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पाश्चायत सोच एवं आर्थिक गुलामी…

वर्तमान समय में धर्म की व्याख्या के स्वरूप ही बदल गये हैं. एक तरफ शासन में बैठे लोग सनातन धर्म के रक्षा की बात कर रहे हैं. वहीं, कुछ लोग देश में धर्म के स्वरूप को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहें हैं. वर्तमान समय के भारत में ग्लोबलाइजेशन के दौर में पश्चमी सभ्यता के तौर-तरीके में जीने की होड़ मची है. भारतीय इतिहास की बात जाय तो… आज भी गुलामी की परम्पराओं में जीने के आदि लोग किसी भी तरह से गुलामी करवाने की होड़ मची है.

देश की आजादी के स्वर्णिम 75 अमृत काल बीत गये लेकिन, आर्थिक व मानसिक गुलामी आज भी लोगों के जेहन में बसी है. आम–आवाम घर से लेकर बाहर तक हर दिन या यूँ कहें कि हर पल आर्थिक व मानसिक गुलामी से दो-चार होना पड़ता है. कभी इस देश में सौ प्रतिशत साक्षरता हुआ करती थी लेकिन, वर्तमान समय में साक्षरों की संख्या में ईजाफा तो हुआ है लेकिन आर्थिक व मानसिक गुलामी के कारण आज भी पिछड़ो की संख्या में पहला नंबर है.

वर्तमान समय में यहाँ के आवाम को हिन्दोस्तान कहने व सुनने में तकलीफ होती है वहीं भारत कहने में सीना गर्व से फुल जाता है. वर्तमान समय में सिन्धुवासी अपने-आप को हिन्दू कहने में भी झिझक महसूस करते हैं. आज पूरी दुनिया के लोगों का विश्वास सनातन धर्म की और बढ़ रहा है वहीं, सनातनी अपने आप को सनातन परम्परा से दूर हो रहें हैं.

सनातन परम्परा और इतिहास की बात की जाय तो यहाँ के धार्मिक और पौराणिक ग्रंथ लिखित हैं. इन ग्रंथों में लिखे गये शब्द पूर्णत: प्रमाणिक है. वहीं पश्चमी सभ्यता या यूँ कहें कि आधुनिक मानव वर्तमान समय तक इन ग्रंथों पर प्रमाणिकता सिद्ध करने पर लगे हैं. सनातन धर्मावलम्बियों के साथ-साथ पूरी दुनिया के लोग भगवान् श्रीकृष्ण को जानते है और मानते हैं.  भगवान्  श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था. भगवान्  श्रीकृष्ण ने कहा था कि…

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

जब मनुष्य वस्तुओं का ध्यान करता है, तो उसके प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है. आसक्ति से काम उत्पन्न होता है, काम से क्रोध उत्पन्न होता है.

क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:। स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

क्रोध से मोह होता है और मोह से स्मृति का मोह होता है. स्मरण शक्ति के नष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है.

श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

वह जो इसके प्रति समर्पित है और जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया है, वह विश्वास से ज्ञान प्राप्त करता है. ज्ञान प्राप्त करने के बाद वह तुरंत परम शांति को प्राप्त कर लेता है.

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।

कर्म करने का ही अधिकार है, फल पर कभी नहीं.कर्म का फल तेरा प्रयोजन न हो, न अकर्म के प्रति तेरी आसक्ति हो.

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।।

मैं समस्त जगत् का रचयिता, कर्ता, समस्त कर्मों का कर्ता, माता, पिता या दादा, ओंकार, ज्ञानी और ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हूं.

वैसे तो देखा जाय तो सनातन परम्परा गूढ़ तत्व है, इसे समझना इतना आसन नहीं है. लेकिन,वर्तमान समय के भारत में नुडल्स परम्परा चल रही है. वर्तमान समय के भारत में जिस प्रकार का असंतोष… इस परम्परा को लेकर है वहीँ, दुनिया भर के वैज्ञानिक इन्ही गूढ़ तत्वों को समझ कर दुनिया में अपना नाम व देश के झंडा को परचम फहरा रहें है. भारतीय परिवेश के ज्यादातर आवाम रासायनिक घोल में उलझ गये हैं वहीँ, विदेशों के लोग भारतीय परम्परा, आयुर्वेद व योग कर अपना जीवन खुशहाल बना रहे हैं.

कभी दुसरो को दान देने वाला आज दान लेने वाला बन गया है. जब दुनिया में एक भी स्कूल नहीं था तब भारत में लाखों गुरुकल चल रहे थे और कई महापुराण लिखे जा चुके थे वहीँ सदी परिवर्तन क्या हुआ कि आज देश के युवा ही नहीं पूरा देश उस देश से भीख की उम्मीद लगा बैठा है जहाँ करीब 300-350 वर्ष पूर्व से लोग लिखना-पढ़ना सीख रहें. जिस ज्ञान को दुनिया के लोग आज सीख रहें है वो ज्ञान भारत में हजारों वर्ष पूर्व ही जानते और मानते थे.

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