News

आधुनिक मीरा…

भारतीय साहित्य के आकाश में महादेवी वर्मा का नाम धुर्व तारे के समान प्रकाशमान है. इनकी गिनती हिंदी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तम्भों (सुमित्रानंदन पन्त, जयशंकर प्रसाद व सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”) में से एक मानी जाती हैं साथ ही आधुनिक हिंदी की सशक्त कवियित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है. महादेवी वर्मा ने खड़ी हिन्दी के कोमलता और मधुरता से संसिक्त कर सहज मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का द्वार खोला साथ ही विरह को दीपशिखा का गौरव भी दिया. महादेवी वर्मा ने स्वतन्त्रता के पहले के भारत को भी देखा था और उसके बाद के भारत को भी. उन्होंने मन की पीड़ा को स्नेह और श्रींगार से सजाया कि दीपशिखा में वह जन-जन की पीड़ा के रूप में स्थापित हुई.

महादेवी वर्मा ने खड़ी बोली हिंदी की कविता में उस कोमल शब्दावली का विकास किया जो अभी तक केवल बृज भाषा में ही सम्भव मानी जाती थी. उन्होंने संस्कृत और बंगला के कोमल शब्दों को चुनकर जामा पहनाया व संगीत की जानकार होने के कारण उनके गीतों का नाद सौन्दर्य व व्यंजना शैली अत्यंत दुर्लभ है. उन्होंने अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरूआत की और अंतिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनी रहीं. महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ-साथ कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थी.

महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को फरुखाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ था और उनकी मृत्यु 11 सितम्बर 1987 को हुई थी.. उनके पिता का नाम श्री गोविन्द प्रसाद वर्मा जो एक वकील थे था माता का नाम श्रीमती हेमरानी देवी थीं. कहा जाता है कि, महादेवी वर्मा के माता-पिता शिक्षा के अनन्य प्रेमी थे. महादेवी वर्मा की प्रारम्भिक शिक्षा इंदौर में हुई और उन्होंने बी.ए. जबलपुर से किया. महादेवी वर्मा घर में सबसे बड़ी थी और उनसे छोटे दो भाई और एक बहन भी थी. 1919 में इलाहाबाद के ‘क्रॉस्थवेट कॉलेज’ से शिक्षा का प्रारंभ करते हुए महादेवी वर्मा ने 1932 में इलाहाबाद विश्विद्यालय से संस्कृत में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की. इस दौरान उनकी दो काव्य संकलन ‘नीहार’ और ‘रश्मि’ प्रकाशित होकर चर्चा में आ चुकी थीं.

सात वर्ष की उम्र में ही उनकी काव्य प्रतिभा मुखर हो चुकी थीं. विद्यार्थी जीवन में ही उनकी कविताऐं देश की प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाने लगीं थीं. महादेवी वर्मा का विवाह छोटी उम्र में ही हो गया था लेकिन उनको सांसारिकता से कोई लगाव नहीं था बल्कि वो तो बौद्ध धर्म से बहुत प्रभावित थीं और स्वयं भी एक बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहतीं थीं. बताते चलें कि, महादेवी वर्मा की शादी 1914 में ‘डॉ. स्वरूप नरेन वर्मा’ के साथ हुई, उस वक्त उनकी उम्र  9 साल की थी और वो अपने माता-पिता के साथ रहती थीं क्योंकि उनके पति लखनऊ में पढाई कर रहे थे. बताते चलें कि, 27 अप्रैल 1982 को महादेवी वर्मा को भारतीय साहित्य में उनके अहम योगदान के लिए ज्ञानपीठ अवॉर्ड मिला था.

Related Articles

Back to top button