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आखिर बिहार के अगले मुख्यमंत्री कौन होंगे…?

कहा जाता है कि राजनीति की कोई दशा और दिशा नहीं होती है. घड़ी की टिक-टिक के साथ राजनीति का भी मिजाज बदलता रहता है. वैसे ही कभी –कभी राजनीति ऐसे चौराहे पर खड़ी हो जाती है जहाँ भविष्य का चेहरा धुंधला और दिलचस्प हो जाता है. यह सवाल सिर्फ सत्ता के परिवर्तन का नहीं, बल्कि बिहार की बदलती आकांक्षाओं का भी प्रतीक है. गठबंधन की राजनीति में जब भी सत्ता परिवर्तन की बात आती है तो भविष्य और भी धुंधला दिखाई पड़ता है. वैसे तो वर्तमान समय के बिहार का भी हाल यही है. वर्तमान मुख्यमंत्री राज्य सभा जा रहे हैं और बिहार के अगले मुख्यमंत्री कौन होंगें… यह सवाल जनता से लेकर सत्तासीन तक को कौंध रहा है. वर्तमान समय में गठबंधन के शीर्ष चुपी साधे हैं और अटकलों का बाजार गर्म है. साथ ही बिहार में अपराधियों का बोल-बाला भी बढ़ रहा है.

वर्ष  1990 में लालू प्रसाद यादव के सत्ता में आने के बाद से जो क्रम चला था — पहले लालू, फिर राबड़ी देवी, फिर जीतन राम मांझी और नीतीश कुमार. जल्द ही राज्य बिहार को एक ऐसा मुख्यमंत्री मिल सकता है जो किसी राष्ट्रीय पार्टी से होगा, और वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से होगा. वैसे तो देखा जाय तो यह केवल एक सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि, बिहार की सियासत की दिशा और प्रकृति में मूलभूत बदलाव का भी संकेत है. बताते चलें कि, वर्ष 1962 में जनसंघ के तीन विधायकों से शुरू हुई यात्रा करीब 64 वर्षों के बाद भाजपा बिहार को अपना मुख्यमंत्री देने जा रही है. सबसे बड़ा प्रश्न यह है: आखिर यह मुख्यमंत्री कौन होगा? और उसकी योग्यता किस पैमाने पर तय की जाएगी?

ज्ञात है कि, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 16 मार्च 2026 को राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया और 30 मार्च को उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया साथ ही 10 अप्रैल को राज्यसभा की शपथ भी लेने वाले हैं. बताते चलें कि, नीतीश कुमार ने अभी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया है लेकिन संवैधानिक रूप से कोई व्यक्ति बिना विधानमंडल का सदस्य हुए अधिकतम छह माह तक मुख्यमंत्री पद पर रह सकता है. वहीं, जेडीयू नेता विजय कुमार चौधरी ने स्पष्ट किया है कि नीतीश “संवैधानिक मानदंडों का पालन करते हुए समय से इस्तीफा भी देंगें. सूत्रों के अनुसार, खरमास की समाप्ति के बाद नीतीश मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं.

सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पद छोड़ने से पहले भाजपा से कुछ शर्तें मनवाना चाहते हैं. जिनमें उत्तराधिकारी पर उनकी सहमति हो साथ ही गृह विभाग, विधानसभा अध्यक्ष पद और विभागों का बंटवारा. वहीं, जेडीयू ने यह भी स्पष्ट करते हुए कहा है कि वो “मध्य प्रदेश या राजस्थान जैसे प्रयोग” नहीं चाहता है. वर्तमान समय के परिदृश्य में राज्य बिहार में मुख्यमंत्री के उम्मीदवारों को कई मानदंडों (जातीय समीकरण, संगठनात्मक वफादारी, नीतीश कुमार की इच्छा, और दिल्ली की रणनीति) पर खड़ा उतरना पड़ेगा…

भाजपा अब तक बिहार में सवर्णों की पार्टी मानी जाती रही है. वहीं पार्टी भी अब इस धारणा को तोड़ना चाहती है. भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री पद के लिए कई नाम चर्चा के दौर में हैं. ज्ञात है कि, बिहार की राजनीति में जाति आज भी सबसे निर्णायक कारक है. हाल ही में हुई जाति जनगणना के आंकड़े इस समीकरण को स्पष्ट करते हैं. बिहार की सबसे बड़ी जातीय श्रेणी (36.01% जनसंख्या) और सबसे बड़े वोट बैंक है नीतीश कुमार. यदि भाजपा ईबीसी से मुख्यमंत्री बनाती है, तो यह नीतीश के सामाजिक आधार को सीधी चुनौती होगी. दूसरी ओर, ईबीसी में 112 उपजातियाँ हैं, जिनमें से केवल 8 की आबादी 1% से अधिक है. एक जाति से मुख्यमंत्री बनाने पर अन्य ईबीसी जातियाँ नाराज हो सकती हैं.

ज्ञात है कि 20 वर्षों से अधिक समय तक नीतीश कुमार ने बिहार पर शासन किया है। इससे उनका वजन और प्रभाव इतने अधिक हैं कि भाजपा उन्हें नज़रअंदाज भी नहीं कर सकती है. जेडीयू के वरिष्ठ नेता के अनुसार “नीतीश कुमार को निर्णायक सहमति दी गई है. यह केवल सत्ता का स्थानांतरण नहीं है, यह विरासत का भी स्थानांतरण है”. वहीं, भाजपा के एक सांसद ने यह मानते हुए कहा कि, “हम चाहते हैं कि सब कुछ सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझे, यह समझते हुए कि नीतीश को नाराज करना उल्टा पड़ सकता है”.

नये मुख्यमंत्री की रेस कई नामों का दौर चल रहा है वहीं, नीतीश कुमार ने सार्वजनिक रूप से सम्राट चौधरी के  नाम का संकेत दिया है. जबकि भाजपा में मुख्यमंत्री का चयन तीन स्तरों पर होता है: पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और आरएसएस. जहाँ तक बात आती है सम्राट चौधरी की तो आरएसएस उन्हें पसंद नहीं करता है चुकि, वो विभिन्न दलों में घूमते हुए भाजपा में आये हैं जबकि संघ संगठन में बने नेताओं को प्राथमिकता देता है. एक तरफ, भाजपा ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, ओडिशा में अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरों को मुख्यमंत्री बनाया है. बिहार में भी यह पैटर्न दोहराया जा सकता है, और तब कोई ईबीसी या दलित नेता चौंकाने वाला विकल्प हो सकता है.

राजनीती के जानकर बताते हैं कि, आरएसएस जितना किसी का विरोध करता है, मोदी उतना ही उसे समर्थन दे सकते हैं. लेकिन असली सवाल यह है कि मोदी ऐसे नेता को पसंद करते हैं जो स्वतंत्र रूप से खड़ा हो सके और सम्राट चौधरी भी वैसे ही हैं. एक तरफ, सम्राट चौधरी के पास 18 महीने से उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री के रूप में प्रशासनिक अनुभव के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कार्यशैली को करीब से देखा है. वही,केंद्रीय मंत्री के रूप में नित्यानंद राय की अनुभव और गहरी संगठनात्मक पकड़ के साथ संजीव चौरसिया/प्रमोद कुमार को मंत्री स्तर का अनुभव व आरएसएस से जुड़ाव और साफ छवि का होना.  दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सुपुत्र निशांत कुमार अब सक्रिय राजनीति में प्रवेश कर रहे है. सूत्रों के अनुसार, वो उपमुख्यमंत्री बन सकते हैं.वहीं, राजनीती के जानकर के अनुसार, सम्राट-निशांत की साझेदारी “लव-कुश” सामाजिक समीकरण को संरक्षित रख सकती है.

द हिंदू के संपादकीय के अनुसार, “नए मुख्यमंत्री को तीसरे गियर में शिफ्ट होना होगा और बिहार की सबसे गंभीर समस्या प्रवासन का भी समाधान करना होगा”. बताते चलें कि, वर्ष  2011 की जनगणना के अनुसार, बिहार में जन्मे 9 मिलियन लोग राज्य से बाहर काम करते हैं. यह आंकड़ा नवीनतम गणना में और भी बढ़ सकता है. नए मुख्यमंत्री को ऐसा वातावरण बनाना होगा कि बिहार में जन्मे लोगों के पास वहीं रहने और काम करने का विकल्प हो? कभी बिहार में जातिगत अन्याय को लालू यादव ने संबोधित किया था. वहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने  “बिहार अस्मिता” की राजनीति को आवाज दी और बुनियादी ढांचे का विकास किया. चूकिं, नए मुख्यमंत्री का कार्यकाल अब लालू के “जंगल राज” से नहीं, बल्कि नीतीश के 20 वर्षों के शासन से तुलना की जाएगी. “सुशासन बाबू” की छवि को पीछे छोड़ना या उसे बनाए रखना इतना भी आसान नहीं होगा?

बताते चलें कि, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन काल में बिहार में साम्प्रदायिक शांति तो बनी रही परन्तु मुसलमानों ने जेडीयू को वोट भी ना दिया हो, लेकिन मुसलमानों को कभी धमकी महसूस नहीं हुई. वहीं, भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में यह संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी. एक तरफ,  भाजपा पर विपक्ष हमेशा “दलित-पिछड़ा विरोधी” होने का आरोप लगाता रहा है वहीं, नए मुख्यमंत्री के लिए अब इस धारणा को तोड़ना होगा. यही कारण है कि ईबीसी या दलित चेहरे का विकल्प रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है.

सबसे बड़ी चुनौती तो यह है कि, पिछले 36 वर्षों से बिहार के मुख्यमंत्री क्षेत्रीय दलों (लालू, राबड़ी, नीतीश) से थे और इन सभी की सत्ता का केंद्र पटना ही था परन्तु अब मुख्यमंत्री को दिल्ली की निर्देशों का पालन करना होगा. वो अंतिम निर्णायक नहीं होंगें. उन्हें भी अपने पद की रक्षा भी करनी होगी, क्योंकि अन्य दावेदार उनकी गलती का इंतजार कर रहे होंगे. सबसे बड़ा सवाल यहाँ है कि, क्या भाजपा नीतीश की इच्छा का सम्मान करते हुए सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाएगी, या वह अपने “सरप्राइज” पैटर्न के तहत कोई ईबीसी या दलित चेहरा पेश करेगी? साथ ही क्या नया मुख्यमंत्री नीतीश की विरासत को आगे बढ़ा पाएगा, या वह उसकी छाया से बाहर निकल पाएगा? और सबसे आखरी सवाल यह है कि क्या वह बिहार की सबसे बड़ी समस्या—प्रवासन—का समाधान कर पाएगा?

बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, यह तो 10 अप्रैल को ही स्पष्ट होगा. लेकिन यह तय है कि चयन केवल राजनीतिक लोकप्रियता पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक क्षमता, सामाजिक संतुलन और पार्टी नेतृत्व के विश्वास पर आधारित होगा. योग्यता का असली पैमाना “डिग्री” नहीं बल्कि “डिलीवरी” (परिणाम देने की क्षमता) होगा. बिहार एक नए परिवर्तन के दौर से गुजर रहीं और आने वाला समय ही बिहार का भविष्य तय करेगा…?

संजय कुमार सिंह,

पोलिटिकल एडिटर. 

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