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व्यक्ति विशेष -981.

रोशनआरा बेगम

रोशनआरा बेगम एक प्रभावशाली शहजादी, राजनीतिक रणनीतिकार और प्रतिभाशाली कवयित्री थीं. उनका जन्म 03 सितंबर 1617 को बुरहानपुर, भारत में हुआ था. रोशनआरा के पिता मुगल बादशाह शाहजहाँ और उनकी माता का नाम मुमताज महल था. वो मुगल बादशाह शाहजहाँ और मुमताज महल की तीसरी संतान थीं.

वर्ष 1657 में शाहजहाँ की बीमारी के बाद उत्तराधिकार के लिए हुए संघर्ष में उन्होंने अपने छोटे भाई औरंगजेब का समर्थन किया था. औरंगजेब के सत्ता में आने के बाद (1658), रोशनआरा को मुग़ल साम्राज्य की सर्वोच्च महिला का पद यानी ‘पाद्शाह बेगम’ (शाही हरम की मुख्य संचालिका) बनाया गया था. पाद्शाह बेगम बनने के बाद उन्हें शाही फरमान (‘निशान’) जारी करने का विशेष अधिकार मिला और वह मुग़ल दरबार की एक अत्यंत शक्तिशाली राजनैतिक हस्ती बनी.

समय के साथ रोशनआरा और औरंगजेब के संबंधों में खटास आई जिसके कारण उन्होंने राजदरबार से दूरी बना ली और दिल्ली के उत्तर में स्थित ‘रोशनआरा बाग’ के एक महल में एकांत जीवन बिताया. रोशनआरा बेगम का निधन 11 सितंबर 1671 को  दिल्ली में हुआ था.

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स्वतंत्रता सेनानी कमलापति त्रिपाठी

कमलापति त्रिपाठी एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, लेखक और पत्रकार थे. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे और स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे, जिनमें रेल मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद भी शामिल है. कमलापति त्रिपाठी अपनी विद्वता, राजनैतिक दूरदर्शिता और देशभक्ति के लिए जाने जाते थे.

कमलापति त्रिपाठी का जन्म 3 सितंबर 1905 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के गाँव बनारस के नजदीक हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा बनारस के क्वींस कॉलेज में हुई, जहाँ उन्होंने साहित्य और भारतीय संस्कृति में गहरी रुचि ली. उन्होंने शिक्षा के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लेना शुरू किया.

कमलापति त्रिपाठी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी के नेतृत्व में सक्रिय रूप से शामिल हुए. उन्होंने वर्ष 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान अपनी शिक्षा छोड़ दी और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े. वे कई बार जेल गए और अपनी स्वतंत्रता सेनानी भूमिका के दौरान कई महत्वपूर्ण आंदोलनों में भाग लिया, जैसे: – सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930), भारत छोड़ो आंदोलन (1942). उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन के दौरान जेल की सजा भी काटी, लेकिन उनके इरादे कभी नहीं डगमगाए. उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से भी जनता को जागरूक करने का काम किया.

स्वतंत्रता के बाद, कमलापति त्रिपाठी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रमुख नेता बने और उन्हें विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया गया. उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में भी कार्य किया. उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश ने सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में काफी प्रगति की. उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान तब आया जब वे भारतीय रेल मंत्री बने. उनके कार्यकाल के दौरान, भारतीय रेलवे ने उल्लेखनीय सुधार किए और उनका योगदान इस क्षेत्र में अद्वितीय माना जाता है. कमलापति त्रिपाठी को उनकी सेवाओं के लिए “रेल मंत्री के रूप में अमिट छाप छोड़ने वाले” नेताओं में गिना जाता है.

कमलापति त्रिपाठी एक प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार भी थे. उन्होंने हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया.

 प्रमुख रचनाएँ: –  “सत्याग्रह और स्वतंत्रता संग्राम”.

“महात्मा गांधी और स्वतंत्रता आंदोलन” वे लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी के मुखपत्र “आज” के संपादक भी रहे, जहाँ उन्होंने अपने लेखों और विचारों के माध्यम से समाज को प्रेरित किया और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जागरूकता फैलाने का कार्य किया.

कमलापति त्रिपाठी एक साधारण और सादगी पसंद व्यक्ति थे. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी समाज और देश की सेवा में समर्पित की. उनकी सादगी और ईमानदारी उन्हें राजनीति में सबसे अलग पहचान देती थी. कमलापति त्रिपाठी का निधन 8 अक्टूबर 1990 को वाराणसी में हुआ था. कमलापति त्रिपाठी को आज भी उनकी निष्ठा, सेवा और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के लिए याद किया जाता है. उत्तर प्रदेश और भारतीय राजनीति में उनका नाम हमेशा सम्मान से लिया जाता है, और वे भारतीय लोकतंत्र के एक स्तंभ के रूप में माने जाते हैं.

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तबला वादक पंडित किशन महाराज

पंडित किशन महाराज भारतीय क्लासिकल संगीत के एक प्रमुख तबला वादक थे, जिन्होंने अपनी विशेष तालीम और प्रदर्शन कौशल के लिए विश्वव्यापी प्रशंसा प्राप्त की. उनका जन्म 3 सितंबर 1923 को काशी के कबीरचौरा मुहल्ले के संगीतज्ञ के परिवार में हुआ था. पंडित किशन महाराज बनारस घराने के प्रमुख सदस्य थे और उन्होंने तबला वादन की बनारस बाज की शैली को आगे बढ़ाया.

उन्होंने अपने दादा बड़े रामदासजी और पिता हरि महाराज से तबला वादन सीखा और बाद में अपने चाचा कान्ठे महाराज के शिष्य बने, जो स्वयं एक महान तबला वादक थे. पंडित किशन महाराज की विशेषता उनकी तकनीकी कुशलता, लय की गहराई और अभिव्यक्ति की विविधता थी. उन्होंने अपनी प्रस्तुतियों में तबला के विभिन्न बोलों को इस प्रकार से पेश किया कि वह हमेशा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते थे.

पंडित किशन महाराज ने अपने कैरियर में कई प्रतिष्ठित कलाकारों के साथ मंच साझा किया, जैसे कि पंडित रवि शंकर, उस्ताद अली अकबर खान, और उस्ताद विलायत खान आदि. उन्होंने न केवल भारत में बल्कि विश्वभर में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया. उनके कला जीवन और उपलब्धियों को भारत सरकार द्वारा पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे सम्मानों से नवाजा गया.

पंडित किशन महाराज का निधन 4 मई 2008 को खजूरी में हुआ था. लेकिन, उनकी संगीत साधना और उनके द्वारा स्थापित मानक आज भी तबला वादकों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं.

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अभिनेता उत्तम कुमार

बांग्ला सिनेमा के ‘महानायक’ और भारतीय फिल्म इतिहास के सबसे प्रतिष्ठित और प्रभावशाली अभिनेताओं में से एक थे उत्तम कुमार. उनका वास्तविक नाम अरुण कुमार चटर्जी था.

उत्तम कुमार का जन्म 3 सितंबर 1926, भवानीपुर, कोलकाता में हुआ था और उनका निधन 24 जुलाई 1980 को कोलकाता में हुआ. उन्होंने साउथ सबर्बन स्कूल और गोयेनका कॉलेज, कोलकाता से पढ़ाई की थी. उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत कलकत्ता पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क से की थी.

उत्तम कुमार ने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत वर्ष 1948 में फिल्म ‘दृष्टिदान’ से की थी. बांग्ला फिल्मों में अभिनेत्री सुचित्रा सेन के साथ उनकी जोड़ी के लिए जाना जाता है. इस जोड़ी ने कई सफल फिल्में दीं, जिनमें ‘सप्तपदी’, ‘पौथे होलो देरी’ और ‘हरानो सुर’ शामिल हैं.

उत्तम कुमार ने हिंदी फिल्मों में काम किया जिनमें प्रमुख हैं – छोटी सी मुलाक़ात (1967), अमानुष (1975), आनंद आश्रम (1977), किताब (1979), दूरियां (1979).

उत्तम कुमार को वर्ष 1967 में ‘चिरियाखाना’ और ‘एंथोनी फ़िरंगी’ फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था. उन्हें “महानायक” की उपाधि दी गई, जो आज भी बंगाली सिनेमा में उनके योगदान को दर्शाती है. कोलकाता में उनके नाम पर कोलकाता में उत्तम थिएटर और महानायक उत्तम कुमार मेट्रो स्टेशन है. उनके पोते गौरव कुमार आज बंगाली फिल्मों में अभिनय कर रहे हैं.

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संगीतकार प्यारेलाल

भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग के एक महान संगीतकार, जिनका नाम लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी के रूप में अमर है. प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा का जन्म 3 सितम्बर 1940 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था. बचपन में ही माँ का देहांत और आर्थिक संघर्षों के बीच, उनके पिता पंडित रामप्रसाद शर्मा ने उन्हें वायलिन सीखने के लिए प्रेरित किया. प्यारेलाल ने बचपन से ही संगीत को अपना जीवन बना लिया और घंटों रियाज़ करते थे.

प्यारेलाल ने संगीतकार एंथनी गोंजाल्विस से वायलिन सीखा था. उनके सम्मान में ही फिल्म अमर अकबर एंथनी में एक गाना “माई नेम इज एंथनी गोंजाल्विस” शामिल किया गया था.

प्यारेलाल की मुलाकात संगीतकार लक्ष्मीकांत शांताराम कुडालकर से हुई और जल्द ही उनकी दोस्ती एक कामयाब संगीतकार जोड़ी में बदल गई, जिसे लोग लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के नाम से जानते हैं. यह जोड़ी वर्ष 1963- 98 तक हिंदी सिनेमा में सक्रिय रही और उन्होंने 635 से ज़्यादा फिल्मों में संगीत दिया. उन्होंने कई बड़े फिल्म निर्माताओं के साथ काम किया और अपने संगीत से हिंदी सिनेमा को एक नई पहचान दी.

गीत – सावन का महीना(मिलन), दिल विल प्यार व्यार (शागिर्द), बिन्दिया चमकेगी(दो रास्ते), डफली वाले (फ़िल्म- सरगम), तू मेरा हीरो है (हीरो ), यशोदा का नन्दलाला (संजोग), चिट्ठी आई है(नाम), एक दो तीन (तेज़ाब)…

प्यारेलाल शर्मा आज भी संगीत से जुड़े हुए हैं और उन्हें उनके असाधारण योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है.

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अभिनेता गोविन्द नामदेव

गोविन्द नामदेव एक भारतीय अभिनेता हैं जो हिंदी फिल्मों और टेलीविजन में काम करते हैं. वे मुख्य रूप से खलनायक की भूमिकाओं के लिए जाने जाते हैं.

गोविन्द नामदेव का जन्म 3 सितम्बर 1950 को सागर, मध्य प्रदेश में हुआ था. वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के स्नातक हैं, और थिएटर से उनका गहरा जुड़ाव रहा है.

गोविन्द नामदेव ने आपने अभिनय कैरियर की शुरुआत वर्ष 1992 में डेविड धवन की फिल्म ‘शोला और शबनम’ में एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी की भूमिका से की थी. जिसमें उन्होंने एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई थी.

फ़िल्में: – बैंडिट क्वीन’, ‘विरासत’, ‘सत्या’, ‘सरफरोश’, ‘ओह माई गॉड’ और ‘सिंघम.

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अभिनेता विवेक ओबेराय

विवेक ओबेरॉय जिनका पूरा नाम विवेक आनंद ओबेरॉय है. वो जाने-माने अभिनेता, उद्यमी और फिल्म निर्माता हैं. उनका जन्म 3 सितंबर 1976 को हैदराबाद, आंध्र प्रदेश (अब तेलंगाना) में हुआ था. उनके पिता का नाम एक्टर सुरेश ओबरॉय है और उनकी माँ का नाम यशोधरा ओबरॉय है.

विवेक ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा  हैदराबाद पब्लिक स्कूल हैदराबाद से की उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए मेयो अजमेर चले गये. उन्हें भी एक्टिंग में दिलचस्पी  थीं और अभिनय की बारीकियां सीखने के लिए न्यूयॉर्क चले गए. विवेक ने  अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत रामगोपाल वर्मा की फिल्म कंपनी से की थी.

फ़िल्में – ओमकारा, मस्ती, कृश 3, काल, साथिया, मस्ती, ओमकारा, रक्त चरित्र, ग्रांड मस्ती, कडुवा, पीएम नरेंद्र मोदी.

विवेक ओबेरॉय ने 29 अक्टूबर 2010 को (कर्नाटक के राजनेता और मंत्री जीवराज अल्वा की बेटी प्रियंका अल्वा  से विवाह किया. उनके दो बच्चे हैं—एक बेटा (विवान वीर ओबेरॉय) और एक बेटी (अमाया निर्वाण ओबेरॉय).

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महिला पहलवान साक्षी मलिक

साक्षी मलिक भारत की प्रसिद्ध फ्रीस्टाइल महिला पहलवान है. वह ओलंपिक खेलों में पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला पहलवान हैं.

साक्षी मलिक का जन्म 3 सितंबर 1992 को मोखरा गाँव, रोहतक जिला, हरियाणा में हुआ था. उनके पिता का नाम सुखबीर मलिक है जो डीटीसी में बस कंडक्टर हैं और उनकी माता का नाम सुदेश मलिक हैं जो आँगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं. उनके पति का नाम सत्यव्रत कादियान है जो एक अंतराष्ट्रीय पहलवान हैं.

साक्षी ने 12 वर्ष की उम्र में छोटू राम स्टेडियम (रोहतक) के कोच ईश्वर दहिया से कुश्ती के गुर सीखने शुरू किये थे. उन्होंने वर्ष 2016 में हुए रियो ओलंपिक में  58 किलोग्राम भार वर्ग में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया था. उसके बाद उन्होंने ग्लास्गो (2014) में रजत पदक, गोल्ड कोस्ट (2018) में कांस्य पदक और बर्मिंघम (2022) में स्वर्ण (Gold) पदक जीता था.

 साक्षी मलिक को उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए कई पुरस्कारों व सम्मान से सम्मानित किया गया. जिनमें वर्ष 2016 में मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार और वर्ष 2017 में  पद्म श्री (भारत का चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान) से सम्मानित किया गया.

वर्ष 2023 में भारतीय कुश्ती महासंघ के चुनावों के विरोध में साक्षी मलिक ने कुश्ती के प्रतिस्पर्धी खेलों से आधिकारिक रूप से संन्यास की घोषणा की थी.

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