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व्यक्ति विशेष

भाग - 87.

अधिवक्ता सत्येन्द्र प्रसन्न सिन्हा

सत्येन्द्र प्रसन्न सिन्हा एक प्रमुख भारतीय अधिवक्ता और राजनेता थे, जिनका जन्म 24 मार्च 1863 को बंगाल के बीरभूम जिले में हुआ था. उनके पिता एक जमींदार थे. सिन्हा ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अपने गृह नगर से ही प्राप्त की और बाद में ‘प्रेसीडेंसी कॉलेज’, कलकत्ता से छात्रवृत्ति प्राप्त की. उन्हें लंदन के ‘लिंकंस इन’ बार से भी आमंत्रण प्राप्त हुआ था​​.

सत्येन्द्र प्रसन्न सिन्हा बंगाल के एडवोकेट जनरल थे और उन्होंने वाइसरॉय की काउंसिल में कानून सदस्य के रूप में प्रवेश करने का सम्मान प्राप्त किया था. प्रथम विश्व युद्ध के बाद उन्हें ‘लॉर्ड’ की उपाधि दी गई और वह ‘अंडर सेक्रेटरी ऑव स्टेट फॉर इंडिया’ के पद पर नियुक्त किए गए.1920 में, वह बिहार और उड़ीसा के पहले गवर्नर बने. यह ब्रिटिश शासन में इस पद पर आसीन होने वाले पहले भारतीय थे​​.

1917 में सिन्हा इंग्लैंड लौट आए और राज्य सचिव, एडविन सैमुअल मोंटेगु के सहायक के रूप में काम किया. उन्होंने ‘भारत सरकार अधिनियम- 1919’ को ‘हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स’ में पारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1919 में यूरोप के शांति सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया.

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साहित्यकार हरिभाऊ उपाध्याय

हरिभाऊ उपाध्याय एक प्रसिद्ध भारतीय साहित्यकार थे. जिनका जन्म 24 मार्च 1892 को मध्य प्रदेश के उज्जैन ज़िले के भौंरोसा नामक गाँव में हुआ था. उनकी साहित्यिक चेतना उनके विद्यार्थी जीवन से ही जाग्रत हो गई थी. वे संस्कृत के नाटकों और अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध उपन्यासों के अध्ययन के बाद उपन्यास लेखन की ओर अग्रसर हुए​​ थे.

हरिभाऊ उपाध्याय ने हिन्दी पत्रकारिता में भी योगदान दिया और 1911 में ‘औदुम्बर’ मासिक पत्र के सम्पादक के रूप में कार्य किया. उनके संपादन में ‘औदुम्बर’ में अनेक विद्वानों के विविध विषयों से सम्बद्ध लेखमाला प्रकाशित हुई, जिससे हिन्दी भाषा की प्रगति हुई. 1915 में, वे महावीर प्रसाद द्विवेदी के सान्निध्य में आए और उन्होंने ‘सरस्वती’, ‘प्रताप’, ‘हिन्दी नवजीवन’ और ‘प्रभा’ पत्रिकाओं के सम्पादन में भी योगदान दिया​​.

हरिभाऊ उपाध्याय ने हिन्दी साहित्य की सेवा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. उन्होंने कई मौलिक रचनाओं के अतिरिक्त जवाहरलाल नेहरू की ‘मेरी कहानी’ और पट्टाभि सीतारमैया द्वारा लिखित ‘कांग्रेस का इतिहास’ का हिन्दी में अनुवाद किया. अनुवाद करने में उन्होंने इस बात का विशेष ध्यान रखा कि पुस्तक की भाषा लेखक की भाषा और उसके व्यक्तित्व के अनुरूप हो.

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अभिनेता इमरान हाशमी

इमरान हाशमी एक भारतीय अभिनेता हैं जो हिंदी सिनेमा में अपने काम के लिए जाने जाते है.24 मार्च 1979 को मुंबई में जन्मे, वह बॉलीवुड के प्रमुख भट्ट परिवार से आते हैं. इमरान ने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत 2003 में विक्रम भट्ट द्वारा निर्देशित फिल्म “फुटपाथ” से की, हालांकि यह बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई. हालाँकि, उन्होंने 2004 में अपनी अगली फिल्म “मर्डर” से महत्वपूर्ण ध्यान और प्रसिद्धि प्राप्त की, जो एक बड़ी व्यावसायिक सफलता थी और उनके कैरियर में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई.

इमरान को विभिन्न शैलियों में उनकी भूमिकाओं के लिए जाना जाता है, खासकर थ्रिलर और नाटकों में. उनकी कुछ उल्लेखनीय फिल्मों में “तुमसा नहीं देखा” (2004), “आशिक बनाया आपने” (2005), “गैंगस्टर” (2006), “आवारापन” (2007), और “जन्नत” (2008) शामिल हैं. उन्हें “शंघाई” (2012) और “हमारी अधूरी कहानी” (2015) जैसी फिल्मों में उनके प्रदर्शन के लिए आलोचनात्मक प्रशंसा मिली. हाल के वर्षों में, वह “चेहरे” (2021), “मुंबई सागा” (2021) जैसी फिल्मों में दिखाई दिए, और 2023 में “सेल्फी” और “टाइगर 3” में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं.

हाशमी की निजी जिंदगी और बैकग्राउंड भी काफी दिलचस्प है. उनका जन्म एक मुस्लिम पिता और एक ईसाई (कैथोलिक) मां से हुआ था और वह फिल्म निर्माता महेश भट्ट के भतीजे होने के कारण भट्ट परिवार से संबंधित हैं. इमरान की शादी 2006 में परवीन शाहनी से हुई है और उनका अयान नाम का एक बेटा है. अपने फिल्मी कैरियर के अलावा, इमरान अपने निजी जीवन के लिए जाने जाते हैं और विभिन्न विवादों और उल्लेखनीय घटनाओं में शामिल रहे हैं. वह एक आत्मकथात्मक पुस्तक “द किस ऑफ लाइफ” के लेखक भी हैं, जिसमें उनके बेटे अयान की कैंसर से लड़ाई का विवरण दिया गया है. उनकी शिक्षा मुंबई के जमनाबाई नरसी स्कूल और सिडेनहैम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स में पूरी हुई है.

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साहित्यकार राधिकारमण प्रसाद सिंह

राधिकारमण प्रसाद सिंह एक  हिंदी साहित्यकार थे, जिनका जन्म 10 सितम्बर, 1890 को बिहार के शाहाबाद जिले में हुआ था. वे द्विवेदी युग के एक प्रसिद्ध कथाकार और उपन्यासकार थे. उनकी आरंभिक शिक्षा घर पर हुई और बाद में उन्होंने आरा ज़िला स्कूल, सेंट जेवियर्स कॉलेज, कलकत्ता और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने 1914 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की.

राधिकारमण प्रसाद सिंह को अंग्रेज सरकार द्वारा ‘राजा’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था और उन्हें सी.आई.ई. की उपाधि भी मिली. वे गांधीवादी विचारधारा के प्रभाव में थे और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे.

उनकी रचनाओं में कहानी संग्रह जैसे ‘कुसुमांजलि’, ‘अपना पराया’, ‘गांधी टोपी’, और ‘धर्मधुरी’ शामिल हैं. उन्होंने उपन्यास ‘राम-रहीम’, ‘पुरुष और नारी’, ‘सूरदास’, ‘संस्कार’, ‘पूरब और पश्चिम’, और ‘चुंबन और चाँटा’ जैसी कृतियाँ भी लिखीं. उनके लघु उपन्यास, नाटक, संस्मरण और गद्यकाव्य भी हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हिस्से हैं.

उनकी सेवाओं के लिए उन्हें ‘पद्मभूषण’ और ‘साहित्यवाचस्पति’ की उपाधि से भी सम्मानित किया गया था. राधिकारमण प्रसाद सिंह का देहांत 24 मार्च, 1971 को हुआ था.

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