Health

अश्वगंधा…

डा० बिनोद उपाध्याय

आधुनिक जीवन प्रणाली और आधुनिक खान पान भी कई बीमारियों की जड़ है और हम सभी आधुनिक बनने कि होड़ में या यूँ कहें कि प्रतिस्पर्धा में बीमारियों को घर बुला रहें हैं. आधुनिकता की दौर में भारतीय जीवन पद्धति में जड़ी-बूटी व मसालों का प्रयोग होता हैं. ये जड़ी-बूटी ही हमारे आयुर्वेद चिकित्सा में भी प्रयोग होते हैं. अगर, मानव अपने जीवन को तंदुरुस्त रखना चाहता हो तो अपनी जीने की पद्धति को थोडा बदल ले तो वो कई बीमारियों को अपने से दूर भगा सकता है. पिछले कई लेख में आयुर्वेद से जुड़े फल, फुल और मसाले के बारे में जानकारी मिली उसी श्रृंखला में आज बात करते हैं अश्वगंधा के बारे में……..

अश्वगंधा जो कि सोलेनेसी कुल का द्विबीज पत्रीय पौधा है, जिसकी पत्तियाँ रोमयुक्त, अण्डाकार होती हैं और इसके फुल हरे, पीले तथा छोटे एवं पाँच के समूह में लगे हुये होते हैं. इसका फल पकने पर लाल रंग का होता है और इसकी जड़ो का रंग भूरा और से सफेद होता है. ज्ञात है कि, पुरे विश्व में सोलेनेसी परिवार की लगभग 3000 जातियाँ व 90 वंश पाये जाते हैं जिनमें, केवल 2 जातियाँ ही भारत में पाई जाती हैं. भारत में इसकी खेती 1500 मीटर की ऊँचाई तक के सभी क्षेत्रों में की जाती है जबकि, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर खेती की जा रही है और इन्हीं क्षेत्रों से पूरे देश में अश्वगंधा की माँग को पूरा किया जाता है. अश्वगंधा की खेती के लिए बलुई दोमट अथवा हल्की लाल मृदा की मिट्टी ही खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है.

बताते चले कि, अश्वगंधा को भारत में जिनसेंग भी कहते है, और इसकी जड़, पत्ती, फुल और फल का प्रयोग ओषधि के रूप में किया जाता है. इसकी जड़ और पत्ते में कई तरह के रासायनिक घटक उपस्थित होते हैं इसी कारण से इसकी जड़ का प्रयोग किया जाता है. अश्वगंधा की जड़ में उपास्थि रासायनिक घटक जैसे:- एनाफेरीन (एल्केलॉइड), एनाहाइग्रीन (एल्केलॉइड), बीटा-सिस्टेरॉल, क्रोजेनिक एसिड (सिर्फ पत्तियों में), सिस्टेन (फलों में), कस्कोहाइग्रीन (एल्केलॉइड), लौह-तत्व, सियूडो-ट्रोपिन (एल्केलॉइड), स्कोपोलेटिन, सोमिनिफेरीनीन (एल्केलॉइड) सोमिनिफेरीनीन (एल्केलॉइड), ट्रोपैनॉलस, विथेफेरीन-ए (स्टेरॉइडल लैक्टिन), वेथेनीन, विथेनेनीन, वेथेनॉलाइड्स, ए-वाई (स्टेरॉइडल लैक्टिन), एनाफेरीन, एनाहाइग्रीन, सिस्टरॉल, क्लोरोजेनिक एसीड (पत्ती में) आदि. अश्वगंधा के मुख्य अवयव एल्केलॉइड्स और स्टेरॉइडल लैक्टॉन और विथनीन.

अश्वगंधा का चिकित्सकीय प्रयोग कई प्रकार से किया जाता है, यह कई बीमारियों में इसका प्रयोग क्या जाता है जैसे हर्बल उपचार, सुजन और बुखार या संक्रमन. रिसर्च से पता चला है कि, अश्वगंधा मस्तिष्क में न्यूरोलॉजीकल ट्रांसमिशन को ठीक करने में मदद करता है. इसमें एंटीओक्सिडेंट गुण भी पाया जाता है जो कि ह्रदय रोग, मधुमेह, मोतियाबिंद और विकलांगता को रोकने में मदद करता है. इसमें एंटी-एजिंग भी पाया जाता है जो उत्तकों के पुनर्जनन को बढाता है या यूँ कहें कि, उम्र बढने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है साथ ही तनाव को रोकने और भूले की बीमारी को भी रोकने में मदद करता है. इसके गुणों को देखते हुए आम जन-जीवन में इसे लोग टॉनिक भी कहते हैं. यह रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है. कहा जाता है कि, अश्वगंधा कि जड़ को तीन महीने तक सेवन कर लिया जाय तो मानव शरीर में ओज, स्फूर्ति, बल, शक्ति और चेतना आ जाती है. यह पाचन शक्ति को भी सुधारता है और पेशाब को खुलकर आती है.

इसके पत्ते को पीसकर लगाने से त्वचा के रोग, जोड़ो के सुजन और घाव भरने में किया जाता है. इसके नियमित सेवन से हीमोग्लोबिन में वृद्धि होती है साथ ही इसका प्रयोग कैंसर कि दवाओं में भी किया जाता है. चिकित्सकीय सलाह दी जाती है कि, गर्म प्रकृति वाले अश्वगंधा का प्रयोग अधिक मात्र में ना करें जब भी प्रयोग करना हो तो इसे खाली पेट में इसके चूर्ण का प्रयोग करें.

डा० बिनोद उपाध्याय,

ध्रुब आयुर्वेदिक केंद्र, मुन्ना चौक,

तिलक नगर, कंकर बाग, पटना.

 

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