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व्यक्ति विशेष

भाग - 132.

क्रांतिकारी गोपबन्धु चौधरी

गोपबन्धु चौधरी उड़ीसा के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे. उन्होंने गाँधीजी के द्वारा चलाये गए ‘असहयोग आन्दोलन’ और ‘भूदान आन्दोलन’ में सक्रिय भूमिका निभाई थी. गोपबन्धु चौधरी का जन्म  8 मई 1895 को उड़ीसा के कटक में हुआ था और उनका निधन 29 अप्रैल 1958 को हुआ था.

गोपबन्धु चौधरी ने सत्याग्रहियों के प्रशिक्षण के लिये कटक के निकट ‘अलाका आश्रम’ की स्थापना की और विभिन्न रचनात्मक कार्यों को आगे बढ़ाया. अंग्रेज़ सरकार ने गोपबन्धु चौधरी 1930 में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

गोपबन्धु चौधरी का योगदान न केवल स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित था, बल्कि आजादी के बाद भी उन्होंने समाज सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया. उनके कामों ने सामाजिक सुधार में उल्लेखनीय परिवर्तन लाने में मदद की.

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स्वामी चिन्मयानंद

स्वामी चिन्मयानंद का पूरा नाम स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती था और वे एक हिंदू धार्मिक गुरु और वेदांत के विचारक थे. उनका जन्म 8 मई 1916 में जन्मे थे और उनका निधन 3 अगस्त 1993 को हुआ था. स्वामी चिन्मयानंद ने चिन्मय मिशन की स्थापना की थी, जो वेदांत दर्शन और भगवद गीता के अध्ययन को बढ़ावा देता है.

उन्होंने भारत और विदेशों में वेदांत के शिक्षण के लिए कई आश्रम और शिक्षा केंद्र स्थापित किए. स्वामी चिन्मयानंद ने ध्यान, योग, और वैदिक अध्ययन को लेकर कई पुस्तकें भी लिखीं जिनमें वेदांत के मूल सिद्धांतों को सरल और सुगम बनाने की कोशिश की गई थी. उनका मिशन आज भी उनके शिक्षाओं को दुनिया भर में फैला रहा है.

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इतिहासकार तपन राय चौधरी

तपन राय चौधरी एक भारतीय इतिहासकार थे, जिन्होंने मुख्य रूप से ब्रिटिश भारत के इतिहास पर अपने शोध के लिए व्यापक पहचान प्राप्त की. उनका जन्म 1926 में हुआ था और उनका निधन 2014 में हुआ. उन्होंने खासकर बंगाल के आर्थिक और सामाजिक इतिहास पर केंद्रित अपने कार्यों के लिए विशेष रूप से सराहना प्राप्त की.

राय चौधरी ने “बंगाल डिवीजन, 1905-1911” और “पर्मानेंट सेटलमेंट इन बंगाल” जैसी पुस्तकों के माध्यम से अपनी विद्वता प्रदर्शित की. उनकी शोध नीति और आर्थिक विकास, सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक संघर्षों के बीच संबंधों को उजागर करती है.

उन्होंने अपने अकादमिक कैरियर में कई विश्वविद्यालयों में अध्यापन किया और उनके काम ने इतिहास के अध्ययन में नए आयाम स्थापित किए. उनका काम आज भी भारतीय इतिहास के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ माना जाता है.

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ठुमरी गायिका गिरिजा देवी

गिरिजा देवी एक  भारतीय ठुमरी गायिका थीं, जिन्हें भारतीय क्लासिकल संगीत की बनारस घराने की प्रमुख हस्तियों में गिना जाता है. उनका जन्म 8 मई 1929 को हुआ था और उनका निधन 24 अक्टूबर 2017 को हुआ. गिरिजा देवी ने ठुमरी के अलावा, ख्याल, चैती, कजरी, और होरी जैसी विधाओं में भी गायन किया और इन्हें अपनी विशिष्ट शैली में प्रस्तुत किया.

उनकी गायन शैली में उनके गहरे भावुक स्वर और शास्त्रीय संगीत के प्रति उनकी गहरी समझ झलकती थी. गिरिजा देवी को उनके योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें पद्म श्री, पद्म भूषण, और पद्म विभूषण शामिल हैं. उन्होंने न केवल भारतीय संगीत को समृद्ध किया, बल्कि अनेक युवा कलाकारों को प्रशिक्षित करके इस विधा को आगे बढ़ाने का काम किया.

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राजनीतिज्ञ सत्यब्रत मुखर्जी

सत्यब्रत मुखर्जी एक अनुभवी भारतीय राजनीतिज्ञ हैं जो भारतीय जनता पार्टी  से जुड़े रहे हैं. उन्होंने विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों में मंत्री के रूप में कार्य किया है. मुखर्जी का राजनीतिक कैरियर उनके विशेषज्ञता और विविध पोर्टफोलियो के लिए जाना जाता है, जिसमें विदेश मामलों, रक्षा, और उद्योग जैसे क्षेत्र शामिल हैं.

उनके कार्यकाल में, मुखर्जी ने भारतीय विदेश नीति और वैश्विक मामलों में भारत के दृष्टिकोण को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने अपनी विदेश नीति दृष्टिकोण के तहत अनेक द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया.

सत्यब्रत मुखर्जी की योगदान ने न केवल उनकी पार्टी को बल्कि भारतीय राजनीति को भी प्रभावित किया है, और उन्हें एक प्रभावशाली और सम्मानित नेता के रूप में देखा जाता है.

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बंगाल का नवाब मीर क़ासिम

मीर क़ासिम बंगाल के नवाब थे और उन्होंने 1760 – 63 तक शासन किया. मीर क़ासिम नवाब मीर जाफर के दामाद थे और मीर जाफर के अयोग्य होने पर उन्हें बंगाल के नवाब के रूप में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा स्थापित किया गया था. मीर क़ासिम ने अपने शासनकाल में बंगाल की आर्थिक नीतियों में सुधार करने का प्रयास किया और बंगाल की सैन्य शक्ति को मजबूत करने के लिए काम किया.

हालांकि, मीर क़ासिम और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संबंध जल्द ही खराब हो गए, खासकर जब उन्होंने कंपनी के सैनिकों को दी जाने वाली व्यापार सुविधाओं में कटौती कर दी. यह कदम बंगाल में कंपनी के आर्थिक हितों के खिलाफ था. इससे ब्रिटिश कंपनी के साथ उनके संबंधों में तनाव आ गया, जिसके परिणामस्वरूप बक्सर की लड़ाई (1764) में उनकी पराजय हुई. इस हार ने बंगाल में ब्रिटिश प्रभुत्व को मजबूत कर दिया.

मीर क़ासिम का शासनकाल ब्रिटिश राज के प्रारंभिक विस्तार के दौरान एक महत्वपूर्ण कालखंड माना जाता है और उन्हें एक सक्षम लेकिन अंततः असफल नवाब के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने बंगाल की स्वायत्तता बनाए रखने की कोशिश की लेकिन ब्रिटिश शक्ति के सामने झुकना पड़ा.

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वासुदेव चापेकर

वासुदेव चापेकर जिन्हें वासुदेव हरि चापेकर के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारी थे. वे चापेकर बंधुओं में सबसे प्रमुख थे, जिसमें उनके दो भाई दामोदर और बालकृष्ण भी शामिल थे. इन तीनों भाइयों ने मिलकर 1897 में पुणे में ब्रिटिश अधिकारी वॉल्टर चार्ल्स रैंड की हत्या की थी. रैंड पुणे के प्लेग कमिश्नर थे और उनके क्रूर उपायों ने स्थानीय नागरिकों के बीच बहुत असंतोष उत्पन्न किया था.

इस घटना को गणेश चतुर्थी के दौरान अंजाम दिया गया था, जब रैंड और उनके सहायक लेफ्टिनेंट आयर्स्ट की गाड़ी पर हमला किया गया था. इस हमले में रैंड की मौत हो गई और आयर्स्ट गंभीर रूप से घायल हुए थे. चापेकर बंधुओं को बाद में गिरफ्तार किया गया और वासुदेव के साथ उनके भाई दामोदर को भी फांसी दी गई.

वासुदेव चापेकर का कृत्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रेरणादायक घटना के रूप में देखा जाता है, जिसने कई अन्य क्रांतिकारियों को ब्रिटिश राज के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित किया.

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स्वतंत्रता सेनानी अमीर चन्द

अमीर चन्द भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक क्रांतिकारी थे, जो 1912 में हार्डिंग बम कांड में शामिल थे. यह घटना ब्रिटिश वाइसरॉय लॉर्ड हार्डिंग के ऊपर बम से हमला करने की कोशिश थी, जो दिल्ली में हुई थी. इस हमले का उद्देश्य ब्रिटिश राज के खिलाफ एक मजबूत संदेश भेजना था.

अमीर चन्द को इस हमले के लिए बसंत कुमार विश्वास, अवध बिहारी और बालमुकुंद के साथ मिलकर योजना बनाने और इसे अंजाम देने के आरोप में पकड़ा गया था। इन सभी क्रांतिकारियों को बाद में ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और मुकदमा चलाया गया.

अमीर चन्द को अंततः इस केस में फांसी की सजा सुनाई गई और उन्हें 8 मई 1915 में फांसी दे दी गई. उनकी शहादत ने अन्य क्रांतिकारियों को भी प्रेरित किया और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान आज भी याद किया जाता है.

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मशहूर ध्रुपद गायक ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर

ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर भारतीय शास्त्रीय संगीत के ध्रुपद शैली के एक गायक थे. वह डागर वंश के सदस्य थे, जो अपनी ध्रुपद गायन की परंपरा के लिए प्रसिद्ध है. उनका जन्म 15 जून 1932 को हुआ था और उनका निधन 8 मई 2013 में हुआ.

ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर ने अपने चाचा, उस्ताद ज़िया मोहिउद्दीन डागर के साथ मिलकर ध्रुपद संगीत को नई पहचान दी. वे वोकल और रुद्र वीणा दोनों में माहिर थे, और उनके प्रदर्शन उनकी गहराई, शुद्धता और तकनीकी कुशलता के लिए सराहे जाते थे। उन्होंने अपने संगीत कैरियर में ध्रुपद के प्रचार और शिक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया.

उनकी शैली में ध्यान, आध्यात्मिकता और एक गहरी रागात्मक अनुभूति शामिल थी, जिसने ध्रुपद संगीत के पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखते हुए इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाया. ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर को उनके योगदान के लिए विभिन्न सम्मानों से नवाजा गया और वे ध्रुपद संगीत के सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक प्रतिनिधि माने जाते हैं.

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