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माता कुष्मांडा…

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण: संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

नवरात्रा के चौथे दिन माँ कुष्मांडा की पूजा या आराधना की जाती है. संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड को कूम्हडे भी कहा जाता है, और कूम्हडे की बलि इन्हें अतिप्रिय है, इस कारण से भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है. माता अपनी मन्द हंसी से अपने उदर से अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारंण हीं इन्हें माँ कूष्माण्डा कहा जाता है. जब सृष्टि की उत्पत्ति नहीं हुई थी और चारों ओर अंधकार ही अंधकार था, तब इन्होंने ही ब्रह्माण्ड की रचना की थी या यूँ कहें कि, इस जगत की आदिस्वरूपा और आदिशक्ति भी है और इनका निवास स्थान सूर्यमंडल के भीतर के लोक में स्थित है. कुष्मांडा देवी के शरीर की चमक भी सूर्य के समान ही है और कोई देवी देवता इनके तेज और प्रभाव की बराबरी नहीं कर सकता है.

माता कुष्मांडा को तेज की देवी भी कहा जाता है चूँकि, इन्ही के तेज और प्रभाव से दसों दिशाओं को प्रकाश मिलता है. कहा जाता हैं कि, सारे ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में जो तेज है वो देवी कुष्मांडा की ही देन है. माँ की आठ भुजाएं हैं इसीलिए इन्हें अष्ट भुजा भी कहा जाता है. माता के सात हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है और आठवें हाथ में सभी सिध्दियों और निधियों को देने वाली जप माला ह

पूजा के नियम:  –

माता कूष्मांडा की उपासना करते समय पीले या लाल रंग के वस्त्र पहने और माँ को लाल-पीले व नील फूलों से चंदन, अक्षत, दूध, दही, शक्कर और पंचामृत अर्पित करें, साथ ही माँ की मूर्ति का ध्यान करते हुए, उनके मन्त्रों का जाप करें.

माता कूष्मांडा की उपासना करने से साधकों के समस्त रोग व शोक नष्ट हो जाते हैं, इनकी आराधना से मनुष्य को त्रिविध ताप से भी मुक्ति मिलती है. माता कुष्माण्डा सदैव अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि बनाये  रखती है और इनकी आराधना करने से मन में शांति व लक्ष्मी की भी प्राप्ति होती हैं. अतः इस दिन साधक को अत्यंत पवित्र और मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान करते हुए  में पूजा/साधना  करनी चाहिए. अगर

माता कूष्माण्डा को सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए, उसके बाद मन को ‘अनाहत चक्र’ में स्थापित करने हेतु मां का आशीर्वाद लेना चाहिए. इस प्रकार जो साधक प्रयास करते हैं उन्हें भगवती कूष्माण्डा सफलता प्रदान करती हैं, जिससे साधक सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है और मां का आशीर्वाद प्राप्त करता है. अतः साधक को चाहिए कि, इस दिन पवित्र मन से माँ के स्वरूप को ध्यान करते हुए पूजा करनी चाहिए. माँ की भक्ति से आयु, यश, बल और स्वास्थ्य की वृध्दि होती है.

संकलन:          –     ज्ञानसागरटाइम्स टीम.

Video Link:    –     https://youtu.be/hCOe0U0IAoQ

 

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