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माँ परे हैं…

दुनिया ही हर चीज झूठी हो सकती है, हर चीज में खोट हो सकता है पर माँ की ममता में कोई खोट नहीं होता है। यूँ तो यह माना जाता है कि किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है, अपने भाव को व्यक्त किया जा सकता है और अमूमन ऎसा होता भी है। लेकिन दुनिया में अकेली एक ऎसी चीज है जिसे आज तक कोई भी शब्दों में बाँध नहीं सका है। और उस शय का नाम है ‘माँ’।अमेरिका में मदर्स डे की शुरुआत 20वीं शताब्दी के आरंभ के दौर में हुई। विश्व के विभिन्न भागों में यह अलग-अलग दिन मनाया जाता है। मदर्ड डे का इतिहास करीब 400 वर्ष पुराना है। प्राचीन ग्रीक और रोमन इतिहास में मदर्स डे मनाने का उल्लेख है।देश तभी सशक्त बन सकता है, जब उसका हर नागरिक सशक्त हो। इसमें भी महिलाओं की भूमिका हो सबसे आगे है। परिवार में एक मां के रूप में वह अपनी यह भूमिका अदा करती है। राष्ट्र निर्माण में उसके इस योगदान का लंबा इतिहास रहा है। विद्वानों का मानना है कि प्राचीन भारत में महिलाओं को जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ बराबरी का दर्जा हासिल था।मां के शब्द में वह आत्मीयता एवं मिठस छिपी हुई होती है, जो अन्य किसी शब्दों में नहीं होती। मां नाम है संवेदना, भावना और अहसास का। मां के आगे सभी रिश्ते बौने  पड़ जाते हैं। मातृत्व की छा में मां न केवल अपने बच्चों को सहेजती है बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसका सहारा बन जाती है।

मां!’ यह वो अलोकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनो मस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘मां’ वो अमोध मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। ‘मां’ की ममता और उसके आंचल की महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। इसलिए हमारे देश में मां को शक्ति का रूप माना गया है और वेदों में मां को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है।

हमारे वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र, स्मृतियां, महाकाव्य, उपनिषद आदि सब ‘माँ’ की अपार महिमा के गुणगान से भरे पड़े हैं। असंख्य ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, पंडितों, महात्माओं, विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों, साहित्यकारों और कलमकारों ने भी ‘माँ’ के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को कलमबद्ध करने का भरसक प्रयास किया है। इन सबके बावजूद ‘माँ’ शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनंत महिमा को आज तक कोई शब्दों में नहीं पिरो पाया है।किसी भी सभ्यता एवं संस्कृति में माँ का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है और शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जिसने माँ के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए अपनी कृतज्ञता और अदारंजलिन व्यक्त किया हो, भले ही वह कोई साहित्यकार या कवि हो अथवा न हो।माँ’ के बारे में किसी ने क्या खूब कहा है, ‘कोमलता में जिसका हृदय गुलाब सी कलियों से भी अधिक कोमल है तथा दयामय है। पवित्रता में जो यज्ञ के धुएं के समान है और कर्त्तव्य में जो वज्र की तरह कठोर है वही दिव्य जननी है।’जाहिर है माँ के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए एक दिन नहीं बल्कि एक सदी, कई सदियां भी कम है। सभ्यता के विकास क्रम में आदिमकाल से लेकर आधुनिककाल तक इंसानों के आकार-प्रकार में, रहन-सहन में, सोच-विचार, मस्तिष्क में लगातार बदलाव हुए। लेकिन मातृत्व के भाव में बदलाव नहीं आया। उस आदिमयुग में भी मां, मां ही थी। तब भी वह अपने बच्चों को जन्म देकर उनका पालन-पोषण करती थीं। उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा करना सिखाती थी। आज के इस आधुनिक युग में भी मां वैसी ही है। मां नहीं बदली।

प्रभाकर कुमार

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Mother is beyond…

Everything in the world can be false, there can be a fault in everything, but there is no fault in Mother’s love. In fact, it is believed that one can write on any subject, one can express one’s feelings and it usually happens. But there is only one such thing in the world which to date no one has been able to put into words. And the name of that bed is ‘mother’. Mother’s Day in America started at the beginning of the 20th century. It is celebrated on different days in different parts of the world. The history of Mother’s Day is about 400 years old. Celebrating Mother’s Day is mentioned in ancient Greek and Roman history. A country can become strong only when it’s every citizen is strong. In this too, the role of women should be at the forefront. She plays this role as a mother in the family. Its contribution to nation-building has a long history. Scholars believe that in ancient India, women had equal status with men in all spheres of life. In the word of mother, intimacy, and sweetness are hidden, which is not there in any other word. Mother is the name of sensation, emotion, and feeling. All relations become dwarfs in front of Mother. In the guise of motherhood, the mother not only protects her children but also becomes their support when needed.

Mother!’ This is that supernatural word, the mere mention of which makes every hair pulsate, a great tide of emotions automatically rises in the heart and the mind gets drowned in the bottomless ocean of memories. ‘Maa’ is that infallible mantra, just by uttering it every pain gets destroyed. The love of ‘Mother’ and the glory of her lap cannot be described in words, it can only be felt. That’s why in our country the mother is considered as the form of Shakti and in the Vedas, the mother is said to be the first to be worshipped.

Our Vedas, Puranas, Philosophy, Smritis, Epics, Upanishads, etc. are all full of praise for the immense glory of ‘Mother’. Innumerable sages, sages, ascetics, pundits, sages, scholars, philosophers, litterateurs, and pen writers have also tried their best to write down the feelings arising towards ‘Mother’. In spite of all this, no one has been able to put into words the overall definition of the word ‘mother’ and its infinite glory. In any civilization and culture, the place of the mother has always been supreme and there would hardly be any person who has expressed his feelings towards the mother. expressed his gratitude and Adaranjalin by expressing feelings, whether he is a litterateur or a poet or not. And merciful. The one who is like the smoke of Yajna in purity and the one who is as strong as a thunderbolt in duty is the divine mother.’ Obviously not a day but a century, many centuries are less to express gratitude to the mother. In the course of the development of civilization, from primitive times to modern times, there were continuous changes in the shape, type, lifestyle, thinking, and brain of human beings. But the feeling of motherhood did not change. Even in that primitive age, the mother was only the mother. Even then she used to give birth to her children and nurture them. Used to teach them to protect their existence. Even in today’s modern era, the mother is the same. Mother has not changed.

Prabhakar Kumar.

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