Dharm

कालाष्टमी…

भैरव: पूर्णरूपोहि शंकरस्य परात्मन:।

मूढास्तेवै न जानन्ति मोहिता:शिवमायया॥

हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार, इस सृष्टि को चलाने लिए तीन देव नियुक्त किये गए. ये तीन देव हैं ब्रह्मा, विष्णु और महादेव. कहा जाता ही कि, महादेव भोले-भंडारी है और उन्हें प्रसन्न करना बहुत ही आसन है. सच्चे मन से पुकारने पर वो वेल पत्र भी खींचे चले आते हैं. महादेव अपने भक्तों को भय-मुक्त करने के लिए हर दुःख: तकलीफ को अपने उपर ले लेते हैं. महादेव के कई गणों को आप जानते ही है, उन्ही गणों में एक गण है भैरव.

भैरव जिसका शाब्दिक अर्थ होता है भयानक. दुसरे शब्दों में कहें तो भैरव का अर्थ होता है भय से रक्षा करने वाला. भैरव को अगर हम संधि करें तो भय और रव मिलकर बनता है भैरव. भैरव का वाहन है कुत्ता. इन्ह्की संख्यां 64 होती है और ये 08 भागों में विभक्त है. पौराणिक ग्रंथ शिव पुराण के अनुसार, कार्तिक मास (महीने) के कृष्णपक्ष की अष्टमी को मध्यान्ह में भगवान शंकर के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी, अतः इस तिथि को काल-भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है. भैरव को दंड-पाणी भी कहा जाता है.

बताते चलें कि, हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी कहते हैं. लेकिन, कार्तिक महीने की अष्टमी के दिन मनाया जाने वाले पर्व को काल भैरव जयंती, भैरव अष्टमी, काल भैरव अष्टमी, महाकाल भैरव अष्टमी भी कहा जाता है. इस दिन का इंताजार अघोरी बड़ी ही बेसब्री से करते हैं. पौराणीक ग्रंथों के अनुसार, भैरव भगवान शिव का ही प्रचंड स्वरप है. देखने में ये गहरा काला रंग, विशाल प्रलंब, स्थूल शरीर, अंगारकाय त्रिनेत्र, काले डरावने चोगेनुमा वस्त्र, रूद्राक्ष की कण्ठमाला, हाथों में लोहे का भयानक दण्ड और काले कुत्ते की सवारी करते हैं.

वर्तमान समय में भैरव पूजा दो प्रकार से की जाती है. पहला है बटुक भैरव और दुसरे का नाम है काल भैरव.

 बटुक भैरव: – अपने भक्तों को अभी देने और सौम्य स्वरूप के लिए जाने जाते है.

काल भैरव: –  यह रूप पापियों को दंड देने वाला माना जाता है. वैसे तो काल भैरव उग्र कपालिक सम्प्रदाय के देवता के रूप में जाने जाते हैं, और तन्त्र शास्त्र से उनकी आराधना की जाती है.

भैरव के उत्पत्ति की कथा: –

शिव पुराण के अनुसार, अंधकासुर नामक दैत्य अपने कृत्यों से अनीति व अत्याचार की सीमाएं पार कर रहा था, यहाँ तक कि एक बार घमंड में चूर होकर वह भगवान शिव तक के ऊपर आक्रमण करने का दुस्साहस कर बैठा. तब उसके संहार के लिए शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई. वहीं कुछ अन्य पुरानों के अनुसार, भगवान शिव के अपमान-स्वरूप भैरव की उत्पत्ति हुई थी. सृष्टि के प्रारंभकाल में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने भगवान शंकर की वेशभूषा और उनके गणों की रूपसज्जा देख कर शिव को तिरस्कारयुक्त वचन कहे. इस अपमान पर भोले भंडारी ने ध्यान नहीं दिया किन्तु उनके शरीर से उसी समय क्रोध से कम्पायमान और विशाल दण्डधारी एक प्रचण्डकाय काया प्रकट हुई और वो ब्रह्मा का संहार करने के लिये आगे बढ़ गई. यह देखकर सृष्टिकर्ता भय से चीख पड़े. तब, भगवान शंकर के द्वारा मध्यस्थता करने पर ही वह काया शांत हो सकी. चुकिं, रूद्र के शरीर से उत्पन्न उस काय का नाम महाभैरव मिला.

कालान्तर में भगवान शिव ने अपनी पूरी काशी का नगरपाल नियुक्त कर दिया. पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान शंकर ने कृष्ण पक्ष की अष्टमी को ब्रह्मा के अहंकार को नष्ट किया था, इसलिए यह दिन भैरव अष्टमी व्रत के रूप में मनाया जाने लगा. दूसरी कथा यह है कि, सृष्टि के प्रारंभकाल में ब्रह्मा के पांच मुख हुआ करते थे और ब्रह्माजी पांचवे वेद की भी रचना करने जा रहे थे तब सभी देवो के कहने पर महाकाल भगवान शिव ने जब ब्रह्मा जी से वार्तालाप की और समझाने का प्रयास किया लेकिन, ब्रह्माजी नहीं माने और महाकाल से उग्र,प्रचंड रूप भैरव प्रकट हुए और उन्होंने नाख़ून के प्रहार से ब्रह्मा जी की का पांचवा मुख काट दिया.

कालभैरव की पूजा प्राय: पूरे देश में होती है लेकिन, अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से वो  जाने-पहचाने जाते हैं. महाराष्ट्र में खण्डोबा के नाम से उनकी पूजा की जाती है वहीं दक्षिण भारत में भैरव का नाम शास्ता है.

पुरे देश में भैरव के प्रसिद्ध मंदिर है जिनमें, काशी का काल भैरव मंदिर सर्वप्रमुख माना जाता है. दूसरा, नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है. तीसरा उज्जैन के काल भैरव मंदिर जिसकी प्रसिद्धि के कारण ऐतिहासिक और तांत्रिक है. चौथी, नैनीताल के समीप घोड़ाखाल का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है. इसके अलावा शक्तिपीठों और उपपीठों के पास स्थित है भैरव मंदिर.

बतातें चलें कि, भारत में राजपूत काल के अंतिम दौर में मुग़ल काल शुरू हुआ. कहा जाता है कि, औरंगजेब के शासन काल में औरंगजेब ने विख्यात विश्वनाथ मंदिर का ध्वंस किया तब, कालभैरव का मंदिर पूरी तरह अछूता बना रहा था. जनश्रुतियों के अनुसार कालभैरव का मंदिर तोड़ने के लिये जब औरंगज़ेब के सैनिक वहाँ पहुँचे तो अचानक पागल कुत्तों का एक पूरा समूह कहीं से निकल पड़ा था. उन कुत्तों ने जिन सैनिकों को काटा वे तुरंत पागल हो गये और फिर स्वयं अपने ही साथियों को उन्होंने काटना शुरू कर दिया. तब औरंगजेब को अपनी जान बचाने के लिए विवस होना पड़ा और उसने अपने अंगरक्षकों द्वारा अपने ही सैनिको को मरवा दिया.

भैरव साधना में ध्यान का विशिष्ट महत्व होता है. ध्यान का अर्थ होता है कि, उस देवी-देवता का संपूर्ण आकार एक क्षण में मानस-पटल पर प्रतिबिम्बित होना. शास्त्रों के अनुसार, बटुक भैरव जी के ध्यान हेतु इनके सात्विक, राजस व तामस रूपों का वर्णन मिलाता है. जहां सात्विक ध्यान अपमृत्यु का निवारक, आयु-आरोग्य व मोक्षफल की प्राप्ति कराता है, वहीं धर्म, अर्थ व काम की सिद्धि के लिए राजस ध्यान करना चाहिए. उसी प्रकार, कृत्या, भूत, ग्रहादि के द्वारा शत्रु का शमन करने वाले ध्यान को तामस ध्यान कहा गया है.

  • भैरव बाबा को तांत्रिको का देवता कहा जाता है. अत: इनकी पूजा रात्रि में ही की जाती है.
  • पूरी रात्रि भगवान शिव, माता पार्वती के साथ भैरव की पूजा की जाती है.
  • दुसरे दिन सबरे उठकर पवित्र नदी में स्नान, श्राद्ध और तर्पण किया जाता है.
  • उसके बाद भगवान शिव के भैरव रूप पर भभूत चढाई जाती है.
  • उसके बाद काले कुत्ते की पूजा और भोग दी जाती है.
  • इनकी पूजा-आराधना करने वाले को कोई भय नहीं होता है और जीवन में पूर्ण खुशहाली बनी रहती है.

 वालव्यास सुमनजी महाराज,

महात्मा भवन, श्रीरामजानकी मंदिर,

राम कोट, अयोध्या. 8709142129.

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Kalashtami…

 

Bhairav: Poornaroopohi Shankarasy Paramaatma:

Moodhaastevai Na Jaananti Mohitaah Shivamaayaah।।

According to Hindu religious texts, three gods were appointed to run this universe. These three gods are Brahma, Vishnu and Mahadev. It is said that Mahadev is innocent and it is very easy to please him. When you call with a true heart, they even bring the well letters. Mahadev takes upon himself every pain and suffering to free his devotees from fear. You already know the many Ganas of Mahadev, Bhairav is one of those Ganas.

Bhairav which literally means terrible. In other words, Bhairav means one who protects from fear. If we make a treaty with Bhairav, then fear and noise together become Bhairav. Dog is the vehicle of Bhairav. Their number is 64 and it is divided into 08 parts. According to the mythological text Shiv Purana, Bhairava was born from the part of Lord Shankar in the afternoon on the Ashtami of Krishna Paksha of Kartik month (month), hence this date is also known as Kaal-Bhairavashtami. Bhairav is also called Dand-paani.

Let us tell you that the Ashtami of Krishna Paksha of every month is called Kalashtami. But, the festival celebrated on the Ashtami day of Kartik month is also called Kaal Bhairav Jayanti, Bhairav Ashtami, Kaal Bhairav Ashtami, and Mahakal Bhairav Ashtami. Aghori wait for this day with great eagerness. According to mythological texts, Bhairav is the fierce form of Lord Shiva. In appearance, he has deep black colour, huge wings, thick body, three eyes, black scary robe-like clothes, Rudraksh necklace, a terrible iron rod in his hands and rides a black dog.

At present, Bhairav Puja is done in two ways. The first one is Batuk Bhairav and the second one is Kaal Bhairav.

Batuk Bhairav: – Known for his generous and gentle nature to his devotees.

Kaal Bhairav: – This form is considered to punish sinners. Actually, Kaal Bhairav is known as the god of Ugra Kapalik sect, and he is worshiped through Tantra Shastra.

Story of origin of Bhairav: –

According to Shiv Purana, a demon named Andhakasura was crossing the limits of immorality and tyranny with his actions, so much so that once due to pride, he had the audacity to attack even Lord Shiva. Then Bhairav was born from Shiva’s blood to kill him. According to some other Puranas, Bhairava was born as an insult to Lord Shiva. At the beginning of the creation, the creator Brahma, after seeing the attire of Lord Shankar and the decoration of his group, said contemptuous words to Shiva. Bhole Bhandari did not pay any attention to this insult, but at the same time, a huge body vibrating with anger and wielding a huge stick appeared from his body and it moved forward to kill Brahma. Seeing this the creator screamed in fear. Then, only with the intervention of Lord Shankar, that body could calm down. After all, that body born from Rudra’s body was named Mahabhairav.

Later, Lord Shiva appointed him as the mayor of entire Kashi. According to mythological texts, Lord Shankar had destroyed the ego of Brahma on the Ashtami of Krishna Paksha, hence this day started being celebrated as Bhairav Ashtami Vrat. The second story is that, in the beginning of the creation, Brahma used to have five faces and Brahmaji was going to compose the fifth Veda, then at the behest of all the gods, when Mahakaal Lord Shiva talked to Brahmaji and tried to explain, but Brahma ji did not agree and Bhairav appeared in the fierce form from Mahakaal and he cut off the fifth face of Brahma ji with the blow of his nail.

Kalabhairav is often worshiped all over the country, but he is known by different names in different states. In Maharashtra, he is worshiped by the name of Khandoba, whereas in South India, Bhairav’s name is Shasta.

There are famous temples of Bhairav in the entire country, among which the Kaal Bhairav temple of Kashi is considered to be the most prominent. Secondly, the Pandava period temple of Batuk Bhairav in Nehru Park on Vinay Marg, New Delhi is very famous. Thirdly, Kaal Bhairav Temple of Ujjain is historical and tantric due to its fame. Fourth, the Batukbhairav temple of Ghorakhal near Nainital is also very famous. Apart from this, Bhairav Temple is situated near Shaktipeeths and Uppeethas.

Let us tell you that the Mughal period started in the last phase of Rajput period in India. It is said that, during the reign of Aurangzeb, when Aurangzeb destroyed the famous Vishwanath temple, the temple of Kalbhairav remained completely untouched. According to folklore, when Aurangzeb’s soldiers reached there to demolish the temple of Kalabhairava, suddenly a group of mad dogs came out from nowhere. The soldiers who were bitten by those dogs immediately went mad and then started biting their own comrades. Then Aurangzeb was forced to save his life and he got his own soldiers killed by his bodyguards.

Meditation has special importance in Bhairav Sadhana. Meditation means that the entire form of that deity is reflected in the mind in a moment. According to the scriptures, for the meditation of Batuk Bhairav ji, the description of his Satvik, Rajas and Tamas forms is combined. While Satvik meditation prevents untimely death, provides longevity, health and salvation, Rajasic meditation should be done for the accomplishment of religion, wealth and work. Similarly, the meditation which extinguishes the enemy through Krita, Bhoota, Graha etc. has been called Tamas meditation.

  • Bhairav Baba is called the god of tantrikas. Therefore, they are worshipped only at night.
  • Bhairava is worshipped along with Lord Shiva and Mother Parvati throughout the night.
  • On the second day, after waking up early, a bath, Shraddha and Tarpan are performed in the holy river.
  • After that, Bhabhuta is offered to the Bhairava form of Lord Shiva.
  • After that the black dog is worshiped and offered.
  • The one who worships him has no fear and remains completely happy in life.

Valvyas Sumanji Maharaj,

Mahatma Bhavan,

Shri Ram-Janaki Temple,

Ram Kot, Ayodhya. 8709142129.

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