Dharm

सुन्दरकाण्ड-13-1.

श्रीरामजी का बानरो की सेना के साथ चलकर समुन्द्र तट पर पहुँचना-01…

छंद :-

चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।

मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।

वाल्व्याससुमन जी महाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराज जी कहते है कि, दिशाओ के हाथी चिंग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत चंचल हो गए और काँपने लगी साथ ही समुन्द्र खलबला उठे. गंधर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब के सब मन में ही हर्षित हुए.

कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।

जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराज जी कहते है कि, अब हमारे दुःख के दिन दूर हो गए. अनको करोड़ भयानक वानर योद्धा कटकटा रहे है और करोड़ो ही दौड़ रहे है । प्रबल प्रताप कोसलनाथ श्री रामचन्द्र जी की जय हो, ऐसा पुकारते हुए वे उनके गुणसमूहो को गा रहे है.

सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।

गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।

रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।

जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराज जी कहते है कि, उदार व परम श्रेष्ठ एवं महान् सर्पराज शेषजी भी सेना का बोझ नही सह सकते , वे बार-बार घबड़ा जाते है और पुनः पुनः कच्छप की कठोर पीठ को दाँतो से पकड़ते है या यूँ कहें कि बार-बार दाँतो को गड़ाकर कच्छप की पीठ पर लकीर सी खीचते हुए  वे कैसे शोभा दे रहे है. मानो श्रीरामचन्द्रजी की सुन्दर प्रस्थान यात्रा को परम सुहावनी जानकर उसकी अचल पवित्र कथा को सर्पराज शेषजी कच्छप की पीठ पर लिख रहे हो.

दोहा :-

एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।

जहँ तहँ लागे खान फल भालू बिपुल कपि बीर।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराज जी कहते है कि, इस प्रकार कृपिधान श्रीरामजी समुन्द्र तट पर जा पहुँचे. अनको रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे.

वालव्याससुमन जी महाराज,

 महात्मा भवन,

श्रीरामजानकी मंदिर,

राम कोट, अयोध्या.

Mob: – 8709142129.

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Shreeram ji Ka Baanaro Ki sena Ke Saath Samudr Tat Par Pahunchana -01…

Chhand: –

Chikkarahin Diggaj Dol Mahi Giri Lol Saagar Kharabhare

Man, Hrsh Sabh Gandharb Sur Muni Naag Kinnar Dukh Tare।।

Valvyassuman Ji Maharaj, while explaining the meaning of the verse, Maharaj ji says that the elephants of the directions started trumpeting, the earth started shaking, the mountains became restless and started trembling and at the same time, the sea started getting agitated. Gandharvas, gods, sages, snakes and eunuchs all felt happy in their hearts.

Katakatahin Markat Bikat Bhat Bahu Koti Kotinh Dhaavaheen

Jay Raam Prabal Prataap Kosalanaath Gun Gan Gaavaheen ।।

Explaining the meaning of the verse, Maharaj ji says that now our days of sorrow are gone. Millions of terrible monkey warriors are roaring, and millions are running. Prabal Pratap Kosalnath is singing the praises of Shri Ramchandra ji while chanting Jai Ho.

Sahi Sak Na Bhaar Udaar Ahipati Baar Baarahin Mohee

Gah Dasan Puni Puni Kamath Prsht Kathor So Kimi Sohee।।

Raghubeer Ruchir Prayaan Prasthiti Jaani Param Suhaavanee

Janu Kamath Kharpar Sarfaraj So Likhit Abichal Paavanee ।।

Explaining the meaning of the verse, Maharaj ji says that even the generous and the best and the great snake king Sheshji cannot bear the burden of the army, he gets scared again and again and again and again and grabs the hardback of the tortoise with his teeth or should we say again and again -How they are showing their beauty by baring their teeth and drawing a line on the turtle’s back. As if considering the beautiful departure journey of Shri Ramchandra ji as extremely pleasant, you are writing its eternal sacred story on the back of the snake king Shesh ji tortoise.

Doha…

Ehi Bidhi Jai Kripanidhi Utare Saagar Teer

Jahan Tahan Laage Khaan Phal Bhalu Bipul Kapi Veer।।

Explaining the meaning of the verse, Maharaj ji says that, in this way, Kripidhan Shri Ramji reached the seashore. Many brave bears and monkeys started eating fruits everywhere.

Walvyassuman ji Maharaj,

 Mahatma Bhawan,

Shriramjanaki Temple,

Ram Kot, Ayodhya.

Mob: – 8709142129

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