Dharm

मोक्षदा एकादशी…

सत्संग के दौरान एक भक्त ने महाराज जी से पूछा, महाराज जी मोक्षदा एकादशी कब और कैसे मनाया जाता है. वाल्व्यास सुमनजी महाराज कहते है कि, एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भी भगवान वासुदेव से यही सवाल किया था, तब कमलनयन श्यामसुन्दर ने कहा कि, हे युधिष्ठिर तुमने बड़ा उत्तम प्रशन किया है इसके सुनने से तुम्हे यश मिलेगा. मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष की एकादशी को ही मोक्षदा एकादशी के रूप से जानते हैं. महाराजजी कहते हैं कि, इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के प्रारम्भ होने के पूर्व अर्जुन को गीता का उपदेश किया था. महाराजजी कहते हैं कि, मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की सभी तरह के पापों को नाश करने वाली होती है. दक्षिण भारत में मोक्षदा एकादशी  को वैकुण्ठ एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन ही कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीताका उपदेश दिया था. अत:यह तिथि गीता जयंती के नाम से विख्यात हो गई. इस दिन से गीता-पाठ का अनुष्ठान प्रारंभ करना चाहिए तथा प्रतिदिन थोड़ी देर गीता अवश्य पढनी चाहिए.

पूजन सामाग्री: –

वेदी, कलश, सप्तधान, पंच पल्लव, रोली, गोपी चन्दन, गंगा जल, दूध, दही, गाय के घी का दीपक, सुपाड़ी, शहद, पंचामृत, मोगरे की अगरबत्ती, ऋतू फल, फुल, आंवला, अनार, लौंग, नारियल, नीबूं, नवैध, केला और तुलसी पत्र व मंजरी.

व्रत विधि:-

सबसे पहले आपको एकादशी के दिन सुबह उठ कर स्नान करना चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए. उसके बाद भगवान दामोदर की मूर्ति या चित्र की स्थापना की जाती है. उसके बाद धूप, दीप और तुलसी की मंजरी से भगवान दामोदर की पूजा भक्तिपूर्वक करनी चाहिए. भगवान विष्णु के स्वरूप का स्मरण करते हुए ध्यान लगायें, उसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करके, कथा पढ़ते हुए  विधिपूर्वक पूजन करें. ध्यान दें…. एकादशी की रात्री को जागरण अवश्य ही करना चाहिए, दुसरे दिन द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मणो को अन्न दान व दक्षिणा देकर इस व्रत को संपन्न करना चाहिए.

व्रत कथा:-

प्राचीन काल में वैखनास नाम के राजा गोकुल नगर पर राज किया करते थे. वो बहुत ही धार्मिक प्रवृति के राजा थे और प्रजा भी सुखचैन से अपने दिन बीता रही थी और रायज में किसी प्रकार का कोई संकट भी नहीं था. एक दिन क्या हुआ कि राजा वैखानस अपने शयनकक्ष में आराम फरमा रहे थे और स्वप्न में उन्होंने देखा की उनके पिता नरक में बहुत कष्टों को झेल रहे हैं. अपने पिता को इन कष्टों में देखकर राजा बेचैन हो गये और उनकी निंद्रा भंग हो गई और अपने स्वपन के बारे में रात भर राजा विचार करते रहे लेकिन कुछ समझ नहीं आया. राजा ने प्रात:काल ही ब्राह्मणों को बुलवा भेजा, ब्राह्मणों के आने पर राजा ने उन्हें अपने स्वपन के बारे में बताया और मुक्त होने का उपाय पूछा. ब्राह्मणदेव बोले आपकी इस शंका का समाधन पर्वत नामक मुनि ही कर सकते हैं, अत: आप अतिशीघ्र उनके पास जाकर इसका उद्धार पूछें. राजा वैसानख ने वैसा ही किया और अपनी शंका को लेकर पर्वत मुनि के आश्रम में पंहुच गये व मुनि को देखकर साष्टांग दंडवत किया और अपने स्वपन के बारे में कहा. पर्वत मुनि ने योग दृष्टि से राजा के पिता को देखा कि, वे सचमुच नरक में पीड़ाओं को झेल रहे थे. उन्हें इसका कारण का पता चल गया और पर्वत मुनि ने राजा से कहा कि, हे राजन आपके पिता को अपने पूर्वजन्म पापकर्मों की सजा काटनी पड़ रही है. उन्होंने सौतेली स्त्री के वश में होकर दूसरी स्त्री को सम्मान नहीं दिया, उन्होंनें रतिदान का निषेध किया था.

राजा ने उनसे पूछा हे मुनिवर मेरे पिता को इससे छुटकारा कैसे मिल सकता है. पर्वत मुनि ने उनसे कहा कि राजन यदि आप मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का विधिनुसार व्रत करें और उसके पुण्य को अपने पिता को दान कर दें तो उन्हें मोक्ष मिल सकता है. राजा ने विधिपूर्वक मार्गशीर्ष एकादशी का व्रत कर उसके पुण्य को अपने पिता को दान करते ही आकाश से मंगल गान होने लगा. राजा ने प्रत्यक्ष देखा कि उसके पिता बैकुंठ में जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हे पुत्र मैं कुछ समय स्वर्ग का सुख भोगकर मोक्ष को प्राप्त हो जाऊंगा. यह सब तुम्हारे उपवास से संभव हुआ, तुमने नारकीय जीवन से मुझे छुटाकर सच्चे अर्थों में पुत्र होने का धर्म निभाया है. तुम्हारा कल्याण हो पुत्र.

एकादशी का फल: –

एकादशी प्राणियों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक होती है. यह दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक माना गया है. इस दिन व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध मन से भगवान की भक्तिमयी सेवा करता है तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपापात्र बनता है.

ध्यान दें…. 

एकादशी की रात्री को जागरण अवश्य ही करना चाहिए, दुसरे दिन द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मणो को अन्न दान व दक्षिणा देकर इस व्रत को संपन्न करना चाहिए.

वालव्यास सुमनजी महाराज

महात्मा भवन,श्रीराम-जानकी मंदिर, 

राम कोट, अयोध्या. 8709142129.

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Mokshada Ekadashi…

During the Satsang, a devotee asked Maharajji, Maharajji when and how Mokshada Ekadashi is celebrated. Valvyassumanji Maharaj says that once Dharmaraja Yudhishthir had also asked the same question to Lord Vasudev, then Kamalnayan Shyamsundar said, O Yudhishthir, you have asked an excellent question, you will get fame after listening to it. Ekadashi of Margashirsha Shuklapaksha is known as Mokshada Ekadashi. Maharajji says that, on this day, Lord Shri Krishna preached Geeta to Arjun before the beginning of Mahabharata. Maharajji says that Shukla Paksha of Margashirsha month destroys all kinds of sins. In South India, Mokshada Ekadashi is also known as Vaikuntha Ekadashi. On the day of Margashirsha Shukla Ekadashi, Lord Shri Krishna preached the Srimad Bhagavad Gita to Arjun in Kurukshetra. Hence this date became famous by the name of Geeta Jayanti. The ritual of reciting Gita should be started from this day and read for some time every day.

Pooja material: –

Vedi, Kalash, Saptadhan, Panch Pallava, Roli, Gopi sandalwood, Ganga water, milk, curd, cow ghee lamp, betel nuts, honey, Panchamrit, Mogra incense sticks, seasonal fruits, flowers, Amla, pomegranate, cloves, coconut, Lemon, sweet lime, banana and basil leaves and Manjari.

Fasting method: –

First of all, you should wake up in the morning on the day of Ekadashi, take a bath and make a resolution to fast. After that, the idol or picture of Lord Damodar is installed. After that, Lord Damodar should be worshipped with devotion using incense, lamp and basil leaves. Meditate by remembering the form of Lord Vishnu, after that worship Vishnu Sahastranam and worship him methodically while reading the story. Note… Jagran must be done on the night of Ekadashi, this fast should be completed by donating food and Dakshina to Brahmins on the next day in the morning on Dwadashi.

Fast Story: –

In ancient times, a king named Vaikhanas used to rule Gokul city. He was a very religious king and his subjects were spending their days happily and there was no crisis of any kind in the kingdom. What happened one day was that King Vaikhanas was resting in his bedroom and his dream he saw that his father was suffering a lot in hell. Seeing his father in such suffering, the king became restless and his sleep was disturbed the king kept thinking about his dream throughout the night but could not understand anything. The king sent for the Brahmins early in the morning. When the Brahmins arrived, the king told them about his dream and asked for a way to get free. Brahmindev said that only a sage named Parvat can solve this doubt of yours, hence you should go to him as soon as possible and ask for its solution. King Vaisanakh did the same and with his doubts, he reached the ashram of the mountain sage and after seeing the sage he prostrated himself and told about his dream. Parvata Muni saw the king’s father with the yogic vision that he was indeed suffering pain in hell. They came to know the reason for this and Parvat Muni said to the king, O king, your father has to face the punishment for the sins of his previous birth. Being under the control of his step-wife, he did not give respect to another woman, he had prohibited Ratidaan.

The king asked him, O sage, how can my father get rid of this? Parvat Muni told him that Rajan, if he fasts on Margashirsha Shukla Ekadashi as per the rituals and donates his virtue to his father, then he can get salvation. As soon as the king observed a fast on Margashirsha Ekadashi and donated his virtue to his father, auspicious songs started coming from the sky. The king directly saw that his father was going to Vaikuntha. He said, O son, after enjoying the pleasures of heaven for some time, I will attain salvation. All this was possible due to your fasting; you have fulfilled the duty of being a son in the true sense by freeing me from hellish life. Good luck to you son.

Result of Ekadashi: –

Ekadashi helps achieve the ultimate goal of living beings, devotion to God. This day is considered very auspicious and fruitful for serving the Lord with full devotion. On this day, if a person becomes free from desires and does devotional service to God with a pure heart, then he becomes blessed by the Lord.

Pay attention….

Jagran must be done on the night of Ekadashi; this fast should be completed by donating food and Dakshina to Brahmins on the next day in the morning on Dwadashi.

Valvyas Sumanji Maharaj,

Mahatma Bhavan,

Shri Ram-Janaki Temple,

Ram Kot, Ayodhya. 8709142129.

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