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मंगलवार 03 मई 2022 हिंदी पंचांग के अनुसार, वर्ष का दुसरा महिना बैशाख है. तिथिनुसार, शुक्ल पक्ष की तृतीय है. हिदी पंचांग के अनुसार आज का दिन बड़ा ही पवन और पवित्र है. सनातन संस्कृति और उसके इतिहास में आज के दिन का महत्व का वर्णन स्कंद और भविष्य पुराण में विस्तार पूर्वक मिलता है.

सनातन धर्म, संस्कृति और इतिहास की बात आती है तब ऐतिहसिक नदियों की याद आती है. इन ऐतिहसिक नदियों में सरस्वती और सिन्धु नदी का नाम आता है. सिन्धु और सरस्वती के वगैर सनातन धर्म का कोई मतलब नहीं रह जाता है. इन नदियों के किनारे ही वैदिक धर्म और संस्कृति का जन्म हुआ. इन नदियों को प्रचीन नदी की संज्ञा दी गई है. पौराणिक ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण में सिन्धु नदी को महानदी की संज्ञा दी गई है. इसी नदी के तट पर वैदिक धर्म या यूँ कहें कि सनातन धर्म और सभ्यता की नींव रखी गई थी.

पौराणिक ग्रन्थ ऋग्वेद में भी कई नद और नदियों का वर्णन मिलता है. ऋग्वेद के अनुसार सिन्धु की कई सहायक नदियाँ थी उनके नाम कुभा, सुवास्तु, कुमू ,गोमती के साथ-सात इनकी सहायक नदियाँ वितस्ता, चन्द्रभागा, इरावती और शुतुद्री है. बताते चलें कि,  शुतुद्री एशिया की सबसे बड़ी उपनदी है और इनकी सहायक नदियाँ झेलम, चिनाब, राबी ,व्यास और सतलुज है.

मुझे (लेखक) समझ में यह नहीं आता है कि जब वैदिक या सनातन धर्म का जन्म पौराणिक नदी सिधु के तट पर हुआ तो इसे सिन्धुवासी ना कहकर हिन्दुवासी कहा जाता है. वहीँ, वर्तमान समय में कुछ देशों के लोग हिन्दवासी का प्रयोग करते हैं. पौराणिक ग्रन्थों में उल्लेखीत जिन नदियों का जिक्र आया है उनमे से तो कुछ विलुप्त हो गई या यूँ कहें कि विलुप्त के कगार पर खड़ी हैं. वहीँ, सनातनी नदी सिन्धु जो 3,600  किलोमीटर लम्बी और कई किलोमीटर चौड़ी नदी अरब सागर में जाकर मिल जाती थी.

बताते चलें कि, पौराणिक नदी सिन्धु नदी मानसरोबर(तिब्बत) से निकलकर हिमालय की दुर्गम कन्दराओं से गुजरती हुई कश्मीर और गिलगिट से होती हुई पकिस्तान में प्रवेश करती है और पकिस्तान के मैदानी इलाकों से गुजरती हुई अरब सागर में मिल जाती है. कभी यह सनातनी नदी मानसरोबर(तिब्बत) से निकलकर हिमालय की दुर्गम कन्दराओं से गुजरती हुई कश्मीर और गिलगिट से होती हुई कच्छ (गुजरात) से गुजरती हुई अरब सागर में मिलती थी.

देश चलाने वाले लोग अपनी निजी स्वार्थ के कारण इंसानी बस्तियों की जड़ों को बेदखल करते रहेंगें तो, नदी नाले, भवन, पर्वत और जंगल तो वहीँ रह जाते हैं लेकिन, सभ्यता और इतिहास का दफ़न हो जाता है. वहीँ कुछ लोग अपनी इतिहास और संस्कृति को बचाने के लिए काल की गति के अनुसार खुद को ढाल लेते हैं लेकिन, वर्तमान समय में  कालचक्र अपनी गति से चलते हुए आज उस स्थान पर खड़ी हो गई है कि धरती और मानव समुदाय के अस्तित्व पर ही गहरा संकट छा गया है.

काल की गति ने समयानुसार कई धरती के अस्तित्व को बचाने के लिए कई महापुरुषों ने कई तरीकों  से धरती के अस्तित्व और मानव कल्याण के लिए कई पंथ बने और मानव सभ्यता टूटते बिखरते 21वीं सदी में प्रवेश कर गया. अँगुलियों के ईशारे पर ही संसार का अधिकतर काम हो जाता है. इस युग में मानव का अगर कोई दुश्मन है तो वो मानव ही है. मशीनों के साथ काम करते हुए आज का मानव मशीन ही बन गया है. इस युग में स्वार्थ और लालच की प्रथमिकता सबसे उपर है.

वर्तमान समय में मानव समुदाय कई भागों में विभक्त हो कर टूट के कगार पर पहुंच गया है. कभी भारतीय परिवेश में रहने वाले लोग अपने परिवार को संसार की संज्ञा देते थे वहीँ , आज का संसार एक अंगुली पर आकर सिमट गया है. कभी संसार  रूपी घर में सुख और दुःख की बाते होती थी और आज सुख और दुःख भी अंगुली पर ही सिमट गया है.

कभी भारतीय घरों में  जड़ी-बूटियों से हवन और मन्त्र सहित भक्ति गीत सुनाई पड़ती थी लेकिन, सुर, ताल ओर लय से दूर तेज आवाज में झूमते नजर आते हैं. बुजुर्ग एक कहावत का प्रयोग अक्सर ही करते हैं “ विनाश काले विपरीत बुद्धि “ . शायद यह कहावत आज वर्तमान समय के मानव पर ही चिरतार्थ होता दिख रहा है.

आप सभी पाठकों को बैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीय या यूँ कहें कि अक्षय तृतीय की हार्दिक शुभकामनाएं.     

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