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बड़े काम की….

जिस चिकित्सा पद्धति से मनुष्य की बीमारियाँ ठीक हो जाएँ ,वही उसके लिए उपयोगी है, बशर्ते वह अत्यधिक खर्चीली न हो ,लेकिन मुझे लगता है कि आज के मेडिकल बाज़ार में ,जिसमें अस्पतालों से लेकर मेडिकल स्टोर्स तक शामिल हैं, एलोपैथिक इलाज और दवाइयों का खर्चा उठाना हर किसी के वश में नहीं है. ऐसे में कई बीमारियों में जड़ी-बूटियों पर आधारित इलाज के घरेलू उपाय ही काम आते हैं, जिन्हें हम आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति कहते हैं.

यह भारत की सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति है. महर्षि धन्वंतरि को इसका जनक माना जाता है. वैदिक युग में देश में चार वेद रचे गए -ऋग्वेद ,यजुर्वेद ,अथर्व वेद और सामवेद. आयुर्वेद वास्तव में अथर्व वेद का ही एक अंग है. हजारों साल पहले आचार्य सुश्रुत ,महर्षि च्यवन ,महर्षि चरक जैसे कई तपस्वी और महान आयुर्वेदाचार्य हमारे देश मे हुए. आज के युग में आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों का औद्योगिक उत्पादन विभिन्न नामों से किया जाता है. जैसे -मधुमेह के लिए मधुनाशिनी वटी. पाचन संबधी विकारों के लिए आंवला ,बहेड़ा और हर्रा (हरड़ या हरितकी)  मिश्रित चूर्ण ‘त्रिफला के नाम से बहुप्रचलित है.

ऐलोपैथिक औषधियों की तुलना में आयुर्वेदिक दवाइयाँ हालांकि काफी सस्ती होती है, फिर भी कई ऐसी आयुर्वेदिक औषधियाँ ऐसी भी हैं, जो बाज़ार में काफी महँगे दामों में मिलती हैं. आधुनिक विकास की तेज और अस्त-व्यस्त रफ़्तार में जंगल उजड़ते जा रहे हैं. इसलिए जड़ी-बूटियाँ भी कम होती जा रही हैं. जड़ी-बूटियाँ हमारे आस-पास के वनों और अपने स्वयं के घरों की खाली जगहों में  मिल सकती हैं, बशर्ते हम इसके लिए पेड़-पौधों को बचाएँ  ,नये पेड़ पौधे लगाएँ और जंगलों की सुरक्षा पर गंभीरता से ध्यान दें. हममें जड़ी-बूटियों को  पहचानने की क्षमता भी होनी चाहिए.

गाँवों में ऐसे वैद्य आज भी मिल जाएंगे, जिनमें दुर्लभ से दुर्लभ जड़ी-बूटियों की खोज करने और चिन्हित करने  की क्षमता होती है. इस सिलसिले में युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट ,गायत्री तपोभूमि ,मथुरा द्वारा प्रकाशित और डॉ. प्रणव पण्ड्या द्वारा सम्पादित ‘जड़ी-बूटी चिकित्सा -एक संदर्शिका’ एक महत्वपूर्ण पुस्तिका है. मात्र 64 पृष्ठों की यह छोटी -सी पुस्तिका  बड़े काम की है. भारत के प्रत्येक  परिवार में यह पुस्तिका होनी चाहिए. मेरे पास इसका सन 2011 का संस्करण है ,तब इसकी कीमत मात्र 12  रुपए थी. इसमें विभिन्न शारीरिक व्याधियों के इलाज के लिए 42 प्रकार की जड़ी-बूटियों और आयुर्वेदिक महत्व के पेड़-पौधों की जानकारी दी गयी है, जिनमें मौलश्री (बकुल),कायफल ,भृंगराज ,ब्राम्ही ,मालकंगनी ,शंखपुष्पी ,आंवला, हरड़, बिल्व (बेल), मुलहठी, शतपुष्पा, कालमेघ, गिलोय आदि शामिल है.

डॉ. पण्ड्या इसके प्राक्कथन में लिखते हैं -“प्रकृति ने मनुष्य के लिए हर वस्तु उत्पन्न की है. औषधि उपचार के लिए जड़ी-बूटियाँ भी प्रदान की है. इस आधार पर चिकित्सा को सर्वसुलभ ,प्रतिक्रिया हीन तथा सस्ता बनाया जा सकता है. जड़ी-बूटी चिकित्सा बदनाम इसलिए हुई कि उसकी पहचान भुला दी गयी, विज्ञान झुठला दिया गया. सही जड़ी-बूटी उपयुक्त क्षेत्र सेउपयुक्त मौसम में एकत्र की जाए ,उसे सही ढंग से रखा और प्रयुक्त किया जाए, तो आज भी उनका चमत्कारी प्रभाव देखा जा सकता है. “आधुनिक युग की अन्य चिकित्सा विधियों में, विशेष रूप से एलोपैथी में शोध कार्यो को बहुत महत्व दिया जाता है. आयुर्वेद में भी नये अनुसंधानों पर ख़ूब काम होना चाहिए।भारत सरकार के आयुष विभाग द्वारा देश के कुछ बड़े शहरों में राष्ट्रीय आयुर्वेदिक शोध संस्थान भी संचालित किए जा रहे हैं.

यह कार्य जनभागीदारी और समाज सेवी संस्थाओं के माध्यम से भी हो रहा है  इसी तारतम्य में डॉ. पण्ड्या  ने लिखा है युग ऋषि पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य के आशीर्वाद से ब्रम्हवर्चस्व शोध संस्थान ने इस दिशा में सफल शोध-प्रयोग किए हैं. गिनी -चुनी जड़ी-बूटियों से लगभग 80 प्रतिशत रोगों का उपचार सहज ही किया जा सकता है. ऐसी सरल ,सुगम ,सस्ती परंतु प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति जन-जन तक पहुँचाने के लिए यह पुस्तक प्रकाशित की गई है. जड़ी-बूटियों की पहचान ,गुण ,उपयोग विधि सभी स्पष्ट रूप सेसमझाने का प्रयास किया गया है. पुस्तक में  ऐसी जड़ी-बूटियों को प्राथमिक दी गयी है ,जो भारत के अधिकांश क्षेत्रों में पाई जाती हैं अथवा उगाई जा सकती हैं.

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Bade kaam kee…

The medical method which cures human diseases is useful for him, provided it is not very expensive, but I think that in today’s medical market, which includes hospitals to medical stores, allopathic treatment, and medicines It is not in everyone’s control to bear the expenses. In such a situation, only home remedies based on herbs are useful in many diseases, which we call Ayurvedic medicine.

This is the oldest system of medicine in India. Maharishi Dhanvantari is considered to be its father. In the Vedic era, four Vedas were composed in the country – Rigveda, Yajurveda, Atharvaveda, and Samaveda. Ayurveda is actually a part of Atharva Veda. Thousands of years ago, many ascetics and great Ayurvedacharyas like Acharya Sushrut, Maharishi Chyawan, and Maharishi Charak took place in our country. In today’s era, industrial production of Ayurvedic herbs is done with different names. Like – Madhunashini Vati for diabetes. Amla, Baheda, and Harra (Harad or Haritaki) mixed powder is widely known as ‘Trifla’ for digestive disorders.

Though Ayurvedic medicines are very cheap as compared to allopathic medicines, there are many such Ayurvedic medicines that are available in the market at very expensive prices. In the fast and chaotic pace of modern development, forests are getting destroyed. That’s why herbs are also decreasing. Herbs can be found in the forests around us and in the vacant places of our own homes, provided we save trees and plants for this, plant new trees, and pay serious attention to the protection of forests. We should also have the ability to identify herbs.

Even today such Vaidyas will be found in the villages, which have the ability to search for and mark the rarest of rare herbs. In this connection, ‘Herbal Medicine – A Guide’ published by Yug Nirman Yojana Vistar Trust, Gayatri Tapobhoomi, Mathura, and edited by Dr. Pranav Pandya is an important booklet. This small booklet of only 64 pages is of great use. Every family in India should have this booklet. I have its 2011 edition, then its price was only 12 rupees. In this, information has been given about 42 types of herbs and plants of Ayurvedic importance for the treatment of various physical ailments, including Maulashree (Bakul), Kayphal, Bhringraj, Brahmi, Malkangani, Shankhpushpi, Amla, Harad, Bilva (Bel ), Mulhathi, Shatapushpa, Kalmegh, Giloy, etc. are included.

Dr. Pandya writes in its foreword – “Nature has produced everything for man. Herbs have also been provided for drug treatment. On this basis, medicine can be made accessible, non-reactive, and cheap. Herbs Herbal medicine has been infamous because its identity has been forgotten, and science has been falsified. If the right herbs are collected from the right area in the right season, stored, and used properly, their miraculous effect can be seen even today. “In other medical methods of the modern era, research work is given a lot of importance, especially in allopathy. A lot of work should be done on new research in Ayurveda as well. National Ayurvedic Research Institutes are also being run by the AYUSH Department of the Government of India in some big cities of the country.

This work is also being done through public participation and social service organizations. In this context, Dr. Pandya has written that with the blessings of Yug Rishi Pandit Shriram Sharma Acharya, Brahmavarchaswa Shodh Sansthan has done successful research experiments in this direction. About 80 percent of diseases can be easily treated with selected herbs. This book has been published to make such a simple, easy, cheap but effective medical method accessible to the masses. An attempt has been made to clearly explain the identity, properties, and method of use of herbs. In the book such herbs have been given priority, which is found or can be grown in most of the regions of India.

Prabhakar Kumar.

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