कृष्ण जन्माष्टमी…. - Gyan Sagar Times
Dhram Sansar

कृष्ण जन्माष्टमी….

ममाखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥

भगवान विष्णु के आठवें अवतार का जन्म भाद्र (भादों) महीने के अष्टमी की अर्द्धरात्री के  रोहणी नक्षत्र में हुआ था. इस दिन को पूरे  विश्व में श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के रूप में मनाते हैं. इसी दिन भगवान कृष्ण पृथ्वी पर अवतरित हुए थे. श्री कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंग में सराबोर हो जाती है. इस दिन पूरा मथुरा कृष्णमय हो जाता है. श्री कृष्ण जन्माष्टमी की रात्री को मोहरात्रि नही कहा जाता है.

भागवतपुराण, ब्रह्मपुराण, विष्णु पुराण और भविष्य पुराण में श्री कृष्ण जन्माष्टमीके बारे में बताया गया है कि, भाद्र महीने में जो अष्टमी हो और रोहणी (नक्षत्र) युक्त हो, उसी अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र का जन्म हुआ था, और इस तिथि को ही उपवास करना चाहिए. “कृष्ण” वास्तविक में संस्कृत का एक शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘काला’, ‘अंधेरा’ या ‘गहरा नीला’. भगवान श्री कृष्ण के कई नाम है जैसे:- कैन्हया, श्याम, केशव, द्वारकाधीश, वासुदेव, गोविन्द, मुरारी, गोपाल…

वास्तव में श्रीकृष्ण एक निष्काम कर्मयोगी, दार्शनिक, युगपुरुष और दैवी सम्पदाओं से भरपूर पुराण पुरुष थे. उनका जन्म द्वापर युग के शुरुआत में हुआ था. महर्षि वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत और महाभारत में कृष्ण का चरित्र विस्तार रूप से लिखा था. महाभारत युद्ध के समय भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया था ‘वो’ आज पुरे विश्व में लोकप्रिय है.

भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा के कारावास में वसुदेव और देवकी की आठवीं सन्तान के रूप में हुआ, लेकिन उनका लालन-पालन गोकुल में हुआ था. गोकुल में यशोदा औए नन्द उनके पालक माता-पिता थे. बालक कृष्ण बड़े ही नटखट थे और खेल ही खेल में उन्होंने ऐसे-ऐसे काम किये, जो आम मनुष्य के लिए संभव ही नहीं था. नन्द बाबा के घर आचार्य गर्गाचार्यजी के द्वारा उनका नामकरण संस्कार हुआ था. नाम रखते समय आचार्य गर्गाचार्यजी ने बताया था कि तेरा यह पुत्र प्रत्येक युग में अवतार लेता है. इससे पहले यह तीन अवतार ले चूका है और चौथे अवतार में कृष्ण वर्ण होने के कारण ही इसका नाम कृष्ण है.

कृष्ण भारतीय संस्कृति में कई विधाओं का प्रतिनिधित्व करते है और उनका चित्रण आमतौर पर काले या नीले रंग की त्वचा के साथ किया जाता है. बताते चलें कि, भारत और दक्षिनपूर्व एशिया की पत्थर की मूर्तियों में प्राकृतिक रंगों में चित्रित किया गया है. कृष्ण को अक्सर मुकुट में मोर पंख और गले में पुष्पों की माला साथ ही बांसुरी बजाते हुए या त्रिभंग मुद्रा में चित्रित किया गया है. कभी-कभी गाय-बछड़े के साथ होते हैं जो गोविन्द का प्रतीक माना गया है. महाभारत में पांडव राजकुमार अर्जुन को गीता का उपदेश देते हैं तो दूसरी तरफ एक सारथी या यूँ कहें कि पथप्रदर्शक या दूरदृष्टा के रूप में चित्रन किया गया है.

बाल्यकाल की अवस्था में कृष्ण को एक बालक के रूप में चित्रं किया गया है जिसने बालक कृष्ण कभी हाथों व घुटनों पर रेंगते हुए, कभी नृत्य करते हुए, मक्खन खाते या चुराते हुए, लड्डू को अपने हाथ में लेकर चलते हुए और प्रलय के समय बरगद के पत्ते पर तैरते हुए चित्रण किया गया है. कृष्ण की प्रतिमा में क्षेत्रीय विविधताएं उनके विभिन्न रूपों में दिखाई पडती है जैसे गुजरात में द्वारकाधीश, ओडिशा में जगन्नाथ, महाराष्ट्र में बिठोवा, केरल में गुरुवारुप्प्न और राजस्थान में श्रीनाथजी. एक तरफ कृष्ण और राधा का दिव्य प्रेम तो दूसरी तरफ कुरुक्षेत्र के युद्ध में विश्वरूप, तो कहीं मित्रता के प्रतीक के रूप में चित्रण किया गया है. विष्णु धर्मोत्तर, बृहत् संहिता और अग्नि पुराण में कृष्ण के मूर्तियों या यूँ कहें कि वास्तुकला के दिशानिर्देश का वर्णन मिलता है.

 श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन जो मथुरा में राज करते थे. उनका पुत्र कंस बड़ा ही अताताई था. कंस की बहन देवकी थी. देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ था. अताताई कंस ने अपने पिता को कारागार में डालकर स्वयं मथुरा का राजा बन गया. कंस एक बार ज्योतिष से पूछा था कि मेरी मृत्यु कैसे होगी? तब ज्योतिष ने बताया था कि तेरी बहन की आठवीं संतान के हाथों मृत्यु होगी. उसके बाद कंस ने अपनी बहन और बहनोई को कारगर में डाल दिया. कंस ने अपनी बहन के संतानों को एक-एक कर मारता गया और आठवीं संतान की प्रतीक्षा करने लगा. जब देवकी की आठवीं संतान का जन्म हुआ तो कारागृह के सभी सैनिकोण को निद्रा आ गई और देवकी व वसुदेव की साड़ी बेड़ियाँ खुल गई. दूसरी तरफ वसुदेव के दोस्त गोकुल निवासी नन्द के घर भी संतान होने वाला था अत: वसुदेव अपने पुत्र को सूप में रखकर कागार से निकलकर यमुना पार गोकुल की ओर चल पड़े. उस समय यमुना में बाढ़ आया हुआ था, और वसुदेवजी कृष्ण को लेकर यमुना पार करने के लिए उतरे और बालक कृष्ण के पैरों का स्पर्श होते ही यमुना शांत हो गई. वसुदेवजी गोकुल पहुंचकर नन्द को अपना बेटा देकर बेटी को लेकर पुन: मथुरा कारागृह में वापस आ गये.

प्रात:काल जब द्वारपालों ने कंस को सुचना दी कि, देवकी ने कन्या को जन्म दिया है अबतो कंस को उस कन्या से भी होने लगा और वो कारागृह में पहुंचा. देकी के हाथों से कन्या को छिनकर एक पत्थर पर दे मारा, लेकिन भगवान विष्णु की माया से वो आकाश में उड़ गई और आकाशवाणी हुई कि, कंस तेरा मारने वाला गोकुल में पैदा हो गया है, अब तेरी मृत्यु सुनिश्चित है. इसके बाद कंस ने सबसे पहले पूतना को भेजा. पूतना जब कृष्ण को स्तनपान कराने लगी तब कृष्ण ने पूतना के स्तन से प्राण वायु को खींच लिया और वह मृत्यु को प्राप्त हुई. इसके बाद कंस एक-एक कर अपने साथी राक्षसों को भेजता गया और बालक कृष्ण उनका वध करते रहे.

कंस के भेजे गये सभी दैत्यों का संहार होने के बाद कंस बहुत ही परेशान हो गया और द्वारपाल को आदेश दिया की नन्द को मेरे सामने तत्काल उपस्थित करो. जब नन्द दरबार में आये तो कंस ने कहा कि अगर तुम जीवित रहना चाहते हो तो, परिजात के पुष्प ले आओ, अगर तुम नहीं ला सके तो तुम्हारा वध निश्चित है. कंस की बातों को सुनकर नन्द ने ऐसा ही होगा कहकर अपने गृह नगर वापस चले आये. घर आकर सारा वृतांत अपने बन्धु बांधवों को सुनाया, यही बात श्रीकृष्ण भी सुन रहे थे. एक दिन की बात है जब कृष्ण अपने दोस्तों के साथ यमुना के किनारे गेंद खेल रहे थे और अचानक गेंद को यमुना में फेंक दिया. कदम्ब के वृक्ष पर चढ़कर यमुना में कूद पड़े. यमुना नदी में कूदने के उपरान्त बालक कृष्ण पातालपुरी जा पहुंचें और कालियानाग को युद्ध के लिए ललकारने लगे. कृष्ण की ललकार सुनकर कालिया युद्ध करने लगा. युद्ध करते समय कृष्ण को मूर्छा आ गई और उस मूर्छा को दौर करने के लिए गरुड को याद किया. अब बालक कृष्ण गरुड पर चढ़कर कालियानाग से युद्ध करने लगे.

जब कालियानाग को पता चला कि, ये बालक कोई और नहीं भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण है तो उसने साष्टांग प्रणाम किया और परिजात से उत्पन्न पुष्पों को मुकुट में रखक्र भेंट किया. जब श्रीकृष्ण चलने को हुए तो कालिया के फनों पर नृत्य करते हुए यमुना के उपर आ गये. कुछ दिनों बाद कंस ने मल्ल युद्ध की घोषणा की जिसे देखने के लिए बालक कृष्ण को मथुरा बुलाया. मथुरा पहुंचने पर कृष्ण ने अपने भक्तों का कष्ट दूर करते हुए राजमहल पहुंचें. राजमहल पहुंचने पर कंस के साथी चाणूर और केशी का वध करने के बाद कंस का वध किया .

विधि :-

जन्माष्टमी व्रत करने के लिए सर्वप्रथम भादों सप्तमी को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए सात्विक भोजन और हल्का भोजन करें. उपवास के दिन प्रात:काल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत हो जाएं. उसके बाद सूर्य, सोम, यम, काल, भूत, दिक्पाल, भूमि, आकाश और ब्रह्मादि को नमस्कार करते हुए पूर्व उया उत्तर मुख बैठें. इसके बाद हाथ में जल लेकर फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें. दोपहर के समय काले तिल मिश्रित जल से स्नान कर देवकीजी के लिए “सुतिकगृह” को ध्यान करें. उसके बाद श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र को स्थापित करें. इसके बाद विधिविधान से भगवान की पूजन करें. रात्री में भजन-कीर्तन करते हुए रात्री जागरण करें. दुसरे दिन प्रसाद का वितरण करें.

कोई भी व्यक्ति जो जन्माष्टमी का व्रत करता है वह एश्वर्य और मुक्ति को प्राप्त करता है साथ ही आयु कीर्ति, यश, लाभ, पुत्र व पौत्र को प्राप्त कर सभी सुखों को भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है.

कृष्ण की जीवन कथा के कई संस्करण हैं उनमे सबसे अधिक वर्णन भागवत पुराण, विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में मिलता है. सभी की कहानियों में कोई अंतर नहीं है लेकिन उनकी विशेषताओं, विवरण और शैली में काफी भिन्नता है. हरिवंश पुराण में काव्यात्मक और अलौकिक कल्पना से ओतप्रोत है जबकि, भगवत पुराण ब्रह्मांडीय लीला केरूप में प्रस्तुत किया गया है वहीं विष्णु पुराण में रहस्यमय पूर्ण शब्दों में वर्णन किया गया है. हिन्दू ग्रंथों में दार्शनिक विचारों की विस्तृत श्रृंखला कृष्ण के माध्यम से प्रस्तुत की गई है. माधवाचार्य जो कि एक हिदू दार्शनिक थे जिन्होंने वैष्णवाद के हरिदास सम्प्रदाय की स्थापना की और कृष्ण के उपदेशों को द्वैतवाद के रूप में प्रस्तुत किया. वैष्णव विद्यालय के संत जीव गोस्वामी कृष्ण धर्मशास्त्र को भक्ति योग के रूप में वर्णित किया. व्ल्भाचारीजी जो वैष्णवाद के संस्थापक थे उन्होंने कृष्ण ज्ञान को अद्वैत रूप में प्रस्तुत किया. जबकि आदि शंकराचार्य जो हिन्दू धर्म में विचारों के एकीकरण और मुख्य धाराओं की स्थापना के लिए जाने जाते हैं उन्होंने पंचायतन पूजा पर कृष्ण का वर्णन किया.

बताते चलें कि, व्रजमंडल में भाद्रपद-कृष्ण-नवमी में नन्द महोत्सव अर्थात श्रीकृष्ण के जन्म लेने के उपलक्ष्य में बड़े उपलक्ष्य में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. भगवान के श्रीविग्रह पर हल्दी, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर ब्रजवासी आपस में उसका लेपन व छिडकाव करते हैं, मंगलध्वनी बजाई जाती है और मिठाई बाँटी जाती है.  

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