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दूर हटो ए दुनिया वालों…

कवि प्रदीप का जन्म  06 फरवरी 1915 उज्जैन (मध्य प्रदेश) के बड़नगर नामक क़स्बे में हुआ था.कवि प्रदीप का वास्तविक नाम ‘रामचंद्र नारायण द्विवेदी’ था.इनके पिता का नाम नारायण भट्ट था.

कवि प्रदीप की शुरुआती शिक्षा इंदौर के ‘शिवाजी राव हाईस्कूल’ में हुई, जहाँ वे सातवीं कक्षा तक पढ़े. इसके बाद की शिक्षा इलाहाबाद के दारागंज हाईस्कूल में संपन्न हुई. इसके बाद इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की. दारागंज उन दिनों साहित्य का गढ़ हुआ करता था. वर्ष1933-1935 तक का इलाहाबाद का काल प्रदीप जी के लिए साहित्यिक दृष्टीकोंण से बहुत अच्छा रहा. उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की एवं अध्यापक प्रशिक्षण पाठ्‌यक्रम में प्रवेश लिया.

कवि प्रदीप का विवाह मुम्बई निवासी गुजराती ब्राह्मण चुन्नीलाल भट्ट की पुत्री सुभद्रा बेन से वर्ष1942 में हुआ था. वर्ष1950 में विले पार्ले में एस.बी. मार्ग पर 700 गज का प्लॉट ख़रीदकर 70 हज़ार रुपये में प्रदीप ने शानदार बंगला बनवाया.

बताते चलें कि, किशोरावस्था में ही कवि प्रदीप को लेखन और कविता का शौक़ लगा. कवि सम्मेलनों में वे ख़ूब दाद बटोरा करते थे. इलाहाबाद में एक बार हिन्दी दैनिक ‘अर्जुन’ के संपादक और स्वामी श्रद्धानंद के सुपुत्र पं. विद्यावाचस्पति के सम्मान में एक कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी ने लखनऊ की पत्रिका ‘माधुरी’ के फ़रवरी, 1938 के अंक में प्रदीप पर लेख लिखकर उनकी काव्य-प्रतिभा पर स्वर्ण-मुहर लगा दी. निराला जी ने लिखा- “आज जितने कवियों का प्रकाश हिन्दी जगत् में फैला हुआ है, उनमें ‘प्रदीप’ का अत्यंत उज्ज्वल और स्निग्ध है.

वर्ष1939 में लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक तक की पढ़ाई करने के बाद कवि प्रदीप ने शिक्षक बनने का प्रयास किया, लेकिन इसी दौरान उन्हें मुंबई में हो रहे एक कवि सम्मेलन में हिस्सा लेने का न्योता मिला. कवि सम्मेलन में उनके गीतों को सुनकर ‘बाम्बे टॉकीज स्टूडियो’ के मालिक हिंमाशु राय काफ़ी प्रभावित हुए और उन्होंने प्रदीप को अपने बैनर तले बन रही फ़िल्म ‘कंगन’ के गीत लिखने की पेशकश की.

वर्ष1939 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘कंगन’ में उनके गीतों की कामयाबी के बाद प्रदीप बतौर गीतकार फ़िल्मी दुनिया में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए. वर्ष1943 में मुंबई की ‘बॉम्बे टॉकीज’ की पांच फ़िल्मों- ‘अंजान’, ‘किस्मत’, ‘झूला’, ‘नया संसार’ और ‘पुनर्मिलन’ के लिये भी कवि प्रदीप ने गीत लिखे.

कवि प्रदीप गाँधी विचारधारा के कवि थे.प्रदीप ने जीवन मूल्यों की कीमत पर धन-दौलत को कभी महत्व नहीं दिया.प्रदीप भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे.एक बार स्वतंत्रता के आन्दोलन में उनका पैर फ्रैक्चर हो गया था और कई दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ा. वर्ष1940 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम पर था.देश को स्वतंत्र कराने के लिय छिड़ी मुहिम में कवि प्रदीप भी शामिल हो गए और इसके लिये उन्होंने अपनी कविताओं का सहारा लिया.

वर्ष1940 में ज्ञान मुखर्जी के निर्देशन में उन्होंने फ़िल्म ‘बंधन’ के लिए भी गीत लिखा। यूं तो फ़िल्म ‘बंधन’ में उनके रचित सभी गीत लोकप्रिय हुए, लेकिन ‘चल चल रे नौजवान…’ के बोल वाले गीत ने आजादी के दीवानों में एक नया जोश भरने का काम किया. चालीस के दशक में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ अपने चरम पर था. वर्ष1943 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘किस्मत’ में प्रदीप के लिखे गीत ‘आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ए दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है’ जैसे गीतों ने जहां एक ओर स्वतंत्रता सेनानियों को झकझोरा, वहीं अंग्रेज़ों की तिरछी नजर के भी वह शिकार हुए. वर्ष1950 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘मशाल’ में उनके रचित गीत ‘ऊपर गगन विशाल नीचे गहरा पाताल, बीच में है धरती ‘वाह मेरे मालिक तुने किया कमाल’ भी लोगों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुआ. वर्ष1954 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘नास्तिक’ में उनके रचित गीत ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान कितना बदल गया इंसान’ समाज में बढ़ रही कुरीतियों के ऊपर उनका सीधा प्रहार था.

ऐ मेरे वतन के लोगों

‘ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी’ साठ के दशक में चीनी आक्रमण के समय लता मंगेशकर द्वारा गाया गया था.यह गीत कवि प्रदीप द्वारा लिखा गया था। कौन-सा सच्चा हिन्दुस्तानी इसे भूल सकता है? यह गीत आज इतने वर्षों के बाद भी उतना ही लोकप्रिय है। इस गीत के कारण ‘भारत सरकार’ ने कवि प्रदीप को ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से सम्मानित किया था.

कवि प्रदीप को अनेक सम्मान प्राप्त हुए थे, जिनमें ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ (वर्ष1961) तथा ‘फ़िल्म जर्नलिस्ट अवार्ड’ (वर्ष1963) शामिल हैं.यद्यपि साहित्यिक जगत् में प्रदीप की रचनाओं का मूल्यांकन पिछड़ गया तथापि फ़िल्मों में उनके योगदान के लिए भारत सरकार, राज्य सरकारें, फ़िल्मोद्योग तथा अन्य संस्थाएँ उन्हें सम्मानों और पुरस्कारों से अंलकृत करते रहे.उन्हें सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मी गीतकार का पुरस्कार राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा दिया गया. वर्ष 1995 में राष्ट्रपति द्वारा ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि दी गई और सबसे अंत में, जब कवि प्रदीक का अंत निकट था, फ़िल्म जगत् में उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष1998 में भारत के राष्ट्रपति के.आर. नारायणन द्वारा प्रतिष्ठित ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ दिया गया.

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Poet Pradeep was born on 06 February 1915 in Badnagar town of Ujjain (Madhya Pradesh). The real name of poet Pradeep was ‘Ramchandra Narayan Dwivedi’. His father’s name was Narayan Bhatt.

Poet Pradeep’s early education took place in ‘Shivaji Rao High School’, Indore, where he studied till seventh grade. After this, my education was completed at Daraganj High School, Allahabad. After this passed the intermediate examination. Daraganj used to be a stronghold of literature in those days. The period of Allahabad from the year 1933-1935 was very good for Pradeep ji from a literary point of view. He completed his graduation from Lucknow University and took admitted to the teacher training course.

Poet Pradeep was married to Subhadra Ben, daughter of Chunnilal Bhatt, a Gujarati Brahmin resident of Mumbai, in the year 1942. In the year 1950 in Vile Parle, S.B. By purchasing a plot of 700 yards on the road, Pradeep built a magnificent bungalow for Rs 70,000.

Let us tell you that, poet Pradeep got fond of writing and poetry in his adolescence. He used to collect a lot of appreciation at poet conferences. Once in Allahabad, a poet meeting was organized in honor of Pt. Vidyavachaspati, the editor of the Hindi daily ‘Arjun’ and son of Swami Shraddhanand. Suryakant Tripathi ‘Nirala’ ji put a gold stamp on his poetic talent by writing an article on Pradeep in the February 1938 issue of Lucknow’s magazine ‘Madhuri’. Nirala ji wrote- “The light of all the poets who have spread in the Hindi world today, ‘Pradeep’ is extremely bright and auspicious.

After completing his graduation from Lucknow University in the year 1939, poet Pradeep tried to become a teacher, but in the meantime, he was invited to participate in a poet’s conference being held in Mumbai. Hearing his songs at Kavi Sammelan, the owner of ‘Bombay Talkies Studio’ Himanshu Rai was very impressed and offered Pradeep to write the songs for the film ‘Kangan’ being made under his banner.

After the success of his songs in the film ‘Kangan’ released in the year 1939, Pradeep became successful in making his mark in the film world as a lyricist. In the year 1943, poet Pradeep also wrote songs for five films of Mumbai’s ‘Bombay Talkies’ – ‘Anjaan’, ‘Kismat’, ‘Jhula’, ‘Naya Sansar’ and ‘Punarmilan’.

Poet Pradeep Gandhi was a poet of ideology. Pradeep ji never gave importance to wealth at the cost of life values. Deep ji used to actively participate in the Indian independence movement. Once his leg was fractured in the independence movement. Was and had to stay in the hospital for several days. In the year 1940, the Indian freedom struggle was at its peak. Poet Pradeep also joined the campaign to liberate the country and for this, he took the support of his poems.

In the year 1940, he also wrote a song for the film ‘Bandhan’ under the direction of Gyan Mukherjee. Although all the songs composed by him in the film ‘Bandhan’ became popular, the song with the lyrics of ‘Chal Chal Re Naujawan…’ worked to fill a new enthusiasm among the lovers of freedom. In the forties, the Father of the Nation Mahatma Gandhi’s ‘Quit India Movement’ against the British Government was at its peak. Songs like ‘Aaj Himalaya ki choti se phir humne lalkara hai, door hato e Duniya walon Hindustan hamara hai’ written by Pradeep in the film ‘Kismat’, released in the year 1943, shook the freedom fighters on the one hand, but also caused the scorn of the British. He became a victim. His song ‘Upar Gagan Vishal Neeche Gehra Patal, Beech Mein Hai Dharti’ in the film ‘Mashal’, released in the year 1950, also became very popular among the people. The song ‘Dekh Tere Sansar Ki Halt Kya Ho Gayi Bhagwan Kitna Badal Gaya Insaan’ composed by him in the film ‘Nastik’ released in the year 1954 was a direct attack on the growing evils in society.

‘Aye, mere watan ke logon

‘Aye, mere watan ke logon, zara ankh main bhar lo pani’ was sung by Lata Mangeshkar during the Chinese invasion in the sixties. The song was written by poet Pradeep. Which true Indian can forget this? This song is as popular today even after all these years. Because of this song, the ‘Indian Government’ honored poet Pradeep with the title of ‘Rashtrakavi’.

Poet Pradeep received many honors, including the ‘Sangeet Natak Akademi Award’ (1961) and the ‘Film Journalist Award’ (1963). Although the evaluation of Pradeep’s works in the literary world lagged behind, India has been honored for his contribution to films. The government, state governments, the film industry, and other institutions continued to decorate him with honors and awards. He was awarded the best film lyricist by President Rajendra Prasad. In the year 1995, the title of ‘National Poet’ was given by the President, and lastly, when Kavi Pradik’s end was near, in the year 1998, the President of India K.R. The prestigious ‘Dadasaheb Phalke Award’ was given by Narayanan.

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