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मल्लाह…

मेरा भी पाला अजब ग़ज़ब लोगों से पड़ा है। जीवन के ये वो मोती हैं जो मानवीय रिश्तों के गहरे सागर में गोता लगाकर पाए जाते हैं. गोता शब्द के प्रयोग से ही मेरी स्मृति की मंजूषा फड़फड़ाने लगी. शिव की नगरी में शम्भू. शंभू मल्लाह यानी अव्वल किस्म के गोताखोर. धारा के खिलाफ नाव खेने के उस्ताद. सुबह से ही देसी लगाकर गंगा की चिंता करने वाला गंगापुत्र. अपनी धुन का उतना ही पक्का जितना भगवान राम को नदी पार कराने वाला निषादराज. निषादों के आत्मगौरव से लबालब शंभू अक्सर यह ऐलान करते कि ‘कोलंबस’ और ‘वास्कोडिगामा’ भी मल्लाह थे क्योंकि वे भी नाविक थे. शंभू संगीत रसिक थे और विदेशी महिला पर्यटकों में बेहद लोकप्रियभी. नाव चलाने के साथ ही वह कजरी और सोहर भी सुनाते थे. बहुत जीवट के केवट थे शंभू. वैसे तो वह नाव चलाता थे, पर घाट के किनारे होनेवाले सारे कारोबार में उनकी दखल थी.

अस्सी घाट पर उसकी नाव बंधी रहती थी. शंभू सरकारी रिकॉर्ड में बतौर अव्वल दर्जे का गोताखोर दर्ज थे. जैसे बिना गंगा के बनारस के घाटों की कल्पना नहीं की जा सकती. वैसे ही घाटों के किनारे बंधी नाव के बिना आप गंगा की कल्पना नहीं कर सकते हैं. काशी के घाटों पर पंडे और मल्लाह समान अधिकार रखते हैं. हालांकि श्मशान घाट पर पूरा अधिकार डोम का होता है. (डोम पर फिर कभी अलग से)शम्भू मल्लाह की अपनी ही दुनिया थी. वे बिंदास और मुंहफट बनारसी थे. अपने को गंगापुत्र कहते. बनारस में मल्लाह खुद को गंगापुत्र ही कहते हैं. आए दिन शंभू को पुलिस ढूंढती. इसलिए नहीं कि उन्होंने कोई अपराध किया होता था. वरन, इस कारण की पूर्वी उत्तर प्रदेश में कहीं कोई जल दुर्घटना होती, कोई पानी में डूबता या कुएं में गिरता तो पुलिस को गोताखोरी के लिए शंभू की ही तलाश रहती. शंभू घंटों पानी में गोता लगा सकते थे. इस कला में उनके सामने बड़े-बड़े योगाचार्य फेल थे. एक डुबकी लगाते तो घंटा भर पानी के भीतर रह सकते थे.

कौन सी साधना उन्होंने की थी,यह किसी को नहीं पता? शंभू सुबह से ही देसी से तर बतर रहते. उसी देसी तरन्नुम में वे शहर को अपने अंगूठे पर रखते. अपना काम निकलवाने के लिए पुलिसवाले भी काम के वक्त उन्हें ‘देसी’ उपलब्ध करवाते थे. फिर शंभू फौरन डुबकी लगाते और पानी के भीतर से लाश या सामान बड़ी आसानी से ढूंढ कर बाहर निकाल लाते.  दुबले, पतले, चीमड शरीर वाले शंभू का रंग चमकता हुआ काला था, लगभग बैंगनी. धूप में तो उसके शरीर पर आंख नहीं टिकती थी. ऊपर से वह अपने पूरे शरीर पर तेल मले रहते. दिन भर पानी और धूप में रहने के कारण उसका रंग उम्र के साथ गाढ़ा होता जा रहा था. शंभू के इस व्यक्तित्व पर विदेशी महिला पर्यटक लट्टू रहती थीं. शंभू उन्हें अपनी नाव पर घुमाते. अपना गायन सुनाते और अक्सर उन्हीं के साथ रात में बजड़े पर रूक जाते. बनारस में जो बड़ी नाव होती है उन्हें ‘बजड़ा’ कहते हैं जिसमें नीचे बैठने की जगह और ऊपर छत होती है. लगभग ‘हाउसबोट’ की तरह. पर हाऊसबोट से यह छोटा होता है. छत पर ही रईस और पर्यटक गद्दा, चांदनी और मसनद लगा नौका विहार करते हैं.

बुढ़वा मंगल और गुलाब बाड़ी ऐसे ही कई बजडे़ को मिला कर होती थी. अस्सी और भदैनी के बीच में ही शंभू का घर था. भदैनी अस्सी के बगल का मुहल्ला है जहां संस्कृत के प्रकांड विद्वान आज भी रहते हैं. जब तुलसीदास अस्सी घाट पर बैठ ‘रामचरितमानस’ लिख रहे थे तो ये संस्कृत पंडित लोकभाषा में रामचरित लिखने के कारण उनसे इतने नाराज थे कि तुलसीदास का लिखा अक्सर गंगा में फेंक दिया करते. जब तुलसीदास उधर से गुजरते तो उनपर ढेला, पत्थर भी फेंकते. तुलसी उस तरफ़ जाने से डरते इसलिए तुलसीदास ने उस इलाके को कहा ‘भयदायिनी’ जो बाद में बिगड़कर कर ‘भदैनी’ बन गया. शंभू उसी ‘भदैनी’ में रहते थे. कवि केदारनाथ सिंह कहते थे की भदैनी में ‘सरवाईव’ करना ही सरवाईव करने वाले व्यक्तित्व के असाधारण होने की मिसाल है. बनारस में अस्सी से लेकर राजा घाट तक गंगा के किनारे निषादों की घनी बस्ती है. यहां रहने वाले कोई पचास हजार से ज्यादा निषाद गंगा पर ही आश्रित हैं. उनकी रोजी-रोटी गंगा और घाट के किनारे होने वाली गतिविधियां होती हैं.

शंभू बनारसी निषादों का प्रतिनिधि चरित्र था. मस्ती में गाता हुआ बिंदास चलता था. उसे किसी की परवाह नहीं थी. काम भी अपनी मर्जी से करता. जब भदैनी से अस्सी घाट की ओर आता तो रास्ते में तुलसी घाट पर महंत वीरभद्र जी का आवास पड़ता. महंत जी सुबह बाहर चबूतरे पर ही बैठते. वीरभद्र जी बीएचयू में ‘हाईड्रोलिक इंजीनियरिंग’ विभाग में प्रोफेसर थे. वे संकट मोचन मंदिर के मंहत भी थे. महंतजी, तुलसीदास के बनाए अखाड़े में पहलवानी भी करते थे. वे विलक्षण गंगा प्रेमी और बिगड़ते पर्यावरण को बचाने के वैश्विक हीरो थे. महंत जी संगीत प्रेमी भी थे. गंगा के प्रदूषण को जांचने की उनकी एक प्रयोगशाला भी घाट पर ही थी. शंभू जब भी उधर से गाता हुआ अपनी मस्ती में निकलता तो वह वीरभद्र जी को देखते ही संस्कृत बोलने लगता. ”अहं जानामि लक्षणम्, बीरभद्रम्  प्रदूषणम्”. फिर कहता “बंदर की कमाई खाते हैं, वीरभद्रम् प्रदूषणम्”. महंत जी उसे बुलाते, कुछ पैसा देते और वह महंत जी के पैर छू आगे बढ़ जाता. यह लगभग रोज का कर्मकाण्ड था. महंतजी उसके कहे का बुरा नहीं मानते थे. महंतजी के प्रति आदर प्रकट करने और उनसे कुछ पाने की उसकी यह नायाब शैली थी. शंभू के इस अलबेले व्यक्तित्व से विदेशी पर्यटकों की उसमें बहुत रुचि थी.

दुनिया शीतयुद्ध से जूझ रही थी पर शंभू गुटनिरपेक्षता की नीति पर ही चलते थे. यानि वैश्विक संतुलन बनाते हुए उनके अंतरंग संगी साथी रूसी पर्यटक भी होते और यूरोपीय/अमेरिकी भी. गंगा की लहरों पर उनकी गायकी से ‘फिरंगन‘ मंत्रमुग्ध होती थीं। शंभू ने सरगम का ‘स’ भी नहीं सीखा. पर बड़े-बड़े उप-शास्त्रीय गायक उससे पनाह मांग लेते. शंभू भाषा से परे था. उसकी अभिव्यक्ति भाषाओं की मोहताज नहीं थी.वह शब्दों की परिधि से बाहर जा अजब क़िस्म का विस् पा गयी थी. वह कभी स्कूल नहीं गये पर अंग्रेजी, स्पेनिश, इटालवी, फ्रेंच, जापानी और थाई लोगों से आराम से संवाद कर लेते. शरीर के लोच, आंखों की भंगिमा और हाथ के इशारे से शंभू ने अभिव्यक्ति की जो भाषा गढ़ी थी, उसका आंकलन होते तो भाषा वैज्ञानिक जॉर्ज ग्रियर्सन भी नहीं कर पाते.

शंभू अपनी पूरी बात इसी भाषा से सम्प्रेषित कर लेते “नैंकु कही बैननि, अनेक कही नैननि सौं, रही-सही सोऊ कहि दीनी हिचकीनि सौं॥” यानि कुछ आंखों से, कुछ इशारों से और बाक़ी बची हिचकियों से. बनारस में देशी- विदेशी पर्यटकों को डील करने की मल्लाहों की अलग भाषा होती है. घाट पर पर्यटक देखते ही इन्तज़ार कर रहे नाविक लाल, पीला, हरा, नीला उनके कपड़े का रंग बोलते हैं. जो पहले बोलता है, उसी का हक़ उस पर्यटक पर होता है. फिर उसे घुमाने का जिम्मा उसका. इनकी भाषा भी कूट होती है. मालदार पर्यटक है तो साथी बोलते है ‘धौंक दअ ‘ पैसा वाला नहीं है तो नाविक  साथियों को बताता है‘. लिंगड या झन्डू’ है. शम्भू जितने देशी मूल के प्रति भावुक थे, उससे कहीं अधिक विदेशी मूल के प्रति.

राजनीति में विदेशी मूल का मुद्दा तो अब आया मगर बनारस के मल्लाह बिरादरी के बीच कभी ये मुद्दा नहीं रहा. लगभग हर घाट पर आपको दो-चार नाविक मिल जाएंगे जिनकी ससुराल फ्रांस, इटली, स्पेन और जापान में है. यहॉं बनारसी नाविक नाव खेत-खेते कब विदेशी महिलाओं की जिंदगी की नाव खेने लगते हैं, यह पता ही नहीं चलता. तभी मालूम चलता है जब उनकी शादी हो जाती है. फिर वह छ: महीना उस देश में रहता है, जहां की युवती से विवाह करता है और छ: महीना स्वदेश में. ‘वसुधैव कुटुम्बकम‘ में आस्था रखने वाले ऐसे दर्जनों केवट मेरे परिचित हैं.  कई तो विदेश में बस गए. यहां कभी-कभार आते हैं. राजा घाट के 6-7 निषाद ऐसे हैं जो जापानी से शादी कर वहीं बस गए. दरअसल ये विदेशी महिलाएं अपने देश के सामाजिक रिश्तों के खोखलेपन से इतनी ऊबी हुईं होती हैं कि उन्हें यहां रिश्तों का स्थायित्व रास आता है. इसलिए ये आकर्षण कायम है. यहां यह भी जानना जरूरी है कि कभी किसी विदेशी महिला के साथ निषादों की छेड़छाड़ या ठगने की खबर नहीं आई. पंडों की बदसलूकी की खबरें तो आपको अकसर मिलेंगी पर निषादों की नहीं.

शंभू मेरा दोस्त और अज़ीज़ भी, इसकी वजह थी कि बनारस के मेरे घर में भी एक कुआं था. मैं बचपन में ढेर सारा सामान इसी कुएं में फेंक देता था. शायद पानी में सामान गिरने से जो ‘झम्म’ की ध्वनि होती थी वह मेरे लिए बहुत आकर्षक होती थी. मां बताती थीं कि बचपन में, मैं उनकी नजरें छुपा जो कुछ मिलता कुएं में फेंक देता. मेरी इस आदत से परेशान होकर कुएं पर दरवाजा लगवा दिया गया. संयोग देखिए की बहुत बाद में जब मैं बड़ा हुआ तो कुएं की सफाई का जिम्मा मेरे पास ही आया और मुझे ही शंभू को बुलाना पड़ा. शंभू हमारे कुएं की सफाई करते रहे क्योंकि शहर में कुएं की सफाई में तब शंभू अकेला नाम था. शंभू के दो बेटियां थीं और एक बेटा मोहन जो आज भी शायद नाव चलाने के अपने पुश्तैनी पेशे में है. शम्भू उस महान परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिसने भगवान राम को पार लगाया था. शास्त्रों में निषाद, मल्लाह, मांझी और केवट एक ही जाति हैं. सब का काम नाव चलाना था.

निषाद एक प्राचीन अनार्य वंश है. निषाद (नि: यानी जल और षाद मायने शासन) का अर्थ है जल पर शासन करने वाला. प्राचीन काल में जल, जंगल खनिज के यही मालिक थे. आर्यों के आने से पहले इन्हीं का शासन था. निषादों के बहुत सारे दुर्ग और किले थे, जिन्हें आमा, आयसी, उर्वा, शतभुजी, शारदीय आदि नामों से जाना जाता था. इलाहाबाद से 40 किलोमीटर दूर गंगा किनारे ‘श्रृंगवेरपुर’ में निषादराज राजा गुह का किला आज भी मौजूद है. गंगा के इस पार ‘सिंगरौर’ है. भगवान राम को जब वनवास हुआ तो वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है. इसे पार कर उन्होंने गोमती नदी पार की और तब इलाहाबाद से कोई 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे जो निषादराज गुह का राज्य था. यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था.

कहते हैं अपने पिछले जन्म से ही वह प्रभु श्रीराम का भक्त था. वाल्मीकि रामायण और तुलसी के रामचरितमानस दोनों में केवट का बड़ा प्यारा प्रसंग है. पहले तो केवट राम को पांव पखारे बिना नाव पर चढ़ाने को राजी नहीं होता. फिर जब चढ़ा कर पार करा देता है तो फिर राम से मेहनताना लेने को राजी नहीं होता. उसकी दलील होती कि हे प्रभु मैंने आपको नाव से इस पार उतारा है, अब आप मुझे इस भवसागर से उस पार उतारें. यही मेरा दाम है क्योंकि कहीं नाई-नाई से और धोबी-धोबी से पैसा नहीं लेता. समानधर्मी लोगों के बीच क्या लेना देना? राम ने वनवास की पहली रात निषादराज के यहां ही बिताई थी. अपना शंभू भी उन्हीं निषादराज की कहानी से प्रभावित था. वह अपने को भगवान राम का समानधर्मा मानता था. उसकी दलील थी कि भगवान लोगों को भवसागर पार कराते हैं, और वह नदी पार कराता हैं. दोनों का काम एक ही है. दोनों सहकर्मी हैं. यानि शंभू वही काम कर रहे हैं जो भगवान करते हैं. अकसर वह स्वर में गाने लगता. जात पात न्यारी हमारी ना तिहारी नाथ,कहबे को केवट हरि निश्चय विचारिहौं ,तूँ तो उतारो भवसागर परमारथ कौ,मैं तो उतारूँ घाट सुरसरि किनारिहौं,नाई से न नाई लेत,धोबी न धुलाई लेत ,तो सौं उतराई ले कुटुम्ब से निकारिहौं, जैसे प्रभु दिनबंधु तुमको मैं उतारयों नाथ, तेरे घाट जहियेों नाथ मौकूँ कूँ भी उतारिहौं !बाद में यह पद पं. छन्नू लाल मिश्र भी गाने लगे.

पर बनारसियों ने इसे शम्भू के मुँह से ही सुना है यह पद गाते-गाते शंभू टेढ़ा हो जाता. कहता, “हमार भगवान से सीधा सम्बन्ध हौउ, तू का उखाड़ लेबा”. ताव में आता तो कहता “चार वेदों की रचना करने वाले वेद व्यास निषाद थे. कश्यप वंश के ही राजा बलि, विलोचन और प्रहलाद निषाद थे. ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी निषाद थे. दुनिया का सबसे बड़ा धनुर्धर एकलव्य निषाद था. मोहनजोदड़ो, हड़प्पा की खुदाई करने वाले दयाराम साहनी निषाद थे”. वह लक्ष्मीबाई को भी निषाद बताते. विदेशियों से कहते, कोलंबस और वास्कोडिगामा भी निषाद थे.

नाथ पंथ का प्रचार करने वाले गुरू मच्छेंद्र नाथ निषाद थे. यह कह वह जोर से जयकारा लगाता ‘अलख निरंजन’. शम्भू के इन दावों के पीछे शास्त्रों की दुनिया  है. ऋग्वेद और ऐतरेय ब्राह्मण में निषादों का जिक्र विस्तार से है. भारत में निषादों की 578 उपजातियां मिलती हैं. वाल्मीकि ने तो अपने पहले ही श्लोक में ‘निषाद’ का इस्तेमाल किया है. महाभारत के रचनाकार वेदव्यास की मां निषाद कन्या थीं. वर्ष 1891 के सामुदायिक जनगणना के आधार पर आर.बी.रसेल व हीरालाल ने वर्ष 1916 में ‘‘दि ट्राइब्स एण्ड कास्ट्स ऑफ सेन्ट्रल प्रोविन्सेज’’ किताब लिखी. किताब के भाग-1 के अंतिम हिस्से में छपी ग्लोसरी में जातियों का शब्दकोश है, उसके पेज-388 पर मांझी को केवट का पर्यायवाची व मझवार को केवट तथा बोटमैन में सम्मिलित कहा गया है. इतने मस्तमौला, काबिल व जिंदादिल शंभू का जीवन दुखान्त था. नियति की चालबाजी देखिए, पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह सर्वश्रेष्ठ गोताखोर एक रोज़ कुँए में डूब कर मर गया. बनारस में कमच्छा से रेवड़ी तालाब जाने वाली सड़क पर जो कुआं था, वही उनकी मौत का सबब बना. एक चोर उस कुएं में चोरी का सामान फेंक भाग खड़ा हुआ. पुलिस ने सामान की बरामदगी के लिए शंभू को कुएं में उतारा. कुएं में जहरीली गैस थी. शंभू के जीवन का यह आखिरी गोता था. इस बार शंभू कुएं से सामान लेकर नहीं निकले. तालाब और नदी में तैरने वाला शंभू कुएं में डूब गया.

गलती पुलिस की थी, बिना कुएं में गैस जांचें, शंभू को कुएं में उतार दिया था. जनता में गुस्सा था. कमच्छा की सड़क जाम हुई. प्रशासन ने शंभू के परिवार को दस हजार रुपए की मदद की. बनारस के इस इतिहास पुरूष के जान की कीमत बहुत सस्ती आंकी गयी. शम्भू के इस अंतिम गोते को जानने के बावजूद मेरी स्मृतियों में वह अब भी तैर रहा है. गाता हुआ मुस्कुरा रहा है, उसके जीने का अंदाज़ अनोखा था. आनंद फ़िल्म में राजेश खन्ना की तरह – ‘बाबू मोशाय…जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं’. मेरी नज़र में शम्भू मल्लाह इसी फलसफे के जीते जागते प्रतीक थे. उन्होंने ज़िंदगी को जीकर दिखाया और साबित किया कि ज़िंदगी को बड़ी करना खुद इंसान के ही हाथ में है.

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I have also been brought up with strange people. These are the pearls of life that are found by diving into the deep ocean of human relations. With the use of the word Gota, the box of my memory started fluttering. Shambhu in the city of Shiva. Shambhu Mallah means top-class diver. Master of rowing against the current. Gangaputra, who worries about Ganga by applying desi since morning. As true to his tune as Nishadraj who helped Lord Rama cross the river. Shambhu, filled with self-pride of Nishads, often declared that ‘Columbus’ and ‘Vasco da Gama’ were also sailors because they were also sailors. Shambhu was a music lover and was also very popular among foreign female tourists. Along with driving the boat, he also used to recite Kajri and Sohar. Shambhu was a very lively boatman. Although he used to drive the boat, he had interference in all the business that happened on the banks of the ghat.

His boat used to be tied at Assi Ghat. Shambhu was recorded as a top-class diver in the government records. The ghats of Banaras cannot be imagined without the Ganges. Similarly, you cannot imagine the Ganges without a boat tied to the banks of the ghats. Pandas and Mallahs have equal rights on the ghats of Kashi. However, Dom has full authority over the cremation ground. (Sometimes again separately on Dome) Shambhu Mallah had his world. He was a Bindaas and outspoken Banarasi. He calls himself the son of Ganga. In Banaras, the boatmen call themselves the sons of Ganga. The police used to search for Shambhu every day. Not because he had committed any crime. Otherwise, for this reason, there would have been a water accident somewhere in Eastern Uttar Pradesh, someone would have drowned in water or fallen into a well, then the police would have been looking for Shambhu for diving. Shambhu could dive into the water for hours. Big Yogacharyas had failed in front of him in this art. If he took a dip, he could stay underwater for an hour.

Does no one know which meditation he did? Shambhu used to be wet with desi since morning. In the same desi tarannum, he would keep the city on his thumb. To get their work done, the policemen also used to provide ‘desi’ to them at the time of work. Then Shambhu would immediately take a dip and find out the dead body or things very easily from under the water and bring them out. Shambhu’s complexion was shining black, almost purple, with a lean, thin, chubby body. In the sunlight, the eyes could not stand on his body. On top of that, he used to apply oil all over his body. Due to being in the sun and water throughout the day, its color was getting darker with age. Foreign women tourists used to be leery of this personality of Shambhu. Shambhu used to take them around on his boat. Used to recite his singing and often stayed with him on the barge at night. The big boat in Banaras is called ‘Bajda’ in which there is a place to sit at the bottom and a roof at the top. Almost like a ‘houseboat’. But it is smaller than a houseboat. On the roof itself, nobles and tourists take a boat ride with mattresses, chandeliers, and cushions.

Budhwa Mangal and Gulab Bari used to be done by mixing many such birds. Shambhu’s house was situated between Assi and Bhadaini. Bhadaini is a locality next to Assi, where great scholars of Sanskrit still live. When Tulsidas was writing ‘Ramcharitmanas’ while sitting at Assi Ghat, these Sanskrit pundits were so angry with him for writing Ramcharit in folk language that they would often throw Tulsidas’s writings in the Ganges. When Tulsidas used to pass by, they used to throw stones and clods at him. Tulsi was afraid to go that way, so Tulsidas called that area ‘Bhaydayini’, which later changed to ‘Bhadaini’. Shambhu used to live in the same ‘Bhadani’. Poet Kedarnath Singh used to say that ‘survival’ in Bhadaini itself is an example of the extraordinary personality of the person who survives. In Banaras, there is a dense settlement of Nishads on the banks of the Ganges from Assi to Raja Ghat. More than fifty thousand Nishads living here are dependent on Ganga only. Their livelihood is based on activities on the banks of the Ganges and Ghats.

Shambhu was the representative character of Banarasi Nishads. Bindaas used to walk while singing in fun. He didn’t care about anyone. He used to do the work as per his wish. When coming from Bhadaini towards Assi Ghat, Mahant Virbhadra ji’s residence would have been located at Tulsi Ghat on the way. Mahant ji used to sit on the platform outside in the morning. Virbhadra ji was a professor in the ‘Hydraulic Engineering’ department at BHU. He was also the Mahant of the Sankat Mochan Temple. Mahantji also used to do wrestling in the akhada built by Tulsidas. He was a unique Ganga lover and a global hero for saving the deteriorating environment. Mahant ji was also a music lover. One of his laboratories to check the pollution of the Ganga was also on the ghat itself. Whenever Shambhu used to sing and go out in his fun, he would start speaking Sanskrit as soon as he saw Virbhadra ji. “Aham Janami Lakshanam, Birbhadram Pranathanam”. Then he would say “we eat the monkey’s earnings, Veerabhadram pollution”. Mahant ji would call him, give him some money and he would touch Mahant ji’s feet and go ahead. It was almost a daily ritual. Mahantji did not mind what he said. This was his unique style of showing respect to Mahantji and getting something from him. Due to the carefree personality of Shambhu, foreign tourists were very interested in him.

The world was struggling with the Cold War, but Shambhu used to follow the policy of non-alignment. That is, making a global balance, their intimate companions would have been Russian tourists as well as European/Americans. The ‘firangan’ used to be mesmerized by his singing on the waves of the Ganges. Shambhu did not even learn the ‘S’ of Sargam. But big sub-classical singers would have sought shelter from him. Shambhu was beyond language. Her expression was not dependent on language. She went beyond the scope of words and had a strange kind of vision. He never went to school but could communicate comfortably with people in English, Spanish, Italian, French, Japanese, and Thai. Even linguist George Grierson would not have been able to assess the language that Shambhu created with the elasticity of the body, the expression of the eyes, and the gestures of the hand.

Shambhu used to convey his whole thing in this language “Nainku kahi bainni, anek kahi nainni saun, rahi sahi sou kahi dini hichkini saun”. This means some with eyes, some with gestures, and the rest with hiccups. Boatmen have a different language to deal with local and foreign tourists in Banaras. On seeing the tourists on the ghat, the waiting sailors tell the color of their clothes red, yellow, green, and blue. The one who speaks first has the right to that tourist. Then it is his responsibility to turn it around. Their language is also coded. If there is a wealthy tourist, then the companions say ‘Dhaunk da’, if he is not rich, then the sailor tells his companions. Lingad or Zandu. As much as Shambhu was passionate about his native origin, he was more passionate about his foreign origin.

The issue of foreign origin has come up in politics now, but it was never an issue among the seafarers of Banaras. You will find two-four sailors on almost every ghat whose in-laws are in France, Italy, Spain, and Japan. Here, it is not known when the Banarasi sailors start rowing the boat for the lives of foreign women. It is known only when they get married. Then he stays for six months in the country where he marries the girl and for six months in the home country. I know dozens of such boatmen who believe in ‘Vasudhaiva Kutumbakam’. Many settled abroad. Come here occasionally. There are 6-7 Nishads of Raja Ghat who married Japanese and settled there. These foreign women are so bored with the hollowness of the social relations of their country that they like the stability of the relations here. That’s why this attraction persists. It is also important to know here that there has never been any news of Nishads molesting or cheating any foreign woman. You will often find news of the misbehavior of pandas but not of Nishads.

Shambhu is my friend and dearest too, the reason for this was that there was a well in my house in Banaras as well. In my childhood, I used to throw many things in this well. Perhaps the sound of ‘Jhamm’ when things fall into the water was very attractive to me. Mother used to tell me that in childhood, I used to throw whatever I found into the well, hiding from her eyes. Troubled by this habit of mine, a door was installed on the well. Coincidentally, when I grew up much later, the responsibility of cleaning the well came to me and I had to call Shambhu. Shambhu kept cleaning our wells because then Shambhu was the only name in the city for cleaning wells. Shambhu had two daughters and a son Mohan who is probably still in his ancestral profession of driving a boat. Shambhu was the representative of that great tradition, which had crossed Lord Rama. In the scriptures, Nishad, Mallah, Manjhi, and Kevat are the same caste. Everyone’s job was to drive the boat.

Nishad is an ancient non-Aryan dynasty. Nishad (nih means water and shad means rule) means the one who rules over water. In ancient times, they were the owners of water, forests, and minerals. Before the arrival of Aryans, it was their rule. There were many forts and forts of Nishads, which were known by the names Aama, Ayasi, Urva, Shatabhuji, Sharadiya, etc. Nishadraj Raja Guh’s fort is still present in ‘Shringverpur’ on the banks of the Ganges, 40 km from Allahabad. ‘Singraur’ is on this side of the Ganga. When Lord Rama went into exile, he first reached the Tamsa river, which is 20 km away from Ayodhya. After crossing it, they crossed the river Gomti and then reached Shringverpur, some 20-22 kilometers from Allahabad, which was the kingdom of Nishadraj Guh. It was here on the banks of the Ganges that he asked Kevat to cross the Ganges.

It is said that he was a devotee of Lord Shriram since his last birth. In both Valmiki Ramayana and Tulsi’s Ramcharitmanas, there is a very lovely episode of Kevat. At first, the boatman would not agree to take Ram on the boat without washing his feet. Then when he gets him across, he does not agree to take the wages from Ram. His argument would have been O Lord, I have brought you to this site by boat, now you take me to the other side of this world. This is my price because nowhere does he take money from barbers and washermen. What to do with like-minded people? Ram spent the first night of exile at Nishadraj’s place. Apna Shambhu was also influenced by the story of the same Nishadraj. He considered himself to be of equal religion with Lord Ram. He argued that God makes people cross the Bhavsagar, and he makes people cross the river. The work of both is the same. Both are co-workers. This Means Shambhu is doing the same work that God does. Often he used to sing in voice. Caste and caste is not ours, Tihari Nath, Kevat Hari is sure to think about it, you at least get down the ocean of Paramarath, I will get down to the edge of the ghat, we don’t get barbers from barbers, we don’t get washed by washermen, so let’s get rid of the family, like God Dinbandhu Tumko Main Utarayon Nath, Tere Ghat Jahiyeon Nath, where should I take the place! Later, Pt. Channu Lal Mishra also started singing this verse.

But the people of Banaras have heard it from the mouth of Shambhu himself, while singing this verse, Shambhu would have become crooked. Says, “If we have a direct relationship with God, you will be uprooted”. If he would have come to Taw, he would have said, “Ved Vyas Nishad was the creator of the four Vedas. The kings of the Kashyap dynasty were Bali, Vilochan, and Prahlad Nishad. ‘Mountain Man’ Dashrath Manjhi was Nishad. Eklavya Nishad was the greatest archer in the world. Dayaram Sahni, who excavated Mohenjodaro, Harappa, was a Nishad”. He used to describe Lakshmi Bai as a Nishad. He told foreigners that Columbus and Vasco da Gama were also Nishads.

Guru Machhendra Nath Nishad was the preacher of Nath Panth. Saying this he used to shout ‘Alakh Niranjan’. There is a world of scriptures behind these claims of Shambhu. Nishads are mentioned in detail in Rigveda and Aitareya Brahmin. There are 578 sub-castes of Nishads in India. Valmiki used ‘Nishad’ in his very first verse. Nishad Kanya was the mother of Vedvyas, the creator of Mahabharata. Based on the community census of the year 1891, RB Russell and Hiralal wrote the book “The Tribes and Castes of Central Provinces” in the year 1916. There is a dictionary of castes in the glossary printed in the last part of Part-1 of the book, on its page-388 Manjhi is said to be synonymous with Kevat, and Majhwar is included in Kevat and Boatman. The life of Shambhu, so cool, capable, and lively, was tragic. See the trick of destiny, this best diver of Eastern Uttar Pradesh died by drowning in a well one day. The well on the road leading from Kamchha to Revdi Talab in Banaras became the cause of his death. A thief threw the stolen goods in that well and ran away. Police lowered Shambhu into the well to recover the goods. There was poisonous gas in the well. This was the last dive of Shambhu’s life. This time Shambhu did not come out with the goods from the well. Shambhu, who was swimming in the pond and river, drowned in the well.

It was the mistake of the police, without checking the gas in the well, Shambhu was thrown into the well. There was anger in the public. Kamcha’s road was jammed. The administration helped Shambhu’s family with ten thousand rupees. The price of the life of this historical man of Banaras was considered very cheap. Despite knowing this last dive of Shambhu, he is still floating in my memories. He is smiling while singing, and his style of living was unique. Like Rajesh Khanna in Anand’s film – ‘Babu Moshay…Life should be big, not long. In my view, Shambhu Mallah was a living symbol of this philosophy. He showed life by living it and proved that it is in the hands of man himself to make life bigger.

Prabhakar Kumar.

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