Dharm

सुन्दरकाण्ड-16-3.

विभीषण का भगवान् श्रीरामजी की शरण के लिए प्रस्थान और शरण प्राप्ति-03.

दोहा: –

उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।

जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत ।।

वाल व्यास सुमनजी महाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, कृपा के धाम श्रीरामचंद्रजी ने हँसकर कहा – दोनो ही स्थितियो में उसे ले आओ. तब अंगद और हनुमान् सहित सुग्रीव जी कपालु श्रीरामचंद्रजी की जय हो , कहते हुए चले.

चौपाई: –  

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।

दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, विभीषणजी को आदर सहित आगे करक वानर फिर वहाँ चले, जहाँ करूणा की खान श्रीरघुनाथजी ने नेत्रो को आनन्द का दान देने वाले अत्यंत सुखद दोनो भाइयो को विभीषणजी ने दूर से ही देखा.

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।

भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, फिर शोभा के धाम श्रीरामचंद्रजी को देखकर वे पलक रोककर ठिठककर एकटक देखते ही रह गए. भगवान् की विशाल भुजाएँ है लाल कमल के समान नेत्र है और शरणागत के भय का नाश करने वाला साँवला शरीर है.

सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।

नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, सिंह के समान कंधे है, विशाल चौड़ी छाती  अत्यंत शोभा दे रहा है. असंख्य कामदेवो के मन को मोहित करने वाला मुख है. भगवान् के स्वरूप को देखकर विभीषणजी के नेत्रो में जल भर आया और शरीर अत्यंत पुलकित हो गया. फिर मन में धीरज धरकर उन्होने कोमल वचन कहे.

नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।

सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे नाथ ! मै दशमुख रावण का भाई हूँ. हे देवताओ के रक्षक ! मेरा जन्म राक्षस कुल मे हुआ है. मेरा तामसी शरीर है, स्वभाव से ही मुझे पाप प्रिय है, जैसे उल्लू को अंधकार पर सहज स्नेह होता है.

वालव्यास सुमनजी महाराज

महात्मा भवन,श्रीरामजानकी मंदिर

राम कोट, अयोध्या. 8709142129.

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Sunderkand-16-3.

Vibheeshan Ka Bhagavan ShriRama ji ki Sharan ke liye Prasthan Aur Sharan Prapti- 03.

Doha: –

Ubhay Bhaanti Tehi Aanahu Hansi Kah Krpaaniket

Jay Kripaal Kahi Chale Angad Hanu Samet ।।

While explaining the meaning of the verse, Val Vyas Sumanji Maharaj says that Shri Ramchandraji, the abode of grace, laughed and said – bring him in both situations. Then Sugriva ji along with Angad and Hanuman walked saying Jai Kapalu Shri Ramchandraji ji.

Choupai: –

Saadar Tehi Aagen Kari BaanarChale Jahaan Raghupati Karunaakar।।

Doorihi Te Dekhe Dvau BhraataNayanaanand Daan Ke Daata ।।

Explaining the meaning of the verse, Maharajji says that after carrying Vibhishanji forward with respect, the monkeys then went to the place where Shri Raghunath ji, the mine of compassion, saw from a distance the two very pleasant brothers who gave joy to the eyes.

Bahuri Raam Chhabidhaam BilokeeRaheu Thatuki Ekatak Pal Rokee।।

Bhuj Pralamb Kanjaarun LochanSyaamal Gaat Pranat Bhay Mochan ।।

Explaining the meaning of the verse, Maharajji says that, after seeing Shree Ramchandraji, the abode of beauty, he stopped blinking and kept staring at it. God has huge arms, eyes like a red lotus and a dark body that destroys the fear of surrender.

Sindh Kandh Aayat ur SohaAanan Amit Madan Man Moha।।

Nayan Nir Pulakit Ati GaataMan Dhari Dhir Kahi Mridu Baata ।।

Explaining the meaning of the verse, Maharajji says that his shoulders are like those of a lion and his huge and broad chest is extremely graceful. He has a face that fascinates the minds of innumerable Kamadevas. Seeing the form of God, Vibhishanji’s eyes filled with water and his body became extremely excited. Then with patience in his mind, he said gentle words.

Naath Dashaanan Kar MainNisichar Bans Janam Surtraata।।

Sahaj Paapapriy Taamaas DehaJthaa Ulookahi Tam Par Neha।।

Explaining the meaning of the verse, Maharaj ji says, O Lord! I am the brother of Dashmukh Ravana. O protector of the gods! I was born in a demon clan. I have a Tamasic body, by nature I love sin, just as an owl has an instinctive love for darkness.

Valvyas Sumanji Maharaj,

Mahatma Bhavan,

Shri Ram-Janaki Temple,

Ram Kot, Ayodhya. 8709142129.

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