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व्यक्ति विशेष – 717.

अर्थशास्त्री लक्ष्मीचंद जैन

भारत के एक प्रसिद्ध गांधीवादी अर्थशास्त्री, स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता थे लक्ष्मीचंद जैन. उनका जीवन और कार्य भारत में सहकारिता, विकेन्द्रीकृत विकास और ग्रामीण कारीगरों के सशक्तिकरण पर केंद्रित रहा.

लक्ष्मीचंद जैन का जन्म 13 दिसम्बर 1925 को दिल्ली में हुआ था. उनके पिता ‘फूलचंद जैन’ तथा माँ ‘चमेली देवी’ दोनों ही सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे. लक्ष्मीचंद जैन की शिक्षा की प्राथमिक शिक्षा जैन संस्थापित प्राइमरी तथा सेकेंडरी स्कूल दिल्ली से पूरी की. वर्ष 1939 में लक्षीचंद ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज में प्रवेश लिया. शुरू में उन्होंने मेडिकल विषयों से पढ़ाई शुरू की लेकिन दो साल बाद वह इतिहास तथा दर्शनशास्त्र पढ़ने लगे.व्यावहारिक अर्थशास्त्र पर इनकी जबरदस्त पकड़ थी, जिसका उन्होंने जीवन में बहुत उपयोग किया. इस विषय पर उन्होंने 1955 में हावर्ड यूनिवर्सिटी से एक ग्रीष्म कालानी पाठ्यक्रम भी लिया.

 लक्ष्मीचंद जैन महात्मा गांधी के सिद्धांतों में दृढ़ विश्वास रखते थे और मानते थे कि आर्थिक विकास जनता की भागीदारी के बिना सफल नहीं हो सकता. उन्होंने अपने युवा काल में भारत छोड़ो आंदोलन (वर्ष 1942) में भाग लिया था.

भारत के विभाजन (वर्ष 1947) के दौरान, उन्होंने दिल्ली के किंग्सवे कैंप में शरणार्थियों के लिए राहत कार्यों का प्रबंधन किया और पुनर्वास शिविरों में खेती और कुटीर उद्योगों के लिए सहकारी समितियों की शुरुआत की. इसके सचिव के रूप में, उन्होंने विकेन्द्रीकृत उत्पादन को बढ़ावा दिया और संघर्षरत कारीगरों को प्रशिक्षण, तकनीकी सेवाएँ और ऋण प्रदान किए. उन्होंने कारीगरों को मशीनीकरण और बड़े पैमाने पर उत्पादन के विरुद्ध समर्थन दिया. लक्ष्मीचंद जैन भारत के योजना आयोग के सदस्य भी रहे. उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारत के उच्चायुक्त के रूप में भी कार्य किया.

लक्ष्मीचंद जैन को जन सेवा के लिए वर्ष 1989 में रेमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित करने का निर्णय लिया था, जिसे उनके परिवार ने उनके सिद्धांतों के अनुरूप राज्य सम्मानों के विरोध के कारण अस्वीकार कर दिया था.

लक्ष्मीचंद जैन का निधन  14 नवम्बर 2010 को हुआ था. उन्होंने अपना जीवन ग्रामीण स्तर पर भारत की गरीबी को दूर करने और वंचितों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। वह भारत में आर्थिक नियोजन और विकास के एक प्रखर और स्वतंत्र विचारक थे.

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पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर

मनोहर पर्रीकर एक भारतीय राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में चार बार कार्य किया. वे भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख सदस्य थे और उन्हें अपनी सरलता, विनम्रता और प्रशासनिक क्षमता के लिए व्यापक रूप से सम्मानित किया जाता था.

मनोहर पर्रीकर का जन्म 13 दिसंबर 1955 को गोवा में हुआ था. उन्होंने आईआईटी बॉम्बे से मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में अपनी शिक्षा पूरी की. पर्रीकर ने अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से की और बाद में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए.

उन्हें पहली बार वर्ष 2000 में गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में चुना गया, और फिर वे वर्ष 2002, वर्ष 2012 और वर्ष 2017 में इस पद पर वापस आए. पर्रीकर को गोवा में उनकी स्पष्टता और निष्पक्ष शासन के लिए जाना जाता था. वे भारत सरकार में रक्षा मंत्री के रूप में भी काम कर चुके हैं.

मनोहर पर्रीकर का निधन 17 मार्च 2019 को लम्बी बीमारी के बाद हुआ. उनका निधन गोवा और भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ी क्षति थी. उनकी मृत्यु पर देश भर में शोक व्यक्त किया गया और उन्हें एक विनम्र और समर्पित राजनीतिज्ञ के रूप में याद किया गया.

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अभिनेत्री स्मिता पाटिल

स्मिता पाटिल भारतीय सिनेमा की एक प्रतिष्ठित और प्रतिभाशाली अभिनेत्री थीं, जिन्होंने अपने अभिनय से न केवल हिंदी सिनेमा, बल्कि मराठी सिनेमा में भी अमिट छाप छोड़ी. उन्हें मुख्य रूप से समानांतर सिनेमा या आर्ट फिल्मों में अपने दमदार अभिनय के लिए जाना जाता है, लेकिन उन्होंने मुख्यधारा की फिल्मों में भी सफलतापूर्वक काम किया. स्मिता पाटिल को उनके गहरे भावनात्मक और सामाजिक रूप से जागरूक किरदारों के लिए जाना जाता था.

स्मिता पाटिल का जन्म 17 अक्टूबर 1955 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था. उनका सिनेमा के प्रति रुझान बहुत जल्दी विकसित हुआ, और वे एक प्रसिद्ध टेलीविज़न न्यूज़रीडर के रूप में भी लोकप्रिय थीं, जिसके बाद उन्होंने फिल्मों में कदम रखा. वे सिनेमा के समानांतर आंदोलन से जुड़ीं और श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, मृणाल सेन जैसे निर्देशकों के साथ काम किया, जो उनके कैरियर के लिए मील का पत्थर साबित हुआ.

स्मिता की प्रमुख फ़िल्मों में भूमिका, मंथन, आक्रोश, अर्थ, मिर्च मसाला, और चक्र जैसी फिल्में शामिल हैं. इन फिल्मों में उनके संवेदनशील और गहन अभिनय ने उन्हें न केवल आलोचकों का पसंदीदा बनाया, बल्कि उन्होंने दर्शकों के दिलों में भी एक खास जगह बनाई. स्मिता पाटिल की प्रतिभा को कई पुरस्कारों से नवाजा गया, जिनमें दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री (मरणोपरांत) शामिल हैं.

हालांकि स्मिता पाटिल का जीवन बहुत छोटा रहा. वे मात्र 31 वर्ष की उम्र में अपने बेटे प्रतीक बब्बर के जन्म के बाद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के चलते  उनका निधन 13 दिसंबर 1986 को हो गया था. लेकिन इतने कम समय में उन्होंने भारतीय सिनेमा में जो योगदान दिया, वह अमूल्य है. वे आज भी अपने अभिनय, सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूकता, और सशक्त महिला किरदारों के लिए याद की जाती हैं.

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