंह एक ऐसा नाम है, जो न केवल भारत बल्कि विश्व हॉकी के मानचित्र पर अपनी अमिट छाप छोड़ गया. उनका जन्म 5 अप्रैल 1947 को पंजाब के सिंहवान गाँव में हुआ था. अजीत पाल सिंह ने भारतीय हॉकी को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया और अपने नेतृत्व कौशल से देश को कई यादगार जीत दिलाई.
अजीत पाल सिंह ने अपने हॉकी कैरियर की शुरुआत स्कूल स्तर से की. उनकी प्रतिभा को जल्द ही पहचान लिया गया और वे राष्ट्रीय स्तर पर खेलने लगे. वर्ष 1966 में, उन्होंने भारतीय हॉकी टीम में अपनी जगह बनाई और जल्द ही अपने खेल के प्रति समर्पण और कौशल के कारण टीम का अहम हिस्सा बन गए.
अजीत पाल सिंह का सबसे बड़ा योगदान वर्ष 1975 के हॉकी विश्व कप में रहा, जब उनकी कप्तानी में भारतीय हॉकी टीम ने पाकिस्तान को हराकर पहली बार विश्व कप जीता. यह जीत भारतीय हॉकी के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज है. उनके नेतृत्व में टीम ने न केवल विश्व कप जीता, बल्कि भारतीय हॉकी को फिर से गौरवान्वित किया.
अजीत पाल सिंह एक मध्यमार्गी (हाफ-बैक) के रूप में खेलते थे. उनकी खेल शैली में रणनीतिक समझ, गेंद नियंत्रण और टीम को प्रेरित करने की क्षमता शामिल थी. उन्होंने हॉकी को एक नए स्तर पर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बने.
अजीत पाल सिंह के योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1992 में पद्म भूषण से सम्मानित किया. यह सम्मान उनके खेल और नेतृत्व कौशल की मान्यता थी. अजीत पाल सिंह का निधन 14 दिसंबर 2023 को हुआ था. उनके निधन से भारतीय हॉकी जगत को गहरा आघात लगा. उनकी विरासत आज भी युवा हॉकी खिलाड़ियों को प्रेरित करती है.
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साहित्यकार रमेशराज तेवरीकार
साहित्यकार रमेशराज तेवरीकार का जन्म 15 मार्च 1954 को गांव-एसी, जनपद-अलीगढ़, (उत्तर प्रदेश) में हुआ था. उनका पूरा नाम रमेशचन्द्र गुप्त है. उनके पिता का नाम रामचरण गुप्त है जो साहित्यकार, लोकगायक और स्वाधीनता सेनानी थे और उनकी माता का नाम गंगा देवी था.
रमेशराज तेवरीकार एक प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यकार हैं, जो विशेष रूप से अपनी तेवरी शैली के काव्य के लिए जाने जाते हैं. तेवरी एक काव्य विधा है जिसमें क्रोध, विरोध, असंतोष, अन्याय और गरीबों के प्रति सहानुभूति जैसे भाव शामिल होते हैं. उन्होंने ‘तेवरीपक्ष’ नामक एक लघु पत्रिका का भी संपादन और प्रकाशन किया है. तेवरी को उन्होंने एक पूर्ण काव्य-विधा के रूप में स्थापित किया है, जिसे कई छंदों में प्रस्तुत किया जा सकता है जैसे गीत, गज़ल, दोहा, हाइकु, मुक्तक, चतुष्पदी, कुण्डलिया, घनाक्षरी आदि.
रमेशराज ने ‘विरोधरस’ नामक एक नए रस की भी निष्पत्ति की है, जिसे वे तेवरी के लिए उपयुक्त मानते हैं. उनका यह कदम तेवरी शैली को एक विशिष्ट पहचान देता है.उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘अभी जु़बां कटी नहीं’, ‘कबीर जि़न्दा है’, ‘इतिहास घायल है’, ‘एक प्रहारः लगातार’ (सभी तेवरी-संग्रह) जैसी रचनाएँ शामिल हैं. इसके अलावा, उन्होंने ‘तेवरी में रस-समस्या और समाधान’, ‘विचार और रस’ (विवेचनात्मक निबंध), ‘विरोध-रस’ (शोध-प्रबंध) और ‘काव्य की आत्मा और आत्मीयकरण’ (शोध-प्रबंध) जैसे विश्लेषणात्मक और शोध-प्रबंध भी लिखे हैं.
वे ‘साहित्यश्री’, ‘उ.प्र. गौरव’, ‘तेवरी-तापस’, ‘शिखरश्री’ जैसे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किए गए हैं. रमेशराज ने बाल साहित्य में भी योगदान दिया है और ‘अभिनव बालमन’ पत्रिका के लिए कार्यशालाओं में सन्दर्भदाता के रूप में भाग लिया है. वे बाल रचनाकारों को कविता की बारीकियां सिखाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, और उनका मार्गदर्शन बाल साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है. रमेशराज तेवरीकार की साहित्यिक उपलब्धियाँ और उनके द्वारा किए गए साहित्यिक प्रयोग हिंदी साहित्य जगत में उन्हें एक विशिष्ट स्थान प्रदान करते हैं. उनके कार्य और विचार आज भी साहित्यिक चर्चाओं और अध्ययनों में प्रमुखता से शामिल होते हैं.
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अभिनेता अभय देयोल
अभय देयोल एक भारतीय फिल्म अभिनेता हैं, जिनका जन्म 15 मार्च 1976 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था. वे प्रसिद्ध निर्माता और निर्देशक अजीत सिंह देओल के पुत्र हैं और उनके चाचा धर्मेंद्र हैं. अभिनेता सनी देओल, बॉबी देओल और अभिनेत्री ईशा देओल उनके चचेरे भाई-बहन हैं.
अभय ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के जमनाबाई नरसी स्कूल से पूरी की थी. बाद में, उन्होंने न्यूयॉर्क के सिटी कॉलेज में अध्ययन करने का निर्णय लिया, लेकिन अंत में उन्होंने अभिनय की दिशा में अपना कैरियर बनाने का फैसला किया और थिएटर तथा अभिनय के कोर्स किए.
उन्होंने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत वर्ष 2005 में “सोचा न था” फिल्म से की थी. इसके बाद वह “आहिस्ता-आहिस्ता”, “हनीमून ट्रेवल्स प्राइवेट लिमिटेड”, “ओये लक्की. लक्की ओये!”, “देव डी”, और “जिंदगी न मिलेगी दोबारा” जैसी कई सफल फिल्मों में नजर आए. विशेष रूप से, “देव डी” और “ओये लक्की! लक्की ओये!” फिल्मों में उनकी भूमिकाओं की आलोचकों द्वारा बहुत प्रशंसा की गई थी.
अभय देयोल अपने अनूठे चयन और अभिनय के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने हमेशा मुख्यधारा से हटकर फिल्में चुनीं और अपनी विशेष पहचान बनाई है.उनकी शैली और विकल्पों ने उन्हें बॉलीवुड में एक विशिष्ट स्थान दिया है. अभय देयोल की फिल्में आमतौर पर समाजिक मुद्दों पर आधारित होती हैं या वे ऐसे विषयों को छूती हैं जो आम बॉलीवुड सिनेमा में कम ही देखने को मिलते हैं.
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अभिनेत्री आलिया भट्ट
आलिया भट्ट भारतीय सिनेमा की एक ऐसी प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं, जिन्होंने कम उम्र में ही बॉलीवुड में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. उनका जन्म 15 मार्च 1993 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था. आलिया, प्रसिद्ध फिल्म निर्माता महेश भट्ट और अभिनेत्री सोनी राजदान की बेटी हैं. उन्होंने अपने अभिनय कौशल, मेहनत और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं के जरिए दर्शकों का दिल जीता है.
आलिया भट्ट ने अपनी स्कूली शिक्षा जामनाबाई नरसी स्कूल, मुंबई से पूरी की. उन्होंने बचपन से ही अभिनय में रुचि दिखाई और अपने पिता महेश भट्ट के मार्गदर्शन में फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा. उन्होंने अभिनय की औपचारिक शिक्षा हासिल करने के लिए न्यूयॉर्क के ली स्ट्रासबर्ग थिएटर एंड फिल्म इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षण लिया.
आलिया ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत वर्ष 2012 में करण जौहर की फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर से की. इस फिल्म में उनकी भूमिका को दर्शकों और आलोचकों ने काफी सराहा. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. आलिया भट्ट ने अपने कैरियर में कई यादगार फिल्मों में अभिनय किया है.
फिल्में: –
हाईवे (2014): – इम्तियाज अली द्वारा निर्देशित इस फिल्म में आलिया ने एक युवा लड़की की भूमिका निभाई, जो अपहरण के बाद अपने अपहरणकर्ता के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ जाती है. इस फिल्म में उनके अभिनय को खूब सराहा गया.
उड़ता पंजाब (2016): – शशांक घोष द्वारा निर्देशित इस फिल्म में आलिया ने एक पंजाबी लड़की की भूमिका निभाई. इस फिल्म ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की, बल्कि आलिया के अभिनय को भी खूब प्रशंसा मिली.
राज़ी (2018): – मेघना गुलज़ार द्वारा निर्देशित इस फिल्म में आलिया ने एक भारतीय जासूस की भूमिका निभाई, जो पाकिस्तानी सेना में घुसकर भारत के लिए जानकारी जुटाती है. इस फिल्म के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले, जिसमें फिल्मफेयर अवार्ड भी शामिल है.
गंगूबाई काठियावाड़ी (2022): – सैन्जय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित इस फिल्म में आलिया ने गंगूबाई की भूमिका निभाई, जो एक वेश्या से समाज की नेता बनती है. इस फिल्म में उनके अभिनय को खूब सराहा गया और यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर भी सफल रही.
आलिया भट्ट को उनके उत्कृष्ट अभिनय के लिए कई पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं. उन्होंने कई फिल्मफेयर अवार्ड्स जीते हैं और उन्हें भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया है.
आलिया भट्ट ने 14 अप्रैल 2022 को अभिनेता रणबीर कपूर से शादी की. यह जोड़ी बॉलीवुड की सबसे पसंदीदा जोड़ियों में से एक है. आलिया ने अपने व्यक्तिगत जीवन को सार्वजनिक रूप से साझा करने में संयम बरता है और वे अपने काम पर ध्यान केंद्रित करती हैं.
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स्वतंत्रता सेनानी मालती चौधरी
मालती चौधरी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख महिला सेनानी और समाज सुधारक थीं. वे ओडिशा राज्य से थीं और उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. मालती चौधरी का जन्म 26 जुलाई 1904 को अविभाजित भारत के बंगाल में हुआ था. वे एक समृद्ध परिवार से थीं और उनकी शिक्षा शांति निकेतन में हुई थी, जहां उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर के सान्निध्य में शिक्षा प्राप्त की. मालती चौधरी का विवाह ओडिशा के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी नीलकंठ दास से हुआ था. शादी के बाद वे ओडिशा आ गईं और वहीं से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुईं.
मालती चौधरी ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में कई आंदोलनों में भाग लिया, जैसे असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन. उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने वर्ष 1930 के नमक सत्याग्रह में भी हिस्सा लिया और अंग्रेजों के खिलाफ सत्याग्रह किया. मालती चौधरी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सक्रिय सदस्य थीं और उन्होंने कांग्रेस के माध्यम से अनेक आंदोलन और कार्यक्रम आयोजित किए.
मालती चौधरी ने स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ समाज सुधार और ग्रामीण विकास के लिए भी कार्य किए. उन्होंने गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सुधार के लिए अनेक योजनाएं चलाईं. उन्होंने ओडिशा में उड़िया भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए भी कार्य किए. वे उड़िया साहित्य और संस्कृति की संरक्षक थीं.
मालती चौधरी को उनके योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उन्हें वर्ष 1988 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था. मालती चौधरी का निधन 15 मार्च 1998 को हुआ था. उनकी विरासत आज भी जीवित है. उनके सामाजिक और शैक्षिक सुधार कार्य आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं. वे एक सशक्त महिला और समाजसुधारिका के रूप में हमेशा याद की जाती रहेंगी. मालती चौधरी की जीवनगाथा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और समाज सुधार के क्षेत्र में उनके अपार योगदान की साक्षी है. वे न केवल स्वतंत्रता सेनानी थीं, बल्कि समाज की सच्ची सेविका भी थीं.
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इतिहासकार राधा कृष्ण चौधरी
राधा कृष्ण चौधरी एक भारतीय इतिहासकार, विचारक, और साहित्यकार थे. उनका जन्म 15 फ़रवरी, 1921 को हुआ था और उनका निधन 15 मार्च, 1985 को हुआ था. वे बिहार के इतिहास और पुरातत्व पर कई महत्वपूर्ण शोध कार्य करने के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने मैथिली साहित्य में भी बहुत योगदान दिया था।.उन्होंने बिहार के गणेश दत्त कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में काम किया और उन्हें एक प्रख्यात शिक्षाविद के रूप में भी पहचाना जाता था. उनकी पसंद की भाषाएँ हिंदी और अंग्रेज़ी थीं, लेकिन उन्होंने अपने साहित्यिक कार्यों के लिए मैथिली का भी अत्यधिक प्रयोग किया.
उनकी प्रमुख रचनाओं में “Political History of Japan (1868–1947)”, “Maithili Sahityik Nibandhavali”, “Studies in Ancient Indian Law”, “Bihar – The Homeland of Buddhism”, और “History of Bihar” शामिल हैं. उन्होंने मिथिला के इतिहास पर भी कई महत्वपूर्ण शोध कार्य किए थे.
राधा कृष्ण चौधरी का योगदान भारतीय इतिहास और साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है, खासकर बिहार और मिथिला के संदर्भ में. उनके कार्य ने इन क्षेत्रों के इतिहास और साहित्य की समझ में बहुत योगदान दिया है.
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साहित्यकार राही मासूम रज़ा
राही मासूम रज़ा एक हिंदी और उर्दू साहित्यकार थे, जिन्होंने साहित्य के विभिन्न आयामों में अनुपम योगदान दिया. उनका जन्म 1 सितंबर, 1927 को गंगौली गाँव, गाजीपुर जिला, उत्तर प्रदेश में हुआ था और उनका निधन 15 मार्च, 1992 को हुआ था.
राही ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गाजीपुर में पूरी की और पोलियो के कारण कुछ समय के लिए उनकी पढ़ाई बाधित हुई. बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री प्राप्त की और पीएच.डी. की. उन्होंने अलीगढ़ में उर्दू विभाग में अध्यापन भी किया.
राही मासूम रज़ा ने हिंदी सिनेमा और दूरदर्शन के लिए भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. उन्होंने ‘महाभारत’ धारावाहिक की पटकथा और संवाद लिखे, जो बेहद लोकप्रिय हुए और उन्हें बड़ी पहचान दिलाई. उन्हें ‘मैं तुलसी तेरे आँगन की’ फिल्म के लिए फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ संवाद पुरस्कार भी मिला. उनके लेखन की विविधता में उपन्यास, कविता, निबंध और जीवनी शामिल हैं. उनके प्रसिद्ध उपन्यासों में ‘आधा गाँव’, ‘टोपी शुक्ला’, और ‘नीम का पेड़’ शामिल हैं.
राही मासूम रज़ा ने अपने लेखन में साम्यवादी दृष्टिकोण और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय विचारधारारे जताया. उन्हें भारतीय साहित्य और फिल्म जगत में उनके योगदान के लिए ‘पद्म श्री’ और ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया था.
उनकी रचनाओं में उन्होंने सामाजिक विषयों को उठाया और विभिन्न सामाजिक वर्गों के जीवन को चित्रित किया, जो आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं. उनके साहित्यिक कार्य ने उन्हें हिंदी और उर्दू साहित्य में एक विशिष्ट स्थान दिया है, और उनकी रचनाएँ विभिन्न शैक्षणिक सिलेबस में शामिल की गई हैं.
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महिला विमान चालक सरला ठकराल
सरला ठकराल भारत की पहली महिला विमान चालक थीं. उनका जन्म 8 अगस्त 1914 को नई दिल्ली में हुआ था और उनका निधन 15 मार्च 2008 को हुआ. उन्होंने 21 वर्ष की उम्र में, वर्ष 1936 में, विमानन लाइसेंस प्राप्त किया और जिप्सी मोठ विमान को अकेले उड़ाया. इस समय वे पहले से ही चार साल की बेटी की माँ थीं.
सरला ने अपनी शादी के बाद विमान उड़ाने की प्रेरणा अपने पति पी. डी. शर्मा से प्राप्त की, जो एक प्रशिक्षित पायलट थे. विवाह के कुछ समय बाद, उनके पति ने देखा कि सरला को विमान और उड़ान के बारे में जानने में गहरी रुचि थी, इसलिए उन्होंने उनकी ट्रेनिंग का इंतजाम किया. जोधपुर फ्लाइंग क्लब में उन्होंने अपनी ट्रेनिंग पूरी की और लाहौर हवाई अड्डे से उन्होंने अपनी पहली उड़ान भरी. इस प्रकार वे भारत की पहली महिला विमान चालक बनीं.
पति की मृत्यु के बाद और द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभ के कारण, उन्होंने विमानन क्षेत्र से अपना कैरियर बदल लिया. दिल्ली में उन्होंने पेंटिंग शुरू की और कपड़े तथा गहने डिजाइन करने लगीं. वे करीब 20 साल तक अपनी डिज़ाइन की हुई चीजों को विभिन्न कुटीर उद्योगों को देती रहीं. सरला ठकराल की कहानी आज भी अनेक महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत है.



