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व्यक्ति विशेष

भाग - 83.

दारा शिकोह

दारा शिकोह, जिन्हें दारा शुकोह भी कहा जाता है, मुगल सम्राट शाहजहाँ और मुमताज महल के सबसे बड़े पुत्र थे। वह 20 मार्च 1615 को आजमगढ़ में जन्मे थे. दारा शिकोह अपने पिता के सबसे प्रिय पुत्र थे और उन्हें ताजपोशी का उत्तराधिकारी भी माना जाता था.

दारा शिकोह की शिक्षा में इस्लामिक धर्मशास्त्र, दर्शन, इतिहास और अदब शामिल थे. वह सूफी संतों और भारतीय संतों के साथ समय बिताते थे और उनसे बहुत प्रभावित थे. उनके इस रुझान ने उन्हें हिंदू-मुस्लिम एकता का एक महत्वपूर्ण समर्थक बना दिया.

दारा शिकोह ने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया, जिसे ‘सिर्र-ए-अकबर’ या ‘महान रहस्य’ के नाम से जाना जाता है. उनका मानना था कि सभी धार्मिक परंपराओं में एक ही सच्चाई है.

हालाँकि, उनका जीवन संघर्षों से भरा था. उनके छोटे भाई औरंगजेब ने सत्ता के लिए उनके खिलाफ विद्रोह किया और 1659 में उन्हें हराकर गद्दी पर कब्जा कर लिया. दारा शिकोह को अंततः पकड़ लिया गया और धर्मत्याग के झूठे आरोपों पर मृत्युदंड दिया गया. उनकी मृत्यु मुगल साम्राज्य में एक धार्मिक सहिष्णुता के युग के अंत का प्रतीक है.

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इतिहासकार कर्नल टॉड

कर्नल जेम्स टॉड एक अंग्रेजी अधिकारी और इतिहासकार थे, जो भारतीय इतिहास और संस्कृति के प्रति उनकी गहन रुचि के लिए विख्यात हैं. वह 1782 में इंग्लैंड में जन्मे थे और 1799 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में भारत आए. टॉड को राजस्थान के राजपूत राज्यों के राजनीतिक एजेंट के रूप में नियुक्त किया गया था. वहाँ उनकी भूमिका में, उन्होंने राजपूताना के इतिहास, संस्कृति, और भूगोल पर गहराई से अध्ययन किया.

जेम्स टॉड ने “Annals and Antiquities of Rajasthan” नामक कृति लिखी, जिसमें उन्होंने राजपूताना के विभिन्न राजवंशों के इतिहास को विस्तार से दर्ज किया. इस पुस्तक में, उन्होंने राजपूतों के पराक्रम, उनकी सामाजिक रीति-नीति, और उनकी कला एवं वास्तुकला पर विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया. टॉड का काम राजपूताना की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को दस्तावेजीकृत करने में महत्वपूर्ण है, और उन्हें अक्सर “राजपूताना के इतिहासकार” के रूप में जाना जाता है.

हालांकि, टॉड के काम को लेकर कुछ आलोचनाएं भी हैं. कुछ आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि उनकी लेखनी में राजपूतों की रोमांटिक छवि को अधिक महिमामंडित किया गया है और कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को आदर्शवादी तरीके से पेश किया गया है. फिर भी, उनका काम राजस्थान के इतिहास और संस्कृति के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है.

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पार्श्वगायिका अलका याग्निक

अलका याग्निक भारतीय संगीत उद्योग की एक पार्श्वगायिका हैं, जिन्होंने 1980 और 1990 के दशकों में अपनी मधुर आवाज और गायकी की शैली से विशेष पहचान बनाई. वे 20 मार्च 1966 को कोलकाता में जन्मी थीं. अलका याग्निक का संगीत कैरियर बचपन में ही शुरू हो गया था, और उन्होंने बहुत ही कम उम्र से प्रसिद्ध संगीतकारों के लिए गाना शुरू कर दिया था.

अलका याग्निक ने हिंदी सिनेमा के लिए कई यादगार और हिट गाने गाए हैं और उन्हें अपने योगदान के लिए कई पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं. उनकी गायकी की शैली और उनकी आवाज की खूबसूरती ने उन्हें भारतीय संगीत जगत में विशेष स्थान दिलाया है.

अलका याग्निक के सबसे प्रसिद्ध गानों में ‘एक दो तीन’ (तेजाब), ‘तेरा नाम लिया’ (राम लखन), ‘छुपा लो यूँ दिल में’ (दाग: द फायर), और ‘कुछ कुछ होता है’ (कुछ कुछ होता है) शामिल हैं. उनके गाने न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी काफी प्रसिद्ध हैं.

उनकी अद्भुत गायन प्रतिभा और संगीत के प्रति उनका जुनून उन्हें भारतीय पार्श्वगायन जगत की एक महान हस्ती बनाती है.

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तैराक निशा मिलेट

निशा मिलेट भारतीय तैराकी जगत की एक प्रमुख हस्ती हैं. उन्होंने कम उम्र से ही तैराकी में अपनी खास पहचान बनाई और भारतीय तैराकी में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. निशा का जन्म 20 अगस्त 1982 को हुआ था, और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कई मेडल्स जीते हैं.

निशा मिलेट ने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रतिस्पर्धा की है और कई मेडल्स जीते हैं. उन्होंने सिडनी में 2000 ओलंपिक खेलों में भी भाग लिया था, जो उनके केरियर की एक बड़ी उपलब्धि थी. निशा विशेष रूप से फ्रीस्टाइल और बैकस्ट्रोक स्पर्धाओं में उल्लेखनीय हैं.

तैराकी के अलावा, निशा मिलेट ने तैराकी को बढ़ावा देने और युवाओं को इस खेल में प्रशिक्षित करने के लिए भी काम किया है. उन्होंने भारत में तैराकी के विकास के लिए विभिन्न पहलों में भाग लिया है और युवा तैराकों के लिए एक प्रेरणा के रूप में उभरी हैं.

निशा मिलेट का योगदान और उपलब्धियां भारतीय तैराकी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण जगह रखती हैं, और वह भारतीय खेलों की एक महत्वपूर्ण आदर्श छवि हैं.

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गोल्फ खिलाड़ी अर्जुन अटवाल

अर्जुन अटवाल भारतीय पेशेवर गोल्फ खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी सफलता हासिल की है. वह 20 मार्च 1973 को असम, भारत में जन्मे थे. अटवाल ने अपने कैरियर में कई बड़ी गोल्फ चैंपियनशिप जीती हैं और उन्हें भारतीय गोल्फ के सबसे सफल खिलाड़ियों में से एक माना जाता है.

अर्जुन अटवाल पहले भारतीय हैं जिन्होंने यूरोपीय टूर और एशियन टूर पर जीत हासिल की है. वे पीजीए टूर पर जीतने वाले पहले भारतीय और पहले भारतीय मूल के खिलाड़ी भी हैं. उनकी जीत ने भारत में गोल्फ के खेल को एक नई पहचान दी और इस खेल के प्रति युवाओं में रुचि बढ़ाई।

अटवाल की प्रमुख उपलब्धियों में से एक उनकी व्याट क्लासिक में जीत शामिल है, जो उन्होंने पीजीए टूर पर हासिल की थी. उनकी इस जीत ने न केवल उन्हें विश्व गोल्फ के मानचित्र पर स्थापित किया, बल्कि भारतीय गोल्फ के लिए भी एक नई पहचान स्थापित की.

अर्जुन अटवाल का योगदान और प्रभाव भारतीय गोल्फ में महत्वपूर्ण है, और वे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत हैं.

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अभिनेत्री गायत्री जोशी

गायत्री जोशी एक भारतीय अभिनेत्री हैं, जो बॉलीवुड फिल्म उद्योग में अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति के लिए जानी जाती हैं. वह विशेष रूप से आशुतोष गोवारिकर की बहुचर्चित फिल्म “स्वदेश” में अपनी भूमिका के लिए प्रसिद्ध हुईं। “स्वदेश” में, गायत्री ने गीता नामक एक शिक्षिका की भूमिका निभाई, जो भारतीय गाँव में बच्चों को पढ़ाती है. उनके इस किरदार को दर्शकों और आलोचकों दोनों से ही काफी सराहना मिली.

गायत्री जोशी का जन्म 20 मार्च 1977 को हुआ था. वह मॉडलिंग कैरियर से अभिनय की दुनिया में आईं. उन्होंने मॉडलिंग के क्षेत्र में भी काफी सफलता प्राप्त की और कई विज्ञापनों में काम किया. हालाँकि, “स्वदेश” के बाद, गायत्री ने फिल्म उद्योग में अपना कैरियर जारी नहीं रखा और सार्वजनिक जीवन से दूर हो गईं.

उनके अभिनय कैरियर की यात्रा भले ही छोटी रही हो, लेकिन “स्वदेश” में उनकी भूमिका आज भी याद की जाती है और इसे हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार किरदारों में से एक माना जाता है. गायत्री जोशी ने अपने कम समय के अभिनय कैरियर में ही एक अमिट छाप छोड़ी है.

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क्रांतिकारी  एस. सत्यमूर्ति

एस. सत्यमूर्ति भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारी और राजनीतिक नेता थे. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक सक्रिय सदस्य थे और तमिलनाडु में उनकी गहरी राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव था. सत्यमूर्ति का जन्म 19 अगस्त 1887 को हुआ था और उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

सत्यमूर्ति एक प्रभावशाली वक्ता और कुशल राजनीतिज्ञ थे. उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के लिए विभिन्न आंदोलनों और अभियानों में भाग लिया और खासकर तमिलनाडु में उनके प्रयासों ने कई लोगों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने में मदद की. उन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ विरोध और सत्याग्रह का आयोजन किया, जिससे उनकी गिरफ्तारी और कारावास भी हुई.

सत्यमूर्ति ने अपनी राजनीतिक यात्रा में शिक्षा, समाज सुधार और स्वराज्य के प्रचार-प्रसार में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. वे मद्रास प्रेसीडेंसी के लिए कांग्रेस के सचिव और बाद में अध्यक्ष के रूप में कार्य किए.

उनकी मृत्यु 20 मार्च 1943 को हुई, लेकिन उनकी विरासत और उनके द्वारा किए गए कार्य भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक के रूप में याद किए जाते हैं. उनके नेतृत्व और आदर्शों ने भारतीय राजनीति और समाज पर गहरी छाप छोड़ी.

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राजनीतिज्ञ प्रेमनाथ डोगरा

प्रेमनाथ डोगरा एक प्रमुख भारतीय राजनीतिज्ञ और जम्मू-कश्मीर के प्रमुख नेता थे. वे जम्मू-कश्मीर प्रजा परिषद के संस्थापक थे, जो एक राजनीतिक संगठन था जिसने जम्मू क्षेत्र के लिए समान अधिकारों और जम्मू के लोगों के प्रतिनिधित्व की मांग की थी. डोगरा का राजनीतिक कैरियर उस समय के दौरान खासतौर से महत्वपूर्ण था जब जम्मू और कश्मीर में राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन तेजी से हो रहे थे.

उन्होंने जम्मू क्षेत्र के लोगों की आवाज को मजबूती से उठाया और क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने के लिए काम किया। प्रेमनाथ डोगरा का योगदान जम्मू और कश्मीर के इतिहास और उसके राजनीतिक विकास में महत्वपूर्ण रहा है. वे एक राजनीतिक विचारक के रूप में भी जाने जाते थे जिन्होंने क्षेत्र के विकास और लोगों के कल्याण के लिए कई पहल की.

उनका कार्य और विचारधारा आज भी जम्मू क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण मानी जाती है, और उनके योगदान को कई सम्मान और स्मारकों के माध्यम से याद किया जाता है.

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अभिनेता सोभन बाबू

सोभन बाबू एक भारतीय फिल्म अभिनेता थे, जिन्होंने मुख्य रूप से तेलुगु सिनेमा में काम किया. उनका जन्म 14 जनवरी 1937 को हुआ था और उनका निधन 20 मार्च 2008 को हुआ. सोभन बाबू ने 1950 – 90 के दशक तक तेलुगु फिल्म उद्योग में सक्रिय रहे और उन्होंने अपनी अभिनय प्रतिभा और सौम्यता से विशेष पहचान बनाई.

वे अपनी सजीव अभिनय शैली और विशेष रूप से रोमांटिक और पारिवारिक भूमिकाओं में उनके अद्वितीय प्रदर्शन के लिए जाने जाते थे. सोभन बाबू ने अपने कैरियर में कई हिट फिल्मों में काम किया जैसे कि ‘मनुषुलु मामतलु’, ‘खैदी बाबाई’, ‘गोरिंटाकु’, ‘जीवन ज्योति’, और ‘सोग्गाडु’.  उनकी फिल्में न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं, बल्कि समीक्षकों से भी प्रशंसा प्राप्त की.

उन्होंने अपने कैरियर में कई पुरस्कार जीते, जिनमें चार आंध्र प्रदेश राज्य नंदी पुरस्कार और पांच फिल्मफेयर पुरस्कार दक्षिण शामिल हैं. सोभन बाबू अपनी अद्वितीय अभिनय शैली और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण आज भी तेलुगु सिनेमा के प्रशंसकों के दिलों में जीवित हैं.

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उपन्यासकार खुशवंत सिंह

खुशवंत सिंह भारतीय साहित्य जगत के प्रमुख उपन्यासकार, व्यंग्यकार और पत्रकार थे. वे 2 फरवरी 1915 को पंजाब के हदाली में जन्मे थे (जो अब पाकिस्तान में है) और 20 मार्च 2014 को उनका निधन हो गया. खुशवंत सिंह अपनी विवादास्पद और निर्भीक लेखन शैली के लिए प्रसिद्ध थे. उन्होंने अपनी लेखनी में विविध विषयों का समावेश किया, जिसमें इतिहास, राजनीति, समाज, धर्म और सेक्स शामिल हैं.

खुशवंत सिंह के सबसे प्रसिद्ध उपन्यासों में “ट्रेन टू पाकिस्तान” शामिल है, जिसने 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान हुए मानवीय संकट का गहरा और मार्मिक चित्रण किया. यह उपन्यास उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में से एक माना जाता है और इसने उन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई.

उनकी अन्य लोकप्रिय कृतियों में “दिल्ली: ए नॉवेल”, “द कंपनी ऑफ वुमेन”, “द हिस्ट्री ऑफ सिख्स”, और “द एंड ऑफ इंडिया” शामिल हैं. खुशवंत सिंह की लेखनी में व्यंग्य और ईमानदारी का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है.

वे “द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया” के संपादक के रूप में भी काफी प्रसिद्ध रहे, जहाँ उन्होंने अपनी निर्भीक और विवादित संपादकीय नीतियों के लिए चर्चा बटोरी. उनका स्तंभ “With Malice towards One and All” भी काफी लोकप्रिय रहा. खुशवंत सिंह को उनके साहित्यिक और पत्रकारिता योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था, हालांकि उन्होंने बाद में इसे लौटा दिया. उनके कार्य और व्यक्तित्व आज भी भारतीय साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रेरणास्रोत हैं.

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अभिनेता बोब क्रिस्टो

बोब क्रिस्टो, जिन्हें आम तौर पर एक अभिनेता के रूप में जाना जाता है, भारतीय सिनेमा में अपने विशेष रोलों के लिए प्रसिद्ध थे. उन्होंने अक्सर फिल्मों में खलनायक के किरदार निभाए. वास्तव में, उनका जन्म ऑस्ट्रेलिया में हुआ था और उन्होंने भारतीय फिल्म उद्योग में अपना कैरियर बनाया. उनका वास्तविक नाम रॉबर्ट जॉन क्रिस्टो था.

बोब क्रिस्टो ने 1980 – 90 के दशक में अपनी अभिनय प्रतिभा के जरिए ख्याति प्राप्त की. उन्होंने बॉलीवुड में कई मशहूर फिल्मों में काम किया, जैसे कि ‘अग्निपथ’, ‘मिस्टर इंडिया’, और ‘नसीब’ आदि में उन्होंने मुख्यतः विलेन के रूप में या उसके हेंचमैन के रूप में काम किया. उनकी शारीरिक बनावट और अभिनय कौशल ने उन्हें इस तरह के रोल के लिए एक आदर्श विकल्प बना दिया.

बोब क्रिस्टो ने भारतीय सिनेमा में एक विदेशी अभिनेता के रूप में सफलतापूर्वक पहचान बनाई और अपने योगदान के लिए याद किए जाते हैं. उनका निधन 20 मार्च 2011 को हुआ.

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