Dhram Sansar

अक्षय तृतीया…

सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।

दानकाले च सर्वत्र मंत्र मेत मुदीरयेत्॥

भारतीय काल गणना के अनुसार वर्ष (साल) का दूसरा महीना बैशाख होता है यह महीना पवित्र और पावन होता है. इस महीने का जिक्र हमारे पौराणिक ग्रन्थों में हुआ है. ऐसा माना जाता है कि, बैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीय का विस्तृत वर्णन भविष्य पुराण में किया गया है. भविष्य पुराण के अनुसार बैशाख शुक्ल पक्ष तृतीय के दिन सतयुग और त्रेतायुग युग का प्रारम्भ हुआ था. बताते चलें कि, बैशाख शुक्ल पक्ष तृतीय के ही दिन को भगवान विष्णु ने नर-नारायण, हयग्रीव और परशुरामजी का अवतरण हुआ था. इसी दिन श्री बद्रीनाथजी की प्रतिमा स्थापित की जाती है और उनका पूजन भी किया जाता है साथ ही श्री लक्ष्मी-नारायण के दर्शन किये जाते हैं. बैशाख शुक्ल पक्ष तृतीय के ही दिन महाभारत युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का अंत भी इसी दिन हुआ था. वृंदावन स्थित श्री बांकें बिहारी जी के मन्दिर में भी आज ही के दिन श्यामसुंदर, गोविन्द के चरणों का दर्शन होता हैं अन्यथा, पुरे साल वे वस्त्रों से ढके रहते हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन प्रारम्भ किये गये कार्य और दिए गये दान का कभी क्षय नहीं होता है.

अक्षय तृतीया के दिन ब्रहम मुहूर्त में नदी स्नान या स्नान कर शांत चित से भगवान गोविन्द की विधि विधान से पूजा करता है और ब्राहमणों को विधि पूर्वक भोजन व दान करना चाहिए. आज के दिन नवीन (नये) वस्त्र व आभूषण धारण करना चाहिए. कहा जाता है कि, आज के दिन जो कुछ भी दान किया जाता है वो समस्त वस्तुएं स्वर्ग में या अगले जन्म में प्राप्त होगी. अक्षय तृतीय के दिन भगवान लक्ष्मी-नारायण की विशेष पूजा सफेद कमल या सफेद या पीले गुलाब से करनी चाहिए. यह पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है. आज के दिन अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दुसरे बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना चाहिए.

वैसे तो अक्षय तृतीया पर अनेक व्रत कथाएँ प्रचलित हैं लेकिन, बताते चलें कि, स्कंद और भविष्य पुराण में भी कथा का वर्णन है. कथा के अनुसार, अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु ने रेणुका के गर्भ से परशुराम रूप में जन्म लिया. परशुराम की माता और विश्वामित्र की माता के पूजन के बाद प्रसाद देते समय ऋषि ने प्रसाद बदल कर दे दिया था. जिसके प्रभाव से परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे और क्षत्रिय पुत्र होने के बाद भी विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए. आज के दिन परशुरामजी की पूजा करके उन्हें अर्घ्य दिया जाता है. दक्षिन भारत में आज के दिन परशुराम जयंती भी मनाई जाती है.

कुंवारी कन्याये व सौभाग्यवती स्त्रियाँ आज के दिन गौरी की पूजा करती हैं और प्रसाद में भीगे हुए चने, मिठाई और फल देती हैं.

सनातन परम्परा में अक्षय तृतीय का विशेष महत्व होता है. आज का दिन सर्वासिद्ध मुहूर्त केरूप से भी जाना जाता है. अक्षय तृतीया के ही दिन बिना पंचांग देखे भी कोई भी शुभ मांगलिक कार्य, खरीदारी, नई संस्था की स्थापना करना श्रेष्ठ माना जाता है. धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार, आज के दिन पितरों को किया गया तर्पण या पिंडदान का फल अक्षय माना जाता है. इस दिन पवित्र नदी स्नान करने तथा भगवत पूजा करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं. कहा जाता हैं कि, इस दिन को किया गया जप, तप, हवन, दान और स्वाध्याय का फल अक्षय हो जाता है. बताते चलें कि, अक्षय तृतीय के दिन की तिथि यदि सोमवार हो साथ ही रोहणी नक्षत्र हो तो उस वक्त के जप, तप, हवन, दान और स्वाध्याय का फल अक्षय हो जाता है. इस दिन मनुष्यों को चाहिए कि, अपने दुर्गुणों को भगवान नारायण के चरणों में अर्पित कर देना चाहिए और सद्गुणों का आचरण करना चाहिए.

Related Articles

Back to top button