हिंदी पंचांग के अनुसार वर्ष का अंतिम महीना फाल्गुन होता है. इस महीने प्रकृति स्वयं श्रृंगार कर ‘मदमस्त’ दिखाई देती है. इस महीने पलाश (टेसू) के लाल फूल खिलते हैं जो कामदेव का प्रतीक माना जाता है. साथ ही दक्षिण से आने वाली ठंडी हवाएँ मन में चंचलता और उमंग को भर देती हैं.
फाल्गुन का महीना और बसंत के संगम का अनोखा मिलन प्रकृति सहित आवाम को झूमने को मजबूर करती है. वहीँ , बसंत पंचमी से ही मद का भी शुरुर छाने लगता है. माँ वीणावादनी को गुलाल अपर्ण करने के बाद से ही मद से मदमस्त प्रकृति अपने श्रृंगार कर पीत और स्वर्ण की आभा से ओत-प्रोत दिखाई देती है. ” मद से मदमस्त” में ‘मद’ शब्द के दो गहरे अर्थ हैं – पहला मादकता और दूसरा अहंकार का विसर्जन। ‘मद से भरी मदमस्त होरी’ मात्र एक लाइन / पंक्ति नहीं है बल्कि, भारतीय लोक चेतना और ब्रज की सांस्कृतिक विरासत का निचोड़ भी है. यह केवल बाहरी रंगों तक सीमित नहीं बल्कि भीतर की भावनाओं और सामाजिक संरचनाओं का अनूठा संगम जहाँ भक्त, भगवान् और प्रकृति भी प्रेम में एकाकार हो जाते हैं.
वसंत के आगमन, खिलते फूलों और फागुन की बयार से उल्लास की मादकता पैदा होती है. पौराणिक ग्रंथों के अनुसार ‘मद’ (अहंकार) को होली की अग्नि में जलाकर प्रेम के रंग में रंग जाना ही असली ‘मद-मस्त’ होना कहा जाता है. होली की बात चल रही हो, और श्यामसुन्दर की याद ना आये ऐसा संभव ही नहीं है. वैसे भी ब्रज की होली केवल एक उत्सव नहीं बल्कि, लगभग 40 दिनों तक चलने वाला एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उत्सव है. ब्रज की होली का केंद्र राधा-कृष्ण का प्रेम है. पौराणिक ग्रंथों और लोक कथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण अपने सखाओं (ग्वालों) के साथ नंदगाँव से बरसाना राधा जी के साथ होली खेलने जाते थे.
मदमस्त’ होने का अर्थ होता है – जब व्यक्ति अपनी सामाजिक पहचान भूलकर ‘होरी’ के हुड़दंग में शामिल होता है, तब वह मदमस्त कहलाता है. वहीँ वर्तमान समय के दौर में ‘मद’ का अर्थ होता है नशा. वर्तमान समय के दौर में रंगों के साथ-साथ भांग और मदिरा का सेवन भी परंपरा का हिस्सा बन गया है. यह नशा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक भी होता है. जहाँ लोग एक-दूसरे पर रंग डालते हैं, गले मिलते हैं, और सामाजिक दूरी मिट जाती है.
होली का वर्णन प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में भी मिलता है. कालिदास रचित ऋतुसंहार में भी ‘वसंतोत्सव’ का जिक्र मिलता है. चंद बरदाई द्वारा रचित पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासों में भी होली का वर्णन है. विद्यापति से लेकर सूरदास, रहीम, जायसी, मीराबाई, कबीर, बिहारी, केशव और घनानंद आदि अनेक कवियों का प्रमुख विषय रहा है.
“मद से भरी मदमस्त होरी” केवल एक उत्सव का चित्रण नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की जटिलताओं का भी प्रतीक है. ये उस क्षण की व्याख्या है जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और केवल संवेदनाएँ नाचती हैं. यह उमंग, ऊर्जा और समर्पण का उत्सव है. यहाँ मद का अर्थ नशा नहीं प्रेम और भक्ति का मिलन है.
संकलन: – ज्ञानसागरटाइम्स टीम.
Video Link: – https://youtu.be/zdyc3J7Zpng



