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व्यक्ति विशेष

साहित्यकार परमानन्द श्रीवास्तव

परमानन्द श्रीवास्तव एक प्रतिष्ठित हिन्दी साहित्यकार थे, जिनका जन्म 10 फ़रवरी 1935 को गोरखपुर जिले के बाँसगाँव में हुआ था और उनकी मृत्यु 5 नवम्बर 2013 को हुई थी.

उन्होंने गोरखपुर के सेण्ट एण्ड्रूज कॉलेज से अपनी शिक्षा पूरी की और बाद में वहीं पर प्रवक्ता बने. उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय में भी पढ़ाया और वहां हिन्दी विभाग के आचार्य थे. परमानन्द श्रीवास्तव ने हिन्दी साहित्य के विभिन्न शैलियों में योगदान दिया, जिसमें कविता, आलोचना और कहानी शामिल हैं.

उन्होंने ‘आलोचना’ नामक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन भी किया. उनकी कविताएं समकालीन मानवीय संकटों और संवेदनाओं की गहरी पड़ताल करती हैं. उन्हें 2006 में व्यास सम्मान और भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उनके प्रमुख प्रकाशित कृतियों में ‘उजली हँसी के छोर पर’, ‘अगली शताब्दी के बारे में’, ‘चौथा शब्द’, ‘एक अनायक का वृतान्त’ और ‘रुका हुआ समय’ शामिल हैं.

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भूतपूर्व  इसरो अध्यक्ष उडुपी रामचन्द्र राव

उडुपी रामचन्द्र राव एक प्रतिष्ठित भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक थे, जिनका जन्म 10 मार्च 1932 को कर्नाटक के उडुपी जिले में हुआ था. उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक किया, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.एस. की डिग्री प्राप्त की और गुजरात विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की. वे एमआईटी और टेक्सास विश्वविद्यालय, डलास में भी शिक्षण कार्य में संलग्न रहे.

1966 में वापस भारत आकर उन्होंने अहमदाबाद की भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला में काम किया और भारत में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास को बढ़ावा दिया. उनके नेतृत्व में, भारत ने अपने पहले उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ का प्रमोचन किया और कई अन्य उपग्रहों का निर्माण किया. 1984 में वे अंतरिक्ष आयोग के अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग के सचिव बने, जहाँ उन्होंने रॉकेट प्रौद्योगिकी और ध्रुवीय कक्षा उपग्रह प्रमोचन वाहनों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

राव को कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जैसे कि शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार, पद्म भूषण, और पद्म विभूषण। उन्हें अंतरिक्ष और विज्ञान क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए अन्य विश्वस्तरीय सम्मान भी प्राप्त हुएथे. उन्होंने भारत में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास को गति दी और देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई दिशा प्रदान की. उनकी नेतृत्व क्षमता और दृष्टि के चलते भारत ने अंतरिक्ष अनुसंधान में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं। उनकी मृत्यु 24 जुलाई 2017 को बेंगलुरु में हुई थी.

उनके कार्यों और योगदानों की वजह से उन्हें भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कारों से नवाजा गया. उनके सम्मानों में यूरी गगारिन पदक, थियोडोर वॉन कारमन पुरस्कार, और विश्वेश्वरैया पुरस्कार शामिल हैं. इसके अलावा, उन्हें भारत सरकार ने पद्म भूषण और पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया था.

डॉ. उडुपी रामचन्द्र राव का जीवन और कार्य भारतीय विज्ञान और तकनीकी समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत है. उनके अद्वितीय योगदान के लिए वे सदैव याद किए जाएंगे.

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समाज सुधारक लल्लन प्रसाद व्यास

लल्लन प्रसाद व्यास, जो 10 मार्च 1934 को भारत के अवध प्रान्त के बहराइच जनपद में जन्मे थे, एक जाने-माने समाज सुधारक थे.

उनका जीवन मुख्य रूप से आध्यात्मिक प्रकाशन जगत को समर्पित था.1984 में वे नैमिषारण्य के स्वामी नारदानन्द जी के संपर्क में आए और आध्यात्मिक प्रकाशन जगत की प्रमुख हस्ती बन गए.

उन्होंने विश्व रामायण सम्मेलनों के माध्यम से श्री राम के कार्य को विश्व पटल पर पहुंचाने का कार्य किया। व्यास जी ने गायत्री शक्ति पीठ के माध्यम से पहले अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन का आयोजन 27 दिसंबर 1984 को अयोध्या में किया, जिसकी अध्यक्षता पं. रामकिंकर उपाध्याय ने की. लल्लन प्रसाद व्यास का निधन 12 नवंबर 2012 को हुआ.

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राजनीतिज्ञ माधवराव सिंधिया

माधवराव सिंधिया भारतीय राजनीति के प्रमुख व्यक्तित्व थे. वे भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टी, भारतीय जनता कांग्रेस के सदस्य थे. माधवराव सिंधिया का जन्म 10 मार्च 1945 को हुआ था और उनका निधन 30 सितंबर 2001 को एक विमान दुर्घटना में हो गया था.

सिंधिया एक प्रतिष्ठित राजघराने से आते थे; वे ग्वालियर के महाराजा थे. उन्होंने अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत जनसंघ से की थी, लेकिन बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गए. उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों में केंद्रीय मंत्री के रूप में काम किया, जैसे कि रेल मंत्री, नागरिक उड्डयन मंत्री और मानव संसाधन विकास मंत्री.

माधवराव सिंधिया अपने सौम्य और मिलनसार स्वभाव के लिए जाने जाते थे. उन्होंने अपने कार्यकाल में कई सामाजिक और आर्थिक सुधारों की पहल की. उनकी असामयिक मृत्यु ने भारतीय राजनीति में एक बड़ा शून्य छोड़ा. उनके बेटे, ज्योतिरादित्य सिंधिया, भी एक प्रमुख राजनीतिक व्यक्तित्व हैं और वर्तमान में भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं.

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कवि कुमार विश्वास

कुमार विश्वास एक प्रसिद्ध हिंदी कवि, लेखक और मोटिवेशनल स्पीकर हैं. उनका जन्म 10 फ़रवरी 1970 को हुआ था. वे मुख्य रूप से अपनी हिंदी कविताओं और गीतों के लिए जाने जाते हैं जो अक्सर प्रेम, देशभक्ति, और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित होते हैं.

कुमार विश्वास ने अपनी कविताओं के माध्यम से विशेष रूप से युवाओं में एक व्यापक पहचान बनाई है. उनकी कविताएं आमतौर पर जीवन की सरलता और उसके गहरे अर्थों को उजागर करती हैं. उन्हें उनकी कविता ‘कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है’ के लिए विशेष रूप से जाना जाता है, जिसे उन्होंने विभिन्न मंचों पर सुनाया है और जिसे बहुत सराहा गया है.

कुमार विश्वास ने राजनीति में भी कदम रखा है. वे आम आदमी पार्टी (AAP) के सक्रिय सदस्य रहे हैं और 2014 के आम चुनावों में अमेठी से उम्मीदवार भी रहे थे. हालांकि, वे चुनाव नहीं जीत सके थे.

कुमार विश्वास अपने अभिव्यक्तिपूर्ण और आकर्षक व्यक्तित्व के लिए जाने जाते हैं. वे युवाओं के बीच एक प्रेरणास्रोत माने जाते हैं और उन्होंने कई युवा मेलों, कॉलेज फेस्टिवल्स और काव्य संगीत कार्यक्रमों में अपनी कविताओं का पाठ किया है.

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कवि सुदामा पांडेय धूमिल

सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ हिंदी साहित्य के एक प्रसिद्ध कवि थे, जिनका जन्म 9 नवंबर 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ था. उन्होंने हिंदी कविता में एक नया मोड़ लाया, खासकर 1960 -70 के दशक में. धूमिल की कविताएं मुख्य रूप से सामाजिक असमानता, राजनीतिक भ्रष्टाचार, और मानवीय संघर्षों पर केंद्रित होती थीं. उनकी रचनाओं में तीखी आलोचना और गहरा व्यंग्य पाया जाता है, जो समाज के विसंगतियों को उजागर करता है.

धूमिल को उनके जीवनकाल में काफी प्रसिद्धि नहीं मिली, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनके साहित्य की महत्वपूर्णता और उनकी कविताओं की गहराई को व्यापक रूप से सराहा गया. उनकी कुछ प्रमुख कृतियों में ‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’ और ‘धूमिल की कविताएँ’ शामिल हैं. धूमिल की कविताएँ आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं और हिंदी साहित्य में उनका एक विशेष स्थान है.

धूमिल की कविताओं में जनता के प्रति उनकी गहरी संवेदना और व्यवस्था के प्रति उनका असंतोष स्पष्ट रूप से झलकता है. वे अपनी कविताओं में आम आदमी की आवाज बनकर उभरे और अपने लेखन के माध्यम से समाज में जागरूकता और परिवर्तन की दिशा में योगदान दिया. धूमिल की कविताओं में आक्रोश के साथ-साथ एक गहरी दृष्टि भी मिलती है, जो उन्हें हिंदी साहित्य में एक अनूठा स्थान देती है.

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साहित्यकार गुलशेर ख़ाँ शानी

गुलशेर ख़ाँ शानी, जिनका जन्म 16 मई 1933 को जगदलपुर में हुआ था, हिंदी साहित्य में एक प्रसिद्ध कथाकार और उपन्यासकार थे. उन्होंने अपनी लेखनी की शुरुआत जगदलपुर से की और अपने कार्यकाल के दौरान ग्वालियर, भोपाल और दिल्ली में भी रहे. वे ‘मध्‍य प्रदेश साहित्‍य परिषद’, भोपाल के सचिव और ‘साक्षात्कार’ पत्रिका के संस्‍थापक-संपादक रहे. दिल्ली में वे ‘नवभारत टाइम्स’ के सहायक संपादक और साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्‍य’ के संस्‍थापक संपादक भी थे.

शानी के लेखन में उनकी अनूठी भाषा-शैली और समसामयिक विषयों पर उनकी गहरी पकड़ दिखाई देती है. उन्होंने हिंदी साहित्य में नई मान्यताओं को प्रस्तुत करते हुए एक विशिष्ट शैली विकसित की. उनके उपन्यासों और कहानियों में अक्सर समकालीन समाज की जटिलताओं और व्यक्तिगत पीड़ा की गहरी अंतर्दृष्टि मिलती है.

उनके प्रमुख कृतियों में ‘काला जल’, ‘साँप और सीढ़ी’, ‘फूल तोड़ना मना है’, और ‘एक लड़की की डायरी’ जैसे उपन्यास और ‘बबूल की छाँव’, ‘छोटे घेरे का विद्रोह’, ‘एक से मकानों का नगर’, और ‘युद्ध’ जैसे कहानी संग्रह शामिल हैं. उन्होंने अपने पुरस्कृत उपन्यास ‘काला जल’ के माध्यम से हिंदी उपन्यास लेखन में एक नई प्रवृत्ति की शुरुआत की. शानी का लेखन उनके समय की परिस्थितियों को दर्शाता है और हिंदी साहित्य में विषयगत रूढ़ियों से हटकर एक नया स्थान बनाता है.

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कवयित्री सावित्री बाई फुले

 सावित्रीबाई फुले, भारत की पहली महिला शिक्षिका और एक प्रेरणादायक कवयित्री थीं. उनका जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था और उन्होंने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर सामाजिक सुधारों के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए. वे महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और छुआछूत मिटाने के लिए समर्पित रहीं. सावित्रीबाई ने मराठी भाषा में कई प्रेरणात्मक कविताएँ लिखीं, जिनमें से एक बालगीत शिक्षा के महत्व पर बल देता है​​.

सावित्रीबाई की शिक्षा ज्योतिराव द्वारा प्रदान की गई थी और उन्होंने अहमदनगर और पुणे से शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर 18 स्कूलों की स्थापना की और अपनी मित्र फातिमा शेख़ के साथ मिलकर लड़कियों को पढ़ाया. वे पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका मानी जाती हैं​​.

सावित्रीबाई का निधन 10 मार्च 1897 को प्लेग की महामारी के दौरान हुआ, जब वे प्लेग के मरीजों की सेवा कर रही थीं​​. उनका जीवन और कार्य आज भी भारतीय समाज में महिला शिक्षा और सामाजिक सुधार के प्रतीक के रूप में माना जाता है.

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